Saturday, 4 May 2013

ब्रेख्त की तीन छोटी कविताएँ और मित्र की याद





पिछले साल कुछ समय एक जर्मन मित्र के साथ बिताया जिन्हें इत्तेफ़ाक से कविताओं में भी रूचि है। हमनें तय किया कि हम जब भी मिलें कवितापाठ का कार्यक्रम निर्धारित रहेगा और बाद में कुछ अनुवाद भी, जिसमें एक-दुसरे की सहायता की हमें आवश्यकता होगी। वे टूटी-फूटी हिंदी बोल लेती हैं हालांकि उन्होंने आधी उम्र भारत में ही बिताई है। हम कभी यह तय नहीं कर पाए कि उनकी हिंदी ज़्यादा ख़राब है या मेरी जर्मन। इसके बावजूद हमने अपने प्रयास जारी रखे। इस प्रक्रिया में उन्होंने हिंदी की कई कवितायें पढ़ीं। मंगलेश डबराल जी की तो तीन-चार किताबें जो मेरे पास थीं उन्होंने पढ़ डाली। यह कहना शायद ज़्यादा बेहतर होगा कि मुझे पढ़वा डालीं क्योंकि पाठ मुझे ही करना पड़ता था। कुछ कविताओं के जर्मन में अनुवाद भी किये। हेरमान हेस्से और ब्रेख्त की कवितायें भी चाट डालीं। ब्रेख्त की कवितायें हिंदी में पढ़ने की जाने कौनसी धुन उनपर चढ़ गई कि मुझे ब्रेख्त की अपनी किताब के दर्शन उनके बंगलौर छोड़ने से सिर्फ एक दिन पहले हुए। हेस्से की कविताओं से वे ख़ासी प्रभावित हुईं। मगर रिल्के कि कविताओं पर उनका विश्वास रत्ती भर भी कम नहीं हुआ और उनके अनुसार रिल्के सबसे बड़े कवि हैं। जैसे मैं रिल्के को पढ़ने से डरता हूँ उसी तरह अबतक वे ब्रेख्त को पढ़ने से डरती रहीं। अंतर मात्र इतना कि मेरा डर रिल्के की जर्मन न समझ पाने का रहा है और उनका ब्रेख्त के फ़लसफ़े को।

हमनें तय किया कि अनुवादों की शुरुआत छोटी-छोटी कविताओं से की जाए और धीरे-धीरे लम्बी और अधिक गंभीर कविताओं की ओर मुड़ा जाए। यह सिलसिला ठीक-ठाक चल पड़ा और हमनें कुछ कविताओं के अनुवाद भी किये। लेकिन उन्हें अपने अनुवादों पर कतई विश्वास नहीं रहा और यह अविश्वास अंत तक चलता रहा। मेरी हर नकारात्मक प्रतिक्रिया इस विश्वास को बढ़ाती ही गई। यही वजह है कि उनके द्वारा अनुवादित मंगलेश डबराल, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचल और सर्वेश्वर दयाल शर्मा की कोई भी कविता मेरे पास नहीं है। उन्होंने कभी ड्राफ्ट्स को फाइनल किया ही नहीं।

दूसरी ओर मेरे अनुवादों के प्रयास के प्रति वे गम्भीर थीं और उसमें पूरा सहयोग देने की कोशिश भी उन्होंने की। यहाँ भी उनके मूड और मेरे समय की कमी के चलते हम बहुत आगे नहीं बढ़ पाए। इस बीच वे अपने तलाक़ और उसके बाद के नए-नए हार्ट-ब्रेक से भी जूझ रही थीं जिसके बीच में अनुवाद की गुंजाइश बहुत ज़्यादा नहीं बन पाई। इस सबके बीच उन्होंने अचानक बंगलौर छोड़ देने का मन बना लिया। मन बनाने से लेकर बंगलौर छोड़ने के दौरान कविताएँ पीछे छूट गयीं और आगे की प्लानिंग ने वरीयता ले ली। हमारी कोई बैठक फिर नहीं हुई।

इस बात को तकरीबन पाँच महीने बीत चुके हैं। इस बीच मैं सोचता रहा कि चुनिन्दा लम्बी कविताओं के अनुवाद का काम आगे बढ़ाऊंगा लेकिन अपने को हमेशा असमर्थ पाया। हर कोशिश हमारी बैठकों को याद करते हुए रुक गई। इस बीच जो भी कुछ अनुवाद करके रखा था उसके बारे में बिल्कुल भूल गया। कल अचानक नज़र पड़ी और आज ब्रेख्त की तीन छोटी-छोटी कविताएँ पोस्ट कर रहा हूँ।



समाधिलेख (१९१९)*

वह लाल गुलाब लापता है अब तक
कोई नहीं जानता कहाँ होगी वह देह

जब वह ग़रीबों को बता रही थी सच
अमीरों ने खदेड़ा उसे दुनिया से।

*Grabschrift नाम की यह कविता संभवतः रोज़ा लुक्ज़म्बुर्ग के लिए लिखी गई थी। १९१९ उनकी ह्त्या का वर्ष था। इस कविता का दूसरा कोई सन्दर्भ मुझे समझ में नहीं आया।



टूटी रस्सी

टूटी रस्सी को जोड़ा जा सकता है
एक गाँठ से
जुड़ तो जाएगी
लेकिन रह जाएगी जीर्ण ही

हो सकता है हम मिलें
एक बार फिर
मगर वहाँ
जहाँ तुम मुझे छोड़कर चली गईं थीं
नहीं मिलोगी वहीँ दोबारा।



धुआं

ताल किनारे
पेड़ों के झुरमुट के नीचे
छोटा सा घर
छत से तिरता धुआं
कितने सूने लगते

घर, पेड़ और ताल
उसके बिना।