Sunday, 13 December 2009

शराब और शराब

पिछला पूरा महीना शराब और शराबियों की संगत में कटा है और अक्सर शराब सेरिब्रल कोर्टेक्स तक ही पहुंची मगर कई बार भेजे में हिप्पोकाम्पस तक भी पहुंची और ऐसे हर मौके पर हर अभ्यस्त शराबी की तरह मैं भी खूब भावुक हुआ मगर अनुभव से ऐसे मौकों पर अंतर्मुखी होना सीख लिया है। इस बार इतना और किया कि ऐसे हर अवसर पर शराब के बारे में एक-एक लाइन जोड़ता रहा। ज़्यादा गंभीरता से लेने की हिदायत और जोड़ रहा हूँ इस बकवाद के साथ।


मास्टर अथर्व मेरी बोतल के साथ




-१-

शराबी हंसता है

शराबी रोता है

शराबी घिरा रहता है अवसाद में।



-२-

शीरीं छोड़ जाती है फ़रहाद को

लैला मजनूं को


शराब नहीं छोड़ती शराबी को

शराब ही सच्ची प्रेमिका है

जहान भर में



-३-

जाम भरता है

हलक़ में उतरती है शराब

शराबी देखता है अपने में भरता खालीपन



-४-

शराब पीकर मरता है शराबी

दूसरा शराबी ढूंढ लेती है शराब


शराब के लिये यकसां है सारे शराबी

Sunday, 15 November 2009

दूसरा प्यार

दूसरे प्यार में नहीं लिखी जाती
पहली अर्थहीन प्रेम-कविता
पहला थरथराता चुंबन
नहीं लेता कोई दूसरे प्यार में
दूसरे प्यार के बारे में
नहीं लिखता कोई अभिज्ञान
और ना ही होता है शिला-लेखों में उसका वर्णन

दूसरा प्यार नहीं रखा जाता छुपाकर
बटुए की चोर-जेब में
क्या तुमने सुनी है
कोई किंवदन्ति दूसरे प्यार के बारे में
या किसी राजकुमारी की कहानी
जिसे मिला हो दूसरा राजकुमार

दूसरे प्यार के बीच
होता है महा-राशि जल
और एक टूटा हुआ पुल
पहले प्यार की तरह
दूसरे प्यार में
नहीं होती ऐसी सड़क
जिसके दूसरे छोर पर कोई न हो

वास्तव में
दूसरे प्यार तक हो जाते हैं हम इतने व्यावहारिक
कि संभलकर चलते हैं सारे दांव
और दूसरा प्यार बना देता है हमें इतना बनिया
कि मुनाफ़ाखोर हो जाता है प्रेम

दूसरे प्यार का ढ़ोंग सिर्फ़ वो करते हैं
जो बार-बार पड़कर प्यार में
खो देते हैं उसका अर्थ
या वो बेचारे जिन्हे
मिला ही नहीं होता पहला प्यार

Wednesday, 28 October 2009

चुप्पी की कोई तो वजह होगी

नाड़ा देखा है? उसके के दो सिरे होते हैं; एक ओर से खींचो तो दूसरी ओर से छोटा हो जाता है। अपनी हालत पस्त है और कुछ नाड़े जैसी भी। शायद उससे भी ज़्यादा पस्त। मैं अपने को कई सिरों से खींचने की कोशिश करता रहता हूँ और जो सिरा छोड़ता हूँ वो सिकुड़ जाता है। कभी पढ़ने लगता हूँ तो पढ़ता ही रह जाता हूँ बाक़ी सारे काम बंद हो जाते हैं। फिर फिल्मों का नंबर आता है तो बाकी सब रुक जाता है। यह भी भूल जाता हूँ कि आखिरी किताब जो पढ़ी थी उसमें क्या था। यह क्रम चलता रहता है - किताबें, फिल्में, नाटक, कवितायें, ब्लॉग, संगीत, काम, परिवार। क्रम चलता रहता है और टूटता रहता है।

भाई कहा करते थे, एक ही काम करो और उससे चिपके रहो। मुझसे कभी नहीं हुआ और आज भी नहीं होता। किसी भी काम में मन अचानक रमने लगता है। इस आदत का भी मानसिक बीमारी में कोई नाम ज़रूर होगा या शायद बच्चों की तरह अपनी आदत कुछ ऎसी है कई हर नई चीज़ देखकर मचल जाते हैं। भाई यह भी कहा करते थे कि मुझमें किसी काम को लेकर गंभीर होने की आदत नहीं है। इस मामले में उनकी बात सोलह आने सही थी। आज भी अपनी यह आदत बरक़रार है। पिछले दिनों दो हफ्ते छुट्टी लेकर babysitting कर रहा था। दो-तीन दिनों में ही मुझे इस काम में मज़ा आने लगा और जल्दी ही अपने बेटे की आदतों के बारे में बहुत कुछ समझने भी लगा। यहाँ तक कि कुछ ही दिनों में मैंने रात भर जागने की उसकी आदत भी ख़त्म कर दी। अब बाप-बेटे आराम से आठ बजे तक सोते हैं।

काफ़ी वक़्त से उठापटक चल रही है कि केरल में कहीं छोटे से कसबे में ज़मीन लेकर बस जाऊं या कम से कम रिटायर होकर रहने का इन्तेजाम कर लूँ। नासा वाले तो पहले ही दावा कर चुके हैं कि उत्तर भारत में जलस्तर ज़मीन में खतरनाक स्तर तक नीचे जा चुका है। इस अवधारणा पर मेरा वैसे भी पूरा विश्वास है कि तेल से पहले पानी ख़त्म होने वाला है। जाने ऐसा क्यों लगता है इसकी शुरुआत भारत से ही होगी। वैसे स्पेन तो पिछले कुछ सालों से पानी खरीद ही रहा है। इधर चेन्नई में भी पानी खरीदना ही पड़ता है मगर उसपर तो अभी सरकार सब्सिडी देती है। उत्तर भारत में मानसून अब काफ़ी कम हो चुका है। दिल्ली में तो मैंने ठीक से बारिश होते हुए कब से नहीं देखी। शायद लोग समझते नहीं कि अपना देश मानसून से बना हुआ देश है। दक्षिण इस मामले में खुशनसीब है। केरल में तो आधा साल बारिश ही होती रहती है। मुझे अपने आसपास बहुत सारे पेड़ चाहिए जो केरल में हैं ही। कुछ दिन सिर्फ़ इस बारे में ही पता करने में निकल गए। फ़िर एक दिन अचानक जैकी चान की फिल्में देखनी शुरू कीं तो तमाम फिल्में देख डालीं। पिछले कुछ दिनों से पब में बैठकर बीयर पीने का चस्का चढ़ा है। आजकल यह सिलसिला बदस्तूर जारी है मगर कमबख्त आदत किसी चीज़ की नहीं पड़ती। जो काम आज शुरू किया कल वो बंद होना ही है।

ब्लोगिंग में कम से कम दोस्त लोग आते जाते लापता रहने का सबब पूछ जाते हैं मगर मैंने देखा है कि बाक़ी हर महफ़िल में अपना आना-जाना unnoticed ही चला जाता है इसीलिए पढने-लिखने वालों के बीच हो या फिल्में देखने वालों के बीच, अपन चुप पाये जाते हैं। एक बार एन एस डी का एक नाटक देखकर मै और मेरा एक मित्र बाहर आए। नाटक पर बात चल रही थी कि एक बुजुर्ग हमारे पास आए। वे मुझसे बातें करने लगे मगर जब विषय घूमकर नाटक पर पहुँचा तो वे मेरे मित्र से मुखातिब हो गए। मैंने बस पकड़ी और घर आ गया। तो मैंने सोचा आदमी का एक सिर होता है इसलिए सिरा भी एक होना चाहिए; हरफनमौला सिर्फ़ किताबों के नायक होते हैं मगर मेरे नाड़े के आज भी कई सिरे हैं। ब्लोगिंग भी उनमें से एक सिरा है। काफी दिनों से बाकी सिरों की गांठें सुलझाने में उलझा हुआ हूँ इसलिए ब्लोगिंग छूटी हुई है। फ़िर अपन न तो प्योर साहित्यकार हैं न रोज़ विषयों का जुगाड़ कर सकने की कुव्वत अपने में है। अपन उस किस्म के जानवर हैं जो अपने अंधेरे बिल में बैठकर जो पसंद हो वो करते हैं। ऐसे जानवरों को क्या कहते होंगे भला?

Wednesday, 27 May 2009

दीवार के उस पार

सँझा की बेला थी कल
कोई यूँ आ खडा हुआ देहरी पर
कि झट तुम्हारी याद से भीग गया मैं

विलंबित होता है तो खुद ही चला आता है
तुम्हारे बारे में सोचना और
कितना अप्रत्याशित होता है तुम्हें याद करना
मसलन पार्क की बेंच पर बैठे
गली के जवान होते बच्चे
मुझे देख अचकचाकर छुड़ा लेते हैं
एक दूसरे से हाथ
मुझे ध्यान हो आते हैं बीतते साल
और इन सालों में तुम्हारी अनुपस्थिति

तुम्हारे बारे में सोचना ऐसा होता है ज्यूँ
सांस के बारे में सोचते ही हमें महसूस होता है
छाती का उठना-गिरना और हम पाते हैं
इस बीच चलती रही है हमारी सांस

यूँ भी हुआ है कि घर की गैरज़रूरी चीज़ों में
तुम्हें पाया है मौजूद
और उन्हें दे दिया गया है ज़रूरी करार
कभी पुराने कुरते की जेब से निकल आया है
मेरा तुम्हारा एक पूरा प्रहसन भी

गर्मियों की विचलित करती शामों को
सुब्बुलक्ष्मी के गायन के बीच
तुम्हारे पसीने से उठने लगती थी महक
जिन सुदूर कोनों तक जाता था गायन
जहाँ जहाँ पहुँच पाती थी महक
उस परिधि में जड़ हो जाती थी हमारी उपस्थिति
आओ देखो, तुम पाओगी मुझे वे कोने टटोलते

अब सुब्बुलक्ष्मी को सुनना
उनके गायन का आस्वादन भर नहीं रह गया है
बल्कि तुम्हें खोजने का प्रयास बन चुका है

गोपनीय जो है तुम्हारा मेरा, उसमें भी
सेंध चुपके से मार लेती है नियति कभी

Wednesday, 13 May 2009

ग़ाफ़िल कब करेगा दुनिया की सैर?

मैं और मेरे एक मित्र ३,५०० मीटर की ऊंचाई पर चोपता में।

बचपन में बुनी गयीं फंतासियाँ लंबे समय तक साथ रहती हैं या शायद हमेशा। जब अनुभव का दायरा छोटा होता है तो कल्पना का क्षेत्र असीमित होता है। कलाकार बचपन में जो कल्पनाएँ करता है ज़िन्दगी भर उसके इर्द-गिर्द रचता-बुनता है। मगर जो कलाकार नहीं होते वे? मुझे लगता है किसी भी आदमी के बचपन की फंतासियाँ उसके घर और उस घर में मौजूद सामान में ढूंढी जा सकती हैं। नहीं तो उसके अव्यवस्थित जीवन में उन फंतासियों के अवशेष तो मिल ही जायेंगे।

घर में सबसे छोटा प्राणी होने के नाते मेरा अपना निर्बाध संसार था जो बड़ों की अपनी व्यस्तताओं के चलते उनकी दखलंदाजी से परोक्ष-अपरोक्ष रूप से बचा रहता था। दो कमरों के छोटे से घर में और बाद में उससे बड़े घर में भी मेरे लिए अपना एक कोना ढूंढ लेना बेहद आसान होता था। आँगन में पड़ोसी की खिड़की के नीचे गज भर फर्श पर अपना पूरा का पूरा ब्रह्माण्ड बसा लेने में कोई मुश्किल नहीं होती थी। दीवाली और दशहरे के बीच जो मेरा हर साल बीमार होने का कर्म था, वह मेरे लिए खिलौना कार पाने का सबब भी था और इसीलिये सालाना बीमारी से मुझे कभी गुरेज़ नहीं हुआ। उन कारों में मैंने दुनिया के वो सुदूर देश छू डाले, जो अब भी देखे जाने बाकी हैं। शायद कभी वो कोने भी देख पाऊँ।

दुनिया घूमने के सपनों को हवा दी किताबों ने। मिडिल में एक किताब हुआ करती थी - देश और उनके निवासी। हिन्दी और अंग्रेजी के बाद यही किताब मैं उठाता था। अर्जेंटीना के बारे में पहली बार इसी किताब से पता चला। वहां बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती होती है। नीले फूलों वाली फ्रॉक पहनने वाली अलीशिया नाम की उस लड़की को भी नहीं भूला जो किताब के अनुसार टमाटर उगाने वाले किसान की मेरी हमउम्र बेटी थी और खाली वक़्त में अक्सर खेतों में जाया करती थी। खेतों में वक़्त गुजारना मुझ जैसे शहर में पल रहे बच्चे के लिए किसी घटना से कम नहीं था। अलीशिया के बारे में पढ़ते हुए मैं बार-बार उससे रश्क करता था और मैंने निश्चय किया था कि बड़ा होकर टमाटर की खेती करूँगा। आज इस बात पर हंसा जा सकता है मगर बच्चों के लिए यह विचार कितना उत्तेजक हो सकता है यह मुझे अभी भी याद है।

बड़े भाई की कृपा से मुझे कभी कामिक्स पढ़ने-खरीदने की छूट नहीं रही, मगर छुपकर मैंने डायमंड कामिक्स, मधु मुस्कान, लोटपोट, नंदन, चम्पक वगैरह सभी कुछ पढ़ा। उस समय मेरी जोरों से इच्छा होती थी डायमंड कामिक्स में जैसी जगहें दिखाई जाती हैं, वैसी जगहों में काश हम सचमुच रह सकते। घर में धार्मिक-पौराणिक विषयों पर कई किताबें थीं। हनुमान हमेशा अपनी असीमित शक्तियों और हास्यास्पद हरकतों के चलते मेरे पसंदीदा कैरेक्टर रहे। उनपर एक किताब घर में मौजूद थी जिसमें आदि से अंत तक उनकी पूरी कहानी थी। वह किताब मैंने अनेकानेक बार पढ़ी। कृष्ण पर भी दो किताबों का एक सेट था, जिसमें एक ओर तस्वीरें होती थीं और दूसरी ओर कहानी। उस किताब पर तेल के बहुत सारे निशान थे, मतलब कि उसे कई बार पढ़ा गया होगा। मगर मुझे कभी पता नहीं चला कि उसे कौन पढ़ता था। तेल में सनी किताब मेरे लिए उसमें लिखे शब्दों का सार्वभौमिक सत्य होने का प्रतीक था। घर में धार्मिक माहौल के कारण उपजा यह सहज विश्वास था। वह किताब मैंने हजारों बार पढ़ी। कई बार स्कूल की दो महीने की गर्मियों की छुट्टियों में मैं रोज़ वह किताब पढ़ता था और उसका इतना प्रभाव मुझपर था कि मैं उसी युग में पैदा होना चाहता था, कहीं भी मथुरा-वृन्दावन के आसपास। किताब के दूसरे हिस्से में कृष्ण वृन्दावन छोड़कर चले जाते हैं। इस भाग में वे जगह-जगह जाते हैं मगर यह भाग मुझे ख़ास पसंद नहीं था। इसे पढ़कर मैं उदास महसूस करता था और सोचता था कि कैसे कोई अपने मित्र-परिजनों को छोड़कर हमेशा के लिए जा सकता है? फ़िर चाहे इसके एवज में दुनिया घूमने को मिले। मेरे लिए दुनिया घूमने का मतलब वापस अपने घोसले में लौटना होता था। जैसे कि रसूल हमज़ातोव कहते हैं, "हाँ, मुझे बड़े शहरों में पैदल घूमना पसंद है। मगर पाँच-छः लम्बी सैरों के बाद शहर जाना-पहचाना सा महसूस होने लगता है और वहां लगातार घूमते रहने की इच्छा जाती रहती है। मगर अपने गाँव की छोटी सी सड़क पर मैं हजारवीं बार जा रहा हूँ, लेकिन मन नहीं भरा, उसपर जाने की इच्छा का अंत नहीं हुआ।"
"दागिस्तान मेरा चूल्हा है, मेरा पालना है।"
कुछ ऐसा ही मगर दुनिया देखने की इच्छा वक़्त और किताबों के साथ ज़ोर पकड़ती गई। बचपन में किसी किताब या पत्रिका में एक लंबा संस्मरण पढ़ा था जिसमें लेखक के दादा उसे और उसके हमउम्र बच्चों को बीसवीं सदी के आरम्भ में अपने अफ्रीका के जंगलों में किए गए शिकार-अभियानों के बारे में बताते हैं। वह और उस जैसे अनगिनत किस्सों में एक तरह की स्वच्छंदता थी जिसका मेरे घर से स्कूल और स्कूल से घर वाले रूटीन में घोर अभाव था और इसीलिए मेरे हवाई किले और भी ऊंचे होते जाते। मैं अफ्रीका के जंगलों में घोड़े दौड़ते हुए जंगली सूअरों के शिकार के सपने देखा करता। अफ्रीका के जंगल ही नहीं, मैं दुनिया का एक-एक कोना देखना चाहता था और एक-एक आदमी से मिलना चाहता था, हर एक घर में कम से कम एक बार खाना खाना चाहता।

कभी गाँव या कहीं और जा रहे होते तो रात में छोटे कस्बों की नियोन में पीली पड़ी खाली सड़कें और उनपर इक्का-दुक्का घूमते लोग मुझे खासे इन्वाईटिंग लगते। मुझे लगता यह सारा जाल मेरे लिए ही बुना गया है। जब मैं इस जगह से निकल जाऊंगा तो न तो यह जगह मौजूद होगी और न ही ये लोग। यह सिर्फ़ एक इंद्रजाल है जो मेरी घुमंतू इच्छाओं की पूर्ति के लिए गढा गया है।

गाँव में एक बार मैं माँ और पिताजी के साथ ननिहाल गया था। मेरा ननिहाल निकटतम सड़क से घंटे भर की पैदल चढाई पर है इसलिए आने जाने में काफ़ी वक़्त लगता था। उस समय में लगभग पाँच साल का रहा होऊंगा। अपनी नानी से मुझे सिर्फ़ इसी मुलाकात की याद है। वहां से जब शाम को हम वापस लौटे तो सड़क तक पहुँचते पहुँचते ही अँधेरा हो गया और उन दिनों रात को बसें नहीं मिला करती थीं। हम न वापस लौट सकते थे और न घर पहुँच पाने की स्थिति में थे। पिताजी ने एक ट्रक की शरण ली और हम किसी तरह घर पहुंचे। मेरे लिए वह आधे घंटे का सफर मुझे अगले कई दिनों तक हांट करने के लिए पर्याप्त था। ट्रक ड्राइवरों के बारे में पूछ-पूछकर मैं माँ का सिर खा गया था। ड्राइवर के पीछे का छोटा सा केबिन तो मुझे खासा अपीलिंग लगा। मुझे लगा दुनिया घूमनी है तो ट्रक चलाने से बेहतर कोई काम नहीं हो सकता। अपनी मर्जी के मालिक, नई नई जगहें घूमो और जहाँ जब मन करे रुको-बढो। बाद में टी वी पर किसी अंग्रेजी फ़िल्म में रीक्रिएश्नल वहीकल देखकर मेरा इरादा और बलवती हो गया। चलता-फिरता छोटा सा घर। इस तरह मैं घर में रहते हुए भी मनचाही जगह घूम सकता था।

कुछ बड़ा होने पर पड़ोसियों की कृपा से रीडर्स डाईजेस्ट पढने का सौभाग्य बार-बार मिलने लगा। उसमें माई ची मिन की एक कहानी थी मंचूरिया के चरागाहों में रहने वाले एक बालक और मंगोल राजवंश की एक खानाबदोश लड़की की। यह कहानी मुझपर बड़े लंबे अरसे तक हावी रही। मेरे लिए मीलों लंबे-चौड़े चारागाह और उनपर सरपट घोड़े दौड़ाना ही ज़िन्दगी जीने का आदर्श तरीका हो गया। दिन-रात मैं तरकीबें भिड़ाने लगा कि किसी तरह मंगोलिया भाग जाऊं, मगर कत्यूर से आगे जाने का जुगाड़ आजतक नहीं हो पाया। आज भी मुझे एस्कीमो और मंगोल खानाबदोशों की जीवनशैली बेहद आकर्षित करती है। कहानी पढ़ने के पाँच-छः साल बाद मैंने उस कहानी की अधूरी प्रति ढूंढ निकाली और अभी तक सहेज कर रखी है। आगे गोर्की और राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथाएं और अनुभव पढ़कर समझ आया कि जीने का यह ढंग कितना घटनाप्रधान और कच्चे दिमाग के लिए कितना उपजाऊ हो सकता है। जर्मन सीखने के पीछे एक हद तक राहुल सांकृत्यायन की बहुभाषी प्रतिभा का हाथ था। उनकी जीवनी पढ़ने के बाद मैंने तिब्बत और कालिंगपोंग अपने घूमने की सूची में जोड़ लिए।

पिछले कुछ दिनों से चे की मोटरसाइकिल डायरीज़ पढ़ रहा था। अब बचपन के बुने हवाई किले रेत के साबित हो रहे हैं। हाल कुछ यूँ है कि बंगलौर से निकलना भी मुश्किल होता जा रहा है, मंगोलिया और तिब्बत तो फिर बहुत दूर हैं इसलिए मोटरसाइकिल डायरीज़ मुझे उस तरह से चमत्कृत न करके दूसरी तरह से परेशान कर रही थी। कॉलेज में एक जाट मित्र था, ठीक पैसे वाला था। हम दोनों के पास यामाहा आर एक्स 100 हुआ करती थी और अक्सर मनसूबे बांधे जाते कि मोटरसाइकिल पर दुनिया घूमी जाए मगर उसे तेल पिलाने की कुव्वत दोनों में से किसी की नहीं होती थी। कॉलेज ख़त्म होने से पहले हमने वचन बाँधा कि तीस पर पहुँचते-पहुँचते मोटरसाइकिल पर भारत दर्शन करेंगे। तब जोश था, पैसे नहीं थे। जब पैसे हुए तो जोश ख़त्म हो गया। भारत दर्शन लायक पैसे हुए तो संपर्क ही टूट गया और अगर संपर्क होता भी तो क्या वक़्त निकल पाता? शायद हममें से कोई वक़्त का बहाना बनाकर मन ही मन इस विचार को बचकाना कहकर खारिज कर देता। हर उम्र की अपनी मांग होती है और उस मांग को उसी उम्र में पूरा कर लेना चाहिए ऐसा मेरा मानना है। नहीं तो कुछ यूँ हो कि बचपन जैसी उत्तेजना इस उम्र में भी महसूस हो, कुछ यूँ कि सारे काम ताक पर रखकर कहीं निकल पड़ें। जाट का तो कह नहीं सकता मगर मोटरसाइकिल पर घूमने के विचार को मैं चाहे खारिज कर दूँ, नई-नई जगहें और दुनिया घूमना मेरे लिए आज भी उतना ही आनंददायक है जितना बचपन में था।

Friday, 13 March 2009

नोस्टाल्जिया का नशा

कभी किसी नये रास्ते से गुज़रते हुए पुरानी सी महक नासापुटों में पैठती है तो आदमी वहां पहुँच जाता है जहाँ से वह बहुत पहले गुज़र चुका है। एक छोटी सी तान से अकसर सालों का फासला तय करके वही क्षण वापस आ खडा होता है जिसे भुला दिया गया था या जिसे हम डायरी के पुराने पन्ने पर धूल फांकने के लिए छोड़ आये थे। बीते ज़माने में दोस्तों की टांगों का तकिया बनाकर नीमनशे में बुझती आखों के लैंपपोस्ट से पढ़ी कोई कविता दोबारा नज़रों के सामने गुज़र जाए तो यकायक वो भूले नाम दिमाग में धींगामुश्ती करने लगते हैं, जिनका इन बीच के सालों में कोई ज़िक्र ही नहीं उठा। कभी यूँ भी होता है कि इत्र या डेओ की महक से बरबस कोई याद आ जाता है जिसे भुलाना अपने आप में ताजमहल खड़ा कर लेने से कम नहीं रहा होगा। और तो और एक पुराना इश्तेहार अगर बजने लगता है तो अपने साथ जाने कितने वाकये ज़िन्दा कर देता है या रसोई में दाल में लगा तड़का भी लंबा सफर तय करा लाता है कई बार।

नोस्टाल्जिया कई तरह का होता है। याद के कई दरवाज़े होते हैं और याद कई सूत्रों से जुड़ी होती होगी, तभी तो कभी कभी बेतार की तार से कुछ अप्रत्याशित याद आ जाता है। जैसे मेरे साथ तो कुछ यूँ है कि कभी-कभी खड़ी कटी हुई मूली देखकर मुझे बचपन के सर्दियों के दिन या आ जाते हैं जब मैं अपने दिल्ली के घर के बगीचे से ताज़ी मूली खोदकर दाल-चावल के साथ घर की देहरी में बैठकर बड़े चाव से खाता था। कई बार कोशिश की मगर वह समां रिवाइव नहीं हो पाया। सुबह सुबह की हवा की ताज़गी और महक झट उन दिनों में पंहुचा देती है जब गर्मियों की सुबह उठकर ६-७ किलोमीटर फुटबाल स्टेडियम तक फुटबाल खेलते हुए जाया करते थे या उन दिनों की जब दिल्ली की सड़कें कमोबेश खाली हुआ करती थीं और सुबह सुबह डी टी सी की बसों से दोस्त के साथ मिलकर रेसिंग साइकिल पर होड़ लगाया करता था। अस्बसटस की छत वाली इमारतें देखकर कालोनी का म्युनिसिपलिटी का वो स्कूल याद आता है जहाँ टाट-पट्टी पर बैठकर दुनियादारी के पहले सबक लिए थे। वो स्कूल आज भी वहीं खड़ा है और जब मौका लगता है दिल्ली जाकर देख आता हूँ मगर सरकार ने व्यापार करने से क्या हाथ झाडे, वो सरकारी कालोनी ही गिरा दी गई जहाँ बीस-बाईस साल गुजारे। सालों इस्तेमाल न किए गए रबर के छोटे से पुर्जे की महक से पिताजी की पहली और अब तक की आखरी फिएट के अन्दर की रबरी आबो-हवा याद आ जाती है जो इस पीढी की कारों में कतिपय ही उपलब्ध है।


नोस्टाल्जिया कैसा भी हो सकता है, किसी भी चीज़ का, किसी भी बात का या किसी भी बात से। मसलन कतार से खड़े नारियल के पेड़ देखकर केरल में बिताये दिन याद आते हैं और हरियाले झुरमुट को देखकर गाँव की याद आती है। यह तो फ़िर भी तार्किक लगता है, मेरी श्रीमती को तो बारिश के बरसने से दिल्ली में माँ के हाथ के बने पकोडे तक याद आते हैं। नोस्टाल्जिया का कोई सर-पैर होना कतई ज़रूरी नहीं। ये बेबात की बात मुझे युहीं नहीं सूझी। हुआ कुछ यूँ कि कुछ सालों से चली आ रही परम्परा को तोड़ते हुए मैंने दो हफ्ते पहले बीयर की कैन लेने की बजाय बोतल ले ली। बचपन में जब पिताजी बीयर पीते थे तो उस दौर में बोतल ही मिला करती थी। पिताजी बीयर को कांच के गिलास में उड़ेला करते थे। गिलास की तली और दीवारों से फुदककर तैरकर ऊपर जाते और अंततः हवा में विलीन होते हवा के बुलबुले मुझे बाँध लेते। किताबें परे सरकाकर मैं देर तक वो प्रक्रिया देखता रहता था। मद्धम पीले रंग में मुझे दो चीज़ें बेहद पसंद रही हैं। एक तो बीयर का रंग और दूसरा माकूल लैंप शेड के बल्ब की पीली रौशनी। दोनों का नशा पुरजोर होता है। ऐसी ही मद्धम पीली रौशनी में देखे पहले पहला नाटक "रक्त-कल्याण" का वातावरण भी शायद इसी वजह से नहीं भूलता। खैर, मुझे लगता है कि बीयर से मेरी मुहब्बत का आगाज़ भी उसी किसी वक़्त हुआ होगा पिताजी के गिलास में बीयर देखकर। गौना होने में ज़रूर कुछ साल लग गए। जब कायदे से घर पर बैठकर बीयर पीनी शुरू की तो सबसे पहले एक बोन चाइना का बीयर मग लाया। पारदर्शिता के अभाव में उससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले तो उसे विस्थापित करने के लिए कांच के दो बीयर मग आ गए, जो आज तक चल रहे हैं। बीयर को गिलास में देखकर जो सुरूर होता था वह उसे पीकर कभी नहीं हुआ। फ़िर धीरे धीरे बोतल की जगह कैन ने ले ली और सुरूर सिर्फ़ पीने तक सीमित हो गया। कैन बोतल से इसलिए जीत गई क्योंकि मुझे एक बार में 650ml बीयर पीना पसंद नहीं और बोतल में यह स्वतंत्रता नहीं रहती। दो हफ्ते पहले अचानक सोचा कि यु बी एक्सपोर्ट पी जाए। यह बीयर अक्सर सिर्फ़ बोतल में ही उपलब्ध होती है और इसके कैन मिलना मुश्किल होता है। साथ ही किंगफिशर की नई किंगफिशर ब्लू भी ले आया। नीले को मादकता का पर्याय माना गया है। सोचा कि देखें नीली बीयर मादकता पैदा कर पाती है या नहीं। मेरी मत कहाँ गई थी जो सोच बैठा कि किंगफिशर ब्लू नीली होगी। वह तो पीली ही निकली। खैर, जब बीयर मग में उड़ेली तो उसमें से उठते हुए बुलबुले देखकर मैं बेतरह नोस्टालजिक हो गया। पिताजी की बीयर से लेकर अपनी सैंडपाईपर और कार्ल्सबर्ग तक सब याद आ गया। मोहल्ला गुंजायमान कर देने वाले दोस्तों के बीयर-दारु-प्रदत्त ठहाके भी याद आ गए। अफ़सोस ये सब ऐसे वक़्त में हो रहा है जब मैं बीयर की अपनी डोज़ द्विसाप्ताहिक कर चुका हूँ और उसपर भी भारी राशनिंग लगा चुका हूँ।

Wednesday, 11 February 2009

संशय के बाद

अपने डर को छुपाकर उसे
लिखने थे प्रेमगीत
किसी को दिखानी नहीं थीं
अपनी कंपकंपाती उँगलियाँ
और उन उँगलियों के बीच
उलझा संशय
उसकी आत्मा अब भी गीली थी
प्रेम और उसके इतिहास की भाप में
उसे प्रेम के दुश्चक्रों से बाहर निकलना था
खुद को दिए दिए फिरना कुछ भी हो
उसे इनकार हो चला था
उसके प्यार हो पाने से
जिन्होंने गढा था यह फिकरा
उनके लिए कोई जगह नहीं थी
उसकी कविता में
यही उसका प्रतिशोध था
उसने ठान लिया था
अपने निरुद्देश्य प्रेम की तरह उसे
नहीं लिखनी थी निरुद्देश्य कवितायें

Friday, 30 January 2009

मुझपे तेरे ये भरम जाने कितने झूठे होंगे

एक बार फिर देखा; वही पुरानी तस्वीरें, वही उलझी सी लिखावट वाले सलीके से तह किये हुए पत्र। वही लापरवाही से लिखे गहरे-हलके अक्षर। सब समेटकर बड़े से लिफ़ाफ़े में डाल दिये। बगल की फ़व्वारे की दुकान से लकड़ी के महंगे विंड-चाईम्स के खनकने की आवाज़ रह-रहकर गूँज उठती थी। छोटे-छोटे फव्वारों से पानी की अल्हड़ थिरकन उठकर माहौल को वैसे ही रोमांटिक बना रही थी जैसी पहले बनाया करती थी। उधर छोटे से रेस्तराँ में कोई बैरा को ऑमलेट के लिये आवाज़ लगा रहा था। सामने छोटे से मंच पर, जो आजतक अपनी पहली प्रस्तुति के लिये तरस रहा था, बड़ा सा मटमैला सफ़ेद पड़ा परदा लटक रहा था। उसके पीछे एक कोने से बेतरतीब पड़े लकड़ी के बेंच झाँक रहे थे, जिन्हें किसी ने यूँही निरुद्देश्य वहाँ छोड़ दिया था। उनपर धूल की इतनी मोटी परत जमी हुई थी कि लगता था जैसे वे बने ही मिट्टी से हों। मंच के बगल की दीवार पर गहरे हरे रंग की बेल पूरी चढ़कर अब छज्जी तक पहुँच चुकी थी। दर्शक-दीर्घा में पत्थर की सीढ़ियाँ घास से घिरी हुई थीं; ऐसी बेतरतीब घास जो पत्थर को भी निगल लेना चाहती हो। उसी घास पर मैनें वह लिफ़ाफ़ा फ़ैला दिया जो पिछले दो सालों से मेरे हिस्से की तरह मेरे साथ रहा था। मेरे पसीने और उसके जिस्म की महक के अलावा त्रिवेणी की उस दर्शक-दीर्घा की घास की पनियायी महक भी इस लिफ़ाफ़े का हिस्सा थी, जहाँ वह मेरे साथ इस कदर सुरक्षित महसूस करती थी कि अंधेरा घिरने पर भी कभी घर जाने की जल्दी नहीं मचाती थी। जब भी हम मिले त्रिवेणी कला संगम ही हमारा अड्डा रहा और यही दर्शक-दीर्घा हमारे बैठने की जगह। वहाँ जो रोज़ आने-जाने वाले लोग थे वे हमें दर्शक-दीर्घा वाला जोड़ा कहते थे, हालांकि जोड़ा हम किस हद तक थे मैं नहीं जानता। ऐसा कोई विचार भटकता हुआ भी मेरे पास कभी नहीं आया। मैं हमेशा से जानता था कि मैं इस कहानी में पहला तो क्या दूसरा भी नहीं हूँ। सुविधा कहें या नैतिकता या मात्र प्रेम, किनारे मुझे ही लगाया जाएगा, यह मैं पहले ही दिन से जानता था।

“मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं अभी।” मैनें पहली बार उसे खुद के आफ़िस के लोगों के साथ शिमला न जाने का कारण बताया। इतने दिनों तक मैं सबको कहता रहा कि मैं खुद पहाड़ी हूँ; मुझे क्या ज़रूरत है पैसे खर्च करके पहाड़ देखने की, मगर उनकी ज़िद थी कि अगर ट्रिप पर जाएँ तो सब जाएँ। मुझे सच में जाने की इच्छा नहीं थी। सारे पहाड़ एक से ही होते हैं और फ़िर मेरे पास सच ही में पैसे नहीं थे। किराया, राशन और बाकी का खर्चा मिलाकर मेरे पास बचता ही क्या था। फ़िर घर पर भी पैसे भेजने होते थे और फ़ीस के पैसे बचाने होते थे सो अलग।


“देखिये, सिर्फ़ दो हज़ार रुपए की बात है।” उसने कहा। मुझे समझ नहीं आया कि उसे कैसे समझाऊँ कि दो हज़ार रुपए मेरे लिये कारूं के ख़ज़ाने से कम नहीं है, मगर क्या कहता; सिर्फ़ मुस्कुरा दिया। जब उसने हार मानने से इंकार कर दिया तो मुझे संक्षेप में उसे अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बताना पड़ा।
“हम्म्म।” बस इतनी सी आवाज़ उसने निकाली और कुछ सोचती हुई चली गई। मैनें राहत की सांस ली। किसी की भी ग़रीबी ऐसा मुद्दा है जिसे कोई भी रातों-रात नहीं मिटा सकता। इस विचार ने मुझे राहत दी कि अब मैं बच जाऊँगा। मगर थोड़ी ही देर में वह वापस आकर मेरे पास खड़ी हो गई। मैं अपने काम में इतना डूबा हुआ था कि मुझे उसके आने का पता ही नहीं चला। तबतक सारे लोग, जो चाय पीने के लिये पेंट्री में गए हुए थे, वापस आ चुके थे। जब मेरा ध्यान उसकी ओर गया ही नहीं तो उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। फ़िर मेरे कान के पास मुँह लाकर बोली, “आप एक मिनट मेरे साथ आएँगे?”

मैं उत्सुकतावश उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। दफ़्तर में ट्रेनिंग रूम के साथ एक छोटा सा खुला केबिन होता था जहाँ लोग बतियाने के लिये बैठा करते थे। हम सब लंच भी वहीं किया करते थे। वह वहाँ एक कुर्सी पर बैठ गई और मैं अपनी आदत के मुताबिक उसके सामने मेज़ पर बैठ गया। मुझे बहुत हैरानी हुई जब उसने मुझे बताया कि वह सिर्फ़ यह सोचकर जाने के लिये तैयार हुई थी कि मैं भी जाऊँगा। मैं उसे ठीक से नहीं जानता था मगर अच्छी लड़की थी यह अपने अन्तरज्ञान के आधार पर कह सकता था। मेरी अपनी व्यस्तताएँ इतनी होती थीं कि किसी के साथ ज़्यादा घुलना-मिलना मेरे लिये संभव नहीं हो पाता था, खासकर दफ़्तर में। सबसे एक तरह की दूरी बनाए रखना मेरे लिये संयत होकर काम करने में मददगार होता था। इस वजह से मैं हर साथी कर्मचारी से एक हद के बाद कटा हुआ रहता था। दूसरी ओर मेरी तटस्थ प्रवृति के कारण कई बार लोग मुझपर मेरे अनचाहे ही विश्वास करने लगते थे। ऐसी अनपेक्षित अपेक्षाओं से मैं भागता था। उसकी बात सुनकर भी चौंका मगर जानने की उत्सुकता भी थी।

मैनें पूछा, “मेरे जाने या न जाने से तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है? मेरा मतलब है, तुम्हारा कार्यक्रम मेरे होने से क्यों निर्धारित होगा?”
वह मेरे बेबाक सवाल पर हँस पड़ी, “ग़लत मत समझिये। मुझे यहाँ लोग खास पसंद नहीं हैं। सिर्फ़ एक-आध हैं जो सही किस्म के लगते हैं और आप उनमें सबसे पहले हैं।”
“अच्छा तो मुझे अपने सही होने की कीमत चुकाने के लिये कहा जा रहा है?” मैनें हलके अंदाज़ में कहा।
वह खुलकर हँसी, “आपका सेंस आफ़ ह्यूमर काफ़ी अच्छा है।”
“प्रत्युन्नमति”, मैं बोला।
“क्या? प्रत्युन्नमति? ये क्या होता है?” उसने पूरी सुलभता से पूछा।
मैनें कहा, “सेंस आफ़ ह्यूमर।”
“उसे सेंस आफ़ ह्यूमर ही रहने दीजिये न। अच्छा, फ़िलहाल अगर आप बुरा न मानें तो मेरे पास एक सुझाव है। आपकी मर्ज़ी है अगर आपको पसंद न आए तो आप मना भी कर सकते हैं। पर मैं सचमुच चाहती हूँ कि आप साथ चलें।” उसने कहा।

मैं सुनने को उत्सुक था। आखिर पहली बार कोई मेरे साथ कहीं जाना चाहता था या बेहतर शब्दों में कहूँ तो मुझे अपने साथ ले जाना चाहता था। मैंने कहा, “बताओ। बुरा लगेगा तो कह दूँगा।”
वह बोली, “देखिये अगर बात सिर्फ़ पैसों की है तो मैं आपकी मदद कर सकती हूँ। आप मुझसे पैसे ले लें और जब भी सुविधा हो लौटा दीजियेगा।”
“ऐसे अवसरों पर मैं पारंपरिक औपचारिकता परे सरका देता हूँ। मुझे क्या आपत्ति हो सकती है सिवाय इसके कि मैं नहीं जानता कि तुम्हें पैसे लौटाने की क्या जुगत भविष्य में कर पाऊँगा। अगर ऐसी ही हालत रही तो यह लौटाना शायद कभी न हो पाए।” मैनें कहा।
जवाब में उसने एक श्लोक सुनाया, जो उसके बार-बार दोहराने की वजह से मुझे अच्छी तरह से रट गया था। आज भी जस का तस याद है;

“यानि कानि च मित्राणि, कृतानि शतानि च।
पश्य मूषकमित्रेण, कपोता: मुक्तबन्धना:॥”

फिर उसने मुझे इसका अर्थ भी समझाया, “सैकड़ों मित्र बनाने चाहिये। मित्र चूहे की सहायता से ही कबूतर बन्धन से मुक्त हो गए थे।”
“तो हममें से चूहा कौन है और कबूतर कौन?” मैनें उसके मुँह से श्लोक निकलने की हैरत के बावजूद हलके अंदाज़ में पूछा।
“इससे फर्क पड़ता है क्या?”


अरज :- कुछ महीनों पहले यूँही कुछ लिखने का सोचा था जिसका यह पूर्वार्ध है। अब चूंकि बात पुरानी हो चुकी है और विचार बदल चुका है इसलिए इसे आगे बढ़ाने का कोई विचार नहीं। इस अंश को यूँही पोस्ट कर दिया। आप चाहें तो गरिया-लतिया भी सकते हैं कि यूँही आपका वक़्त जाया किया।

Friday, 23 January 2009

"बैले दे ज़ू" देखकर पीयर के लिए

इससे तो बेहतर है
अनजान लोगों से बतियाया जाए कुछ भी
किताबों में घुसा लिया जाए सिर
एक के बाद एक चार-पांच फ़िल्में देख डाली जाएं
पूरी रात का सन्नाटा मिटाने के लिये
टके में जो साथ हो ले
ऐसी औरत के साथ काटी जाए दिल्ली की गुलाबी ठंडी शामें
गुलमोहर के ठूँठ के नीचे
या दोस्तों को बुला लिया जाए मौके-बेमौके दावत पर

तुम्हे प्यार करते रहना खुद से डरने जैसा है
और डर को भुलाने के लिये जो भी किया जाए सही है।

Monday, 19 January 2009

परमाणु बम - दूसरे विश्वयुद्ध का निर्णायक हथियार



सापेक्षता के सिद्धांत के द्वारा परमाणु उर्जा की थ्योरी विकसित करने का श्रेय आइंस्टाइन को जाता है जिसके आधार पर तकरीबन चालीस साल बापरमाणु बम बनाया गया। १९३८ तक यह थ्योरी थ्योरी ही रही। उस साल तीन जर्मन वैज्ञानिकों ने एक खोज की। ओट्टो हान, लीजे माइत्नेर और फ्रित्ज़ स्ट्रास्मान ने पाया कि यदि यूरेनियम पर न्युट्रान बरसाया जाए तो उससे बेरियम और क्रिप्टन उत्सर्जित होते हैं और इस प्रक्रिया से बहुत गर्मी पैदा होती है जिसे न्यूक्लिअर फ़िज़न कहते हैं। तकरीबन इसी वक़्त डेनिश मूळ के वैज्ञानिक नील्स हेनरिक डेविड बोअर ने महसूस किया कि इस प्रकिया के द्वारा सामरिक हथियार विकसित किया जा सकता है। अगले साल १९३९ में नील्स अमेरिका चले गए। उनका उद्देश्य अमेरिका को इस तरह के हथियार पर काम करने के लिए चेताना था और वे चाहते थे अमेरिका इसपर जर्मनी से पहले सफलता प्राप्त करे। जिस ओर जर्मनी दूसरे विश्व युद्ध में जा रहा था यह कदम ज़रूरी भी लग रहा था।


नील्स ने अमेरिका पहुँच कर हंगेरियन मूल के भौतिकशास्त्री लियो स्जिलार्ड से संपर्क साधा और उन्हें इस बारे में बताया। लियो ने तत्काल आइंस्टाइन से बात की जोकि अमेरिका में ही थे। आइंस्टाइन के सिद्धांत ने ही न्यूक्लिअर फ़िज़न के दरवाज़े खोले थे और वे विश्व के निर्विवाद प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे। आइंस्टाइन ने राष्ट्रपति रूज़वेल्ट को २ अगस्त १९३९ को वह मशहूर पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अमेरिका को जर्मनी द्वारा इस ओर प्रयोग करने के बाबत लिखा और चेताया कि नाज़ियों द्वारा इस तरह का अस्त्र बनाने में सफलता पाने से विश्व भर के लिए क्या खतरा हो सकता है। हालाँकि बाद में उन्होंने अपने इस पत्र पर अफ़सोस व्यक्त किया मगर भविष्य में क्या होगा यह उस समय कहना सम्भव नहीं था।


असीमित संभावनाओं वाले इस संभावित अस्त्र के निर्माण को गोपनीय रखना आवश्यक था। राष्ट्रपति ने परमाणु बम को विकसित करने का काम अमेरिकी सेना के मैनहैटन विभाग को सौंपा जिसकी वजह से इस परम गोपनीय प्रोजेक्ट को मैनहैटन प्रोजेक्ट कहा जाता था। इस प्रोजेक्ट का सञ्चालन करने का जिम्मा मेजर जनरल लेसली ग्रोव्स को दिया गया और इसके निर्माण से चार यूरोपी प्रवासी जुड़े। इस प्रोजेक्ट की गोपनीयता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी सरकार में इसके बारे में लगभग कोई नहीं जानता था। यहाँ तक कि रूज़वेल्ट की आकस्मिक मृत्यु होने पर जब ट्रूमन राष्ट्रपति बने तो उन्हें भी इसकी कोई जानकारी नहीं थी। मगर साथ ही यह भी सच है कि कुछ लोगों ने सोवियत, जोकि उस समय अमेरिका का युद्ध में सहयोगी था, को इस प्रोजेक्ट के कुछ गोपनीय दस्तावेज उपलब्ध कराये थे।


अब सबसे पहले एक न्यूक्लिअर रिएक्टर बनाने की आवश्यकता थी जिसके द्वारा चेन-रिअक्शन किया जा सके। यह काम शिकागो विश्वविद्यालय में इटालियन भौतिकशास्त्री एनरीको फ़ेर्मी के निर्देशन में अंजाम दिया गया। ये वही फ़ेर्मी थे जिन्हें १९३८ में न्यूटरोन फ़िज़िक्स में शोध के लिए नोबेल मिला था। शिकागो रिएक्टर में ५० टन यूरेनियम, केडमियम कंट्रोल रौड्स, ५०० टन ग्रेफाईट इस्तेमाल किया गया। चेन-रिअक्शन कराने में अगले तीन साल लगे और २ दिसम्बर, १९४२ को इसमें सफलता पायी गई। मेजर जनरल ग्रोव्स ने मैनहैटन प्रोजेक्ट के लिए गुप्त रूप से तीन केन्द्र स्थापित किए। पहला केन्द्र टेनेसी में बनाया गया जहाँ यूरेनियम-२३५ फेक्ट्री लगाई गई। इसके लिए भारी मात्रा में बिजली की ज़रूरत थी जो टेनेसी में नवनिर्मित हाइड्रो-इलैक्ट्रिक बांधों से उपलब्ध कराई गई। वाशिंगटन में प्लूटोनियम-२३९ केन्द्र स्थापित किया गया। तीसरा केन्द्र असल में एक प्रयोगशाला था जोकि न्यू मेक्सिको के पास लोस आलामोस में थी। यही वह जगह थी जहाँ परमाणु बम वास्तव में बनाया गया। फ़ेर्मी के साथ हंगेरियन भौतिकशास्त्री लियो स्जिलार्ड भी इस प्रोजेक्ट से जुड़ गए। ये वही लियो स्जिलार्ड थे जिन्होंने आइंस्टाइन से रूज़वेल्ट को पत्र लिखने के लिए कहा था। जिस समय फ़ेर्मी शिकागो में काम कर रहे थे लगभग उसी समय रॉबर्ट ओपनहाइमर और उनके साथ कुछ और वैज्ञानिक केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में न्यूक्लिअर फ़िज़न पर काम कर रहे थे। उन्होंने पाया कि यूरेनियम-२३५ के अलावा प्लूटोनियम-२३९ से भी न्यूक्लिअर फ़िज़न करना सम्भव है। इसी के आधार पर जनरल ग्रोव्स ने तीन केन्द्र स्थापित किए थे। अब रॉबर्ट ओपनहाइमर भी मैनहैटन प्रोजेक्ट से जुड़ चुके थे। चौथे वैज्ञानिक आर्थर कोम्प्टन थे जो इस प्रोजेक्ट से जुड़े।


पहला परमाणु हथियार, जोकि एक यूरेनियम-२३५ बम था, का सफल प्रयोग १६ जुलाई १९४५ में न्यू मेक्सिको के रेगिस्तान में किया गया। इसे कोड दिया गया - ट्रिनिटी। इसके समानांतर अमेरिकी वायुसेना ने एक संगठन स्थापित किया जिसे ५०९ कोम्पोसिट ग्रुप नाम दिया गया। इस ग्रुप को अज्ञात विशाल बमों को गिराने की ट्रेनिंग दी गई और इस काम के लिए बोइंग बी-२९ बोम्बर्स का इस्तेमाल किया गया। १९४५ के मध्य तक विश्व भर में सैनिक और राजनैतिक माहौल तेजी से बदल चुका था। राष्ट्रपति रूज़वेल्ट की अप्रैल में मृत्यु हो चुकी थी और मई में जर्मनी आत्मसमर्पण कर चुका था। यूरोप में विश्वयुद्ध ख़त्म हो चुका था और मित्र देशों ने अपना ध्यान अबतक पूरी तरह से जापान पर केंद्रित कर लिया था। मैनहैटन प्रोजेक्ट से जुड़े लगभग सभी वैज्ञानिक इसी वजह से इससे जुड़े थे ताकि जर्मनी के इस ओर सफलता हासिल करने से पहले अमेरिका या मित्र देश इसपर काम शुरू कर दें मगर जापान पर इसका इस्तेमाल हो वे इसके हिमायती नहीं थे। पर अब बात उनके चुनाव की नहीं रह गई थी। इवो जिमा और ओकिनावा में चल रहे युद्ध में मित्र देश जापान द्वारा बुरी तरह पछाडे जा चुके थे। मित्र देशों का अंदाजा था कि यदि युद्ध जापान की धरती पर इसी तरह चलता है तो लगभग दस लाख जाने जा सकती हैं और इनमे से ज्यादातर अमेरिकियों के होने की सम्भावना ट्रूमन को यह मंज़ूर नहीं था। उन्होंने अपने केबिनेट और उच्च सैनिक सलाहकारों के साथ मीटिंग के बाद तय किया कि जापान के ख़िलाफ़ दो परमाणु बमों का प्रयोग किया जाए।


पहला बम, जिसे "लिटिल बॉय" के नाम से जाना जाता है, वास्तव में लिटिल नहीं था। उसका वज़न ९,७०० पाउंड था। यह एक यूरेनियम बम था और ६ अगस्त १९४५ को इसे हिरोशिमा पर गिराया गया। इसके तीन दिन बाद अगला बम, जोकि एक प्लूटोनियम बम था, नागासाकी पर गिराया गया। इस बम का वज़न तकरीबन दस हज़ार पाउंड था. हिरोशिमा में परमाणु बम के हमले से अस्सी हज़ार लोग तो तत्काल मारे गए और नागासाकी में गिराए गए परमाणु बम "फैट मैन" से चालीस हज़ार लोग मारे गए। आने वाले दिनों में मरने वालों की संख्या लगभग दुगनी हो गई। जापान को लगा कि अमेरिका अगर चाहे तो ऐसे कई और परमाणु हमले जापान पर कर सकता है जोकि हालांकि सही नहीं था मगर अंततः जापान ने १५ अगस्त को मित्र देशों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अमेरिका ने पूरी कोशिश की कि कोई भी अन्य देश परमाणु हथियार बनाने या प्राप्त करने में सफल न हो सके। अमेरिका को अपने प्रयासों में पहला झटका १९४९ में लगा जब अमेरिका से चोरी से प्राप्त दस्तावेज़ों के आधार पर सोवियत ने भी परमाणु बम बना लिया। इस तरह अमेरिका का वर्चस्व समाप्त हो गया और दुनिया प्रत्यक्ष रूप से दो धुरियों में बंट गई। इसके पीछे अमेरिका की अपना एकाधिकार बनाये रखने की कामना काम कर रही थी या उसे इस विनाशक हथियार के ग़लत इस्तेमाल की चिंता खा रही थी यह बहस का विषय हो सकता है। विश्व का अग्रणी बनकर वह कूटनीतिक और अगर ज़रूरत पड़े तो शक्ति द्वारा यह कोशिश करता आया है कि कोई भी देश परमाणु शक्ति संपन्न न बन सके किंतु ज्ञान और विज्ञान पर एकाधिकार बनाए रखने की मंशा इस युग में सम्भव नहीं है अमेरिका को यह समझना चाहिए। वैसे भी एकमात्र परमाणु हमला करने वाले देश को नैतिक स्तर पर भी यह अधिकार नहीं कि वह परमाणु शक्ति संपन्न देश का अपना स्टेटस बरकरार रखते हुए किसी और को यह साधन प्राप्त करने से रोके।

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट