Thursday, 31 October 2013

फटी डायरी के पन्ने

1.
मुझे शहरों में रहना पसंद नहीं। उस ज़माने में भी पसंद नहीं था जब शहर आज की अपेक्षा कम मुसीबतज़दा थे। नापसंदगी की फिहरिस्त लम्बी है। फिलहाल उनमें से एक कारण यह भी है कि रात के बारह बजने को आये और सिरहाने की खिड़की से तमाम आवाज़ें और शोर झिरकर अंदर आ रहा है। यहाँ तक कि बच्चों की आवाज़ें भी। बार-बार, हज़ारहा दोहराया जाता है कि भीड़ के बीच आदमी कितना अकेला है। यह स्टेटमेंट बहुत घसीटा जा चुका है। मुझे ठीक इसके विपरीत लगता है। अकेलेपन की तमाम इच्छा के बीच आदमी भीड़ में घिरा हुआ है। भीतर का जो अकेलापन है उसे दिनभर बाहर आने का मौका नहीं मिलता। मैं इंतज़ार करता हूँ कि रात हो और मैं अपने अकेलेपन के साथ कुछ एकांतिक समय बिता सकूँ लेकिन शहरों में रात और नींद भी उतने ही आभासी हो गए हैं जितनी शान्ति।

2.
हमें हमेशा उन पुराने प्रेम सम्बन्धों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए जो अब हमारे साथ नहीं हैं। वे सम्बन्ध हमारे जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे बहुत कुछ सहेजने लायक ऐसा पीछे छोड़ गए हैं जो अब तक ठीक से सहेजा नहीं जा सका है। पर हम प्रेम को कैसे सहेजना चाहिए नहीं जानते और अपने आप को छितरा देते हैं।
बेहद सरसरी तौर पर हम प्रेम का विज्ञान तो सीख लेते हैं किन्तु उन निर्मम अनुभवों को टटोलकर अलग कर देते हैं जोकि इस प्रेम सम्बन्ध की वास्तव में एकमात्र निधि हैं।

3.
दीये की लौ में उसका चेहरा टिमटिमाता है; मद्धम आंच में मगर आवेग के साथ। लौ के सन्तरी आलोक में अमूमन बुझे हुए चेहरों से भी बड़ा तेज पैदा होता है, समूची मानवजाति दैदीप्यमान लगने लगती है जैसे अँधेरे के बीच अखंड प्रकाशपुंज।

4.
मैक्स म्यूलर भवन; कल हम आखरी बार मिले थे - फिर कभी न मिलने के लिए। वह टेबल के दूसरी और बैठी थी धूप से बचने के लिए। धूप मेरे चेहरे पर सीधी पड़ रही थी। कहने को कितना कुछ था फिर भी हम चुपचाप थे। यही ठीक भी था। मैंने ठिठोली करते हुए उससे कहा, "तुम्हें याद है मैंने कहा था कि हर सम्बन्ध में या तो अपेक्षा आ जाती है या उपेक्षा?" उसे शायद समझ नहीं आया कि मैं वाकई ठिठोली कर रहा हूँ या गम्भीर हूँ। उसने सिर्फ हलकी सी मुस्कान से जवाब दिया। मैं बेचैन था वहाँ से उठकर जाने के लिए। उसने कहा, "सो दिस इज़ इट" और उठकर अपने दोस्तों के पास चली गयी। अब मुझे वहाँ से जाने की जल्दी महसूस नहीं हो रही थी। मैं चाय ख़त्म कर लेना चाहता था।

5.
मुझे बार बार तुम्हारी याद आ रही है रुक-रूककर। मैंने सोचा था कि मैं तुमसे नाराज़ हूँ और इस बीच हम एक-दूसरे से दूर होते रहे हैं। अब लगता है यह ग़लत है, कम से कम मेरी ओर से तो ग़लत ही है। तुम्हारी ओर से वैसे भी मुझसे मिलने या बात करने के प्रयास महीने दो महीने से पहले नहीं होते।
मुझे तुम्हारी याद आ रही है जैसे कभी कुमार गन्धर्व की एक बंदिश अचानक याद आ जाती है; जैसे बेर्गमान की फिल्म देखने की हूक उठती है; जैसे सात्र का कोई पात्र याद आ जाता है एक दिन बेबात। मुझे पता है कि मैं तुमसे यूँही बात नहीं कर सकता, कोई कारण होना चाहिए और यह तो कह ही नहीं सकता कि मुझे तुम्हारी याद आ रही है। मेरे पास एक ही चारा है कि मन बहलाने के लिए सड़कों पर मारा-मारा फिरूं। वही करूंगा शायद।

6.
जब हम प्रेम में होते हैं तो हमें प्रेम के अलावा कुछ नहीं जताना चाहिए; उसने मुझसे कहा। उसे मेरे प्रेम की तीव्रता से डर लगता है और मुझे उसके प्रेम की सांद्रता से। वह चुप रहती है। मैं उससे मज़ाक में अक्सर कहता हूँ कि मुझे चुप रहने वाले लोगों से डर लगता है। उनके पास सोचने के लिए ज़यादा समय होता है। वह हँस देती है बस। मेरी उससे हमेशा शिकायत रहती है कि वह हम दोनों के बीच विलगाव लेकर चलती है। क्यों? वह कहती है, "तकलीफ कम होगी माई वुडन मंकी।" मुझे उसके बोलने से भी डर लगता है और चुप रहने से भी। प्रेम करते करते मैं उससे डरने लगता हूँ।

7.
प्रेम जैसा भी होता है, मैं शायद उसे उसके सही रूप में नहीं जानता। प्यार अपने वास्तविक रूप में मेरे पास भी फटका हो ऐसा लगता नहीं। गोर्की कहते हैं, "एक चीज़ है जिसकी मनुष्य उम्मीद कर सकता है और कभी कभी उसे पा भी सकता है, वह है मनुष्य का प्रेम।"
'क्रॉस ऑफ़ आयरन' में ष्टाईनर अस्पताल में पड़ा हुआ है और आँख खोलता है तो उसकी चेतना जंग और अस्पताल के बीच झूल रही होती है। अवचेतन में वह अपनी नर्स का स्पर्श खोजता रहता है। स्पर्श के लिए सभी तरसते हैं पर कितने लोग प्रेम के स्पर्श को समझ पाते हैं और उसके बारे में सोचते भी हैं?

8.
सम्बन्ध जेब में पड़े रुमाल की तरह होते हैं। रुमाल जिसे कभी शुरुआत में अनफोल्ड किया गया होगा मगर अब एक अरसे से ज़ेब में औपचारिकता के लिए यूँही पड़ा है। उसकी सलवटों पर मैल जम गया है और तहें एक-दूसरे से कसकर चिपक गयी हैं - इस्तेमाल न होने के कारण। आप जानते हैं कि जेब में हाथ डालेंगे तो अनिवार्य रूप से रुमाल ही हाथ आएगा जोकि आपके लिए अस्तित्व से परे की चीज़ हो गया है। उसके वजूद का कोई औचित्य नहीं - वह बस है। उसके नीचे शायद आपकी ज़रुरत की कोई चीज़ पड़ी है मगर वह बाधा की तरह बीच में हमेशा मौजूद रहता है।

9.
वे दिन अभी बहुत पुराने नहीं पड़े हैं। मैं अब भी उस दरवाज़े की किरकिराहट महसूस करता हूँ। आदमक़द खिड़कियों पर लटकती ब्लाइंड्स से झिरता प्रकाश और उसके आलोक में उसके चेहरे के सूक्ष्म भाव। सब कुछ स्थायी है। दिन पुराने पड़ रहे हैं किन्तु याददाश में अभी तक सबकुछ करीने से रखा हुआ है। कुछ बहुत भोले पल होते थे जो हमारे आसपास हमेशा मौजूद रहते थे। 

Saturday, 4 May 2013

ब्रेख्त की तीन छोटी कविताएँ और मित्र की याद





पिछले साल कुछ समय एक जर्मन मित्र के साथ बिताया जिन्हें इत्तेफ़ाक से कविताओं में भी रूचि है। हमनें तय किया कि हम जब भी मिलें कवितापाठ का कार्यक्रम निर्धारित रहेगा और बाद में कुछ अनुवाद भी, जिसमें एक-दुसरे की सहायता की हमें आवश्यकता होगी। वे टूटी-फूटी हिंदी बोल लेती हैं हालांकि उन्होंने आधी उम्र भारत में ही बिताई है। हम कभी यह तय नहीं कर पाए कि उनकी हिंदी ज़्यादा ख़राब है या मेरी जर्मन। इसके बावजूद हमने अपने प्रयास जारी रखे। इस प्रक्रिया में उन्होंने हिंदी की कई कवितायें पढ़ीं। मंगलेश डबराल जी की तो तीन-चार किताबें जो मेरे पास थीं उन्होंने पढ़ डाली। यह कहना शायद ज़्यादा बेहतर होगा कि मुझे पढ़वा डालीं क्योंकि पाठ मुझे ही करना पड़ता था। कुछ कविताओं के जर्मन में अनुवाद भी किये। हेरमान हेस्से और ब्रेख्त की कवितायें भी चाट डालीं। ब्रेख्त की कवितायें हिंदी में पढ़ने की जाने कौनसी धुन उनपर चढ़ गई कि मुझे ब्रेख्त की अपनी किताब के दर्शन उनके बंगलौर छोड़ने से सिर्फ एक दिन पहले हुए। हेस्से की कविताओं से वे ख़ासी प्रभावित हुईं। मगर रिल्के कि कविताओं पर उनका विश्वास रत्ती भर भी कम नहीं हुआ और उनके अनुसार रिल्के सबसे बड़े कवि हैं। जैसे मैं रिल्के को पढ़ने से डरता हूँ उसी तरह अबतक वे ब्रेख्त को पढ़ने से डरती रहीं। अंतर मात्र इतना कि मेरा डर रिल्के की जर्मन न समझ पाने का रहा है और उनका ब्रेख्त के फ़लसफ़े को।

हमनें तय किया कि अनुवादों की शुरुआत छोटी-छोटी कविताओं से की जाए और धीरे-धीरे लम्बी और अधिक गंभीर कविताओं की ओर मुड़ा जाए। यह सिलसिला ठीक-ठाक चल पड़ा और हमनें कुछ कविताओं के अनुवाद भी किये। लेकिन उन्हें अपने अनुवादों पर कतई विश्वास नहीं रहा और यह अविश्वास अंत तक चलता रहा। मेरी हर नकारात्मक प्रतिक्रिया इस विश्वास को बढ़ाती ही गई। यही वजह है कि उनके द्वारा अनुवादित मंगलेश डबराल, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचल और सर्वेश्वर दयाल शर्मा की कोई भी कविता मेरे पास नहीं है। उन्होंने कभी ड्राफ्ट्स को फाइनल किया ही नहीं।

दूसरी ओर मेरे अनुवादों के प्रयास के प्रति वे गम्भीर थीं और उसमें पूरा सहयोग देने की कोशिश भी उन्होंने की। यहाँ भी उनके मूड और मेरे समय की कमी के चलते हम बहुत आगे नहीं बढ़ पाए। इस बीच वे अपने तलाक़ और उसके बाद के नए-नए हार्ट-ब्रेक से भी जूझ रही थीं जिसके बीच में अनुवाद की गुंजाइश बहुत ज़्यादा नहीं बन पाई। इस सबके बीच उन्होंने अचानक बंगलौर छोड़ देने का मन बना लिया। मन बनाने से लेकर बंगलौर छोड़ने के दौरान कविताएँ पीछे छूट गयीं और आगे की प्लानिंग ने वरीयता ले ली। हमारी कोई बैठक फिर नहीं हुई।

इस बात को तकरीबन पाँच महीने बीत चुके हैं। इस बीच मैं सोचता रहा कि चुनिन्दा लम्बी कविताओं के अनुवाद का काम आगे बढ़ाऊंगा लेकिन अपने को हमेशा असमर्थ पाया। हर कोशिश हमारी बैठकों को याद करते हुए रुक गई। इस बीच जो भी कुछ अनुवाद करके रखा था उसके बारे में बिल्कुल भूल गया। कल अचानक नज़र पड़ी और आज ब्रेख्त की तीन छोटी-छोटी कविताएँ पोस्ट कर रहा हूँ।



समाधिलेख (१९१९)*

वह लाल गुलाब लापता है अब तक
कोई नहीं जानता कहाँ होगी वह देह

जब वह ग़रीबों को बता रही थी सच
अमीरों ने खदेड़ा उसे दुनिया से।

*Grabschrift नाम की यह कविता संभवतः रोज़ा लुक्ज़म्बुर्ग के लिए लिखी गई थी। १९१९ उनकी ह्त्या का वर्ष था। इस कविता का दूसरा कोई सन्दर्भ मुझे समझ में नहीं आया।



टूटी रस्सी

टूटी रस्सी को जोड़ा जा सकता है
एक गाँठ से
जुड़ तो जाएगी
लेकिन रह जाएगी जीर्ण ही

हो सकता है हम मिलें
एक बार फिर
मगर वहाँ
जहाँ तुम मुझे छोड़कर चली गईं थीं
नहीं मिलोगी वहीँ दोबारा।



धुआं

ताल किनारे
पेड़ों के झुरमुट के नीचे
छोटा सा घर
छत से तिरता धुआं
कितने सूने लगते

घर, पेड़ और ताल
उसके बिना।