Sunday, 27 June 2010

फुर्सत में पहाड़ की सैर और कुछ तस्वीरें

कोई दस-बारह सालों बाद पहाड़ों की ओर रुख किया इसलिए काफी उत्साहित और रोमांचित था. पहाड़ मुझे बहुत आकर्षित करते हैं और इस बार कुछ लोगों से भी लम्बे अरसे के बाद मिलने का मौका मिल रहा था इसलिए मौका और भी ख़ास था. इन कुछ लोगों में से एक मेरी फेवरेट चाची भी थीं. इन दस बारह सालों में वे माँ से नानी बन चुकी हैं और चेहरा झुर्रियों से सिकुड़ने लगा है. उनका छोटा बेटा जो कभी दादी-दादी कहकर मुझपर लटका रहता था अब मैं उसके कंधे तक भी नहीं पहुँचता. चाचा के बचे-खुचे बाल बाल सफ़ेद हो गए और दोनों बेटियां ससुराल जा चुकी हैं. चाची के अलावा इतने सालों में सब कुछ बदल गया है. नौले के ऊपर बांज का पेड़ आखिरकार गिर गया और गिरा भी यूँ कि अगर पेड़ की दो शाखें नौले के दोनों ओर फैलकर सही अंतराल पर ज़मीन से नहीं टकराती तो तीसरी शाख नौले की छत तोड़ते हुए उसमें घुस जाती. छोटी गाड़ पिछली बार जब गया था तभी सूख चुकी थी और इस बार कोसी में भी पानी बहुत कम दिखा. कुछ सालों बाद शायद वह भी गायब हो जायेगी. चीड़ पहले से ज़्यादा फ़ैल चुका है. चीड़ चाहे यूरोप के माकूल हो, हिमालय के माकूल तो नहीं ही है. इससे शायद गरमी भी बढती है. पिछली बार जागेश्वर गया था जहाँ चारों ओर देवदार हैं. वहां और मेरे यहाँ के मौसम में बहुत अंतर नज़र आया. इस बार तो ज़्यादातर दोपहरों को पसीने से तर रहता था. मौसम की दुर्दशा पर अफ़सोस हुआ और चिंता भी. पता नहीं हम किस ओर जा रहे हैं.

बहुत से लोगों से मिल सका मगर समय की सनातन कमी के चलते बहुत से लोगों से मिलना रह गया और जिनसे नहीं मिल सका उन्हें अभी तक पता भी नहीं कि मैं बंगलौर से बाहर भी गया था. जब आ पड़ेगी तो हाथ जोड़ लूँगा. इस बार मेरा उद्देश्य परिवार के साथ एकजुट होना था और ढेर सारी तस्वीरें खींचना था. एस एल आर कैमरे पर पानी की तरह पैसा बहाने और फोटोग्राफी के गुर न सीख पाने के अफ़सोस के बाद पहली बार उसका इस्तेमाल कर पा रहा था. मैंने अपने आप से वादा किया था कि खुद फोटोग्राफी सीखूंगा. उसमें अभी वक़्त लगेगा मगर बतौर एक्सपेरिमेंट कुछ तस्वीरों पर नज़र फिराई जा सकती है.


ब्लॉग पर तस्वीरों कि क्वालिटी में कुछ खराबी मैंने महसूस की. यही और कुछ और तस्वीरें पिकासा में भी डाली हैं जो इधर देखी जा सकती हैं: http://picasaweb.google.co.in/getmahendram/Devbhoomi02#