Sunday, 14 March 2010

भाई

तुम अगर होते
तो शायद झगड़कर घुन्ना बने बैठे होते
हम एक दूसरे से
लेकिन तुम मर चुके बरसों पहले
और मेरे लिए तुम अब बस एक विषय रह गए हो
क्या कुछ और भी संभव था
जबकि न मैं तुमसे कभी मिला
न देखा तुम्हें?
मुझे तो अट्ठारहवें जन्मदिन पर
उपहार की तरह दी गई
तुम्हारे होने और होकर मरने की ख़बर
उन अट्ठारह-बीस सालों में
किसी ने बात नहीं की तुम्हारी
और शायद हटा दिए गए तुम्हारे अस्तित्व के शेष

दुनिया बहुत बदल चुकी है भाई
और मैं तुम्हारे प्रति अपने हलके से प्यार को
भारी शब्दों से वज़नी नहीं बना सकता

जहाँ हम पैदा हुए
मैं वहां से हजारों मील दूर बैठा हूँ
मुझे तुम्हारा ध्यान हो आता है कभी-कभी
और कभी-कभी अफ़सोस सा भी

मैं माँ को देखता हूँ और हैरान सा होता हूँ
माँ जो तुम्हारी बीमारी के बीच
खेतों से घर और घर से खेतों के चक्कर काटती रही
जिसने तुम्हारी मंगलकामना के लिए
अस्पताल की खिड़की पर खड़े खड़े काटीं कई रातें
इस बात से अनजान कि मैं जानता हूँ तुम्हारे अस्तित्व के बारे में
वह मेरे बेटे को गोद में लिए
आँखें बंद किए बैठी है
और उसके चेहरे पर सुख का दीर्घ भाव है
जो बारम्बार तृप्त हो चुकी आकांक्षाओं से पनपता है
मैं दुविधा में हूँ
तुम्हें जीवित रख पाने की आकांक्षा का भाव
उस तृप्त चेहरे की झुर्रियों में कहीं तो दबा ही होगा