Wednesday, 27 May 2009

दीवार के उस पार

सँझा की बेला थी कल
कोई यूँ आ खडा हुआ देहरी पर
कि झट तुम्हारी याद से भीग गया मैं

विलंबित होता है तो खुद ही चला आता है
तुम्हारे बारे में सोचना और
कितना अप्रत्याशित होता है तुम्हें याद करना
मसलन पार्क की बेंच पर बैठे
गली के जवान होते बच्चे
मुझे देख अचकचाकर छुड़ा लेते हैं
एक दूसरे से हाथ
मुझे ध्यान हो आते हैं बीतते साल
और इन सालों में तुम्हारी अनुपस्थिति

तुम्हारे बारे में सोचना ऐसा होता है ज्यूँ
सांस के बारे में सोचते ही हमें महसूस होता है
छाती का उठना-गिरना और हम पाते हैं
इस बीच चलती रही है हमारी सांस

यूँ भी हुआ है कि घर की गैरज़रूरी चीज़ों में
तुम्हें पाया है मौजूद
और उन्हें दे दिया गया है ज़रूरी करार
कभी पुराने कुरते की जेब से निकल आया है
मेरा तुम्हारा एक पूरा प्रहसन भी

गर्मियों की विचलित करती शामों को
सुब्बुलक्ष्मी के गायन के बीच
तुम्हारे पसीने से उठने लगती थी महक
जिन सुदूर कोनों तक जाता था गायन
जहाँ जहाँ पहुँच पाती थी महक
उस परिधि में जड़ हो जाती थी हमारी उपस्थिति
आओ देखो, तुम पाओगी मुझे वे कोने टटोलते

अब सुब्बुलक्ष्मी को सुनना
उनके गायन का आस्वादन भर नहीं रह गया है
बल्कि तुम्हें खोजने का प्रयास बन चुका है

गोपनीय जो है तुम्हारा मेरा, उसमें भी
सेंध चुपके से मार लेती है नियति कभी

Wednesday, 13 May 2009

ग़ाफ़िल कब करेगा दुनिया की सैर?

मैं और मेरे एक मित्र ३,५०० मीटर की ऊंचाई पर चोपता में।

बचपन में बुनी गयीं फंतासियाँ लंबे समय तक साथ रहती हैं या शायद हमेशा। जब अनुभव का दायरा छोटा होता है तो कल्पना का क्षेत्र असीमित होता है। कलाकार बचपन में जो कल्पनाएँ करता है ज़िन्दगी भर उसके इर्द-गिर्द रचता-बुनता है। मगर जो कलाकार नहीं होते वे? मुझे लगता है किसी भी आदमी के बचपन की फंतासियाँ उसके घर और उस घर में मौजूद सामान में ढूंढी जा सकती हैं। नहीं तो उसके अव्यवस्थित जीवन में उन फंतासियों के अवशेष तो मिल ही जायेंगे।

घर में सबसे छोटा प्राणी होने के नाते मेरा अपना निर्बाध संसार था जो बड़ों की अपनी व्यस्तताओं के चलते उनकी दखलंदाजी से परोक्ष-अपरोक्ष रूप से बचा रहता था। दो कमरों के छोटे से घर में और बाद में उससे बड़े घर में भी मेरे लिए अपना एक कोना ढूंढ लेना बेहद आसान होता था। आँगन में पड़ोसी की खिड़की के नीचे गज भर फर्श पर अपना पूरा का पूरा ब्रह्माण्ड बसा लेने में कोई मुश्किल नहीं होती थी। दीवाली और दशहरे के बीच जो मेरा हर साल बीमार होने का कर्म था, वह मेरे लिए खिलौना कार पाने का सबब भी था और इसीलिये सालाना बीमारी से मुझे कभी गुरेज़ नहीं हुआ। उन कारों में मैंने दुनिया के वो सुदूर देश छू डाले, जो अब भी देखे जाने बाकी हैं। शायद कभी वो कोने भी देख पाऊँ।

दुनिया घूमने के सपनों को हवा दी किताबों ने। मिडिल में एक किताब हुआ करती थी - देश और उनके निवासी। हिन्दी और अंग्रेजी के बाद यही किताब मैं उठाता था। अर्जेंटीना के बारे में पहली बार इसी किताब से पता चला। वहां बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती होती है। नीले फूलों वाली फ्रॉक पहनने वाली अलीशिया नाम की उस लड़की को भी नहीं भूला जो किताब के अनुसार टमाटर उगाने वाले किसान की मेरी हमउम्र बेटी थी और खाली वक़्त में अक्सर खेतों में जाया करती थी। खेतों में वक़्त गुजारना मुझ जैसे शहर में पल रहे बच्चे के लिए किसी घटना से कम नहीं था। अलीशिया के बारे में पढ़ते हुए मैं बार-बार उससे रश्क करता था और मैंने निश्चय किया था कि बड़ा होकर टमाटर की खेती करूँगा। आज इस बात पर हंसा जा सकता है मगर बच्चों के लिए यह विचार कितना उत्तेजक हो सकता है यह मुझे अभी भी याद है।

बड़े भाई की कृपा से मुझे कभी कामिक्स पढ़ने-खरीदने की छूट नहीं रही, मगर छुपकर मैंने डायमंड कामिक्स, मधु मुस्कान, लोटपोट, नंदन, चम्पक वगैरह सभी कुछ पढ़ा। उस समय मेरी जोरों से इच्छा होती थी डायमंड कामिक्स में जैसी जगहें दिखाई जाती हैं, वैसी जगहों में काश हम सचमुच रह सकते। घर में धार्मिक-पौराणिक विषयों पर कई किताबें थीं। हनुमान हमेशा अपनी असीमित शक्तियों और हास्यास्पद हरकतों के चलते मेरे पसंदीदा कैरेक्टर रहे। उनपर एक किताब घर में मौजूद थी जिसमें आदि से अंत तक उनकी पूरी कहानी थी। वह किताब मैंने अनेकानेक बार पढ़ी। कृष्ण पर भी दो किताबों का एक सेट था, जिसमें एक ओर तस्वीरें होती थीं और दूसरी ओर कहानी। उस किताब पर तेल के बहुत सारे निशान थे, मतलब कि उसे कई बार पढ़ा गया होगा। मगर मुझे कभी पता नहीं चला कि उसे कौन पढ़ता था। तेल में सनी किताब मेरे लिए उसमें लिखे शब्दों का सार्वभौमिक सत्य होने का प्रतीक था। घर में धार्मिक माहौल के कारण उपजा यह सहज विश्वास था। वह किताब मैंने हजारों बार पढ़ी। कई बार स्कूल की दो महीने की गर्मियों की छुट्टियों में मैं रोज़ वह किताब पढ़ता था और उसका इतना प्रभाव मुझपर था कि मैं उसी युग में पैदा होना चाहता था, कहीं भी मथुरा-वृन्दावन के आसपास। किताब के दूसरे हिस्से में कृष्ण वृन्दावन छोड़कर चले जाते हैं। इस भाग में वे जगह-जगह जाते हैं मगर यह भाग मुझे ख़ास पसंद नहीं था। इसे पढ़कर मैं उदास महसूस करता था और सोचता था कि कैसे कोई अपने मित्र-परिजनों को छोड़कर हमेशा के लिए जा सकता है? फ़िर चाहे इसके एवज में दुनिया घूमने को मिले। मेरे लिए दुनिया घूमने का मतलब वापस अपने घोसले में लौटना होता था। जैसे कि रसूल हमज़ातोव कहते हैं, "हाँ, मुझे बड़े शहरों में पैदल घूमना पसंद है। मगर पाँच-छः लम्बी सैरों के बाद शहर जाना-पहचाना सा महसूस होने लगता है और वहां लगातार घूमते रहने की इच्छा जाती रहती है। मगर अपने गाँव की छोटी सी सड़क पर मैं हजारवीं बार जा रहा हूँ, लेकिन मन नहीं भरा, उसपर जाने की इच्छा का अंत नहीं हुआ।"
"दागिस्तान मेरा चूल्हा है, मेरा पालना है।"
कुछ ऐसा ही मगर दुनिया देखने की इच्छा वक़्त और किताबों के साथ ज़ोर पकड़ती गई। बचपन में किसी किताब या पत्रिका में एक लंबा संस्मरण पढ़ा था जिसमें लेखक के दादा उसे और उसके हमउम्र बच्चों को बीसवीं सदी के आरम्भ में अपने अफ्रीका के जंगलों में किए गए शिकार-अभियानों के बारे में बताते हैं। वह और उस जैसे अनगिनत किस्सों में एक तरह की स्वच्छंदता थी जिसका मेरे घर से स्कूल और स्कूल से घर वाले रूटीन में घोर अभाव था और इसीलिए मेरे हवाई किले और भी ऊंचे होते जाते। मैं अफ्रीका के जंगलों में घोड़े दौड़ते हुए जंगली सूअरों के शिकार के सपने देखा करता। अफ्रीका के जंगल ही नहीं, मैं दुनिया का एक-एक कोना देखना चाहता था और एक-एक आदमी से मिलना चाहता था, हर एक घर में कम से कम एक बार खाना खाना चाहता।

कभी गाँव या कहीं और जा रहे होते तो रात में छोटे कस्बों की नियोन में पीली पड़ी खाली सड़कें और उनपर इक्का-दुक्का घूमते लोग मुझे खासे इन्वाईटिंग लगते। मुझे लगता यह सारा जाल मेरे लिए ही बुना गया है। जब मैं इस जगह से निकल जाऊंगा तो न तो यह जगह मौजूद होगी और न ही ये लोग। यह सिर्फ़ एक इंद्रजाल है जो मेरी घुमंतू इच्छाओं की पूर्ति के लिए गढा गया है।

गाँव में एक बार मैं माँ और पिताजी के साथ ननिहाल गया था। मेरा ननिहाल निकटतम सड़क से घंटे भर की पैदल चढाई पर है इसलिए आने जाने में काफ़ी वक़्त लगता था। उस समय में लगभग पाँच साल का रहा होऊंगा। अपनी नानी से मुझे सिर्फ़ इसी मुलाकात की याद है। वहां से जब शाम को हम वापस लौटे तो सड़क तक पहुँचते पहुँचते ही अँधेरा हो गया और उन दिनों रात को बसें नहीं मिला करती थीं। हम न वापस लौट सकते थे और न घर पहुँच पाने की स्थिति में थे। पिताजी ने एक ट्रक की शरण ली और हम किसी तरह घर पहुंचे। मेरे लिए वह आधे घंटे का सफर मुझे अगले कई दिनों तक हांट करने के लिए पर्याप्त था। ट्रक ड्राइवरों के बारे में पूछ-पूछकर मैं माँ का सिर खा गया था। ड्राइवर के पीछे का छोटा सा केबिन तो मुझे खासा अपीलिंग लगा। मुझे लगा दुनिया घूमनी है तो ट्रक चलाने से बेहतर कोई काम नहीं हो सकता। अपनी मर्जी के मालिक, नई नई जगहें घूमो और जहाँ जब मन करे रुको-बढो। बाद में टी वी पर किसी अंग्रेजी फ़िल्म में रीक्रिएश्नल वहीकल देखकर मेरा इरादा और बलवती हो गया। चलता-फिरता छोटा सा घर। इस तरह मैं घर में रहते हुए भी मनचाही जगह घूम सकता था।

कुछ बड़ा होने पर पड़ोसियों की कृपा से रीडर्स डाईजेस्ट पढने का सौभाग्य बार-बार मिलने लगा। उसमें माई ची मिन की एक कहानी थी मंचूरिया के चरागाहों में रहने वाले एक बालक और मंगोल राजवंश की एक खानाबदोश लड़की की। यह कहानी मुझपर बड़े लंबे अरसे तक हावी रही। मेरे लिए मीलों लंबे-चौड़े चारागाह और उनपर सरपट घोड़े दौड़ाना ही ज़िन्दगी जीने का आदर्श तरीका हो गया। दिन-रात मैं तरकीबें भिड़ाने लगा कि किसी तरह मंगोलिया भाग जाऊं, मगर कत्यूर से आगे जाने का जुगाड़ आजतक नहीं हो पाया। आज भी मुझे एस्कीमो और मंगोल खानाबदोशों की जीवनशैली बेहद आकर्षित करती है। कहानी पढ़ने के पाँच-छः साल बाद मैंने उस कहानी की अधूरी प्रति ढूंढ निकाली और अभी तक सहेज कर रखी है। आगे गोर्की और राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथाएं और अनुभव पढ़कर समझ आया कि जीने का यह ढंग कितना घटनाप्रधान और कच्चे दिमाग के लिए कितना उपजाऊ हो सकता है। जर्मन सीखने के पीछे एक हद तक राहुल सांकृत्यायन की बहुभाषी प्रतिभा का हाथ था। उनकी जीवनी पढ़ने के बाद मैंने तिब्बत और कालिंगपोंग अपने घूमने की सूची में जोड़ लिए।

पिछले कुछ दिनों से चे की मोटरसाइकिल डायरीज़ पढ़ रहा था। अब बचपन के बुने हवाई किले रेत के साबित हो रहे हैं। हाल कुछ यूँ है कि बंगलौर से निकलना भी मुश्किल होता जा रहा है, मंगोलिया और तिब्बत तो फिर बहुत दूर हैं इसलिए मोटरसाइकिल डायरीज़ मुझे उस तरह से चमत्कृत न करके दूसरी तरह से परेशान कर रही थी। कॉलेज में एक जाट मित्र था, ठीक पैसे वाला था। हम दोनों के पास यामाहा आर एक्स 100 हुआ करती थी और अक्सर मनसूबे बांधे जाते कि मोटरसाइकिल पर दुनिया घूमी जाए मगर उसे तेल पिलाने की कुव्वत दोनों में से किसी की नहीं होती थी। कॉलेज ख़त्म होने से पहले हमने वचन बाँधा कि तीस पर पहुँचते-पहुँचते मोटरसाइकिल पर भारत दर्शन करेंगे। तब जोश था, पैसे नहीं थे। जब पैसे हुए तो जोश ख़त्म हो गया। भारत दर्शन लायक पैसे हुए तो संपर्क ही टूट गया और अगर संपर्क होता भी तो क्या वक़्त निकल पाता? शायद हममें से कोई वक़्त का बहाना बनाकर मन ही मन इस विचार को बचकाना कहकर खारिज कर देता। हर उम्र की अपनी मांग होती है और उस मांग को उसी उम्र में पूरा कर लेना चाहिए ऐसा मेरा मानना है। नहीं तो कुछ यूँ हो कि बचपन जैसी उत्तेजना इस उम्र में भी महसूस हो, कुछ यूँ कि सारे काम ताक पर रखकर कहीं निकल पड़ें। जाट का तो कह नहीं सकता मगर मोटरसाइकिल पर घूमने के विचार को मैं चाहे खारिज कर दूँ, नई-नई जगहें और दुनिया घूमना मेरे लिए आज भी उतना ही आनंददायक है जितना बचपन में था।