Friday, 30 January 2009

मुझपे तेरे ये भरम जाने कितने झूठे होंगे

एक बार फिर देखा; वही पुरानी तस्वीरें, वही उलझी सी लिखावट वाले सलीके से तह किये हुए पत्र। वही लापरवाही से लिखे गहरे-हलके अक्षर। सब समेटकर बड़े से लिफ़ाफ़े में डाल दिये। बगल की फ़व्वारे की दुकान से लकड़ी के महंगे विंड-चाईम्स के खनकने की आवाज़ रह-रहकर गूँज उठती थी। छोटे-छोटे फव्वारों से पानी की अल्हड़ थिरकन उठकर माहौल को वैसे ही रोमांटिक बना रही थी जैसी पहले बनाया करती थी। उधर छोटे से रेस्तराँ में कोई बैरा को ऑमलेट के लिये आवाज़ लगा रहा था। सामने छोटे से मंच पर, जो आजतक अपनी पहली प्रस्तुति के लिये तरस रहा था, बड़ा सा मटमैला सफ़ेद पड़ा परदा लटक रहा था। उसके पीछे एक कोने से बेतरतीब पड़े लकड़ी के बेंच झाँक रहे थे, जिन्हें किसी ने यूँही निरुद्देश्य वहाँ छोड़ दिया था। उनपर धूल की इतनी मोटी परत जमी हुई थी कि लगता था जैसे वे बने ही मिट्टी से हों। मंच के बगल की दीवार पर गहरे हरे रंग की बेल पूरी चढ़कर अब छज्जी तक पहुँच चुकी थी। दर्शक-दीर्घा में पत्थर की सीढ़ियाँ घास से घिरी हुई थीं; ऐसी बेतरतीब घास जो पत्थर को भी निगल लेना चाहती हो। उसी घास पर मैनें वह लिफ़ाफ़ा फ़ैला दिया जो पिछले दो सालों से मेरे हिस्से की तरह मेरे साथ रहा था। मेरे पसीने और उसके जिस्म की महक के अलावा त्रिवेणी की उस दर्शक-दीर्घा की घास की पनियायी महक भी इस लिफ़ाफ़े का हिस्सा थी, जहाँ वह मेरे साथ इस कदर सुरक्षित महसूस करती थी कि अंधेरा घिरने पर भी कभी घर जाने की जल्दी नहीं मचाती थी। जब भी हम मिले त्रिवेणी कला संगम ही हमारा अड्डा रहा और यही दर्शक-दीर्घा हमारे बैठने की जगह। वहाँ जो रोज़ आने-जाने वाले लोग थे वे हमें दर्शक-दीर्घा वाला जोड़ा कहते थे, हालांकि जोड़ा हम किस हद तक थे मैं नहीं जानता। ऐसा कोई विचार भटकता हुआ भी मेरे पास कभी नहीं आया। मैं हमेशा से जानता था कि मैं इस कहानी में पहला तो क्या दूसरा भी नहीं हूँ। सुविधा कहें या नैतिकता या मात्र प्रेम, किनारे मुझे ही लगाया जाएगा, यह मैं पहले ही दिन से जानता था।

“मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं अभी।” मैनें पहली बार उसे खुद के आफ़िस के लोगों के साथ शिमला न जाने का कारण बताया। इतने दिनों तक मैं सबको कहता रहा कि मैं खुद पहाड़ी हूँ; मुझे क्या ज़रूरत है पैसे खर्च करके पहाड़ देखने की, मगर उनकी ज़िद थी कि अगर ट्रिप पर जाएँ तो सब जाएँ। मुझे सच में जाने की इच्छा नहीं थी। सारे पहाड़ एक से ही होते हैं और फ़िर मेरे पास सच ही में पैसे नहीं थे। किराया, राशन और बाकी का खर्चा मिलाकर मेरे पास बचता ही क्या था। फ़िर घर पर भी पैसे भेजने होते थे और फ़ीस के पैसे बचाने होते थे सो अलग।


“देखिये, सिर्फ़ दो हज़ार रुपए की बात है।” उसने कहा। मुझे समझ नहीं आया कि उसे कैसे समझाऊँ कि दो हज़ार रुपए मेरे लिये कारूं के ख़ज़ाने से कम नहीं है, मगर क्या कहता; सिर्फ़ मुस्कुरा दिया। जब उसने हार मानने से इंकार कर दिया तो मुझे संक्षेप में उसे अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बताना पड़ा।
“हम्म्म।” बस इतनी सी आवाज़ उसने निकाली और कुछ सोचती हुई चली गई। मैनें राहत की सांस ली। किसी की भी ग़रीबी ऐसा मुद्दा है जिसे कोई भी रातों-रात नहीं मिटा सकता। इस विचार ने मुझे राहत दी कि अब मैं बच जाऊँगा। मगर थोड़ी ही देर में वह वापस आकर मेरे पास खड़ी हो गई। मैं अपने काम में इतना डूबा हुआ था कि मुझे उसके आने का पता ही नहीं चला। तबतक सारे लोग, जो चाय पीने के लिये पेंट्री में गए हुए थे, वापस आ चुके थे। जब मेरा ध्यान उसकी ओर गया ही नहीं तो उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। फ़िर मेरे कान के पास मुँह लाकर बोली, “आप एक मिनट मेरे साथ आएँगे?”

मैं उत्सुकतावश उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। दफ़्तर में ट्रेनिंग रूम के साथ एक छोटा सा खुला केबिन होता था जहाँ लोग बतियाने के लिये बैठा करते थे। हम सब लंच भी वहीं किया करते थे। वह वहाँ एक कुर्सी पर बैठ गई और मैं अपनी आदत के मुताबिक उसके सामने मेज़ पर बैठ गया। मुझे बहुत हैरानी हुई जब उसने मुझे बताया कि वह सिर्फ़ यह सोचकर जाने के लिये तैयार हुई थी कि मैं भी जाऊँगा। मैं उसे ठीक से नहीं जानता था मगर अच्छी लड़की थी यह अपने अन्तरज्ञान के आधार पर कह सकता था। मेरी अपनी व्यस्तताएँ इतनी होती थीं कि किसी के साथ ज़्यादा घुलना-मिलना मेरे लिये संभव नहीं हो पाता था, खासकर दफ़्तर में। सबसे एक तरह की दूरी बनाए रखना मेरे लिये संयत होकर काम करने में मददगार होता था। इस वजह से मैं हर साथी कर्मचारी से एक हद के बाद कटा हुआ रहता था। दूसरी ओर मेरी तटस्थ प्रवृति के कारण कई बार लोग मुझपर मेरे अनचाहे ही विश्वास करने लगते थे। ऐसी अनपेक्षित अपेक्षाओं से मैं भागता था। उसकी बात सुनकर भी चौंका मगर जानने की उत्सुकता भी थी।

मैनें पूछा, “मेरे जाने या न जाने से तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है? मेरा मतलब है, तुम्हारा कार्यक्रम मेरे होने से क्यों निर्धारित होगा?”
वह मेरे बेबाक सवाल पर हँस पड़ी, “ग़लत मत समझिये। मुझे यहाँ लोग खास पसंद नहीं हैं। सिर्फ़ एक-आध हैं जो सही किस्म के लगते हैं और आप उनमें सबसे पहले हैं।”
“अच्छा तो मुझे अपने सही होने की कीमत चुकाने के लिये कहा जा रहा है?” मैनें हलके अंदाज़ में कहा।
वह खुलकर हँसी, “आपका सेंस आफ़ ह्यूमर काफ़ी अच्छा है।”
“प्रत्युन्नमति”, मैं बोला।
“क्या? प्रत्युन्नमति? ये क्या होता है?” उसने पूरी सुलभता से पूछा।
मैनें कहा, “सेंस आफ़ ह्यूमर।”
“उसे सेंस आफ़ ह्यूमर ही रहने दीजिये न। अच्छा, फ़िलहाल अगर आप बुरा न मानें तो मेरे पास एक सुझाव है। आपकी मर्ज़ी है अगर आपको पसंद न आए तो आप मना भी कर सकते हैं। पर मैं सचमुच चाहती हूँ कि आप साथ चलें।” उसने कहा।

मैं सुनने को उत्सुक था। आखिर पहली बार कोई मेरे साथ कहीं जाना चाहता था या बेहतर शब्दों में कहूँ तो मुझे अपने साथ ले जाना चाहता था। मैंने कहा, “बताओ। बुरा लगेगा तो कह दूँगा।”
वह बोली, “देखिये अगर बात सिर्फ़ पैसों की है तो मैं आपकी मदद कर सकती हूँ। आप मुझसे पैसे ले लें और जब भी सुविधा हो लौटा दीजियेगा।”
“ऐसे अवसरों पर मैं पारंपरिक औपचारिकता परे सरका देता हूँ। मुझे क्या आपत्ति हो सकती है सिवाय इसके कि मैं नहीं जानता कि तुम्हें पैसे लौटाने की क्या जुगत भविष्य में कर पाऊँगा। अगर ऐसी ही हालत रही तो यह लौटाना शायद कभी न हो पाए।” मैनें कहा।
जवाब में उसने एक श्लोक सुनाया, जो उसके बार-बार दोहराने की वजह से मुझे अच्छी तरह से रट गया था। आज भी जस का तस याद है;

“यानि कानि च मित्राणि, कृतानि शतानि च।
पश्य मूषकमित्रेण, कपोता: मुक्तबन्धना:॥”

फिर उसने मुझे इसका अर्थ भी समझाया, “सैकड़ों मित्र बनाने चाहिये। मित्र चूहे की सहायता से ही कबूतर बन्धन से मुक्त हो गए थे।”
“तो हममें से चूहा कौन है और कबूतर कौन?” मैनें उसके मुँह से श्लोक निकलने की हैरत के बावजूद हलके अंदाज़ में पूछा।
“इससे फर्क पड़ता है क्या?”


अरज :- कुछ महीनों पहले यूँही कुछ लिखने का सोचा था जिसका यह पूर्वार्ध है। अब चूंकि बात पुरानी हो चुकी है और विचार बदल चुका है इसलिए इसे आगे बढ़ाने का कोई विचार नहीं। इस अंश को यूँही पोस्ट कर दिया। आप चाहें तो गरिया-लतिया भी सकते हैं कि यूँही आपका वक़्त जाया किया।

Friday, 23 January 2009

"बैले दे ज़ू" देखकर पीयर के लिए

इससे तो बेहतर है
अनजान लोगों से बतियाया जाए कुछ भी
किताबों में घुसा लिया जाए सिर
एक के बाद एक चार-पांच फ़िल्में देख डाली जाएं
पूरी रात का सन्नाटा मिटाने के लिये
टके में जो साथ हो ले
ऐसी औरत के साथ काटी जाए दिल्ली की गुलाबी ठंडी शामें
गुलमोहर के ठूँठ के नीचे
या दोस्तों को बुला लिया जाए मौके-बेमौके दावत पर

तुम्हे प्यार करते रहना खुद से डरने जैसा है
और डर को भुलाने के लिये जो भी किया जाए सही है।

Monday, 19 January 2009

परमाणु बम - दूसरे विश्वयुद्ध का निर्णायक हथियार



सापेक्षता के सिद्धांत के द्वारा परमाणु उर्जा की थ्योरी विकसित करने का श्रेय आइंस्टाइन को जाता है जिसके आधार पर तकरीबन चालीस साल बापरमाणु बम बनाया गया। १९३८ तक यह थ्योरी थ्योरी ही रही। उस साल तीन जर्मन वैज्ञानिकों ने एक खोज की। ओट्टो हान, लीजे माइत्नेर और फ्रित्ज़ स्ट्रास्मान ने पाया कि यदि यूरेनियम पर न्युट्रान बरसाया जाए तो उससे बेरियम और क्रिप्टन उत्सर्जित होते हैं और इस प्रक्रिया से बहुत गर्मी पैदा होती है जिसे न्यूक्लिअर फ़िज़न कहते हैं। तकरीबन इसी वक़्त डेनिश मूळ के वैज्ञानिक नील्स हेनरिक डेविड बोअर ने महसूस किया कि इस प्रकिया के द्वारा सामरिक हथियार विकसित किया जा सकता है। अगले साल १९३९ में नील्स अमेरिका चले गए। उनका उद्देश्य अमेरिका को इस तरह के हथियार पर काम करने के लिए चेताना था और वे चाहते थे अमेरिका इसपर जर्मनी से पहले सफलता प्राप्त करे। जिस ओर जर्मनी दूसरे विश्व युद्ध में जा रहा था यह कदम ज़रूरी भी लग रहा था।


नील्स ने अमेरिका पहुँच कर हंगेरियन मूल के भौतिकशास्त्री लियो स्जिलार्ड से संपर्क साधा और उन्हें इस बारे में बताया। लियो ने तत्काल आइंस्टाइन से बात की जोकि अमेरिका में ही थे। आइंस्टाइन के सिद्धांत ने ही न्यूक्लिअर फ़िज़न के दरवाज़े खोले थे और वे विश्व के निर्विवाद प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे। आइंस्टाइन ने राष्ट्रपति रूज़वेल्ट को २ अगस्त १९३९ को वह मशहूर पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अमेरिका को जर्मनी द्वारा इस ओर प्रयोग करने के बाबत लिखा और चेताया कि नाज़ियों द्वारा इस तरह का अस्त्र बनाने में सफलता पाने से विश्व भर के लिए क्या खतरा हो सकता है। हालाँकि बाद में उन्होंने अपने इस पत्र पर अफ़सोस व्यक्त किया मगर भविष्य में क्या होगा यह उस समय कहना सम्भव नहीं था।


असीमित संभावनाओं वाले इस संभावित अस्त्र के निर्माण को गोपनीय रखना आवश्यक था। राष्ट्रपति ने परमाणु बम को विकसित करने का काम अमेरिकी सेना के मैनहैटन विभाग को सौंपा जिसकी वजह से इस परम गोपनीय प्रोजेक्ट को मैनहैटन प्रोजेक्ट कहा जाता था। इस प्रोजेक्ट का सञ्चालन करने का जिम्मा मेजर जनरल लेसली ग्रोव्स को दिया गया और इसके निर्माण से चार यूरोपी प्रवासी जुड़े। इस प्रोजेक्ट की गोपनीयता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी सरकार में इसके बारे में लगभग कोई नहीं जानता था। यहाँ तक कि रूज़वेल्ट की आकस्मिक मृत्यु होने पर जब ट्रूमन राष्ट्रपति बने तो उन्हें भी इसकी कोई जानकारी नहीं थी। मगर साथ ही यह भी सच है कि कुछ लोगों ने सोवियत, जोकि उस समय अमेरिका का युद्ध में सहयोगी था, को इस प्रोजेक्ट के कुछ गोपनीय दस्तावेज उपलब्ध कराये थे।


अब सबसे पहले एक न्यूक्लिअर रिएक्टर बनाने की आवश्यकता थी जिसके द्वारा चेन-रिअक्शन किया जा सके। यह काम शिकागो विश्वविद्यालय में इटालियन भौतिकशास्त्री एनरीको फ़ेर्मी के निर्देशन में अंजाम दिया गया। ये वही फ़ेर्मी थे जिन्हें १९३८ में न्यूटरोन फ़िज़िक्स में शोध के लिए नोबेल मिला था। शिकागो रिएक्टर में ५० टन यूरेनियम, केडमियम कंट्रोल रौड्स, ५०० टन ग्रेफाईट इस्तेमाल किया गया। चेन-रिअक्शन कराने में अगले तीन साल लगे और २ दिसम्बर, १९४२ को इसमें सफलता पायी गई। मेजर जनरल ग्रोव्स ने मैनहैटन प्रोजेक्ट के लिए गुप्त रूप से तीन केन्द्र स्थापित किए। पहला केन्द्र टेनेसी में बनाया गया जहाँ यूरेनियम-२३५ फेक्ट्री लगाई गई। इसके लिए भारी मात्रा में बिजली की ज़रूरत थी जो टेनेसी में नवनिर्मित हाइड्रो-इलैक्ट्रिक बांधों से उपलब्ध कराई गई। वाशिंगटन में प्लूटोनियम-२३९ केन्द्र स्थापित किया गया। तीसरा केन्द्र असल में एक प्रयोगशाला था जोकि न्यू मेक्सिको के पास लोस आलामोस में थी। यही वह जगह थी जहाँ परमाणु बम वास्तव में बनाया गया। फ़ेर्मी के साथ हंगेरियन भौतिकशास्त्री लियो स्जिलार्ड भी इस प्रोजेक्ट से जुड़ गए। ये वही लियो स्जिलार्ड थे जिन्होंने आइंस्टाइन से रूज़वेल्ट को पत्र लिखने के लिए कहा था। जिस समय फ़ेर्मी शिकागो में काम कर रहे थे लगभग उसी समय रॉबर्ट ओपनहाइमर और उनके साथ कुछ और वैज्ञानिक केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में न्यूक्लिअर फ़िज़न पर काम कर रहे थे। उन्होंने पाया कि यूरेनियम-२३५ के अलावा प्लूटोनियम-२३९ से भी न्यूक्लिअर फ़िज़न करना सम्भव है। इसी के आधार पर जनरल ग्रोव्स ने तीन केन्द्र स्थापित किए थे। अब रॉबर्ट ओपनहाइमर भी मैनहैटन प्रोजेक्ट से जुड़ चुके थे। चौथे वैज्ञानिक आर्थर कोम्प्टन थे जो इस प्रोजेक्ट से जुड़े।


पहला परमाणु हथियार, जोकि एक यूरेनियम-२३५ बम था, का सफल प्रयोग १६ जुलाई १९४५ में न्यू मेक्सिको के रेगिस्तान में किया गया। इसे कोड दिया गया - ट्रिनिटी। इसके समानांतर अमेरिकी वायुसेना ने एक संगठन स्थापित किया जिसे ५०९ कोम्पोसिट ग्रुप नाम दिया गया। इस ग्रुप को अज्ञात विशाल बमों को गिराने की ट्रेनिंग दी गई और इस काम के लिए बोइंग बी-२९ बोम्बर्स का इस्तेमाल किया गया। १९४५ के मध्य तक विश्व भर में सैनिक और राजनैतिक माहौल तेजी से बदल चुका था। राष्ट्रपति रूज़वेल्ट की अप्रैल में मृत्यु हो चुकी थी और मई में जर्मनी आत्मसमर्पण कर चुका था। यूरोप में विश्वयुद्ध ख़त्म हो चुका था और मित्र देशों ने अपना ध्यान अबतक पूरी तरह से जापान पर केंद्रित कर लिया था। मैनहैटन प्रोजेक्ट से जुड़े लगभग सभी वैज्ञानिक इसी वजह से इससे जुड़े थे ताकि जर्मनी के इस ओर सफलता हासिल करने से पहले अमेरिका या मित्र देश इसपर काम शुरू कर दें मगर जापान पर इसका इस्तेमाल हो वे इसके हिमायती नहीं थे। पर अब बात उनके चुनाव की नहीं रह गई थी। इवो जिमा और ओकिनावा में चल रहे युद्ध में मित्र देश जापान द्वारा बुरी तरह पछाडे जा चुके थे। मित्र देशों का अंदाजा था कि यदि युद्ध जापान की धरती पर इसी तरह चलता है तो लगभग दस लाख जाने जा सकती हैं और इनमे से ज्यादातर अमेरिकियों के होने की सम्भावना ट्रूमन को यह मंज़ूर नहीं था। उन्होंने अपने केबिनेट और उच्च सैनिक सलाहकारों के साथ मीटिंग के बाद तय किया कि जापान के ख़िलाफ़ दो परमाणु बमों का प्रयोग किया जाए।


पहला बम, जिसे "लिटिल बॉय" के नाम से जाना जाता है, वास्तव में लिटिल नहीं था। उसका वज़न ९,७०० पाउंड था। यह एक यूरेनियम बम था और ६ अगस्त १९४५ को इसे हिरोशिमा पर गिराया गया। इसके तीन दिन बाद अगला बम, जोकि एक प्लूटोनियम बम था, नागासाकी पर गिराया गया। इस बम का वज़न तकरीबन दस हज़ार पाउंड था. हिरोशिमा में परमाणु बम के हमले से अस्सी हज़ार लोग तो तत्काल मारे गए और नागासाकी में गिराए गए परमाणु बम "फैट मैन" से चालीस हज़ार लोग मारे गए। आने वाले दिनों में मरने वालों की संख्या लगभग दुगनी हो गई। जापान को लगा कि अमेरिका अगर चाहे तो ऐसे कई और परमाणु हमले जापान पर कर सकता है जोकि हालांकि सही नहीं था मगर अंततः जापान ने १५ अगस्त को मित्र देशों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अमेरिका ने पूरी कोशिश की कि कोई भी अन्य देश परमाणु हथियार बनाने या प्राप्त करने में सफल न हो सके। अमेरिका को अपने प्रयासों में पहला झटका १९४९ में लगा जब अमेरिका से चोरी से प्राप्त दस्तावेज़ों के आधार पर सोवियत ने भी परमाणु बम बना लिया। इस तरह अमेरिका का वर्चस्व समाप्त हो गया और दुनिया प्रत्यक्ष रूप से दो धुरियों में बंट गई। इसके पीछे अमेरिका की अपना एकाधिकार बनाये रखने की कामना काम कर रही थी या उसे इस विनाशक हथियार के ग़लत इस्तेमाल की चिंता खा रही थी यह बहस का विषय हो सकता है। विश्व का अग्रणी बनकर वह कूटनीतिक और अगर ज़रूरत पड़े तो शक्ति द्वारा यह कोशिश करता आया है कि कोई भी देश परमाणु शक्ति संपन्न न बन सके किंतु ज्ञान और विज्ञान पर एकाधिकार बनाए रखने की मंशा इस युग में सम्भव नहीं है अमेरिका को यह समझना चाहिए। वैसे भी एकमात्र परमाणु हमला करने वाले देश को नैतिक स्तर पर भी यह अधिकार नहीं कि वह परमाणु शक्ति संपन्न देश का अपना स्टेटस बरकरार रखते हुए किसी और को यह साधन प्राप्त करने से रोके।

Saturday, 10 January 2009

द्वितीय विश्व-युद्ध के रहस्यमयी हथियार - २


यह असंभव था कि जर्मनी के आत्मसमर्पण के बाद मित्रदेश मिलकर भी जापान पर काबू न पा सकते। ऐसे में अमेरिका के जापान के ख़िलाफ़ परमाणु हथियार प्रयोग किए जाने के क्या कारण हो सकते थे? दरअसल इवो-जीमा और ओकिनावा में जापान की सशक्त रक्षात्मक प्रणाली से बौखलाए अमेरिका को लगा कि यदि युद्ध इसी रूप में चलता है तो अकेले अमेरिका ही अपने दस लाख सैनिक तक गँवा सकता है जोकि उसे मंज़ूर नहीं था। इसी बौखलाहट के चलते सेना के विभिन्न अंग अलग-अलग तरह के उपाय सोच रहे थे। मुख्य रूप से दो उपाय अमेरिका के सामने थे और दोनों ही बेहद घातक। इनमे से एक कोई नई चीज़ नहीं था हालांकि उसका प्रयोग सीमित था और दूसरा विज्ञान का ताज़ा चमत्कार - ज़हरीली गैस और परमाणु बम।

ज़हरीली गैस का प्रयोग प्रथम विश्व-युद्ध के दौरान भी किया गया था और अगले बीस सालों में कई नई और ज़्यादा मारक गैसों की खोज की गई। मगर इनका प्रयोग इतना सीमित रहा कि उँगलियों पर ऐसे किस्सों को गिना जा सकता है। प्रथम विश्व-युद्ध में जर्मन, फ्रांस और ब्रिटिश सेनाओ ने इन गैसों का प्रयोग किया था और इसकी वजह से लगभग एक लाख लोग मारे गए। सबसे पहले जर्मन सैनिकों ने ज़हरीली गैस क्लोरीन का प्रयोग १९१५ में फ्रांसिसी सैनिकों के ख़िलाफ़ किया था। इस गैस को सफोकेटिंग गैस भी कहा जाता था क्योंकि यह फेफडों में घुसकर वहां तरलता पैदा कर देती थी और आक्सीजन को घुसने से रोक देती थी। इससे आदमी का दम घुट जाता था। इसके अलावा फोस्जीन और डीफोस्जीन का भी प्रयोग किया जाता था। मगर सबसे घातक मानी जाने वाली गैस ब्लिस्टर गैस थी जोकि दरअसल मस्टर्ड गैस (दिक्लोरेथिलसल्फाइड) थी। सर्वज्ञात है कि सद्दाम हुसैन ने इसी गैस का प्रयोग ईरानी सेना और ईराकी नागरिकों के ख़िलाफ़ अस्सी के दशक में किया था।

कुल मिलाकर ज़हरीली गैसों का प्रयोग दूसरे विश्व-युद्ध में बिल्कुल नहीं हुआ। इसके पीछे मुख्यतः तीन कारण थे; एक तो यह कि १९२५ में जिनेवा प्रोटोकॉल में ज़हरीली गैसों का युद्ध में प्रयोग निषेध कर दिया गया था। दूसरा यह कि हालांकि सभी देशों ने ज़हरीली गैसों का भण्डार खड़ा किया मगर उसका प्रयोग करने से यह सोचकर डरते रहे कि दूसरा देश भी उनके ख़िलाफ़ ज़हरीली गैसों का प्रयोग कर सकता है। मगर जो कारण सबसे प्रमुख है वह हिटलर का पहले विश्व-युद्ध के दौरान अपना निजी अनुभव था। १९१८ में बेल्जियम में लड़ते हुए हिटलर, जोकि उस समय जर्मन एम्पायर सेना में कोर्पोरल था, एक गैस हमले में फंस गया और तीन महीने के लिए अपनी आँखें गँवा दी। हिटलर के मन में इससे जो भय पैदा हुआ उसकी वजह से उसने, फ़्युह्रर बनने के बाद, साफतौर पर ज़हरीली गैसों के प्रयोग करने पर पाबन्दी लगा दी। यह बात और है कि बाकी सभी देशों की तरह जर्मन सेना भी ज़हरीली गैसें विकसित करती रही और उसका भण्डार खड़ा करती रही। यदि हिटलर के मन में ज़हरीली गैसों को लेकर भय न होता तो शायद दूसरा विश्व-युद्ध ज़्यादा घातक होता। क्योंकि किसी भी देश के इनके प्रयोग करने की स्थिति में अन्य देश अपने को रोक नहीं पाते और यह तय है कि हिटलर ज़रूर इनका प्रयोग करता। जिनेवा प्रोटोकॉल के बाद और दूसरे विश्व-युद्ध के शुरू होने के बीच भी एक-आध बार इन गैसों का प्रयोग किया गया था जैसे इटली ने इथोपिया में १९३५ में इनका प्रयोग किया जिससे लगभग १५००० लोग मारे गए। जापान एक ऐसा देश रहा जिसने १९३७ से लेकर १९४५ तक ज़हरीली गैसों का प्रयोग चीन के ख़िलाफ़ खुलकर किया। १९९५ में एक धार्मिक मत के आतंककारियों ने टोकियो के सबवे में एक गैस-हमला किया। इस हमले में ११ लोग मारे गए थे और कुल हताहतों की संख्या पाँच हज़ार से ज़्यादा थी। इस हमले में सरीन नामक गैस का प्रयोग किया गया था जोकि जापान ने ही दूसरे विश्व-युद्ध के दौरान खोजी थी और चीन में इसका प्रयोग भी किया था।

जापान के इन रासायनिक हथियारों के चीन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल की दूसरे विश्वयुद्ध ख़त्म होने के लगभग ४०-५० सालों तक ख़ास चर्चा नहीं हुई। १९९५ में कागानावा विश्वविद्यालय में कार्यरत प्रोफेसर काइची त्सुनाइशी के हाथ इम्पीरियल जापानी सेना का एक मेमोरेंडा लगा जिससे विश्व को जापान द्वारा चीन में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का पता लगा। जापानी सेना ने हिरोशिमा में तकरीबन ५० लाख गैस-शेल्स का उत्पादन १९३१ से १९४५ तक किया था। बाकी का उत्पादन चीन के मंचूरिया प्रान्त में किया गया। जब विश्व-युद्ध ख़त्म हुआ, उस समय भी चीन का काफ़ी बड़ा हिस्सा जापान के कब्जे में था। जब जापानी सेना लौटने लगी तो उन्हें महसूस हुआ कि ज़हरीली गैसों के भण्डार को, जो उन्होंने चीन में इकठ्ठा किया है, ठिकाने लगना ज़रूरी है। इस भण्डार को चीन में जगह-जगह गाड़ दिया गया। अगले चार दशकों तक इस भण्डार के बारे में किसी को पता नहीं चला। अस्सी के दशक के अंत तक संयोगवश ऐसे कई भंडारों का खुलासा होने लगा जिसके चलते चीन और जापान के राजनैतिक संबंधों में खटास पड़ने लगी। १९८९ में दोनो देशों में इन भंडारों को खोजने और नष्ट करने को लेकर बातचीत शुरू हुई और १९९९ में दोनों देशों ने एक मेमोरेंडम (Memorandum on the Destruction of Japanese Discarded Chemical Weapons in China Between the governments of the People's Republic of China and Japan) पर हस्ताक्षर किए। जापानी विदेश मंत्रालय के अनुसार १९९९ के अंत तक ऐसे सात लाख रासायनिक हथियार चीन में मौजूद थे जबकि चीन के अनुसार इनकी संख्या बीस लाख तक थी।

मानव-जाति को उन संयोगों और घटनाओं का ऋणी होना चाहिए जिनके कारणवश रासायनिक हथियारों का प्रयोग दूसरे विश्व-युद्ध में नहीं हुआ क्योंकि इनका प्रभाव अल्पकालिक नहीं होता। प्रथम विश्व-युद्ध के ख़त्म होने के बाद भी कितने ही लोग जो इन रासायनिक हथियारों के प्रभाव में आए थे, पूर्ण रूप से अपाहिज हो गए थे। ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं, ज़हरीली गैस कितनी भयानक हो सकती है इसका उदाहरण अपने देश में ही मौजूद है। भोपाल-त्रासदी को पच्चीस साल होने को आए मगर अभी तक उसकी भयावहता लोगों के ज़हन में ज़िन्दा है। वह भी तब जबकि वह कोई सैनिक अभियान नहीं था और mass-destruction करना भी वहां उद्देश्य नहीं था।

अगली पोस्ट में हम सबसे अधिक विनाशक और विवादस्पद परमाणु बम के बारे में चर्चा करेंगे।

पहला भाग यहाँ पढ़ें।

Tuesday, 6 January 2009

द्वितीय विश्व-युद्ध के रहस्यमयी हथियार


गाज़ा-पट्टी पर इज़राइल बमबारी कर रहा है। कल सुबह की चाय अख़बार में मृत बच्चे की तस्वीर देखते हुए पी। दिनभर समाचारों में भी मृत या घायल बच्चे दिखाए जाते रहे।

फ़िर एक मेल के जरिये पर्ल-हार्बर के हमले की तस्वीरें देखने को मिलीं और कल से बैठा हुआ nanking masscare के बारे में पढ़ रहा था। अचानक यह भ्रम टूटने को हुआ की हम पहले से बेहतर युग में जी रहे हैं। जाने कैसे वक्त के साथ-साथ यह धारणा मजबूत होती गई कि तमाम आधुनिकताओं से सज्जित मनुष्य का आज उसके कल से बेहतर है, मगर कुछ समय में यह भ्रम टूटा है। भटकते-भटकते हुए दिमाग जापान पर हुए परमाणु हमलों की ओर चला गया। अपनी और मित्र देशों के दस लाख सैनिकों की जान बचाने का ढोंग करने के लिए ट्रूमन ने तक़रीबन सवा दो लाख जापानियों को परमाणु बम के हवाले कर दिया, जिनमे से ज्यादातर नागरिक थे। संभवतः हिरोशिमा और नागासाकी अमेरिका के गिनी-पिग बन गए।

दूसरे विश्व-युद्ध के दौरान विज्ञान और तकनीक ने जिस गति से प्रगति की वह अचंभित करने वाला था, हालाँकि इस प्रगति के पीछे युद्ध में सफलता हासिल करना ही मुख्य उद्देश्य था और इसीलिए अस्त्र-शस्त्रों का जो जखीरा अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और जर्मनी ने इतने कम समय में खड़ा किया वह चमत्कार से कम नहीं लगता। वह भी तब जबकि अभी भी कई तथ्य अप्रकट ही हैं, जैसे क्या दूसरे विश्व-युद्ध के समय टेलीपोर्टिंग, अदृश्य करने की तकनीक और टाइम-मशीन जैसे आविष्कार किए जा चुके थे या नहीं। जहाँ लो सीक्रेट हथियारों और अविष्कारों के बारे में भी दुनिया को विश्व-युद्ध ख़त्म होने के कम से कम पच्चीस सालों बाद पता चला वहां इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी कई तथ्य गुप्त ही होंगे और कई गुप्त सबूत तो संभवतः X-Files के हवाले होकर अब तक गुम भी हो चुके होंगे।

आज भी अकसर "फ़िलाडेल्फिया - एक्सपेरिमेंट" की चर्चा उठती है जिसे आजतक सिर्फ़ अफ़वाह ही माना जाता है क्योंकि इसके बारे में न तो कोई सबूत मौजूद है और न ही कोई सरकारी बयान। माना जाता है कि अमेरिका ने १९४३ में अमेरिकी जलसेना के एक जहाजी बेड़े यू एस एस एलरिज को गायब करके कालयात्रा कराई गई और उसे समय में आगे ले जाकर वापस लाया गया था और टेलीपोर्ट करके फ़िलाडेल्फिया नेवल यार्ड से नोर्फोक, वर्जिनिया भेजा गया था। हालाँकि एल्डरिज की लॉग-बुक में ऐसे किसी परीक्षण का ज़िक्र नहीं है मगर एक अत्यन्त गुप्त प्रोजेक्ट "रेनबो" के अस्तित्व के बारे कोई शक नहीं है, जिसके अंतर्गत फ़िलाडेल्फिया - एक्सपेरिमेंट किए जाने की बात उठती है। वैसे जानकार तो यह कहते हैं कि प्रोजेक्ट रेनबो का उद्देश्य राडार पर बड़े ओब्जेक्ट्स की दृश्यता कम करना भर था। सच जो भी हो निश्चित ही रोचक होगा और सम्भव है घातक भी।

बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। थ्योरी के रूप में माना जाता है या उस समय माना गया कि यदि कोई वस्तु चुम्बकीय दबाव में हो तो ऐसे में उसके आसपास किरणों का स्वरूप बिगड़ जायेगा और राडार की तरंगों का भी। इससे वह वस्तु एक तरह से अदृश्य हो जायेगी। माना जाता है कि इस तरह के दो प्रयोग किए गए थे और उनमे से पहला प्रयोग २२ जुलाई १९४३ को फ़िलाडेल्फिया नेवल यार्ड में किया गया था। इसके लिए बड़े जनरेटर चालू किए गए। ऐसा करते ही धुंध छा गई और उसने पूरे बेड़े को ढँक लिया और जब धुंध छंटी तो जहाज गायब हो गया था। इसके बाद जनरेटर को बंद करते ही धुंध और जहाज वापस अपनी जगह पर आ गए। माना जाता है कि उसी साल अक्टूबर में जहाज फ़िर से गायब हुआ और नोर्फोक में प्रकट हुआ, फ़िर नोर्फोक से गायब होकर फ़िलाडेल्फिया में प्रकट हुआ। फ़िलाडेल्फिया - एक्सपेरिमेंट तथाकथित रूप से विश्व-युद्ध के बाद भी चालू रहा और इसे मोन्टोक-प्रोजेक्ट नाम दिया गया था। यदि जहाज के कर्मचारियों की गिनती न भी की जाए तो भी सैकड़ों लोगों ने इस अभियान के कभी न कभी प्रत्यक्ष गवाह होने की बात मानी है। कार्लोस आलेंदे या कार्ल एलेन नामक एक नाविक को इस प्रोजेक्ट का पहला प्रत्यक्ष गवाह माना जाता है। इस विषय पर मात्र अफवाहें ही हों ऐसा नहीं है। इसे लेकर कई किताबें लिखीं जा चुकी हैं और दो फिल्में भी बनीं - १९८४ में The Philadelphia Experiment और १९९३ में बनी The Philadelphia Experiment-२।

ऐसे कितने ही आविष्कार थे जो उस समय किए गए होंगे और जिनके बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। सच जो भी हो और जितना भी हो मगर ऐसे अभियानों की चर्चा आज ६० साल बाद भी रहस्यमय, रोमांचकारी और डर पैदा करती है। जब लिखने बैठा था तो परमाणु बम के इतिहास के बारे में सोचकर लिखना शुरू किया था मगर वो अगली बार के लिए स्थगित। शायद गुप्त हथियारों के बारे में लिखते लिखते ही दस-बारह पोस्ट निकल जाएँ। इरादा तो कुछ ऐसा ही है।

Monday, 5 January 2009

बहुत दुविधा है भाई


किसी अच्छी ख़बर की आस बड़ी हो गई है। दिन-रैन इंतज़ार कि कोई ख़बर आने को है। मगर क्या ख़बर? ऐसा क्या होने को है जिसकी उम्मीद है? कुछ भी तो नहीं... फिर? ऐसा भी कोई देखा है जो बेमतलब और अनजान आस के लिए सारे काम छोड़कर बार-बार मैजिक आई से झाँककर कर देखता है कि कोई खड़ा तो नहीं बाहर, बार-बार ई-मेल खंगालता है, दौड़कर जाता है और लेटरबॉक्स टटोलता फिरता है? ऐसा क्यों होता है कि अकेलापन कई बार शरीर से बाहर झाँकने लगता है, सामने खड़ा मुँह चिढाने लगता है और हम अपने को बेबस पाते हैं? और ऐसा भी क्या अकेलापन कि पचास लोगों के बीच कहीं से उग आए? कोई कारण तो हो। सवाल मुश्किल होता है और उत्तर ऐसा कि ख़ुद से उसकी उम्मीद नहीं की जा सकती। किसी और से उत्तर की आशा भी बेवकूफ़ी लगती है।


दरअसल दिन रात में फ़र्क करना ही भारी पड़ने लगता है। दिन को सोओ और रात को जागो या रात को सोओ, दिन को जागो, फ़र्क पड़ना बंद हो जाता है। हर वक्त घटाटोप ही लगता है। हर तरफ़ ऐसी बेतरतीबी पसर जाती है कि सरदी की रातें पसीने से तर हो जाती हैं; हफ्ते के दिनों में फ़र्क करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में ब्रांडी की बोतल भी फटने को होती है। आधी रात की चुप्पी में हौले से उठो तो लगता है उस घर में नहीं उठे जहाँ सोये थे। दीवारों के सुर बदल जाते हैं। लोग बात करते हैं तो जवाब नहीं आता ज़बान तक; फिर अपने से ही पूछा जाता है ये सवाल कि ये लोग एकालाप क्यों कर रहे हैं। मैं तो इनसे बात कर नहीं रहा... मुझे तो किसी होनी का इंतज़ार है... मैं तो मुन्तजिर हूँ... इनसे बात कैसे करूँ?


अब कोई पूछे तो क्या बताऊँ किस बात का इंतज़ार है? क्या होने वाला है? चुप रहकर किस-किस को नाराज़ किया जाए? मगर बात करके भी किस-किस को मनाया जाए?