Monday, 17 November 2008

घुन्ना

मैं प्रेम-गीत पढ़ता हूँ और हँस देता हूँ
क्या मैनें लिखी कोई कविता तुम्हारे नाम?
या गुलदस्ते में सजाकर दिया था तुमनें अपना प्रेम?
हम जानते थे प्रेम-कविताओं की क्षुद्रता
हँसते थे और हँसते-हँसते रो देते थे
तब प्यार हमें ले गया था वहाँ
हर चीज़ जहाँ से छोटी नज़र आती है।
हमारे लिये न कविताएँ थीं,
न चाहिये थे हमें बिछोह के गीत।

एक प्रेम बेआवाज़ घुल जाता है हवा में;
विदेह होता है एक प्रेम
एक प्यार ऐसा भी तो होता है।
खंडित स्मारक पर बैठा हूँ मैं
पढ़ता हूँ एक प्रेम-गीत
पढ़ता हूँ और हँसता हूँ अकेला।

Friday, 7 November 2008

चंद ज़रूरी लोगों के नाम

कितना कुछ बदल गया?
कुछ लोग आगे निकल गये, कुछ रह गए पीछे
साथ कोई न रहा,
शांत लहर के नीचे जन्म ले रही हैं मछलियाँ

शहर चमचमाकर नए हो गए
मगर पुरानी पड़ गईं उनकी स्मृतियाँ,
बासी किताबों पर पीलापन चढ़ गया
और बाकी बचे खतों को कुतर रही है उदासी,

ढहती दीवारों पर उठती है नई धूप
और अवसाद पर भी जम जाती है स्नेह की परत

अंधेरा अब भी वही है,
कोई बदलाव नहीं उसके भारीपन में
न उदासी में,
मुझे अंधेरे कोने में बैठना अब भी भाता है,

बावजूद इसके कि दुनिया घूमती है,
हाशिये पर उतर गए समय के बावजूद
तुम्हारे साथ रहता हूँ मैं आज भी उसी युग में
जिस युग में हम मिले थे आखरी बार
और पहली बार

कितना आशातीत था हमारा अलग होना,
और कितना असंभव
एक दूसरे को सिर्फ़ याद करते हुए जीवित रह जाना

कुछ लोग और चंद बातें
अभिशप्त होती हैं सिर्फ़ दस्तावेज़ बनकर रहने के लिये
न उनका वर्तमान में कोई स्थान होता है, न भविष्य में,
मैं तो तुम्हारे अतीत में भी मर चुका हूँ न?

बड़ा कठिन लगता है मुझे
अच्छे लोगों के साथ गुज़ारे दिनों को याद करना,
फिर चाहे वे अच्छे दिन हों या बुरे
प्रेम कोई हिमालय तो नहीं
जिसे रखा जा सके हमेशा ताज़ा और पवित्र।

Tuesday, 4 November 2008

हेरमान हेस्से, एक बार फिर

हेरमान हेस्से की दो और कविताओं का अनुवाद कर पाया हूँ जिन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये और, शिरीष भाई के अनुनाद के लिये दो अनुवाद मैनें अपने दफ़्तर का एक ज़रूरी काम स्थगित करके किये, जोकि अच्छी बात नहीं है, मगर मैं जब भी हेरमान की कविताएँ लेकर बैठता हूँ सिटिंग लंबी हो जाती है और कुछ न कुछ अनुवाद करके ही उठता हूँ। सो आज के लिये ये दो कविताएँ:


बिना तुम्हारे

मेरा तकिया ताकता है मुझे हर रात
किसी कब्र के खालीपन में
सोचा नहीं था
इतना कठिन होगा अकेला होना
न मिल पाना तुम्हारे बालों की बिछावन

अकेला लेटा हूँ मैं सुनसान घर में
झूलते मद्धम दिये के साथ
और धीरे से फैलाता हूँ हाथ
तुम्हारे हाथों के लिये
बढाता हूँ अपना गरम मुँह हौले से तुम्हारी ओर
चूमता हूँ अपने को ही निरुत्साह और थकान से
और अचानक उठ बैठता हूँ
मेरे चारों ओर तनी हुई है सर्द रात की चुप्पी
खिड़की से बाहर चमकता है एक साफ तारा
कहाँ हैं तुम्हारे सुनहरे बाल
कहाँ है तुम्हारा खूबसूरत चेहरा?

अब हर हर्ष में पाता हूँ मैं दु:ख
और शराब में ज़हर
जानता नहीं था
इतना कठिन होगा अकेला होना
अकेला और तुम्हारे बिना।



फूल भी


फूल भी पाते हैं मृत्यु
हालांकि वे निष्पाप होते हैं
ऐसे ही हमारा अंतस निष्पाप होता है
और झेलता है सिर्फ़ दुख
हम खुद ही यह समझना नहीं चाहते

जिसे हमनें ग्लानि पुकारा
उसे तो सूर्य निगल गया है
पवित्र फूलों के भीतर से निकल
आता है वह हमें मिलने
खुशबू की तरह, बच्चों की करुण दृष्टि की तरह

और जैसे फूल मुरझाते हैं
हम भी मरते हैं
मरते हैं मुक्ति की मृत्यु
मरते हैं पुनर्जन्म के लिये।

Saturday, 1 November 2008

सचेतन में रहेगी पीड़ा

अकेला बैठ अपनी कुर्सी पर
मैं सोचता हूँ,
सोचता हूँ और हैरान होता हूँ
चुप हो जाता हूँ,
इतना चुप कि बेआवाज़ी भी सन्न हो जाती है

कैसी अफ़ीम घुली थी उन दिनों में
जब सड़क पर गुज़रते लोगों से बेपरवाह
मैं चूमता था उसका चेहरा हाथों में लेकर?

पतझड़ में जब पेड़ ठूँठ हो रहे थे
मैं पूछ रहा था अपने से
देखा क्यों नहीं कभी
कैसा होता है पेड़ों का हरियाना?

जर्जर होकर बिखरता हूँ मैं भीतर
देखता हूँ अपना विदीर्ण होना
और जानता हूँ बरसों बाद
मुझे सोचना नहीं पड़ेगा
कैसा था बिखराव का दर्द।