Monday, 22 September 2008

माँ की उपस्थिति और यादों की पगडंडी

बरसों पहले जो लिखा था आज वह यकायक मेरे दिमाग में कौंध गया:

कुछ दिनों पहले ही तालस्ताय का लिखा एक वाक्य पढ़ा था, “जब आप सुदूर यात्रा पर जाते हैं तो आधी यात्रा तक पीछे छुटे शहर की यादें पीछा करती हैं। आधी यात्रा के बाद ही हम उस जगह के बारे में सोच पाते हैं जहाँ हम जा रहे हैं।” सोचता हूँ, क्या यह बात बिल्कुल सही है? पहाड़ों से लौटते हुए मैं कई कई दिनों तक सिर्फ़ पहाड़ों के बारे में ही सोचता रहता हूँ और अपनी दिनचर्या में गड़बड़ा जाता हूँ जिसक खामियाजा मुझे अकसर भुगतना पड़ता है।

मगर यह अनायास ही नहीं है। परसों माँ को दिल्ली से अपने साथ लेकर आया हूँ और सलीके से चार साल में यह पहली बार है कि हमनें खूब सारी बातें कीं और ज़ाहिर है इतने लंबे अंतराल के बाद की गई बात में उन विषयों को भी छुआ गया, जिनपर पहले कभी चर्चा करने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई या चर्चा करने से बचा किये। इस दौरान साल में एक बार की गई अपनी दिल्ली यात्रा में मैनें महसूस किया कि माँ-पिता के बुढाने की गति बढ़ गई है और यह भी कि हर दुख-तकलीफ़ एक दूसरे से छिपाने की आदत भी हमें पड़ गई है, जोकि इस बार कुछ हद तक ज़ाहिर हुई हैं।
माँ ने (हमारे यहाँ पहाड़ों में माँ को तू ही कहा जाता है) अपना आधा जीवन गाँव में ही बिताया है, इसलिये वह आज भी पूरी तरह गाँव से ही जुड़ी हुई है। पिछले लगभग 35-40 सालों का दिल्ली जीवन भी उसकी सोच और जीवन-शैली को नहीं बदल पाया और वह आज भी पहाड़ी किस्म की हिन्दी ही बोलती है। फ़सक मारना (गप्पें मारना) पहाड़ों के रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ा है। मैं तो इसे एक विधा ही मानता हूँ और मेरी माँ को ईश्वर ने विशेष तौर पर इस विधा से नवाज़ा है।
परिवार भर के छोटे-छोटे बच्चे जब तब इकठ्ठे होकर माँ से अपने माँ-पिताओं के बचपन के किस्से सुनाने को कहते और फ़िर माँ की बातें सुन-सुनकर हँस-हँसकर दोहरे हो जाते। माँ परिवार की सबसे बड़ी बहू है और पिताजी और चाचा-बुआओं में उम्र का बहुत बड़ा अंतर है।
बातों का क्रम जब शुरु हुआ तो बचपन की कई निरर्थक बातें भी दोहराई गईं, जिनमें यूँ तो कोई सार नहीं मिलता मगर अर्थ बड़े गूढ़ निकल आते हैं। गाँव से नया-नया आकर मेरे कालोनी में गुम हो जाने पर अपनी बिल्डिंग से निकलकर दूसरी बिल्डिंग में भटकते हुए यह दोहराना, “हमरौ घर काहूँ गोइ ह्यूनल?” मुझे अब भी धुँधला सा याद है। या बारिश के कीचड़ में पत्थर फेंकते हुए अपना ही सर फुड़वा लेने पर माँ के पूछने पर हँसते हुए यह कहना कि कुछ नहीं हुआ। ऐसे ही सर फूट गया थोड़ा सा।
फिर हर साल गाँव में गर्मियों की छुट्टियाँ गुज़ारने जाना और रैगाड़ में थककर चूर हो जाने तक नहाना या बेमतलब यूँही घूमने निकल पड़ना। डरते-डरते जागर में बैठना (जागर एक धार्मिक अनुष्ठान होता है जिसमें किसी निर्धारित व्यक्ति के शरीर में देवता का आह्वाहन किया जाता है। इसके लिये हुड़का, थाली, दाड़िम की सींकों वगैरह का प्रयोग किया जाता है)।
इन सब बातों में कोई अर्थ नहीं, मगर जब इन सब बातों की याद आती है और जब वर्तमान से इनका तालमेल बैठाने की कोशिश करता हूँ तो तारतम्य के सूत्र खोने लगते हैं। स्कूल के दिनों में ही मुझे लगने लगा था कि मैं उस पीढ़ी से हूँ जो ट्रांसिशन से गुज़र रही है। इस पीढ़ी ने एक ओर तो बरसों-बरस से चली आ रही भारतीय जीवन-शैली देखी है और दूसरी ओर भारत के पूँजीवादी वर्ग में प्रवेश के कारण हुए बदलावों को भी इसी पीढ़ी ने जिया है। अब कहीं तो लोग अतीत को पीछे छोड़ इन बदलावों को खुशी से भोग रहे हैं और कुछ मेरे जैसे उसी अतीत को ॠषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों की तरह बार-बार देखते हैं जोकि मात्र कपोल-कल्पना है। आज भी यदि मैं सब छोड़कर किसी छोटे शांत कस्बे में बस जाना चाहता हूँ तो उसके पीछे अतीत में लौटने की आकांक्षा ही है। मैं अतीत और वर्तमान के बीच त्रिशंकु की तरह अटका हुआ हूँ। मेरी पत्नी जी को इस तरह की कोई दुविधा नहीं। वह दिल्ली में ही पैदा हुई और वहीं बढ़ी हुई। उसका कोई गाँव नहीं।
बहरहाल, यह ट्रांसिशन हर बार बेहद यातनादायक होता है और मैं कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाता। ऐसे में कुमाऊँनी गाने सुनने के अलावा क्या किया जा सकता है? जागर सुनने की बात चल रही थी। जागर सिर्फ़ देवताओं को बुलाने का विश्वास-अविश्वास भर नहीं है। इस प्रक्रिया में जो गाया जाता है उसमें लोक-कथाएँ छुपी हैं, जोकि ज़ाहिर है मुझे ठीक से समझ नहीं आतीं। चलिये यही सुन लिया जाए।
हो सकता है मेरी बची-खुची शाम ठीक से बीत जाए।

Saturday, 13 September 2008

भारत की ट्रैफ़िक संस्कृति भाग - 2

ट्रैफ़िक संस्कृति का बनना-बिगड़ना दो पक्षों पर निर्भर करता है: प्रशासन और जनता। पहले प्रशासन की बात करें। बात ट्रैफ़िक की हो तो प्रशासन के भी कई हिस्से होते हैं जोकि इससे जुड़े होते हैं। मुख्य रूप से ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने वाली अथारिटी, सड़क निर्माण विभाग, म्युनिसिपैलिटि इत्यादि। इनके अलावा अप्रत्यक्ष रूप से तो योजना मंत्रालय से लेकर शहर का प्लानिंग विभाग तक अनगिनत विभाग संबद्ध होते हैं। अगर सीधा-सीधा सड़कों की बात करें तो आपको एक मूल अंतर फिर से दिखाई देगा। पश्चिम में सड़कें सिर्फ़ सफ़र के लिए होती हैं और भरसक कोशिश की जाती है कि घर, दफ़्तर इत्यादि सड़कों से दूर रहें। अपने यहां चूंकि सड़क आज भी विलासिता है इसलिये लोगों की पूरी कोशिश होती है कि जितना संभव हो सके, सड़क के पास घर या दफ़्तर हो। बीसियों सालों से उजाड़ पड़े द्वारका (दिल्ली में) में फ़्लैट्स की कीमतें मेट्रो के वहां पहुंचते ही आसमान छूने लगीं। यह बात और है कि वहां रहने वाले लोग शायद ही कभी मेट्रो का इस्तेमाल करें। मेरे एक मित्र का घर द्वारका में मेट्रो स्टेशन के बिल्कुल सामने है। दो साल पहले ही वे उस घर की कीमत 35लाख आंक रहे थे। मेट्रो स्टेशन के पास तो शोरगुल रहेगा न? तो कीमत कम होनी चाहिये। मगर ऐसा नहीं है। इसकी वजह यह है कि कमर्शियल तौर पर इस्तेमाल करने पर उस मकान का भरपूर लाभ उठाया जा सकता है और कनेक्टिविटी की दृष्टि से वह घर उत्तम जगह पर है। कनेक्टिविटी आज जेट एज के दौर में भी कितनी बड़ी चीज़ है हमारे लिए। इसके पीछे नियमों में जो गड़बड़ी उजागर होती है वह यह है कि जिसका जहां जी चाहे आफ़िस खोल सकता है, रिहायशी इलाकों में भी। रोकने वाला जो है उसकी जेब में कुछ डाल दीजिये और बस। और तो और पर्याप्त पार्किंग जैसी मूलभूत सुविधा के बारे में भी नहीं सोचा जाएगा। होगा क्या? यही कि उस दफ़्तर में आने वाले लोग अपनी गाड़ियां सड़कों पर खड़ी रहेंगीं और उसकी वजह से एक लेन ठप पड़ जाएगी। फिर ट्रैफ़िक जाम। आज ही पढ़ा कि बंगलौर की सड़कों का 25% पार्किंग की भेंट चढ़ जाता है।
इंग्लैंड में जिस भी स्टोर्स में गया, एक बात मैनें ज़रूर नोटिस की। स्टोर के आकार से बड़ी पार्किंग की उपलब्धता। ऐसा क्यों? इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो यह कि वहां हर व्यक्ति गाड़ी लेकर चलता है और ग्रोसरी स्टोर्स में प्रतियोगिता इतनी उग्र है कि सिर्फ़ पार्किंग न मिलने की वजह से कोई भी ग्राहक नहीं छोड़ना चाहेगा। दूसरी वजह है प्रशासन। प्रशासन आपको कुछ भी बनाने की इजाजत तभी देगा जबकि आप रोज़मर्रा के संभावित ट्रैफ़िक से कुछ प्रतिशत ज़्यादा की पार्किंग व्यवस्था करेंगे। यह बात सिर्फ़ ग्रोसरी स्टोर्स पर ही लागू नहीं होती। किसी भी तरह के व्यावसायिक संस्थान में हमेशा पर्याप्त पार्किंग की व्यवस्था होती है। अगर कोई छोटी सी मार्किट है तो उसमें दो पार्किंग होती हैं। एक तो उपभोक्ताओं के लिये और दूसरी दुकानदारों के लिये जोकि दुकानों के पीछे होती है।
इधर प्रशासन, माने डेवेलेपमेंट अथारिटी इस बारे में सोचती नहीं। अगर नियम बनाए भी गए हैं तो उनका पालन नहीं होता। यह पहली समस्या है। फिर बात आती है सड़कों की। जब मैं अपना लाइसेंस बनवाने गया तो इंटरव्यु में ट्रैफ़िक इंस्पेक्टर ने कुछ साइनबोर्ड दिखाए और उनका मतलब पूछना शुरु किया। जोकि आसान से धीरे-धीरे मुश्किल साइनबोर्ड्स तक गया। कुछेक का जवाब मैं नहीं दे पाया। मैनें कहा कि ये साइनबोर्ड्स मैनें आजतक सड़कों पर नहीं देखे तो इनके बारे में पूछने की फ़ार्मैलिटी क्यों? इसपर मुझे फेल कर दिया गया। इंस्पेक्टर की गलती नहीं थी। मेरी भी नहीं थी। गलती प्रशासन की थी। साइनबोर्ड्स लगाने का काम इतना कैज़ुअली किया जाता है यह जगजाहिर है। अगर लगा तो ठीक नहीं तो रामभरोसे। और तो और साइनबोर्ड्स का तो आकार, रंग वगैरहा भी निर्धारित नहीं होते। वैसे भी सड़कें व्यावसायिक और पालिटिकल साइनबोर्ड्स से ही इतनी भरी होती हैं कि कुछ और देख पाना संभव नहीं हो पाता। इसपर यदि आपको साइनबोर्ड्स नहीं दिखाई दिया और गलती हो गई तो ज़िम्मेदारी आपकी। लेन सिस्टम अपनाने की बात भी अक्सर कही जाती है। जहां लेन होती है वहां भी कोई इस ओर ध्यान नही देता। मगर ऐसा क्यों है? इसके कई कारण हैं। मुख्य कारण तो यही है कि लोगों को ट्रैफ़िक के नियमों की ओर जागरुक नहीं किया जाता। लाइसेंस कैसे बनाए जाते हैं यह तो जगजाहिर है। लेन सिस्टम वहीं अपनाया जा सकता है जहाँ पर लेन बनाई गई हों। अब सोचिये कि भारत के किसी शहर की कितनी सड़कों पर लेन बनाई जाती हैं? सड़क के दोनो ओर कार्नर लेन मार्किंग पर हमेशा मिट्टी की परत चढ़ी रहती है। बाईं ओर की लेन अक्सर पार्किंग के लिये इस्तेमाल की जाती है और कहीं भी कोई गाड़ी खड़ी मिलने या लोगों के सड़क पर चलने की संभावना के चलते इस लेन को इस्तेमाल ही नहीं करना चाहता। फिर होता यह है कि इस लेन पर धीरे-धीरे मिट्टी की चादर बिछ जाती है और ड्राइविंग के लिये यह लेन सुरक्षित नहीं रह जाती। अब देखिये कि तीन लेन की सड़क में से एक लेन इस्तेमाल न हो पाने के कारण 33% सड़क तो यूँही खत्म हो जाती है।
हम बात कर रहे थे लेन सिस्टम की तो किसी भी शहर को देख लीजिये आपको आधे से ज़्यादा सड़कों पर लेन ही नहीं दिखेंगीं। यह अधूरा काम लोगों को लेन सिस्टम फ़ालो न करने के लिये प्रेरित है। सब सड़कों पर लेन न बनाकर प्रशासन जनता को यही संदेश प्रेषित करता है कि लेन सिस्टम सिर्फ़ एक फ़ार्मेलिटी है और नतीजा सामने आता ही है। लोगों को लेन सिस्टम के मूलभूत नियम भी नहीं मालूम। लोग दायें-बायें मुड़ते हुए इंडिकेटर देते हैं जबकि इंडिकेटर तब दिया जाना चाहिये जब आप एक लेन से दूसरी लेन में जा रहे हों। दूसरी बात सड़कों पर दायें-बायें मुड़ने के निशान अकसर नहीं बनाए जाते और यदि बनाए जाते हैं तो बिल्कुल सिग्नल के पास जबकि ये निशान वहां होने चाहिये जहां पर लोग लेन बदलते हैं मतलब सिग्नल से कम से कम 400-500 मीटर की दूरी पर ताकि लोग सही समय पर अपनी लेन निर्धारित कर लें। इसके लिये सड़कों पर दिशा-निर्देश सूचक साइनबोर्ड्स भी लगे होने चाहिये जोकि दिल्ली में हाल के सालों में लगने लगे हैं मगर बंगलौर में उनका अब भी सर्वथा अभाव है।
लेन सिस्टम तभी ठीक से अपनाया जा सकता है जबकि गति सम्बंधित नियम ठीक से अपनाए जाएं। किसी सड़क के एक स्ट्रैच पर बड़ी गाड़ियों के लिये गति-सीमा 40 होती है और छोटी गाड़ियों के लिये 50 या 60। वैसे तो इस नियम का पालन किया ही नहीं जाता, यदि किया भी जाए तो कई कठिनाइयां आएंगीं। एक बस जो 40 की गति पर चल रही है और उसके लिये बायीं लेन निर्धारित है। यदि उस बस को दायीं ओर जाना है तो इस प्रक्रिया में उन सभी गाड़ियों की गति बाधित होगी जो उस बस के पीछे 60 की गति से चल रही हैं। यह प्रक्रिया हमारी सड़कों पर इतने बार दोहराई जाती है कि बंगलौर की औसत गति 10 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई है। इसकी वजह है शहर की प्लानिंग। हर 100 मीटर पर एक मोड़ या कट होता है और उसके लिये कोई सिग्नल या लेन हो ज़रूरी नहीं। इसका असर ट्रैफ़िक की गति पर दिखाई पड़ता है।
बंगलौर में एक और चीज़ जो देखने में आती है वह है हर सिग्नल के पास स्पीड-ब्रेकर। मेरे अनुसार यह भी प्रशासन की ग़ैर-जिम्मेदारी का एक नमूना ही होता है। प्रत्यक्ष रूप से प्रशासन नियमों का पालन करवाने में असफल रहता है इसलिये ऐसे अप्रत्यक्ष तरीके अपनाता है। स्पीड-ब्रेकर की ऊँचाई और चौड़ाई नियमों में बंधी है मगर प्रशासन खुद इस ओर इतना लापरवाह होता है कि कई बार ऐसे स्पीड-ब्रेकर बनाए जाते हैं जिन्हें पार करने में ज़ेन जैसी लो ग्राउण्ड क्लियरेंस वाली गाड़ियों का तला उनसे टकरा जाता है। इन स्पीड-ब्रेकर्स पर अकसर ज़ेब्रा नहीं बनाए जाते जिसकी वजह से इन्हे रात में, और कई बार दिन में भी, देख पाना कठिन होता है। नतीजन होती हैं दुर्घटनाएं। इन दुर्घटनाओं में जो नुकसान होता है उसकी जिम्मेदारी प्रत्यक्ष रूप से प्रशासन पर होनी चाहिये। बंगलौर-मैसूर हाइवे पर एक जगह लोग सड़क पार करते हैं इसलिये प्रशासन ने वहां पर एक स्पीड-ब्रेकर बना दिया है। होना यह चाहिये था कि पैदल-पार पथ या सड़क पार करने वालों के लिये आप्श्नल रेड सिग्नल जैसा कुछ बनाया जाता, मगर प्रशासन ने स्पीड-ब्रेकर बनाकर छोड़ दिया, वह भी हाइवे पर। मैं रात को वहां से गुज़रा और मुझे वह स्पीड-ब्रेकर नहीं दिखाई दिया। दुर्घटना होते होते बची। प्रशासन की नज़र में नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं?

Thursday, 11 September 2008

भारत की ट्रैफ़िक संस्कृति भाग - 1

अभी पिछले दिनों पेन्सुल्वेनिया, अमेरिका से एक दल बंगलौर आया। उन्हें आमंत्रित करने के पीछे उद्देश्य था कि वे यहां की ट्रैफिक-स्थितियों का अवलोकन करें और विस्तृत सुझाव प्रस्तुत करें। उन लोगों ने शहर के दो-चार चक्कर काटने के बाद दो टुक शब्दों में कहा कि यहां भी वही टेक्नोलोजी इस्तेमाल हो रही है जो अमेरिका में होती है इसलिये इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है मगर बेहद बेसिक चीज़ें जैसे सड़कों पर गड़्ढ़े भरे होने चाहिये और लाइट की सही व्यवस्था होनी चाहिये आदि पर काम करने की सख्त ज़रूरत है।
यह ऐसे समय पर हुआ है जबकि मैं अपने भारत लौटने के बाद से ही रोज़ देर से दफ़्तर पहुँच रहा हूँ। 13 किलोमीटर तय करने में डेढ़ घंटे लगते हैं। जब मैं यहां से अप्रेल में गया था तब मुझे लगभग 45 मिनट लगते थे यानि 4-5 महीनों में 45 मिनट का अंतर आ गया। इस वजह से इस बारे में काफ़ी दिनों से सोच रहा था। दरअसल ट्रैफिक के बारे में उस समय सोचना शुरु किया जब बाइक हाथ लगी थी ’93 में। हालांकि उस दौरान ट्रैफिक की खास समस्या दिल्ली में थी नहीं। मगर यह बात शुरु से कचोटती रही है कि हमारी सड़कें इतनी खस्ताहाल रहती हैं, लोगों में ट्रैफिक-सेंस नहीं है और सरकारी मशीनरी भी ट्रैफिक को उतना ही हल्के तौर पर लेती है जितने हल्के तौर पर सड़क पर चलता हुआ आम आदमी।
बंगलौर अनपेक्षित रूप से और अचानक विकसित हो गया। विकसित का मतलब सिर्फ़ साफ़्टवेयर कंपनीज़ का यहां आना है, इंफ़्रास्ट्रक्चर के संदर्भ में तो सिर्फ़ बेड़ागर्क ही हुआ है जैसाकि भारत में हर बढ़ते शहर के साथ अनिवार्य रूप से होता ही है। मगर यहाँ के बारे में जो तथ्य मुझे रोचक लगता है वह यह कि बंगलौर सिलिकान सिटी बनने से पहले रिटायरमेंट हब हुआ करता था इसलिये यहां का माहौल काफ़ी लेडबैक टाइप हुआ करता था। भीड़ थी ही नहीं और दो-चार ही खासमखास इलाके थे जिनकी देखभाल प्रशासन को करनी होती थी। जब इस शहर का आकार बढ़ने लगा तो प्रशासन ने अपनी काम करने की गति में कोई सुधार करने की नहीं सोची। लोग आनन-फ़ानन में ज़मीन के बढ़ते दामों का फ़ायदा उठाने के चक्कर में गली-गली में इमारतें खड़ी करने लगे। सड़क जैसी बेसिक चीज़ के बारे में किसी ने सोचा ही नहीं। वैसे सड़क यहां पर न दस साल पहले बेसिक चीज़ थी न आज है। यह हाल कमोबेश पूरे भारत पर लागू होती है मगर बंगलौर इस मामले में अग्रणी है। चैन्नई और हैदराबाद में बंगलौर के मुकाबले बहुत बेहतर सड़कें हैं। मेरे नए फ़्लैट के आगे सड़क नहीं थी और लोगों ने फ़्लैट इसी शर्त पर खरीदे थे कि बिल्डर सड़क बनाकर देगा। जो काम प्रशासन का है उसके लिये पैसा हमारी ही जेब से जा रहा है। गाड़ी खरीदते वक़्त जो रोड-टैक्स आप भर रहे हैं सो अलग है। वैसे कुछ दिनों पहले ही खबर थी कि रोड टैक्स से मिले पैसों में से सिर्फ़ 55 करोड़ रुपये ही सड़कों के निर्माण और रख-रखाव पर खर्च किये गए हैं जबकी टैक्स लगभग 1700 करोड़ वसूला गया है। जहां तक मुझे याद पड़ता है बंगलौर में रोड-टैक्स पूरे देश में सबसे ज़्यादा अर्जित किया जाता है, दिल्ली से भी ज़्यादा। तो पैसे की कमी नहीं है। कमी है विज़न की। प्रशासन जिन लोगों के हाथ में है उन्हें या तो ट्रैफिक का क ख ग भी नहीं मालूम या फ़िर उन्हे इसमें कोई रुचि नहीं है। वे सिर्फ़ अपनी डयूटी बजाकर घर जाते हैं।
भारतीयों के दो कैरेक्टरिस्टिक हैं जिनके बारे में मैनें कुछ साल पहले सोचा था: हमें घिचपिच और भीड़-भड़क्के में रहने की आदत है और दूसरा हमें शोर से प्यार है। इसके दो उदाहरण हैं मेरे पास। हमारे शहरों में, कस्बों, कालोनियों में घर इतने पास पास बनाए जाते हैं, इतने चिपका चिपका कर कि एक के घर में झाड़ू लगे तो दूसरे के घर में उसकी आवाज़ जाती है। और जहां तक शोर की बात है तो हमारा शोरप्रेम तो जग जाहिर है। लोग सड़क को अपने बाप की जागीर समझकर वहां तंबू गाड़कर जगराता करते हैं और अपने साथ पूरे मोहल्ले को ज़बर्दस्ती जगाते हैं। सड़क पर चलते हुए लोग हार्न इस तरह बजाते हैं जैसे रफ़ी के गाने सुना रहे हों। इंग्लैंड में एक बार हम चार सहकर्मियों ने गाड़ी किराए पर ली और दो-चार शहर घूमने का विचार बनाया। तय किया गया कि गाड़ी मैं चलाऊँगा। गाड़ी गोडाउन से निकालने के बाद घर तक लेकर जानी थी जोकि एक किलोमीटर की दूरी पर था। यह काम मेरे एक सहकर्मी अंजाम देना चाहते थे। उन्होनें गाड़ी चलानी शुरू की और सड़क तक आए। आगे एक गाड़ी सड़क पर क्लीयरेंस मिलने का इंतज़ार कर रही थी। मेरे सहकर्मी का हाथ स्वत: ही हार्न पर चला गया जिसका मुझे पहले से ही अंदेशा हो रहा था। मैनें झट से उनका हाथ पकड़ लिया। 4 महीने में मुझे वहां पर सिर्फ़ तीन बार हार्न सुनने को मिला। यह अनायास ही नहीं कि हम सड़क पर हमेशा हार्न बजाते रहते हैं और न ही सिर्फ़ हमारे यहां की ट्रैफिक-परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि हमें हार्न बजाना पड़ता है।
दोनों ही देशों में यह जो अंतर है यह वास्तव में कल्चरल डिफ़ैरेंस है। उनकी संस्कृति में हार्न बजाने का मतलब गाली देना होता है और अपने यहां यह उस शोर का हिस्सा है जिसमें रहने की हमें आदत पड़ी हुई है। एक घटना याद आ रही है। बरसों पहले जर्मन की कक्षा खत्म होने के बाद कनाट प्लेस में गोपालदास बिल्डिंग के नीचे से मैं अपने घर जाने के लिये बस पकड़ा करता था। पीछे ही सुपर बाजार का आफ़िस था जिसके बाहर मैं और मेरे एक मित्र खड़े थे। सड़क के दूसरी ओर मैनें एक अमेरिकी/यूरोपी महिला को देखा जो चलते चलते केला खा रही थी। मैं यह जानने के लिये ठिठककर रुक गया कि वह छिलके का क्या करती है। जहां चारों ओर गंदगी पड़ी हो वहां हम अपना कूड़ा भी उसमें मिला देने के लिये प्रोन होते हैं और फ़िर भारत में कूड़ेदान ढूंढना भगवान ढूंढने से ज़्यादा दुश्कर है (कूड़ेदानों की कुला संख्या मंदिरों से कम ही होगी)। वह महिला केला खत्म करने के बाद रुकी और उसने चारों ओर नज़र दौडाई। सड़क के इस ओर उसे एक कूड़ेदान दिखाई दिया। उसने सड़क पार की और छिलका उसमें डालकर सड़क पार करके चली गई। उस दिन मुझे लगा कि सफ़ाई रखना कुछ देशों में सिर्फ़ आदत नहीं है वह उनकी संस्कृति में घुलमिल चुका है और मजबूत होकर अब कल्चर बन चुका है। यही ट्रैफिक के साथ भी है। ट्रैफिक के नियमों का पालन करना भी इसी संस्कृति का हिस्सा है, वरना मुझे क्यों वहां कहीं भी ट्रैफिक पुलिस नहीं दिखाई दी और फिर भी लोग नियमों के अनुसार गाड़ियां चला रहे थे।

पुनश्च: यह बकवाद आगे भी जारी रखने का इरादा है क्योंकि आजकल मैं ट्रैफिक के अलावा कुछ नहीं सोच पा रहा हूँ और विस्तार से इस बारे में लिखूँगा।

Saturday, 6 September 2008

तुम्हारी याद से डरता हूँ

कल यूंही तुम्हारी भटकी हुई सी याद आ गई
मैनें डरते-डरते तुम्हारे बारे में सोचा
मेरी परिधि के बाहर जो दुनिया है
उसमें गए तुम्हें
लम्बा अरसा बीता
मगर अनुभव से जानता हूँ
पीड़ा स्मृति सापेक्ष है
तुम अब भी जब-तब
कोंपल सी फूट पड़ती हो
मेरे दुर्दान्त निर्जन में
कुहासे सी फैल जाती हो
क्या प्रत्याशा का अतिरेक अब भी है?
तुम्हारे साथ रहकर भी मेरा युद्ध
तुम्हें पा सकने का रहा
और अब तक चल रहा है
तुम्हें भूल पाने का खेल
तभी डरता हूँ
तुम्हारे बारे में सोचने से
जाने कब
अपनी पराजय के सम्मुख
फिर छोटा पड़ जाऊँ
और अगर झांकना भी पड़े
उस खिड़की के बाहर
तो बस यूँ
जैसे बरसों पहले
अधपढ़ी कोई किताब

Friday, 5 September 2008

शिक्षक दिवस के बहाने प्रताप सर की याद

"पीछे के देख रिया है बे? व्हां के तेरा बाप नाच रिया है? हमारे इतिहास के टीचर दन्तु (उनके सारे दांत झड़ चुके थे) सर की पंचलाइन।

मुझे लगता है शिक्षा का और जो कुछ भी प्रभाव पड़ता हो, चरित्र निर्माण में उसका कोई खास योगदान नहीं होता। यदि होता तो भारत की नब्बे प्रतिशत जनसंख्या चरित्रहीन होती। यहाँ मैं उन तमाम स्कूलों और उन स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों की बात कर रहा हूँ जिनकी ड्यूटी पढ़ाना होती है, मगर सिखाना उनके कर्तव्य की परिधि से आजीवन बाहर रहती है।

हर औसत सरकारी स्कूल और वहाँ के अध्यापकों की यही कहानी होती है। औसत से बेहतर, आज्ञाकारी और शरीफ़ छात्र होने के बावजूद भी मेरी नियति में स्कूल में बिताए कुल जमा दिनों से ज़्यादा डंडे खाने लिखे थे। वो बात और है कि उन डंडों से फ़र्क पड़ना बंद हो गया था। मगर इस सबके बीच ऐसे कितने ही अध्यापक थे जो आज भी पढ़ाने की अपनी रोचक शैली और अपने व्यवहार के कारण बच्चों में अपनी लोकप्रियता के कारण याद आते हैं।

छठी कक्षा में जब गए तो अंग्रेज़ी नाम के खतरनाक जीव से वास्ता पड़ा। मैं इस जीव से दो साल एक छोटे-मोटे पब्लिक स्कूल में पढ़े होने के कारण पहले ही रूबरू हो चुका था इसलिये इस जीव का खतरनाकी गुण मेरे लिये सिर्फ़ रोचक विषय था। दूसरे बच्चों की तरह मेरे पेट में रोमांच से खलबली नहीं मच रही थी। प्रताप सर का नाम पहले ही सुन चुका था। हमारी सरकारी कालोनी में किसी को उनको पीठ पीछे गाली देते नहीं पाया गया था मगर वे सभी के लिये कौतुहल का विषय ज़रूर थे। जो भी उनके बारे में बात करता था दो वाक्य उनके के बारे में ज़रूर बोलता था, "प्रताप सर बहुत अच्छी अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं और सर्दी हो या गर्मी हमेशा सफ़ेद रंग की हाफ़ स्लीव कमीज़ और सफ़ेद ही रंग की पैंट पहनते हैं।"

इसने मेरे भीतर भी उनके लिये कौतुहल पैदा किया और इस कौतुहल में मेरा बेहतर अंग्रेज़ी का आत्मविश्वास भी घुला हुआ था। किस्मत से वही हमारे अंग्रेज़ी के अध्यापक बने और अगले तीन साल तक बने रहे। चौथे साल, जब हम नवीं कक्षा में पहुँचे तो अध्यापक बदल गए और एक दूसरे ही महाशय (सी पी सिंह) पढ़ाने लगे। सिंह सर ज़रा चिड़चिड़े थे और इनमें सरकारी स्कूल के अध्यापक वाली उग्रता भी थी। हमारी क्लास में कई लड़के पिछली कक्षाओं में भी इन्ही से पढ़े थे और कुछ मेरी तरह प्रताप सर से पढ़े थे। क्लास का पहला ही दिन था और सिंह सर ने एक लड़के से कुछेक सवाल पूछे जोकि ज़ाहिर है वह नहीं बता पाया। सिंह सर चिढ़ गये और बोले, "हरामखोर! किस उल्लू के पठ्ठे ने अंग्रेज़ी पढ़ायी थी तुझको?" पीछे से किसी ने उन्हे याद दिलाया, "सर ये तो आपकी ही क्लास में था।"

प्रताप सर के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी। उनके पढ़ाने का तरीका मशीनी था मगर कुछ हद तक रोचक था और उनमें न तो वह ठसका था और न ही वे कोर्स पूरा कराने के शार्टकट अपनाते थे। एक दोस्त ने बरसों बाद कहा था, "दही भाई, हम सरकारी स्कूलों की खर-पतवार हैं।" इतना दावे से कह सकता हूँ कि बाकी अध्यापकों की तरह प्रताप सर ने बच्चों को कभी खर-पतवार नहीं समझा।

प्रताप सर रोज़ एक पन्ने का सुलेख घर से लिखने के लिये देते थे और पूरी क्लास की कापियाँ चेक करने का काम पहले मुझे सौंप दिया। यह मेरे लिये शानदार काम था। इससे क्लास में मेरी थोड़ी बहुत प्रतिष्ठा बनी। कहीं अगर प्रताप सर भी बाकी अध्यापकों की तरह डंडा लेकर चलते तो प्रतिष्ठा के साथ ही मेरा आतंक भी बच्चों के मन में बैठता मगर ऐसा नहीं हुआ। मेरे लिये यही बहुत था कि बच्चे एक-एक करके अपनी कापियां लेकर आते और मुझसे साइन करवाते। उनकी कापियों में साइन करते समय मैं खुद को अध्यापकों के समकक्ष पाता था। साइन करने का तात्कालिक मतलब जो बच्चे लगाते थे वह यह था कि साइन वही करता है जिसका कुछ रुतबा है जैसे टीचर, पिताजी, प्रिंसीपल, गैजेटेड अफ़सर आदि। जब यह काम मेरे लिये ज़्यादा होने लगा तो उन्होनें इस काम के लिये मेरे अलावा तीन लड़के और नियुक्त कर दिये। बच्चे कभी कभी मुझसे पूछकर अपनी कापियों में खुद ही साइन कर लेते।

सातवीं क्लास के पहले दिन उन्होनें कुछ लड़कों का नाम लेकर खड़ा होने को कहा। इसमें मेरा नाम भी था। हम सब एक दूसरे की ओर देख रहे थे। सरकारी स्कूल में नाम लेकर खड़ा करवाने का मतलब सिर्फ़ पिटाई होता है, तबतक यह समझ बन चुकी थी। मगर किस्मत से ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रताप सर सबसे पहले मेरे पास आए और बोले, "महेन्द्र को मानिटर बनाते हैं।" मैं घबरा गया। जाट-गूजरों से भरी क्लास में मुझे सबकुछ मज़ूर है मगर मानिटर बनना नहीं। मैं इन लोगों की उद्दंडता से कुछ अवसरों पर दो-चार हो चुका था और अनुभव अच्छा नहीं रहा था। वे मेरे सर पर हाथ फ़िराते हुए बोले, "नहीं, महेन्द्र को पढ़ने दो। मानिटर किसी और को बनाते हैं।" मैं बच गया।

उनका व्यवहार अजीब था। जितने समय वे हमें पढ़ाते रहे, कभी मिलते तो मुस्कुरा देते मगर जब पढ़ाना छूट गया तो मुस्कुराना भी छूट गया। शायद यह उनकी मितभाषी प्रकृति का ही एक रूप था। उनके सफ़ेद टेरीकाट के कपड़े उनका ट्रेडमार्क होते थे। हमेशा सफ़ेद कपड़ों में। जब हम प्रार्थना के लिये लाइन में लगे होते तो वे अक्सर गेट से आते दिखते थे। उनके एक हाथ में कुछ किताबें होती थीं जिन्हे वे कन्धे से ऊपर सीधा खड़ा करके चलते थे। यह अपने गंजे सर को चमकती धूप से बचाने का कारगर तरीका था। सर्दियों में कभी-कभी एक नीले रंग का कोट डाल लेते। बच्चे कहते थे कि वे ब्रह्मचारी और सन्यासी थे, कुछ कहते कि अपनी बहन की मृत्यु के बाद उन्होनें इस तरह का जीवन अपना लिया था। जो भी था, उनकी छवि एक ऐसे निस्संग अध्यापक की थी जिसे दीन-दुनिया से कोई मतलब नहीं, सिर्फ़ पढ़ाना और पढ़ाकर घर जाना। मुझे याद नहीं पड़ता कि उन्होनें कभी चिढ़कर या गुस्से से किसी बच्चे से बात की हो। इसी निस्संगता और व्यवहार के चलते वे उन चुनिंदा अध्यापकों की लीग में शामिल हो पाए, जो बच्चे जाने-अनजाने बना बैठते हैं, जिन्हें बच्चे न तो गाली देते थे और न ही उन्हें शोहदे जाटों और गूजरों से पिटने का अवसर आया।
(यह सब यूंही एक रौ में लिख दिया है। बातों में कोई सूत्र है न लय)

Monday, 1 September 2008

महोदय अ का शाश्वत लेखन

ब्लोगिंग मज़ेदार चीज़ है। यह किताबों-पत्रिकाओं से दो कदम आगे वाला मंच है जहां बात तुरंत पहुंचती है और हर कोई अपनी ढपली बजा सकता है। इस स्वतंत्रता के परिणाम भी मज़ेदार होते हैं। आदमी की वाचन इन्द्रिय उसकी श्रवण इन्द्रिय से हमेशा से बेहतर काम करती आई है इसलिये स्वतंत्र आदमी सिर्फ़ बोलना चाहता है, सुनना नहीं चाहता। कुछ प्राणी ऐसे होते हैं जो कानों में उंगलियाँ ठूसकर बोलते हैं। वे न अपना कहा सुनते हैं न दूसरों का।

अभी-अभी “अ” महोदय ने कुछ सौ-एक लोगों को मित्रता विषय पर कवितानुमा कुछ भेजा। तकनीक के परिणाम भी मज़ेदार होने लगे हैं। जाने कितना समय खर्च करने इन्होनें इतने सारी ईमेल आई डी इकठ्ठी की होंगीं। किसी ने भी ये कविताएं पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई। उलटा लोग इन महोदय को कोसने लगे। कोसने का तरीका भी मज़ेदार है। ये सभी लोग कोसने के लिये reply all करते हैं। अ साहब तो मज़े से बैठे लोगों की प्रतिक्रियात्मक मेल पढ़ रहे हैं अपने एसी आफ़िस में बैठकर और साथ ही अपनी कुख्याति भी प्रतिष्ठित कर रहे हैं; सुलग रहे हैं हम बेवकूफ़ लोग जिन्हें इन्होनें मेल भेजी है। अब reply all का यह किस्सा दो-तीन दिन चलेगा और इसमें अ महोदय की एक भी मेल नहीं होगी। अ महोदय संत सरीखे हैं, वे क्रांतिकारियों के नेता हैं जो कार्यकर्ताओं में ओज भरकर खुद समाधि लगाकर बैठ जाते हैं। सिर धुनेंगे हम लोग।
ईमेल आई डी इकठ्ठी करने का यह प्रशंसनीय प्रयास है। मेरे विचार से वक़्त आ गया है कि लोगों को अपना नज़रिया बदल लेना चाहिये। हम सभी लोगों को चाहिये कि अ महोदय को एक प्रशंसा-पत्र दिया जाए। इन्होनें हिंदी ब्लोगजगत में छितरे लोगों को सिर्फ़ एक मेल से ही एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जोड़ दिया है। इन reply all मेल के जरिये कितनों को तो मैं जानने लगा हूँ। ब्लोगवाणी, नारद और चिठ्ठाजगत सरीखे एग्रीगेटर्स को या तो अपनी दुकान समेट लेनी चाहिये या इन महोदय को अपना सी ई ओ नियुक्त कर देना चाहिये। उड़नतश्तरी जी की हज़ारों टिप्पणियाँ और इसमें ज़ाया घंटों के वक़्त की करामात वैसी कारगर नहीं जैसी अ महोदय की कारगुज़ारी। आउटसोर्सिंग हब हमारे इंडिया को ऐसे ही नवयुवकों की ज़रूरत है जो इस तरह के नए-नए आइडिया लाकर हमारी अर्थव्यवस्था को आगे पहुंचा सकें। क्या फ़र्क पड़ता है अगर इससे हमारे जैसे कुछ कुमति कुढ़ते हैं। छोटे लोगों को दूरदृष्टि कहां होती है? कोसी में बिहार डूब रहा है। तरह-तरह की तस्वीरें, ख़बरें रोज़ अखबारों में आ रही हैं मगर कोई यह नहीं सोचता इस क्षणिक सागर का इस्तेमाल बड़े-बड़े लग़्ज़री क्रूज़ को तैराकर किया जा सकता है। आधा यूरोप उमड़ आएगा बाढ़ के बीच कंधे पर हनुमान की तरह दो बच्चों को चढ़ाकर पेड़ की डालों पर बैठे लोगों को देखने। कितना पैसा मिलेगा इससे। अपनी सरकार ब्राईट साइड देखती ही नहीं है। फ़्रांस तो इतने सालों तक न्यूक्लियर कचरा तक बेचता रहा। सरकार को मुनाफ़ाखोर होना चाहिये तभी देश प्रगति करेगा। इसके लिये अ जैसे प्रयोगधर्मी लोगों की ज़रूरत है।
अ महोदय को हतोत्साहित नहीं होना चाहिये। उन्हें लगे रहना चाहिये, ठेलते रहना चाहिये ऐसे ही। नज़ीर अक़बराबादी, ग़ालिब जैसे कितने ही लोग हैं जिनकी कद्र लोग उनके जीते जी न कर पाए। क्या हुआ अगर महोदय अ आज चैन्नई में गुमनाम पड़े हैं। कभी न कभी तो लोग समझेंगे।
जहाँ लेखक शाश्वत लिखने और अमर होने के फ़ेर में पड़े हैं वहाँ महोदय अ जैसे लोग सबको पीछे छोड़कर अपने लेखन की कैम्पेनिंग करके सबसे आगे निकल जाएंगे; आप चाहे इसे चिरकुटिया लेखन माने बैठे रहें। यहाँ एक से एक दिग्गज लेखक बैठे ठाले हैं, न कोई पढ़ता है उनको न कोई टिपियाता है और दूसरी ओर अ महोदय हैं जिनको मैं कम से कम उतने बार पढ़ चुका हूँ जितनी बार उन्होनें अपने करिश्माई लेखन की झलकियां मुझे ई मेल पर दी हैं। और तो और उन्हें यह सौभाग्य भी प्राप्त हुआ है कि मैनें उन्हें एस टी डी करके हड़काया भी है कि कृपया मुझे ऐसे मेल न भेजा करें। किसी भी दिग्गज लेखक को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ आजतक। ऐसे ही तो पैर जमते हैं साहित्य की कबड़्ड़ी के मैदान में। मैं हतभाग्य; मुझे क्या मालूम मैं क्या पाप कर बैठा। कल कहीं अ बड़े लेखक बन गए तो आज हड़काने वाले लोग चंवर डुलाएंगे उनके। उन्हें निराश नहीं होना चाहिये।