Sunday, 31 August 2008

याद

याद?
मुझे कुछ याद नहीं
मुझे नहीं सताती किसी की याद
इस समय को जीने के बाद
जो बचता है मेरे पास
वह कल की अंधी खोह में खोजती-टटोलती
मेरी दो आँखें और दो हाथ होते हैं

याद?
याद मेरे लिये
पेशानी पर खिंच आई लकीरें हैं
याद है चेहरे पर बिसूर गई एक मुस्कुराहट
और है भविष्य में व्याप्त नाउम्मीदी

Sunday, 24 August 2008

यारों से बातचीत

गलबहियाँ डाली ही नहीं कभी
शिकवे रह गए अनकहे ही
ग़ुरूर के पुठ्ठों पर धौल ही मारते रहे
सहलाना तो भूल ही गए
जो चोट मैंने तुमसे खाई
उसकी सुईयाँ तुम्हें भी चुभी ही होंगीं
जैसे तुम्हारे लिये रचे गये मेरे श्राप
मुझे भी अपवित्र कर गए
चलो उन निरापद दिनों की ही बात करते हैं
तब अपने बदहाल दिनों का आसमान
न साफ़ था न मैला
मगर अपना-अपना था
तुमनें मुझे न काटा न चाटा
तुम सिर्फ़ दोस्त ही बने रहे
निर्लिप्त दोस्त
वे बीयर की बोतलों
और गोश्त की हांडी पर
चढ़े हुए दिन थे
उफ़नते और धांस की महक भरे दिन
जो एक ही गिलास में ढलते थे
और एक ही थाली में उतरते थे
हाथ धुलने के साथ ही झगड़े भी
एक ही नाली में बहते थे
ऐसा कुछ है क्या कि
जब अपना कहने को कुछ नहीं होता
तब सब अपने होते है?
चलो इन बचकाने सवालों में भी नहीं उलझते
मेरा सच तो यह है कि
जब अपना आसमान साफ होने लगे
तब दूसरों का मैल काटता है
तुम्हारा सच भी ऐसा ही कुछ होगा
दरअसल तुम और मैं
समानांतर सच में जीने वाले दोस्त हैं
जो सिर्फ अपने आसमान का मैल
धुलने का इंतज़ार करते हैं
और अब जो मैल धुल गए हैं
तो क्या कुछ भी कहने को बाकी है?

Tuesday, 19 August 2008

शब्द

वक़्त की किताब पर
लिखा एक शब्द
घिस-घिसकर मिट जाएगा
भुला दिया जाएगा
रौंद दिया जाएगा
पैरों तले
रेशा-रेशा जिसका
उखड़ जाएगा
एक दिन धुल जाएगा
जिसका अस्तित्व
लेकिन हज़ारों सालों बाद भी
जो प्रतिध्वनित होगी
वह
उस शब्द की गूँज होगी।

Friday, 15 August 2008

ब्लोगर्स की जमात के बीच मेरी ग़ैर-मौजूदगी और याचनात्मक प्रोमोश्नल मेल

तकरीबन नौ दिन हुए वापस आए और जितनी मुझे उम्मीद थी, मेरी मसरूफ़ियत उससे भी कई गुना बढ़ गई है। पिछले सप्ताहांत के लिये किये जाने वाले कामों की एक लिस्ट बनाई थी जो बीस की संख्या पार कर गई। पूरा सप्ताहांत उसमें निकल गया, फ़िर भी कुछ काम रह गए। सो, कल के लिये भी काम बचे हुए हैं।
देवी जी को लेकर डाक्टर के पास जाना भी इस दौरान लगा रहा। प्रसव के आखिरी दिनों में डाक्टर हफ़्ते से पहले देवी जी के दर्शन करना चाहती है और नर्सिंग होम घर से काफ़ी दूर है, इसलिये उसी में आधा दिन चला जाता है। फ़िर भारत पहुंचने के बाद आफ़िस के काम और भी बढ़ गए हैं और मेरे काउंटरपार्टस मुझसे उन सारे कामों की आशा भी कर रहे हैं जोकि मेरे नहीं हैं और उन सारे कामों की भी जो मैं इंग्लैंड में होने की वजह से पहले नहीं कर सकता था। इसके अलावा वे लोग जितना ज़्यादा हो सके काम निकलवा लेना चाहते हैं क्योंकि बच्चे के आते ही मैं तकरीबन पन्द्रह दिनों की छुट्टी पर चला जाऊँगा। इस दौरान मैं गधे की तरह काम कर रहा हूँ और चक्की के न जाने कितने पाटों के बीच पिस भी रहा हूँ।
इस सबके बीच ब्लोगिंग करने का वक़्त ही नहीं निकल पा रहा, जिसकी गर्मी मुझतक पहुँच रही है। मैनें दो बातें इस दौरान नोटिस कीं।
पहली यह कि ब्लोगजगत और सिनेमाजगत में खास अंतर नहीं है। जबतक आप अपनी मौजूदगी दर्ज करवा सकते हैं तबतक लोग आपको याद रखेंगे, वरना धीरे-धीरे भूलने लगेंगे। (ज्ञान जी और संजीत जी जैसे लोग अपवाद हैं) बीच-बीच में कुछ हलके-फ़ुलके पोस्ट मैं गानों-ग़ज़लों की शक्ल में अपने दूसरे ब्लोग पर डालता रहा। इसमें कोई खास झंझट नहीं है। सिर्फ़ दस-पन्द्रह मिनट लगते हैं। इसलिये सोचा जबतक इस ब्लोग पर कुछ ना डाल सकूं तबतक दूसरे और तीसरे ब्लोग को ही कम से कम सक्रिय रखूँ। मगर मैं शायद इसी ब्लोग की वजह से पहचाना जाता हूँ इसलिये जितने भी लोग मेरे इस ब्लोग को देखते हैं उन्हें लगा होगा मैं ग़ायब हो गया हूँ। हालांकि काफ़ी अंतराल के बाद दो-एक पुरानी लिखी कविताएँ पोस्ट कर दीं, जिनपर मेरा traffic feed बताता है कि ज़्यादा लोग पढ़ने के लिये नहीं आए।
इसकी कई वजहें हो सकती हैं। शायद लोगों को मेरा लिखा पसंद नहीं आया या अंतराल ने मुझे उनके मानस से साफ कर दिया। मगर मुझे लगता है कि मेरे पोस्ट डालने के समय में अंतर की वजह से लोगों को मेरे पोस्ट के बारे में पता ही नहीं लगा क्योंकि इंग़्लैंड में मैं भारत के सुबह के तकरीबन चार-पांच बजे समय पोस्ट किया करता था और यहां पोस्ट डालने का वक़्त शाम के आठ से दस के बीच हो गया है।
खैर, इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात जो मैं उपस्थिति की कर रहा था, वह हमेशा प्रमुख कारक रहता है। जैसाकि मैनें कहा कि मेरे पास ब्लोग्स पढ़ने का समय नहीं था तो टिप्पणी करने का कहाँ से होता? सिर्फ़ दो-चार ब्लोग्स पर टिप्पणी करके या सिर्फ़ पढ़कर हट जाया करता था। इसका सीधा प्रभाव मुझे अपनी पाठक संख्या पर दिखाई दिया। मैं टिप्पणी नहीं कर रहा तो लोग काहे मेरे ब्लोग पर टिप्पणी करेंगे?
यहां लौटने के बाद जो काम मैं अपने बचे-खुचे समय में करता रहा वह था पढ़ने का। इसी दौरान अचानक ब्रेख़्त की कविताओं का एक पुलिंदा, जो मैनें सालों पहले प्रिंट-आउट लेकर रख लिया था हाथ लगा। मुझे लगा और कुछ नहीं तो चलो कुछ एक कविताओं का अनुवाद ही कर लिया जाए। इसी समय विजय गौड़ जी ने मुझे धर दबोचा और वो अनुवाद अपने यहाँ पोस्ट कर दिये। फ़िर लगा कि चलो अब गंभीरता से अगर अनुवाद करना है तो पहले कुछ पढ़ लिया जाए। फलस्वरूप आज तकरीबन पांच किताबें खरीद लाया।
पाठक न मिलने के रोने के बीच मैनें जिस दूसरी बात का नोटिस लिया वह यह कि एक ओर मेरे जैसे लोग हैं जो शांति से इस ग़म में घुट रहे हैं कि कोई पढ़ नहीं रहा और दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो तमाम ब्लोगर्स की मेल आई-डी उठा-उठाकर उन्हें मेल भेज रहे हैं कि आओ मेरा ब्लोग पढ़ो; मैं गुरु-गंभीर विषय पर बहुत ही सार्थक चिंतन कर रहा हूँ और अगर आपने यह नहीं पढ़ा तो क्या जिये आप सरीखा। इस दौरान दिन में बीसियों ऐसे मेल या तो मैं उड़ाता रहा या तंग आकर लोगों को प्रेम-पूर्वक या गुस्से में लिखता रहा ऐसे मेल न करने के लिये।
मेरे तईं यह बेहयाई है कि लोग बग़ैर जाने-पहचाने किसी को भी मेल भेज देते हैं और अक्सर मेरी प्रतिक्रिया नरम नहीं होती। मुझे दिन में लगभग दस प्रोमोशनल काल्स मेरे मोबाईल पर आती हैं जिनसे मैं खासा परेशान हूँ और अब इसी तरह ही याचनात्मक मेल कि आईये मेरा ब्लोग पढ़ लीजिये। इस तरह की मेल मुझे चौराहों पर खड़े उन भिखारियों की याद दिलाती है जो नकली दयनीयता पैदा करके लाखों का धंधा हर साल कर जाते हैं। हालांकि ब्लोगर्स के मामले में मुझे यह दयनीयता नकली नहीं लगती। वे ब्लोगर-जीव सच ही दयनीय हैं जो अनजाने लोगों को अपना ब्लोग पढ़वाने के लिये मेल भेजते हैं।
मेरा विचार और माथा दोनों गरम है। आपका कया हाल है?

Thursday, 14 August 2008

पहचान

1

जिनकी कोई पहचान नहीं होती
वे खोजते रहते हैं उसे
किताबों में
हाथ की लकीरों में
अजनबी चेहरों में
और आने वाली पीढ़ी में।


2

अजनबी चेहरों में
खोजते रहते हैं हम
अपनी पहचान तमाम उम्र
और जो हमारे हाथ लगता है
वह एक मसखरा होता है
जिसका कोई चेहरा नहीं हुआ करता
और खो देते हैं हम
अपनी रही सही पहचान भी।

Wednesday, 6 August 2008

पुराना सामान

इस चहारदीवारी के भीतर
अनाप-शनाप सामान की तरह
तुम भी भर दी गई हो
रोज़ वही दीवारें, वही सामान
वही तुम

अब इतने बरसों बाद
हम मिलते हैं एक-दूसरे से
रेडियो-टीवी की तरह
मेरी पुरानी साइकिल
आमंत्रण नहीं देती अब
हम एक-दूसरे को देखते हैं पलभर
थकान भरी आखों से
और फेर लेते हैं मुँह

ये सब सामान
जो मैंने शौक से इकठ्ठे किये
मुझे भर देते हैं ऊब से
इन्हें रोज़ वहीं पड़े देखना
मेरी आदत है बीते कई सालों से

एक दिन
तुम मर जाओगी
ठीक वैसे ही जैसे
इस सामान को निगल जाएगा समय
और फ़िर सबकुछ
मेरी यादों में तह हो जाएगा
धूल फ़ांकती
किसी पुरानी किताब की तरह

Monday, 4 August 2008

प्रोफ़ेश्नलिज़्म और पढ़ा-लिखा आदमी

प्रोफ़ेश्नलिज़्म का पढ़ाई से कितना लेना-देना है? ज़्यादा नहीं, ऐसा मुझे लगता है। सैकड़ों उदाहरण जमा हो गए हैं मेरे पास। ज्ञान जी की पिछली पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए अचानक इस बारे में भी सोचने लगा और तभी से लगातार सोच रहा हूँ। मेरे घर में पिछले करीब दो सालों से एक कुक मेरे अपने फ़्लैट में शिफ़्ट होने तक (मैं अपने घर में फ़रवरी में शिफ़्ट हुआ) काम कर रही थी। खाना बनाने में वह शैफ़ाली की कसौटी पर खरी उतरी। शैफ़ाली के खाने के पंजाबी शौक होने और कुक के तमिल होने की वजह से यह बहुत मुश्किल था, मगर उसने कभी निराश नहीं किया। मज़े की बात कि उसका नाम भी अन्नपूर्णा है। कई बार ऐसा हुआ की हमारी सफ़ाई करने वाली बाई बगैर बताए नहीं आती थी। ऐसे हर मौके पर अन्नपूर्णा बग़ैर हमारे कुछ कहे सारे बर्तन-भांडे भी धो देती थी और पूरे घर की भी सफ़ाई कर देती थी। हम ऐसे हर मौके पर उसे यह सब काम करने के लिये मना करते रहे, पैसे की बात तो बहुत दूर की है। जब भी हमनें कहा कि हम ऐसे अचानक आ पड़े काम के लिये उसे अलग से पैसे देंगे तो वह साफ़ मना कर देती और कहती “पैसे की बात करके मुझे छोटा ना करें।” यह एक टयूनिंग तो थी ही हम लोगों के बीच में क्योंकि उसे ज़रूर लगता होगा कि हम उसका बेज़ा इस्तेमाल नहीं करेंगे और दूसरी ओर हम इस ओर से जागरूक थे कि उसे उसकी मेहनत का उचित मुआवज़ा मिले। तमाम तंगी के बीच वह अपनी इकलौती संतान (लड़की) को एक छोटे स्तर के पब्लिक स्कूल में पढ़ा रही है और अकसर सत्र के शुरु में उसे एक साथ फ़ीस भरनें में दिक्कत होती है। पिछली बार उसने हमसे उधार मांगा। जब हमें उधार मांगने का कारण पता चला तो मैंने शैफ़ाली से कहा कि उधार देने की ज़रूरत नहीं है। हम फ़ीस ही भर देंगे, जिसपर शैफ़ाली तुरंत तैयार हो गई। यह दोनों पक्षों का एक-दूसरे पर सहज विश्वास की वजह से हुआ और इस विश्वास के उपजने की वजह क्या अन्नपूर्णा का प्रोफ़ेश्नलिज़्म नहीं है? कारपोरेट-जगत में अकसर पहले आपको अपनी अपरिहार्यता सिद्ध करनी होती है, उसके बाद ही कंपनी आपका विश्वास भी करती है और आपका महत्व भी समझती है। यह सिद्धांत हर जगह लागू होता है; मुख्य सिद्धांत के रूप में कारपोरेट-जगत में भी और घरेलू नौकरों के साथ भी जो इस बारे में संभवत: कोई सिद्धांत भले ही न गढ़ पाएँ, मगर कई अपने व्यवहार में इसे जाने-अनजाने अपनाते हैं। ऐसी ही एक सफ़ाई वाली बाई भी थी हमारे घर पर जो अन्नपूर्णा की तरह काम के मामले में पूरी तरह प्रोफ़ेशनल है। हम इन दोनों की कमी आज भी महसूस करते हैं अपने घर में। शैफ़ाली ने तो पूरी कोशिश की कि इन दोनों को किसी भी तरह अपने पास ले आए। कुछ आसार तो हैं देखें क्या होता है।
मेरे विदेश-प्रवास के दौरान श्रीमति जी और उनकी माता यहाँ बंगलौर में दुकेले थे। इस बीच कई नए कुक्स और सफ़ाई वाली बाइयों से साबका पड़ा और हर बार शैफ़ाली ने अन्नपूर्णा और नागम्मा को और भी शिद्दत से याद किया। मेरा मानना है कि प्रोफ़ेश्नलिज़्म का पढ़ाई से कोई लेना देना नहीं। यह कल्चर के रूप में कंपनियां अपने यहाँ लागू तो कर देती हैं और ऊपरी तौर पर उसका रूप भी बहुत प्रोफ़ेशनल लगता है मगर अंदर ही अंदर तमाम तरह की राजनीति चलती रहती है। किसी भी कारपोरेट में आधे से ज़्यादा लोग सच्चे प्रोफ़ेशनल नहीं होते। कम या ज़्यादा यह बात अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे काम करने वालों पर भी लागू होती है, घरेलू नौकरों को मिलाकर मगर अन्नपूर्णा जैसे सच्चे प्रोफ़ेशनल लोग आपको ज़रूर टकराएंगे।
यहाँ भी देखें।

Sunday, 3 August 2008

वे सब हमारे ठाने हुए द:ख थे

कितने बदनसीब थे हम
कि सोते रहे फूलों की सेज पर
और गाते रहे
बहती नदियों के किनारे बैठकर खिलखिलाते गीत
जब चाँद लुट रहा था
अपनी तमाम सुँदरता और धब्बों के साथ
हम गुलज़ार किये थे
सनमख़ानों में आराईशी ख़ियाबां
हमनें कब परवाह की
किस गिर्दाब में गुमगश्ता है ख़ाम ज़िंदगी
हमारे गले तक भरी हुई थी शराब
मुँहभर गालियों के साथ
हम गाते रहे
अपनी बिछड़ गई प्रेमिकाओं के शोकगीत
और रोते रहे
फ़िर अकेले छुट जाने का अफ़सोस
नीम नशे में हमनें कोसा अपने वजूद को
और उन माओं को
जिन्होनें हमें पैदा किया अजाने
उन पिताओं को भी नहीं बख़्शा
जो पराए लगे ज़िंदगीभर
कोठे के रंगीन अन्धेरे कोनों में
झुरझुराते चाँद के नीचे सुनते रहे
किसी की कच्ची-पक्की तानें
लुटाते रहे
अपने अधपके इल्म की अधजली वाहवाही
कूड़े के ढेर पर जब ज़िंदगी
अपने होने की तस्दीक़ कर रही थी
हम मसरूफ़ थे
अपने वजूद के हवाले देने में
और किसी की नकली भावनाओं को
अपने अब्तरी आंसुओं से चरितार्थ करने में
ताउम्र इस तौर रंजीदा थे हम
कि जाना ही नहीं क्या होती है तकलीफ़
इस कदर डूबे रहे हम अपने दु:खों की रूमानियत में
कि रोने में ही सुख मिला किया हमें
जिन्होनें आफ़तें देखी नहीं
वे हम थे
हमारी आत्मा से जो टपकते थे
वे सब हमारे ठाने हुए नकली दु:ख थे

Friday, 1 August 2008

पहाड़, शहर और तुम

एक ओर वह शहर है
जहाँ मैं रहता हूँ
दूसरी ओर वे पहाड़
जहाँ मैं पैदा हुआ
इन दोनों के बीच हो तुम
मैं मानव हूँ
मुझे बेहद प्यार है
तुमसे, अपने शहर से और अपने पहाड़ों से
जबतक ज़िंदा हूँ
भूलेगी नहीं पहाड़ों की दुर्गमता
शहर की कुटिलता भी नहीं बिसरेगी
अपने हर ऐब के साथ वे
मेरे ही रहेंगे
मैं उन्हें उसी तरह प्यार करूँगा
जैसे तुम्हें चूमता हूँ हर बार
पिछली रात की तुम्हारी
असहज चुप्पी तोड़ने के लिये।