Tuesday, 29 July 2008

पहाड़

पहाड़ साथ नहीं जाते किसी के
वे वहीं खड़े रहते हैं जैसे टूटा हुआ पिता
झुके कंधे लिये
अपने से बाहर निकलती सड़क को देखता है
जो धकेले जा चुके हैं
उनके पीछे छुटे सामान के साथ
आबाद रही पगडंडियों पर रखे हैं हरे घाव
किसी की स्मृति में नहीं रहते वे
न रखते हैं किसी की याद
अपने पथरीले जिस्म में
वे खड़े रहते हैं
बगैर किसी के लौट सकने की
गुँजाईश के साथ

पहाड़ वहीं खड़े रहते हैं
जैसे टूटा हुआ पिता झुके कंधे लिये
अपने से बाहर निकलती सड़क को देखता है
और पहाड़ वे पिता हैं
जो और उठ उठ जाते हैं
खुद को अकेला पाकर
उनकी जड़ें व्याप्त हैं
उनके अस्तित्व से भी आगे
जितने ऊँचे हैं वे
उससे भी ज़्यादा गहरे हैं

Wednesday, 23 July 2008

हज़ारों मील की दूरी नहीं

हज़ारों मील की दूरी नहीं तुम्हारे मेरे बीच
तुम्हारी आवाज़ में तुम्हारा चेहरा तो देख सकता हूँ
शब्दों के कंपन पर थाम सकता हूँ तुम्हें
अपने ठंडे हाथों में

हज़ारों मील की दूरी नहीं तुम्हारे मेरे बीच
तुम्हारे मेरे बीच गिरजे हैं, मदिरालय हैं
चिकनी सड़कें, खूब सारी घास, अनंत नीला पानी है
तुम्हारे मेरे बीच साथ बिताए दिन हैं
अच्छे दिनों की यादें है तुम्हारे मेरे बीच
बुरे दिनों के दुस्वप्न हैं
फ़िर भी हज़ारों मील की दूरी नहीं तुम्हारे मेरे बीच
तुम्हारे मेरे बीच गर्भ में पलता एक शिशु है
जो जोड़ता है हमें एक दूसरे से
जीवन के यकीन से
ईश्वर के मनुष्य पर विश्वास से
इसलिये हज़ारों मील की दूरी नहीं तुम्हारे मेरे बीच

Sunday, 13 July 2008

परिभाषाएँ

शायद जो अपना बदलना इतने सालों से मुल्तवी कर रहा था वह यकायक मेरी ग़ैरमौजूदगी पाकर पिछले दो-चार सालों में बदल गया। यह भी हो सकता है कि घट तो सभी कुछ रहा हो पर मेरी ही आँखें बदली हुई रही हों। जो भी हो आज जब मैक्स म्युलर भवन में घुसा तो यकायक लगा कहीं और ही चला आया हूँ। सिक्योरिटी पर रमेश नहीं था। जो था मैं उसे नहीं जानता था, वह भी मुझे नहीं जानता होगा मगर उसने रोका नहीं। शायद रमेश से मेरी रोज़ की दुआ सलाम मेरे कपड़ों से टपक रही थी, जिसे उसने देख लिया होगा। आम का वह पेड़ काटा जा चुका था जो फल नहीं देता था, आम देने वाला पेड़ सलामत था। यूँ भी वहाँ कौन उस पेड़ के फल खाता था जो वो पेड़ फल देने का अपना फ़र्ज़ पूरा करता; सिवाय रेहाना के जो कभी-कभी बगीचे में गिरी अमियाँ बटोर लेती थी घर पर चटनी बनाने के लिये। कहती थी उसकी दादी बहुत अच्छा मुरब्बा और चटनी बनाती है आम से। मुझसे कहती थी पेड़ पर चढ़कर बड़ी-बड़ी अमियाँ तोड़ने के लिये। मैं हँस देता था उसके भोलेपन पर। “यह कोई जगह है क्या पेड़ पर चढ़ने की?” मैं कहता। जहाँ भी पेड़ हो वहाँ पेड़ पर चढ़ा जा सकता है, यह उसका तर्क होता था। कोई झिझक या शर्म नहीं करती थी। जब मैं कहता, “मैक्स म्युलर जैसी सोफ़िस्टिकेटेड जगह पर तो अपना गंवारपन घर रखकर आया करो।”, तो वह मुँह घुमाते हुए कहती, “आम के पेड़ पर चढ़ना गंवारों का काम है और अल्फ़ांज़ो खाना तुम जैसे सोफ़िस्टिकेटेड लोगों का काम है क्यों? यू डबल स्टैंडर्ड।” और खुद ही पेड़ पर लपक पड़ती। दोनों ही पेड़ कुछ इस तरह के थे कि तना दस फ़ीट एकदम सीधे, उसके बाद शाखें फटती थीं। चाहकर भी उनपर चढ़ा नहीं जा सकता था। मगर यह उसका गुस्सा नहीं होता था। वह जानती थी मेरी झिझक। दो-चार बार फ़ुदककर खुद भी वहीं बेंच पर बैठ जाती और हसरत से लटकते आमों को देखती थी। जाने क्यों उसे पेड़ों पर चढ़ने का इतना शौक था। मैं उसे चिढ़ाने के लिये कहता था कि तुम्हारे अंदर रामपुर के बब्बन हज्जाम का भूत है तभी तुम घड़ी-घड़ी पेड़ पर चढ़ने लगती हो। उसके पूर्वज रामपुर से आकर दिल्ली में बस गये थे।

मेघदूत ओपन थियटर उसे सिर्फ़ इसलिये पसंद था क्योंकि वहाँ मंच की पृष्ठभूमि में विशाल बरगद का पेड़ था। नाटक के बीच में वह फ़ुसफ़ुसाकर कहती, “काश मैं यह बरगद का पेड़ होती। अल्काज़ी से लेकर सुरेखा सीकरी की कितनी ही अनगिनत प्रस्तुतियों का साक्षी रहा है यह पेड़। इससे ज़्यादा नाट्य-कला संपन्न कोई होगा दुनियां में?” मार्च-अप्रैल की गुलाबी शामों को कभी जब हम फ़िरोज़शाह रोड़ पर रिपर्टरी का कोई नाटक शुरु होने से पहले टहल रहे होते तो कच्चे जामुन देखकर वह या तो पेड़ पर चढ़ने की ज़िद करती या पत्थर उठाकर जामुन गिराने की। बिल्कुल छोटे से बच्चे की तरह कहती, “रेहाना को जामुन खिलाओ।” मैं अकसर उसे हाथ पकड़कर खींच ले जाता था। उसे समझना कभी-कभी मुश्किल लगता था। मैं खीझकर उससे पूछता था कि तुम कैसे इतनी आसानी से गोर्की और जैनेन्द्र से जामुन और आम पर छलांग मार देती हो? उसके जवाब अक्सर बड़े हिंसक होते थे। वह कहती, “मुझे तुम्हारे सांस्कृतिक गलियारों के उन हरामखोरों की तरह गंभीरता ओढ़ना नहीं आता और क्या बुद्विजीवी जामुन नहीं खाते?” मैं खिलखिलाकर हँस देता। उसे मेरा खिलखिलाकर हँसना बड़ा अच्छा लगता था मगर ऐसे मौके कम ही आते थे। हम खुद ही एक-दूसरे को खिलखिलाकर हँसने के मौके कम ही दिया करते थे। वह कहती थी सुख जितना बड़ा होता है वह दु:ख भी उतना ही बड़ा लेकर आता है। तमाम आधुनिकता के बीच यह छोटा सा अंधविश्वास उसने अपने और मेरे लिये बचाकर रखा हुआ था।

सोचने लगा कि अगर रेहाना कटा हुआ पेड़ देखती तो क्या कहती? छोटी सी किताबों की दुकान पर ताला लटक रहा था और उसके आगे काफ़ी कुर्सियाँ समेटकर रखी हुई थीं जैसे अरसा बीता हो दुकान खुले हुए। कफ़ैटेरिया भी पूरी तरह बदल चुका था। खुले आंगन में वो बड़ी हरी छतरियाँ नहीं थीं जिनके नीचे बैठकर रेहाना और मैंने जर्मन के आ, बे, से, डे से लेकर गोएथे पर जाने कितनी बहसें की थीं। दो साल तक हर शाम हम अक्सर एक साथ होते थे, क्लास शुरु होने से पहले और उसके बाद भी। एक दिन जब क्लास में पहुँचा तो वह मेरे पास आई और बोली, “हाई। आई एम रेहाना। आप मयूर विहार में रहते हैं न?” वह भी वहीं रहती थी। उस दिन पहचान हुई और उसी दिन से हमनें घर साथ जाना शुरु कर दिया। साथ आते नहीं थे क्योंकि मैं ऑफ़िस से सीधा आता था और वह कॉलेज से। बस में भी अकसर हमारी बहसें गरमागरम होती थीं और पता नहीं कैसे हमारी आवाज़ें हमारे कद से भी ऊँची हो जाती थीं। एक दिन सीढियाँ उतरते हुए मैनें उसे समझाने के लिये एक पूर्वसर्ग का उच्चारण किया “त्सुअर”। उसने कहा कि यह गलत उच्चारण है और सही उच्चारण “सुअर” है। मैं ठठ्ठा मारकर हँसा। अपनी बात मज़ाक में उड़ी जान उसने ज़ोर देकर कहा कि वह सही कह रही है। ऐसे उठते उठते हमारी आवाज़ तेज़ हो गई और हमारा ध्यान इस ओर तब गया जब पीछे से हँसी की आवाज़ें सुनाई दीं। कुछ लोग जो एडवाँस जर्मन सीख रहे थे, हमारी बातें सुनकर हँस रहे थे। वह अक्सर मुझसे जानबूझकर उलझती थी। मेरा तर्क जानकर वह खुद दूसरी ओर हो जाती थी और लड़ने बैठ जाती।

प्रकाश जब भी हमें कफ़ैटेरिया में बैठा देखता, खुद ही मेरे लिये एक चाय और उसके लिये एक कॉफ़ी ले आता था। वह रेहाना को चिढ़ाने के लिये आंटी कहता था। रेहाना अकसर उसे छेड़ती थी, “प्रकाश दिख रहा है उत्तराखण्ड-प्रेम। अगर मैं अकेले बैठूँ तो मजाल है कि तुम कभी मेरे लिये बगैर मांगे कुछ लाओ।” प्रकाश के पास हमेशा नया जवाब होता था। मगर एक बार उसने वह कह दिया जिससे हम दोनों ही हमेशा बचते रहे थे। उसने कहा, “रेहाना आंटी अब तो आप भी उत्तराखण्डी ही हो गई हो हमारे भैया की होकर।” मैनें एकदम से उसे कुछ और लाने के लिये भेज दिया। रेहाना भी किसी को हाय करती हुई उठकर चली गई और दस मिनट बाद लौटी। ऐसे मौके जब भी आते थे, सहजता लाने का जिम्मा उसका होता था, मैं हमेशा ऐसी परिस्थितियों से बचता था। वह शायद मेरी यह आदत जानती थी। हम एक-दूसरे की सिर्फ़ संगति साथ लेकर चलते थे, उससे ज़्यादा कुछ लेकर चलने के लिये हम तैयार नहीं थे, मगर जल्दी ही हमें महसूस होने लगा कि कुछ था जो हमें धकेलता था और जिससे हम बचने की भरसक कोशिश करते थे। उसका मानना था कि अगर संबंध ढोने की हद तक खींचोगे तो वह बोझ बन जाएगा और उसके अनुसार दुनिया के हर संबंध कि गत यही होती है कि उसे ढोया जाए। इसीलिये वह आज़ाद रहना चाहती थी; रात से लेकर सुबह तक आज़ाद और सुबह से लेकर शाम तक आज़ाद। मगर जाने कैसे उसकी शामें मेरे लिये होती थीं, सर्दियों की नीली शामें, वसंत की गुलाबी शामें, बरसात की हरी शामें, और पतझड़ की पीली शामें। गर्मियों की शामें हम नहीं मिलते थे। मैक्स म्युलर भवन बंद रहता था तब। गर्मियों की सलेटी शामें हम अपने-अपने घरों में चाय पीते हुए बिताते थे।

आज भी गर्मियों की ही एक शाम थी और हमेशा की तरह हम साथ नहीं थे। कफ़ैटेरिया के काउंटर पर प्रकाश नहीं था, कोई भी पहचाना हुआ चेहरा नहीं था। शायद वेंडर ही बदल गया था। जो चाय मेरी टेबल पर खुद आ जाती थी, उसके लिये दस मिनट इंतज़ार करना पड़ा। सच, कुछ चीज़ें अपने बदलने की खबर नहीं देतीं। लाइब्रेरी में घुसा तो वहाँ भी न संदीप दिखाई दिया न आशा। जो बैठी थी उसने सोचा मैं यहाँ नया हूँ और मदद के लिए मेरे पास चली आई। मुझे अजीब सा लगा। जिस जगह से मेरा जीवन जुड़ा हुआ है मैं उसी के लिये अजनबी हो गया हूँ। फ़िर रेहाना की एक बात, जो वह अकसर मुझे कहती थी, याद आ गई। “शहरों से यादें मत जोड़ो, उनसे बाहर निकलते ही वे तुम्हे पराया कर देते हैं।” अकेले यहाँ आना परायेपन के अहसास को और हवा दे रहा था। उस लड़की को शुक्रिया कहकर कुछ सीडीज़ देखने लगा। वही सब पुराने रेकार्डस् जो हम साथ सुना करते थे। उसे खासतौर पर ब्लिक्सा बारगैल्ड को सुनना पसंद था और मैं राईनहार्ड मे का दीवाना था। ब्लिक्सा बारगैल्ड की सीडी दिखाई दी तो मैनें उसे बाहर खींच लिया। बारकोड के स्टीकर पर धूल चिपकी हुई थी। शायद हमारी ही चिपकाई हुई धूल थी। वह कहती थी कि अपने-अपने अंगूठे के छाप छोड़ देते हैं जगह-जगह। कभी अगर हम साथ न हुए तो ये छाप तो साथ होंगे। उसने कफ़ैटेरिया के बगल में झाड़ियों के नीचे से कुछ मिट्टी ली और उसपर पानी डालकर थोड़ा सा कीचड़ बना लिया और अपने अंगूठे से उस स्टीकर पर एक छाप बना दी। फ़िर मुझसे भी ऐसा ही करवाया। वह कीचड़ अब धुल चुका था और उसकी जगह नई धूल ने ले ली थी मगर मुझे लग रहा था कि उस धूल में हमारे अंश अब भी हैं, जैसे मैं अपनी और उसकी धूल को पहचान रहा हूँ।

याद आया कि रिसेप्शन पर गरिमा ज़रूर मिल जाएगी। एग्ज़िबिशन गैलेरी से होकर अंदर गया। वहां पर लगी फ़ोटो प्रदर्शनियाँ मैं हमेशा देखता था। उन तस्वीरों में मुझे जर्मन लोगों का चरित्र और उनका दृष्टिकोण अलग से झांकता नज़र आता था। मैं रेहाना से कहता था कि सौ तस्वीरें रख दोगी तो भी उसमें से किसी जर्मन की खींची तस्वीर पहचान लूंगा और फ़िर खुद ही अपने दावे पर डर जाया करता था। हालांकि रेहाना ने मुझे कभी चुनौती ही नहीं दी। पता नहीं कैसे, वह मुझे भीतर से लेकर बाहर तक अच्छी तरह पहचानती थी। इस कदर कि कई बार मैं अपने आपको उसके सामने नंगा महसूस करता था। उसका मुझे इस तरह जानना मुझे अच्छा नहीं लगता था; लगता था जैसे कुछ गोपनीय नहीं बचा है मुझमें, जैसे वह यह भी जानती हो कि मै क्या सोच रहा हूँ। कई बातें जो हम अपने आप से भी छुपाकर रखना चाहते हैं, जिन्हें अपना हिस्सा होते हुए भी सौतेला कर देते हैं, मुझे महसूस होता था मेरे उन विचारों को भी रेहाना जानती थी। वह हँस देती थी सिर्फ़। उसे मेरा डर मेरे आसपास डैने फ़ैलाए दिख जाता था। रिसेप्शन पर पहुंचा तो पता चला गरिमा छुट्टी पर थी। हमेशा की तरह किसी हिल-स्टेशन पर निकल गई होगी घुमक्कड़ी करने।

कोई भी पुराना परिचित चेहरा नहीं दिखाई दिया तो मैं टहलता हुआ बाहर आ गया। वह सिक्योरिटी गार्ड वहीं था। इस बार उसने मेरी ओर देखने की चेष्टा भी नहीं की। कागज़ पर पेन घुमाते हुए वो एक आँख बना रहा था जिसमें दरारें पड़ी हुईं थीं। मैनें गेट से बाहर निकलकर सड़क पार की और बस स्टैंड के पीछे वाले केयोस्क से एक चाय ली और एक सिगरेट सुलगाई। धुओं के छल्लों के बीच मैनें देखा कि केयोस्क में दोनों लड़के वही थे जो पहले हुआ करते थे। जिसने चाय आगे बढ़ाई वह मुझे देखकर मुस्कुरा दिया। मैनें भी होंठ थोड़े से खींच लिये और फ़िर धुंए के छल्ले बनाने लगा। पैसों के लिये जेब में हाथ डालने लगा तो अजीब सा लगा। हमेशा रेहाना ही मेरी जेब से पैसे निकालकर उस लड़के को देती थी। पहली बार जब हम वहाँ पर चाय पी रहे थे तो मेरे एक हाथ में चाय थी और दूसरे में सिगरेट। जब मैनें उसे कहा कि मेरी जेब से पाँच रुपए का सिक्का निकालकर चाय के पैसे दे दे तो उसने कुटिल सी मुस्कान अपने चेहरे पर खींचकर मुझसे पूछा, “तुम्हारी जेब फटी तो नहीं है न?” मैनें कहा, “फटी क्यों होगी?” वह बोली, “लड़कों को सुविधा होती है न फटी जेब से।” रेहाना जैसी बिंदास लड़की से टकराकर अक्सर मेरे दब्बू व्यक्तित्व पर कई खरोंचें पड़ जाती थीं।

स्टैंड के पीछे वाली सरदार सोबा सिंह की बनाई कोठी अब भी वही उजाड़ सी लग रही थी जैसे अब भी अपने होने का मातम मना रही हो। कोठी का पेंट पीला पड़ चुका था और दीवारों पर पिछली बारिश के हरियाए पानी के निशान पड़े हुए थे। एक पुरानी सी कार पोर्च में खड़ी थी जिसे देखकर लगता था जैसे आखरी बार सालों पहले चली हो। उसपर एक मटमैले रंग की दरी लटक रही थी। पास ही एक मोटरसाईकल भी कमोबेश उसी हालत में खड़ी थी। सबकुछ बड़ा बेतरतीब सा था वहाँ या शायद मुझे ही बेतरतीबी ज़्यादा महसूस हो रही थी। एक पल के लिये भी मुझे नहीं लगा कि यह वही जगह है जहाँ हमनें इतना समय साथ हँसते हुए बिताया था। हँसी के अतीत पर थकान और निर्ममता चढ़ गई थी। चाय खत्म हुई तो मैं टहलता हुआ अग्रसेन की बावड़ी की ओर निकल पड़ा। रेहाना को यहाँ आना बड़ा अच्छा लगता था। बावड़ी में ही एक कुँआ था जिसमें अब भी पानी था। चौकीदार कहता था कि यह कुँआ हर साल बलि मांगता है और पिछले दस सालों में उसने खुद ही यहाँ दस आत्महत्याएँ देखी हैं। रेहाना को रोमांच हो आता था ऐसी बातें सुनकर। कुँआ सच में बहुत गहरा था और उसकी कोई चहारदीवारी भी नहीं की गई थी। उस तक जाने के लिये एक चबूतरे पर चढ़ना होता था जहाँ से कनाट प्लेस की ऊँची इमारतें साफ़ दिखतीं थीं। उसे वहाँ खड़ा होना इसलिये भी अच्छा लगता था क्योंकि उसके अनुसार वह चबूतरा उसके भविष्य की दो संभावनाओं को एक साथ एक ही फ़्रेम में दिखाता था। “और क्या हैं वे भविष्य की दो संभावनाएँ?” एक बार जब मैनें पूछा तो उसने कहा कि या तो वह इन मीनारों की तरह ऊंची उठ जायेगी या इस कुँए की तरह ज़मीन में धंस जाएगी। बीच की कोई संभावना उसने अपने लिये कभी जानी ही नहीं।

माल्टा दूतावास से बाएँ मुड़कर जब बावड़ी के खंडहर पर पहुँचा तो चौकीदार नदारद था। टहलता हुआ बावड़ी की सीढियों पर जा बैठा। घुट सन्नाटा और ठहरा हुआ हरा पानी। कहीं दूर से धीमी-धीमी आती गाड़ियों की आवाज़ें। एकबारगी भ्रम होता कि हम शायद किसी जंगल के बीच बैठे हुए हैं। लगा फ़िर से उन्ही दिनों में पहुँच गया हूँ जब हम अकसर वहाँ जाया करते थे। रेहाना को यहाँ बैठकर बातें करना बहुत अच्छा लगता था। हम अकसर मेरे वाकमैन पर कुछ न कुछ सुनते थे वहाँ बैठकर। ईयरफ़ोन का एक सिरा वह अपने कान में डाल लेती थी और दूसरा मेरे कान में। हम यूँही एक-दूसरे के सिर से सिर टिकाए गाने सुनते वहाँ पर कई बार घंटों बिता देते थे। उसे बावड़ी की सीढियों पर बैठकर फ़रीदा खानम की ग़ज़लें सुनना पसंद था। वह कहती थी कि फ़रीदा खानम को सुनते हुए इन सीढियों पर चलो तो स्वर्ग के दरवाज़े तक पहुँच जाओगे। “स्वर्ग का रास्ता बावड़ी के हरे, सड़े पानी से होकर जाता है मुझे नहीं पता था।” मैं मज़ाक करता था। वह झूठमूठ रूठते हुए कहती, “देख लेना स्वर्ग तो तुम्हे यहीं मिलेगा।” एक ग़ज़ल वह अकसर बार-बार सुनने की ज़िद करती थी:
दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया


कई बार सुना मगर स्वर्ग के दरवाज़े नहीं खुले। वह कहती थी, “जब तुम अपनी फ़िल्म में मेरा कैरेक्टर डालोगे तो ये ग़ज़ल बतौर मेरी सिग्नेचर ट्यून बैकग्राऊंड में बजाना।”
मै पूछता, “तुम देखोगी फ़िल्म?”
“तुम बनाओगे तो ज़रूर देखूँगी।” उसका जवाब होता।
“मैं तुम्हें कैसे बताऊँगा कि मैनें फ़िल्म बना ली है और कहाँ ढूढूँगा तुम्हें? रामपुर तो तुम जाओगी नहीं वापस।” मैं पूछता था। इसका कोई जवाब न उसके पास होता न मेरे पास। दरअसल जवाब तो हमारी जेबों में थे मगर हमारे हाथ इतने अकड़े हुए थे कि हम जेब से उन्हें बाहर ही नहीं निकालना चाहते थे। रामपुर वापस जाने की बात पर वह खिलखिलाकर हँस देती और मुद्दा उसी हँसी में ख़ाक हो जाता। हम साथ-साथ ऐसे जीते थे जैसे अलग होना लाज़िमी हो और इस बात का कोई अफ़सोस न उसे हो न मुझे। अफ़सोस तो हमारी रूहों में जम चुका था मगर हम इस बात को हाशिये पर रखते हुए दिन बिताते थे। हमारी ज़िद और इच्छा थी किसी भी तरह के संबंध से स्वतंत्र रहने की। हमनें इस बारे में खुलकर कभी बात नहीं की। अगर कभी इस तरह की कोई बात निकलती भी थी तो हम बातें पलटकर सुविधाओं के गलियारों से निकलना बेहतर समझते थे और हमेशा एक-दूसरे के लिये अपनी ज़रूरत स्वीकारने से बचते थे। जाने क्यों एक भारीपन हमेशा हमारे साथ रहता था, तब भी जब हम एक साथ हमारी दुनियाँ मे होते थे और तब भी जब अलग-अलग अपनी दुनियाओं में होते।

एक बार हम मानवीय संबंधों पर बात कर रहे थे। यूँ तो हम दोनो का मानना एक ही था मगर उसकी सोच ज़्यादा मुखर थी। उसने मेरी ओर एक सवाल उछाला था, “संबंधों की मिथ्याप्रतीति में अपेक्षा और उपेक्षा के बीच आदमी कितने संबंध साध पाता है? हर संबंध में या तो अपेक्षा आ जाती है या उपेक्षा।”
मैं अवाक रह गया था उसकी यह परिभाषा सुनकर। मैनें कहा, “रेहाना तुम शब्दों की जादूगरनी हो।”
“मैं रूप की भी जादूगरनी हूँ।” उसने पलकें जल्दी-जल्दी झपकाते हुए कहा और हम देर तक खिलखिलाते हुए हँसते रहे। वही खिलखिलाना जिससे अकसर हम बचते थे। इस हँसी के बीच हमारी परिभाषाएँ अपनी जड़े मजबूत कर रही थीं और हम अपनी दिशाएँ; यह जानते हुए भी कि इसका अर्थ क्या होगा। खाईयाँ हमारी ही खोदी हुई थीं मगर जैसे उन्हें पाटना हमारा काम न था, हम इस ओर से मुँह फेरे खड़े रहे।
उठकर कुछ सीढ़ियाँ और उतरने लगा। वाकमैन तो था नहीं, मोबाइल निकाला और एक इअरफ़ोन कान में लगाकर फ़रीदा ख़ानम की वही ग़ज़ल सुनने लगा। रेहाना की ओर वाला इयरफ़ोन हवा में ही झूल रहा था। शब्द बेड़ियों से छूटकर भागने लगे:
पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गई वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें या आसमान खा गया


“एवरी रिलेशनशिप कम्स विद एन एक्स्पायरी डेट।” यह उसका मूलमंत्र था। मैनें उसे छेड़ते हुए एक बार पूछा था, “क्यों? कितने संबंधों में पड़ चुकी हो अबतक?” उसने जिन जलती नज़रों से मुझे देखा था मैं दोबारा नहीं भूला उन्हें।
“मैं आजतक किसी रिलेशनशिप में नहीं पड़ी और न पड़ूँगी कभी। मानवीय व्यवस्था ऐसी है कि संबंध बनने के बाद एकदम ढोने की स्थिति में आ जाते हैं।” उसने कहा था। हालाँकि इस दावे का खोखलापन हर शाम को साबित होता था जब हम साथ होते। साथ न होने पर भी मैं उसकी रूह की तपन रात को करवटें बदलते हुए महसूस करता था और मेरे नाम से उसकी भी नसें फड़कनें लगती थीं। उसने मेरी आवाज़ एक कैसेट में रिकार्ड करके अपने पास रख ली थी और अकसर उसे सुनती थी। हम मरते थे एक-दूसरे के साथ के लिये मगर सच्चाई से इस तरह मुँह चुराते थे कि अगर कभी सच्चाई सामने आ जाए तो बावड़ी के कुँए में कूदकर आत्महत्या कर लेंगे।

“तुम्हारी थ्योरी क्या है स्त्री-पुरुष को लेकर?” उसने यह सवाल हमारी मुलाक़ात के एक हफ़्ते बाद ही पूछा था। ये वे दिन थे जब हम पर एक-दूसरे का व्यक्तित्व हावी होने लगा था। हमारी सोच इतनी ज़्यादा मिलती थी कि जान-पह्चान होने के कुछ दिनों बाद ही हम एक-दूसरे का सिर्फ़ वो कोना टटोलने लगे थे जहाँ हमें कोई ऐसा विषय मिले जिसपर हमारा मतभेद हो। वह शनिवार का दिन था और हम श्रीराम सेंटर में एक नाटक देखने के लिये आए हुए थे और वहीं कैफ़े में बैठकर कुछ खा रहे थे।
“स्त्री-पुरुष संबंध का जो आधार समाज ने बनाया है उससे मुझे बहुत ज़्यादा आपत्ति नहीं है। मैरिज इंस्टिट्यूशन में एक ही कमी है कि वहाँ स्त्री-पुरुष हर समय साथ रहते हैं। इससे संबंध मोनोटोनस होने लगता है और अकसर जो उल्लास शुरुआती दिनों में होता है वह मर जाता है। इसलिये मैं मानता हूँ कि विवाह या लिव इन की जगह लिव आउट जैसा कुछ होना चाहिये।” मैं उसकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगा। उसने कहा, “मैं सुन रही हूँ। कहते रहो।” और हौले से मुस्कुरा दी।
“मैं जानता हूँ कि मैं किसी भी संबंध को ज़्यादा दिन नहीं घसीट सकता और यह भी जानता हूँ कि मजबूरी की इस व्यवस्था में लोग शादी करके एक ही व्यक्ति के साथ पड़े रह जाते हैं। पुरुष क्योंकि ज़्यादा आज़ाद है, इसलिए वह ऊब से बचने के लिये कुछ हद तक विवाहोत्तर संबंध बना लेता है। स्त्रियों के लिये तो वह विकल्प भी नहीं है। उन्हें घुटना पड़ता है। पश्चिम में जहाँ व्यक्तिगत आज़ादी ज़्यादा है, वहाँ मैरिज इंस्टिट्यूशन टूट रहा है। नीदरलैंड में तो शादी करना हेय समझा जाता है।”
उसने मुझे लगभग टोकते हुए कहा, “तो तुम मानते हो कि पश्चिमी व्यवस्था आदर्श है?”
“नहीं। वे संबंध को मात्र शारीरिक उत्सर्जन का माध्यम मानते हैं और विलगाव के बावजूद भी संबंध बना लेते हैं। वहाँ तो कई बार संबंध सिर्फ़ इसलिये टूट जाते हैं क्योंकि पार्टनर को लाल रंग का सोफ़ा पसंद है या वह गोल्फ़ को बोरिंग मानता है। यह पराकाष्ठा है। आदर्श की बात नहीं करता मगर बेहतर स्थिति लाई जा सकती है। विवाह किया है या नहीं यह बात मायने नहीं रखती, संबंध को एकरस होने से बचाना ज़रूरी है और उसके लिये ज़रूरी है व्यक्तिगत स्वतंत्रता जोकि अकसर वित्तीय स्वतंत्रता होने के बाद भी कई बार नहीं आती। जबतक दो जन साथ रह रहे हैं तबतक किसी न किसी चोर-दरवाज़े से समझौता नाम की चीज़ घुस ही जाती है। यही अकसर संबंधों के टूटने का कारण भी बनता है। अंडरस्टैंडिंग और समझौता किस हद तक किया जाए यह तय नहीं किया जा सकता और फ़िर अपेक्षाएं पनपने लगती हैं। मैं इन अपेक्षाओं से बचना चाहता हूँ मगर संबंध को तोड़कर नहीं, उसे बनाए रखकर। जितने की इच्छा होगी उतना मैं अपने साथी के लिये करूँगा, मगर नहीं चाहूँगा कि उसे मुझसे कोई अपेक्षा हो और ऐसा होने की संभावना तभी ज़्यादा बनेगी जब हम साथ न रहकर समानांतर रहें।” एक लंबी सांस लेकर मैं चुप हो गया।
“एकरसता और उससे बचने की बात करने का मतलब है कि संबंध को कैसे बेह्तर घसीटा जाए। उसके लिये तो डोपामाईन की डोज़ ले लो।” उसने कहा।
“एन्ड्रोजन, एस्ट्रोजन, डोपामाईन और नोरापिनेफ़्रिन, सभी की ही डोज़ ली जा सकती हैं मगर उन्हें विकसित होने में तो अभी समय लगेगा और फ़िर औक्सीटोनिक और वैसोप्रेसिन बाधा नहीं डालेंगे क्या आपके पैशन में? रसायनिक प्रक्रिया की बात करना बेमानी है। प्रेम इंजेक्शन के बल पर नहीं किया जा सकता। मै सिर्फ़ यह कह रहा हूँ कि संबंधों में नए अर्थ कैसे भरे जाएँ, उन्हें कैसे नए मानी दिये जाएँ।” मैनें कहा।
वह लगभग चीख पड़ी, “बस इसीलिये मुझे यह सब खटकता है। संबंधों में नए मानी भरना, नए अर्थ देना; माई फ़ुट। मानी उस चीज़ में भरे जाते हैं जो बेमानी होती है। मुझे तुम्हारी इस थ्योरी से भी ज़्यादा उम्मीद नहीं है। सपाट शब्दों में कहूँ तो मानवीय समाज नीलगायों के एक झुँड से ज़्यादा कुछ नहीं है। वह चाहता है कि उसके आसपास उसके जैसे ही जीव रहें। इससे सुरक्षा की भावना बनी रहती है मगर इससे ज़्यादा कोई ज़िम्मेदारी वह कुदरती तौर पर नहीं लेना चाहता। बाघ आक्रमण कर दे तो वह सिर्फ़ अपनी जान बचाकर भागता है, घास दिख जाए तो खुद खाना चाहता है और क्रमबद्व सामाजिक विकास ने तो ऐसी-ऐसी संस्थाएं खड़ी कर दी हैं कि मनुष्य जितना लाचार पहले था, उससे कहीं ज़्यादा लाचार हो गया है। संबंध उससे निभते नहीं मगर तोड़ने का माद्दा भी उसमें नहीं है। फ़िर सामनें आती हैं संबंधों की विकृतियाँ। इससे बेह्तर है कि अपनी स्वतंत्रता बनाए रखो और एकला चलो रे।” वह सांस लेने के लिये रुकी। “मैनें किसी अविवाहित व्यक्ति को न किसी का बलात्कार करते देखा है न ही किसी विवाहित से संबंध बनाते। ज़्यादातर अविवाहित लोग सोच-समझकर अविवाहित रहते हैं और ज़्यादातर विवाहित लोग सब-कांशियसली विवाह का निर्णय लेते हैं। वे सिर्फ़ लकीर पीटते हैं।” वह कहती गई और मैं इस रिबैलियस के हिलते हाथों की लय पर थिरकते बड़े-बड़े गोल झुमकों को ध्यान से देख रहा था। मैं अविवाहितों के उसके तर्कों को आँकड़ों और तथ्यों से ग़लत सिद्व कर सकता था मगर जानता था कि मेरी ही तरह उसपर कोई विचार थोपना संभव नहीं है। तर्क अलग-अलग थे मगर विचार एक ही से थे यह जानकर हमको प्रसन्नता हुई। यह समझने में काफ़ी वक़्त निकल गया कि यह प्रसन्नता हमपर कितनी भारी पड़ने वाली है मगर उन दिनों तो हम दोनों एक दूसरे को बौद्विक स्तर पर अन्वेषित करने का सुख भोग रहे थे।

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई, ये मैं कहाँ समा गया

फ़रीदा खानम अब भी गा रही थी इस ओर तब ध्यान गया जब अचानक चौकीदार की आवाज़ सुनाई दी। वह पहचान गया था। “कहाँ थे सा’ब? कितने सालों बाद आए हो?” उसने पूछा।
“बस भई अब यहाँ आना हो नहीं पाता। जर्मनी चला गया था। एक महीना पहले ही लौटा हूँ।” मैनें कहा।
“जर्मनी? ये कहाँ है?” उसने पूरी मासूमियत से पूछा।
मुझे हँसी आ गई। मैनें उसे बताया, “गोरों के देश भई।”
“अच्छा-अच्छा। मैडम कहाँ हैं? उनको साथ नहीं लाए? अच्छा बच्चों के साथ होंगीं शायद घर पर।”
“नहीं। अकेला ही आया हूँ।” मेरा जवाब देने का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था और उसके सवाल थे कि खत्म ही नहीं हो रहे थे।
“मैडम को भी ले गए न गोरों के देश या अकेले ही गए थे?” उसने पूछा।
मुझे उत्तर देने से पहले ही अगले प्रश्न से डर लगने लगा। मैनें बताया, “मैडम अमेरिका चली गई थी।” उसने अमेरिका का नाम सुना हुआ था।
“अमरीका? सा’ब कुछ समझ नहीं आया। आप गोरों के देश और मैडम अमरीका?” उसकी सारी हैरानी उसके चेहरे से टपक रही थी। वह चुप नहीं हुआ। अपनी ही रौ में कहता रहा, “हाँ सा’ब आप लोग थे भी अलग से। आपका तो तरीका ही समझ में नहीं आता था मुझे। यहाँ तो जो भी आता है एक कोने में जाकर चूमा-चाटी करता है और एक आप लोग थे जो बावड़ी में बैठकर बस गाने सुनते रह्ते थे या पता नहीं क्या-क्या बात करते रहते थे।”
मैं हँस दिया। मैनें उससे कहा, “कुँआ नहीं दिखाओगे आज?”
वह उत्साहित हो गया, “आओ ना सा’ब क्यों नहीं दिखाऊँगा, ज़रूर दिखाऊँगा।” हम बातें करते-करते चबूतरे पर चढ़ने लगे। कुँए का पानी अब भी हरा था। न उसकी गहराई बदली थी, न दूर खड़ी मीनारों की ऊँचाई। रेहाना के प्रतिमान अब भी वैसे ही खड़े थे और वह ऊँचाइयाँ छूने की कोशिश में तीन साल पहले अमेरिका चली गई थी। वहाँ की एक युनिवर्सिटी ने उसे “मैक्स-म्युलर एंड हिज़ इन्टरप्रिटेशन ऑफ़ वेदाज़” विषय पर पी एच डी करने के लिये आमंत्रित किया था। और भी प्रतियोगी थे इस स्कालरशिप के लिये मगर चयनकर्ता समिति को रेहाना उसके दो बेबाक़ जवाबों की वजह से पसंद आ गई। उन्होनें पूछा कि वह मुस्लिम होकर हिंदुओं के धर्मग्रंथों पर शोध करने को क्यों उत्सुक है? क्या वह इसे महज़ अमेरिका के लिये एक टिकट के तौर पर ले रही है? रेहाना ने कहा, “वेद रचने की शुरुआत जब हुई थी तब धर्म अपने घुटनों पर चलते थे। ऋग्वेद लिखे जाने के बाद हिंदु धर्म को अपने आज के रूप में विकसित होने में सैकड़ों साल लगे। यही बात कमोबेश सारे धर्मों और धर्मग्रंथों पर लागू होती है, इसलिये वेदों को मात्र धर्मग्रंथ मानकर उनका अध्ययन करना बहुत बड़ी भूल होगी। वैसे भी शोध में धर्म का चश्मा पहनना ग़लत होगा, इसलिये इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि शोधार्थी का धर्म क्या है। मैंने धर्मग्रंथों को उस युग के परिपेक्ष्य में देखकर ही पढ़ा है जिस युग में वे रचे गये थे और उसी अनुसार उनकी व्याख्या भी की है।” दूसरा सवाल भी उसके धर्म को लेकर ही था। एक चयनकर्ता ने उससे पूछा कि इस बात की क्या गारंटी है कि रेहाना मुस्लिम होने के नाते वेदों के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रस्त नहीं है। उसने कहा कि इसका जवाब वह पहले ही सवाल में दे चुकी है मगर फ़िर भी यदि उसका मुस्लिम होना उन्हें खटक रहा है तो वह भी एक सवाल पूछना चाहती है कि इस बात की क्या गारंटी है कि अमेरिका के एक ईसाई देश होने के नाते यूनिवर्सिटी उससे वेदों की ईसाई धर्म के पूर्वाग्रहों के आधार पर व्याख्या करने को नहीं कहेगी? उसने यह भी साफ़ कर दिया था कि आवश्यकता पड़ने पर वह मैक्स म्युलर को कटघरे में खड़ा करने से भी नहीं चूकेगी। मैं उससे अकसर कहता था कि तुम्हारी बेबाक़ी मुझे लूट लेती है। वह मुस्कुराते हुए हमेशा एक ही जवाब देती थी, “लुटवाते-लुटवाते खत्म हो जाओगे और फ़िर पूछोगे मुझसे कि रेहाना मैं कहाँ ग़ायब हो गया?”

ये सुबह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
मैं आईने में ढूंढता हूँ मैं कहाँ चला गया

“सा’ब ये क्या गा रहे हो?” चौकीदार ने मुझे टोका। मैनें उससे पूछा, “फ़रीदा ख़ानम का नाम सुना है कभी?” उसने ना में सिर हिलाया।
“याद है सा’ब आप एकबार कुँए में गिरते-गिरते बचे थे और मैडम ने आपका हाथ पकड़ लिया था?” उसने याद दिलाया। हम एक बार वहीं चबूतरे पर खड़े हुए बहस कर रहे थे कि भारत में अब अच्छे ग़ज़ल गायक क्यों नहीं होते। मैं यह साबित करने की कोशिश कर रहा था कि गायक तो हैं मगर भारत में ग़ज़ल के साथ प्रयोग करने का मतलब है कि आप नहीं बिकेंगे। आज का दौर सिर्फ़ जगजीत और पंकज उदहास जैसे ग़ज़ल गायकों के लिये है, जो आसान सी ग़ज़लें भारी संगीत के साथ ठेलते रहते हैं। सूडो-इन्टेलेक्चुअल्स के लिये ये ग़ज़ले रेफ़ेरेन्स के काम आ जाती हैं। वे आराम से वाइन के ग्लास खनकाते हुए बग़ैर उर्दु समझे घंटों ग़ज़लों पर पूरी गंभीरता से बहस करने की सुविधा पा जाते हैं और शौक से डींगें हाँकते हैं अपने कला-सम्पन्न होने की। आज के दौर में तो बेग़म अख़्तर भी फ़ेल हो जातीं। मैं गाकर रफ़ी की गाई एक ग़ज़ल उसे सुनाने लगा और गाते-गाते पीछे की ओर चलने लगा। इस प्रक्रिया में मैं बिलकुल भूल गया कि पीछे कुँआ भी है। मेरा एक पैर बिल्कुल कुँए के मुहाने पर था जब उसने कूदकर मुझे खींच लिया और कसकर मुझसे चिपक गई। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। वह बग़ैर कुछ कहे कुछ देर यूँही मुझसे चिपकी रही। मैं अपने पेट और छाती के बीच उसकी तेज़ धड़कने महसूस कर रहा था। उसका बदन ऐसे कांप रहा था जैसे अभी छटपटाकर गिर पड़ेगी और दिल इतना तेज़ धड़क रहा था कि बस फट पड़ेगा। घबरा तो मैं भी गया था मगर उससे भी बड़ा डर मेरे अंदर पैठ गया। मुझे लगा कि कहीं वह क्षणिक आवेग में कुछ ऐसा न कह दे कि हम दोनों ही एक-दूसरे से नज़र न मिला पाएँ। ऐसे मौके कम ही आते थे मगर जितने भी आए, हमारी खुद की गढी हुई परिभाषाएँ हमारे बीच आ जाती थीं और अपने साथ एक असहजता ले आती थीं। खैर, ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैनें उसे चबूतरे की सीढियों पर बैठाया और उसके पर्स से बोतल निकालकर पानी पिलाया। अगले दो दिनों तक वह गुमसुम सी रही और मुझसे बात करने में हिचकती रही। मैं जानता था कि वह सच्चाई से मुँह छिपा रही थी पर मैं ही कौनसा ईमानदारी बरत रहा था। ऐसे तमाम मौकों पर हम एक-दूसरे से मुँह चुराने लगते थे।

अपने संबंध की जो सीमा हमनें तय की थी वह हम दोनों के बीच ही इतनी निजी थी कि हमनें कभी एक-दूसरे तक से उसपर खुलकर बात नहीं की और न ही कभी मौखिक तौर पर यह जानने या तय करने की कोशिश की कि हमारा संबंध किस ओर जा रहा और इसकी नियति क्या होगी। मुझे लगता है अगर मैं जर्मनी और वह अमेरिका न जाती तो आज इतने सालों बाद भी हम एक-दूसरे से यूँही मिलते और वैसे ही बावड़ी की सीढियों पर बैठकर फ़रीदा ख़ानम को सुन रहे होते। इस संबंध में किसी बदलाव की पहल न वह करती और न मैं, मगर शायद भीतर ही भीतर हम दोनों चाहते थे कि पहल दूसरा करे। यदि कोई पहल कर भी देता तो भी यह मुश्किल ही था कि दूसरा अपनी उन परिभाषाओं को ताक पर रखकर तैयार हो जाता, जिनकी हम इतनी डींगें हाँकते थे। लोग यही समझते थे कि हम जल्दी ही शादी कर लेंगे। जब उसके अमेरिका जाने की खबर आई तो कई दिनों तक दोस्त मुझे कुरेदते रहे और समझने की कोशिश करते रहे कि हमारा संबंध किस दिशा में जा रहा है और अगर टूट रहा है तो क्यों? हम दोनों के एक-दूसरे के प्रति व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया था; आने का कोई कारण भी नहीं था और यही बात दोस्तों को परेशान करती थी। हमारे पास जो जवाब थे उनकी व्याख्या इतनी लंबी थी कि किसी को भी समझाने में एक जीवन बीत जाता।
गरिमा शायद हमारे संबंध की जटिलता समझती थी और कई बार उसने मुझसे कहा था, “ये क्या पागलपन है? तुम दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है।”
मैं कहता, “ज़रूरत है इसीलिये तो साथ हैं। और क्या उम्मीद कर रही हो तुम? ”
“शादी या कम से कम साथ ज़िंदगी बिताना।”, उसने कहा।
मैनें कहा, “उसकी नौबत ही नहीं आएगी। हम जल्दी ही एक-दूसरे से ऊब जाएँगे।” अगले छ: सालों तक हम एक-दूसरे से नहीं ऊबे। उसके अमेरिका से गाहे-बगाहे ख़त आते रहते थे और मैं भी उसे लिखता था मगर वहाँ भी हम अपनी बात करने से बचते थे और देखे गए शहरों का वर्णन करते थे या रोज़मर्रा की ज़िंदगी का ज़िक्र। हमारे अंदर इतनी दरिद्रता भर गई थी कि बाँटने के लिये कुछ और नहीं था और जो था उसे हमनें सिर्फ़ अपने-अपने लिये सहेजकर रख लिया था। जो हमें एक-दूसरे से बाँटना चाहिए था वही हमारे बीच दीवार बनकर खड़ा था।
गरिमा का समझाना जारी रहा, “अगर ऐसा ही है तो साथ ही क्यों होते हो तुम? जिस संबंध की कोई नियति ही तुम्हारे पास नहीं है उसे रोक दो, आगे ही मत बढ़ने दो।”
“तुम हर संबंध को ढर्रे में ढालने पर तुली रहती हो, यहीं गलती करती हो। क्या हम ऐसे ठीक नहीं हैं? क्या इससे ज़्यादा की अपेक्षा करनी चाहिये? हर संबंध के लिए नीड़ नहीं बसाया जाता। कुछ को फ़्रेम में जड़कर रख देना चाहिये, ताज़गी बनी रहती है।” मैनें कहा।
उसने पूछा, “अगर तुम लोग अपने संबंध और एक-दूसरे को इतनी सहजता से ही लेते हो तो फ़िर साथ रहने की बात पर कई बार तुम लोग इतने असहज क्यों हो जाते हो?”
वह हमारे बीच के उन असहज क्षणों को जाने कैसे पकड़ लेती थी जिन्हें हम हमेशा छोड़ देना चाहते थे। उसकी इस बात का कोई जवाब मेरे पास नहीं था, रेहाना इसके जवाब में शायद ज़रूर कुछ कहती मगर गरिमा मेरी दोस्त थी रेहाना की नहीं। गरिमा ने रेहाना से कभी इस बारे में बात नहीं की; शायद उसे भी अपने अधिकार-क्षेत्र की परिधि पता थी और उसने उसके बाहर जाकर कुछ कहने की चेष्टा कभी नहीं की। करती भी, तो भी कुछ नहीं हो सकता था। किसी और का इस बारे में मुझसे या रेहाना से बात करना पेचीदगी को सिर्फ़ बढ़ा ही सकता था।

चौकीदार कुछ देर में आने का कहकर चला गया। मैं वहीं बावड़ी की सीढ़ियों पर बैठ गया। फ़रीदा आपा अब भी गा रही थीं:
गये दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
उठो अमलकशों उठो कि आफ़ताब सर पे आ गया

बावड़ी के हरे पानी को देखता रहा। यह भी जाने कितने सालों से ऐसे ही पड़ा है, बगैर किसी बहाव के, इसलिये सड़ांध मारने लगा है और रंग भी हरा पड़ गया है। हमारे संबंध पर भी हमारी तमाम बौद्विक परिभाषाओं के बावजूद काई जम गई थी, तब भी जब हम इतने सालों से दूर् थे। हालांकि हम दोनों ही कोई ठहराव नहीं आने देते थे और किसी न किसी बहाने एक-दूसरे को खंगालते रहते थे, इसीलिये शायद हम अब भी एक-दूसरे की ज़रूरत तो थे मगर तो भी हमारे संबंध का कोई निश्चित आकार नहीं था और कोई निश्चित संबंध बने बिना भी हम दोनों की परिभाषाओं को ठेंगा दिखाती हमारे संबंध की असफलता हमारे सामने खड़ी थी। हमनें क्या दिया एक-दूसरे को सिवाय परिभाषाओं के? ये कुछ सवाल अकसर मेरे सामने सिर बाये खड़े रहते थे। रेहाना को भी यही सवाल ज़रूर परेशान करते थे। जर्मनी में जब भी उसके पत्र आते, उसके वाक्य तार से खिंचे-खिंचे लगते, जैसे कुछ और ही था जो वह कहना चाह रही थी या और भी कुछ कहना चाह रही थी। मैं उनमें सिर्फ़ एक पंक्ति पढ़ना चाह्ता था, जो उसने कभी नहीं लिखी। पूरे पत्र को बार-बार पढ़कर मैं अपने मतलब का अर्थ उसमें से निकालना चाहता था। हर बार पत्र को टटोलता कि कोई तो ऐसा शब्द मिले जिससे कुछ उम्मीद बने। न ऐसा होना था न हुआ। समय बीतता रहा और हम संपर्क में बने रहे। एक बार उसने लिखा था कि हम स्वंय से झूठ बोलते हैं और बहुत उत्कंठा से आशा करते हैं कि दूसरे हमपर विश्वास कर लें जबकि दूसरे हमारी बेवकूफ़ी पर मुस्कुरा रहे होते हैं। मनुष्य इतना कपटी है कि अपने आप को भी ज़िंदगी भर छलावे में रख सकता है। जाने क्यों उन दिनों नीत्शे की एक पंक्ति उसे बेहद पसंद थी, “वी हैव द आर्ट टु सेव आवरसेल्व्स फ़्राम द ट्रुथ।” मुझे उसके पत्रों में एक अजीब सी बेचैनी दिखाई देती थी। प्रत्यक्षत: उसने कभी कुछ नहीं लिखा मगर जिस स्तर पर हम एक-दूसरे को समझते थे, वहाँ कई बातें अनकही रहकर भी प्रेषित हो जाती थीं।

हालांकि अमेरिका जाने के शुरुआती दिनों में वह बहुत उत्साहित थी। अपने पत्रों में वह सिर्फ़ अपनी बात करती थी। उसके पहले तीन पत्र कम से कम पन्द्रह पन्नों के थे। उसने लिखा था, “मेरे पास एक अस्तित्वपरक नक्शा है, जिसपर सब जगह लिखा है, ‘आप यहाँ पर हैं’। मुझे लगता ही नहीं कि जीवन मेरे अस्तित्व के परे भी कुछ हो सकता है। लगता है जैसे मैंने वह अवस्था पा ली है जहाँ महसूस होता है कि मैं जीवन से नहीं हूँ, जीवन मुझसे है। फ़िलहाल यह मेरी उपलब्द्वि है।” वह जीवन से इतनी लबालब लगती थी कि अगर अपने नोट्स के बारे में भी बात करती थी तो उसमें भी उसका रोमांच टपकता था। वह अपने काम और नए जीवन को लेकर बहुत खुश थी। छ: महीने के अंदर ही उसने अनपेक्षित रूप से अपना पहला पेपर प्रकाशित करवा दिया था जिसपर एक प्रशंसा-पत्र भारतीय संस्कृति मंत्रालय से उसे भेजा गया था। मैक्स-म्युलर विरोधी और उनके समर्थक, दोनो ही खेमों में इस पेपर की चर्चा हुई थी। मैनें बधाई देने के लिये उसे फ़ोन किया था। वह खुशी से चहक रही थी। मुझे बड़ा अच्छा लगा। मैनें पूछा, “क्या बात है? तुम्हारी आवाज़ से ज़रूरत से ज़्यादा ही खुशी टपक रही है?”
उसके अतिउत्साही स्वर का स्तर बना रहा, “पता है ऑस्कर अब्बा कहते थे, ‘टु लव वनसैल्फ़ इज़ द बिगेनिंग ऑफ़ अ लाइफ़लौंग रोमांस।’ तो बस जान लो कि जितना प्यार मैं अपने-आप को पहले करती थी, उससे कहीं ज़्यादा अब करती हूँ। मुझे लगता है मैनें अमेरिका आकर बिल्कुल सही निर्णय लिया।”
मैनें इस टिप्पणी की वही व्याख्या की जो उसने प्रेषित की थी। वह सच में अपने निर्णय से खुश थी। वह लीक पीटने वालों में से नहीं थी। संभावनाओं के जंगल में घुसकर हमेशा अपने लिये पगडंडी बनाना उसकी आदत थी। अमेरिका जाने का निर्णय भी इन्ही में से एक था, जिसे उसका संपन्न परिवार उसके फ़ितूर से ज़्याद कुछ मानने के लिये लंबे अरसे तक राज़ी नहीं हुआ। मगर नतीजे उसके परिवार के सामने आने लगे।

डेढ़ साल बाद ही उसे मैक्स म्युलर पर सेमिनारों की एक ॠंखला के लिये जर्मनी और इंग्लैंड आमंत्रित किया गया। मैं उससे मिलने म्युनिख गया था और उसका पेपर भी सुना। अलग से प्रभावित होने की ज़रूरत नहीं थी। मैं उससे शुरु से ही प्रभावित था। मगर इस बार वह मुझे कुछ उदास सी लगी। उन दिनों भी नीत्शे उसकी ज़बान पर था मगर कुछ नकारात्मक स्वर में। “वेनएवर आई क्लाईम्ब आई एम फ़ॉलोव्ड बाय अ डॉग कॉल्ड ईगो।” उसने मुझे कहा, “मुझमें कुछ गलत पनप रहा है; शायद अहम। मुझे इससे बचना होगा।” उसका स्वर सुनकर तो लगा जैसे वह कह तो रही हो, “मुझे बचना होगा” मगर उसका अर्थ हो, “मुझे बचा लो।” पर कैसा अहम, मैं समझ नहीं पाया। मुझे उसके व्यवहार में कोई भी परिवर्तन नज़र नहीं आया और अहम किस बात का? अभी भी वह सफ़लता से मीलों दूर थी यह वह भी जानती थी। मुझे लगा था कि वह अपने को लेकर दुविधा में है। संभवत: यह दुविधा हम दोनों को लेकर थी, मगर उसने इस ओर कुछ इशारा नहीं किया। मैं भी इस कोने को छेड़ने से बचता रहा। अगले हफ़्ते वह इंग्लैंड के लिये रवाना हो गई और मैं हनोवर वापस आ गया। वापस जाकर उसने पत्र में लिखा था, “मैं बुरी तरह से उलझन में हूँ। क्या मुझे यही सब चाहिये था? जबतक व्यस्त रहती हूँ इस सब की ओर ध्यान नहीं जाता मगर बिस्तर पर पसरते ही सबकुछ टूटा-टूटा लगता है। लगता है जैसे सबकुछ बिखर रहा है और अगली सुबह मैं इस बिखरे हुए को समेटने की जुगत में लग जाती हूँ। पता नहीं यह बिखराव क्या है। मेरा अपने आप से ही संघर्ष बढ़ने लगा है। यह दुविधा कहां से पैदा हो गई? तुम शायद विश्वास नहीं करोगे, कई बार मुझे ज़ोरों से इच्छा होती है बच्चे खिलाने की। यह क्या हो रहा है? मैं ऐसी कभी नहीं रही। क्या उम्र अपनी मांग मुझपर हावी कर रही है? मुझे लगता है ट्वेंटी फ़ाईव इज़ द राईट एज टु टेक रौंग डिसीज़न्स। पहली बार मुझे लग रहा है कि मैनें शायद अमेरिका आकर सही निर्णय नहीं लिया, मगर मुझे यह भी नहीं पता कि सही निर्णय क्या होता।” यह संकेत था, चुनौती थी, याचना थी या मात्र उलझन ही थी, मैं नहीं समझ पाया। मैं कारण जानना चाहता था मगर न वह समझा पायी न मैनें उसे ज़्यादा कुरेदा। अगले डेढ़ साल भी गुज़र गये और अब उसकी पी एच डी पूरी हो चुकी थी। भविष्य को लेकर वह एक महीना पहले तक उहापोह में थी जब मैनें उससे आखरी बार हनोवर से फ़ोन पर बात की थी। यहाँ आकर जब बात हुई तो उसने बताया कि यूनिवर्सिटी अपने ईंडिक स्टडीज़ विभाग में उसे लेने के लिये उत्सुक है और जर्मनी से भी उसे ऐसा ही एक आमंत्रण आया है मगर वह भारत वापस आकर काम करना चाहती है। उसे दस दिन के अंदर निर्णय लेना था क्योंकि जर्मनी और अमेरिका, दोनों की युनिवर्सिटीज़ जल्द से जल्द किसी को रखकर काम शुरु कर देना चाहती थीं मगर भारत में कोई काम इतनी जल्दी मिलना मुश्किल लग रहा था। मैनें उसे कहा था निर्णय लेते ही मुझे सूचित करने के लिये मगर आज पच्चीसवाँ दिन है और हमारी दोबारा बात नहीं हुई। मैनें मेल लिखा तो उसने जवाब में सिर्फ़ वक़्त पर सूचित करने की बात कही थी और कुछ नहीं कहा।
बावड़ी के ऊपर गहरे रंग के जामुन लटक रहे थे। कुछ जो पूरे पक चुके थे, वे रह-रहकर बावड़ी के पानी में गिरते और काई थोड़ी फट जाती। अंदर का ठहरा हुआ पानी थोड़ा मचलता और काई को किनारे ठेलकर एक बूँद हवा में उछलकर फ़िर पानी में ग़र्क हो जाती। हिलता हुआ पानी ठहर जाता और काई फ़िर अपनी जगह ले लेती। शाम हो चुकी थी और अंधेरा बावड़ी की दीवारों में पैठ गया था। फ़रीदा आपा आखरी शेर पर थीं;
"जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिये
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया"

Thursday, 3 July 2008

लड़कियाँ सिर्फ़ सामान हैं तुम्हारा

तुम्हारी लड़कियाँ सिर्फ़ सामान हैं तुम्हारा
और कौनसा दरजा देते हो तुम उन्हें?
तुम्हारी लड़कियाँ पगड़ी में लिपटी हुई इज़्ज़त होती हैं सिर्फ़
इसलिये उन्हें कलफ़ करके चमकाया जाता है;
हर पगड़ी की फनफनाती कलगी दरअसल
किसी सुशील लड़की का झुका हुआ सिर होती है;
उन लड़कियों को उनके दहेज के साथ
सहेजकर रख दिया जाता है बंद दीवारों में
आने वाले कुछ सालों के लिये
ताकि जब वे पूरा सामान बनकर बाहर निकलें
उन्हें सजाकर रखा जा सके ड्राईंग-रूम की पेंटिंग के नीचे
अपने दहेज के सामान की लिस्ट के साथ
और पूरे दहेज में उनके सबसे आकर्षक होने की प्रार्थना की जाती है।
मगर इससे भी पहले जैसे लकड़ी ठोंककर भरी जाती है हथौड़े के सिर में
तुम उनके शब्दकोश में भर देते हो एक वाक्य
कि उनके लिये प्रेम और काम अकरणीय हैं
और सिखाते हो कि कौमार्य ही है उनकी मुक्ति का अंतिम मार्ग;
मगर तुम यह सीखाना तो भूल ही जाते हो हर बार
कि यह सहेजा हुआ कौमार्य कैसे समर्पित किया जाता है
अपने मुक्ति के देवता के चरणों में,
क्योंकि तुम्हारी महान संस्कृति चौंसठ कलाएँ गढ़ने के बाद भी
तालिबानी युग में जी रही है।
जब बरसों का एक भूखा भोगता है तुम्हारी कन्याओं को
तो उनकी रक्त रंजित दुविधाओं पर मनाते हो तुम उत्सव
और महसूस करते और कराते हो उनके अस्तित्व की सार्थकता।
यह कैसा खेल है कि तुम अपनी कुँठाएं तक खुद लादकर नहीं चल सकते
और बिसात पर उनको ठेलते रहे हो जिनके तुम संरक्षक हो,
क्योंकि मानवीयता के तमाम शास्त्रों ने नहीं गढ़े कोई सिद्धांत
संरक्षितों के आवश्यकतानुसार दोहन पर;
और कैसे उत्सव हैं तुम्हारे कि चीत्कारों पर गाते हो मंगलगान
और सीत्कारों पर अमर्ष राग।
तुम्हारे इस आधी आबादी पर किये अनाचारों की
यह तो सिर्फ़ प्रस्तावना है
जिसके कर्ता, कारक और कारण तुम स्वंय हो
वरना इस आबादी पर
जो हथियार तुमने ताने हुए हैं सदियों से
उनकी घातकता तो मानव इतिहास के सभी युद्धों से ज़्यादा है।

चाकू सर को याद करते हुए

किसी को याद करना भी एक कला ही होती होगी। मैं इस कला में निरा ठस हूँ। अतीत की ओर कभी क्षोभ से देखता था पर धीरे-धीरे रूमानियत से देखना सीख गया या शायद परिस्थितियों ने सिखा दिया। कहीं पढ़ा था, “There is no harm in visiting your past, but make sure that you don’t bring any luggage with you.” मैं तो पूरा घर ही उठा लाता हूँ अपने साथ। कितना तो सुनहरा होता है अतीत हमेशा; मेरा, सभी का। अतीत पेजमेकर की तरह है। वह आपको वैसी ही तस्वीर दिखायेगा जैसी आप गढ़ना चाहेंगे।
कई बार यूँही बैठे-बैठे अतीत के दस्तावेज़ टटोलने लगता हूँ तो ऐसी चीज़ें हाथ लग जाती हैं जो मैंने खुद भी पहले नहीं देखी थीं, जाने क्यों? बहुत अच्छा लगता है।
आज पता नहीं क्यों चाकू सर (यही नाम दिया था हमनें उनको। वे हमें एकांट्स पढ़ाया करते थे और क्लास टीचर भी वही थे।) और सोहन याद आ रहे हैं बेतरह। मैंने दसवीं के बाद स्कूल बदल लिया था। सारे संगी साथी छूट गए; बस मैं और उन दिनों का मेरा एक पक्का दोस्त। पहुँचे दूसरे स्कूल। वह जो उम्र होती है, उसमें ऐसी अद्बुत सहजता होती है कि दोस्त बनाने में और दिल जुड़ाने में वक़्त नहीं लगता। पता भी नहीं कि कब बाईस नए लोगों से जुड़ गया। ऐसी आत्मीयता मिली उन सब लोगों से कि अब अठ्ठारह साल बाद भी रह रह कर याद आते हैं वे चेहरे। अफ़सोस कि अब उनमें से किसी से भी संपर्क नहीं रह गया है।
उनमें से एक चेहरा बड़ा आत्मीय और खास था – सोहन। एक ही चुटकुलेबाज़ था। जब वह चुटकुले सुनाने बैठता तो चौबीस लड़कों की क्लास में सुईपटक सन्नाटा छा जाता था। ऐसी शांति एसेंबली में भी नहीं रख पाती थी हमारी पूरे स्कूल में कुख्यात क्लास। सोहन ही था जिसे मैं आज से तकरीबन नौ साल पहले यकायक फ़िर टकरा गया था। कनाट प्लेस में बाराखंबा रोड पर गोपालदास बिल्डिंग के नीचे बस स्टैंड हुआ करता था। वहाँ से मैं और मेरी एक सहपाठिनी रात आठ बजे के करीब मैक्स म्युलर भवन में जर्मन की क्लास खत्म होने के बाद नौएडा के लिये बस पकड़ते थे। एक दिन ऐसे ही हम बस के इंतज़ार में एक स्टाल से बर्गर खा रहे थे (जोकि उन दिनों मेरे लिये luxury होता था) कि अचानक देखा एक जाना पहचाना व्यक्ति। मुझे देखते ही लगा यह सोहन ही है। मैं भागकर उसके पास गया मैनें उसके कंधे पर हाथ रखा तो वह पलटा और मेरे मुँह से निकला, “सोहन?”। मगर हैरान रह गया जब उसके चेहरा सपाट बना रहा और उसी सपाट चेहरे से उसने कहा, “महेन्द्र।” थोड़ी निराशा हुई वरना मेरी आत्मीयता तो चाह रही थी कि उसे कसकर गले लगाकर दुनियां को बताऊँ कि मुझे अपना दोस्त मिला है सात साल बाद। खैर हाथ मिलाया और पूछा क्या कर रहा है। वह टाल गया और मेरे बारे में पूछने लगा। मैनें पूरे उत्साह से (जिसमें मैं हमेशा पाया जाता हूँ) बताया कि फ़िलहाल जर्मन सीख रहा हूँ। बाकी दोस्तों के बारे मैं भी कुछ खबर मिली उससे। ज़्यादातर लोग आई एन ए के आसपास रहते थे इसलिये एक दूसरे से संपर्क में रहते थे और मैं मालवीय नगर में रहता था सो उन लोगों से संपर्क में नहीं रह पाता था। स्कूल के समय तक टेलीफ़ोन लक्ज़री ही हुआ करते थे। इस दौरान उसकी नज़र मेरे पार कुछ और देख रही थी। पता नहीं क्या? एकबार फ़िर पूछा क्या कर रहा है। उसने बताया कि कहीं किसी कंपनी में एकाउंट्स का काम कर रहा है। मैनें पूछा कि चाचा के पास यू के जाना चाहता था उसका क्या हुआ? उसने ऐसे देखा जैसे समझने की कोशिश कर रहा हो कि ये चाचा कौन हैं मगर होंठ टेड़े करके चुप हो गया। बड़े भाई के बारे में पूछा तो फ़िर वही टेड़े होंठ। मेरा उत्साह इतना ज़्यादा था कि उसकी मुझसे मिलने की अनिच्छा भी मैं नहीं समझ पाया। बस यही सोचता रहा कि पाँच मिनट की मुलाकात में उसने एक भी चुटकुला नहीं सुनाया। मैनें नंबर मांगा तो उसने उलटा मेरा नबर मांगा। वादा लिया कि फ़ोन करेगा। अगले कई दिनों तक माँ से पू्छता रहा कि कहीं मेरे लिये मेरे पीछे किसी का फ़ोन तो नहीं आया था? फ़ोन न आना था न कभी आया। जब लगने लगा कि कुछ ज़िंदगी का बोझ और कुछ अपनी नाकामयाबी उसके सपाट चेहरे पर लिखी हुई थी जो मैं पढ़ नहीं पाया था तो एक दिन बस में से मुझे उसका चेहरा दिखा, मगर जबतक आवाज़ लगाता बस बहुत दूर निकल चुकी थी। थोड़ी ही दूर खाली खाली सा बस स्टेंड होता था, जहाँ बस कभी कभी ही रुकती थी। सोचा अगर रुके तो उतर जाऊँगा और दौड़कर उसे पकड़ लूंगा। मगर बस नहीं रुकी और मैं अगली बार के इत्तेफ़ाक के भरोसे बैठ गया जो आज दस साल बाद भी नहीं आया है। आज हैरान होता हूँ कि किसी तौर बस से उतर जाता तो शायद पता होता कि आज वह कहाँ है। जब हम कुछ खो रहे होते हैं तो खोना देख नहीं पाते।
और याद आते हैं चाकू सर। चार फ़ुटिया चाकू सर जितने छोटे शरीर के स्वामी थे उससे कहीं बड़ी शख़्सियत के मालिक थे। उनका नाम आर सी शर्मा था। पूरा नाम तो कभी पूछा ही नहीं। एकाउंट्स इतनी सहजता से पढ़ा देते थे जैसे शेक्सपीयर पढ़ रहे हों। उनकी क्लास लंच से पहले हुआ करती थी और हम और वे इतने तल्लीन हो जाते थे कि कई बार पता ही नहीं चलता था कि पीरियड खत्म हो गया है। अगर कभी हमें पता चल भी जाता था तो भी किसी कि इच्छा नहीं होती थी टोकने की। जिस एकाउंट्स से मेरे पिछले स्कूल के साथी परेशान थे और मैं और मेरा दूसरा दोस्त उनके तारणहार बन गये थे, उसे हमने चालीस दिन में पूरा चाट डाला था। हुआ युँ था कि उन दिनों मंडल कमीशन का विरोध बहुत ज़ोरों पर था और दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थी सड़कों पर उतर आये थे। जगह जगह वे धरने पर बैठे रहते थे। पहले तो कालेज अनिश्चितकाल के लिये बंद हो गये फ़िर विद्यार्थियों ने स्कूल भी ज़बर्दस्ती बंद करवा दिये। उन दिनों लगभग रोज़ कोई न कोई युवक मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के विरोध में सफ़दरजंग अस्पताल के बाहर आत्मदाह करता था और अक्सर मर भी जाता था। यह सब समझने के लिये हमारी बुद्धि अभी विकसित नहीं हुई थी पूरी तरह। बहरहाल चालीस दिन स्कूल बंद रहे और उन चालीस दिनों की छुट्टियों में मैनें पूरा एकाउंट्स खत्म कर डाला। इससे चाकू सर की नज़र में साख बन गई, हालांकि मैं शुरु के सात आठ अच्छे विद्यार्थियों में भी नहीं आता था मगर एकाउंट्स मेरा पसंदीदा विषय बन गया और मैं चाकू सर का पसंदीदा छात्र। उन्होने शायद ही कभी किसी को डांटा हो या कुछ कहा हो (एक घटना को छोड़कर, जिसका उल्लेख उचित नहीं होगा) मगर उनके व्यक्तित्व में कुछ बात थी कि उनकी नज़र से ही हम थर थर कांपने लगते थे। कभी अगर वे किसी से कोई सवाल पूछ लेते थे तो हम सब उस बच्चे को ऐसे देखते थे जैसे बकरे को हलाल होने से पहले आखरी बार देख रहे हों। अगर जवाब दिया तो ठीक वरना गये। उन्हे उत्तर न मिलने से ही चिड़ थी बस। यह सही भी था क्योंकि वे इतने तफ़्सील से बताते थे कि समझ आना लाज़िमी था और हम उनकी इस खीझ को समझते भी थे। कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी भी बच्चे ने उनके बारे में कुछ भी बुरा कहा हो। वे सवाल पूछकर ऐसे छील देते थे कि हमारी क्लास के एक जाट ने एक बार कहा, “यो आर के णा सै भाई, यो तो चाक्कू सै चाक्कू।“ बस वो दिन था और आज का दिन है, उनका नाम चाकू ही आता है ज़बान पर। बाकी सारे दोस्त जहाँ भी होंगे उन्हे इसी नाम से याद करते होंगे।
चाकू सर शुरू से इतने कठोर नहीं थे। अपनी ग्यारहवीं पूरी तरह मज़े में निकली थी उनके साथ। परीक्षाओं के बाद छुट्टियाँ पड़ती थीं दो महीने की। उनकी इकलौती संतान उनका बेटा हमारा हमउम्र था। जब छुट्टियों के बाद हम स्कूल आये तो सर का चेहरा देख कर घबरा गये। अजीब सी उदासी थी। नमस्ते का जवाब भी वे बड़े अनमने ढंग से दे रहे थे। आँखों के नीचे काले घेरे बन गए थे और दो महीनों में अपनी उम्र दस साल बढ़ा आये थे। उनसे सीधे पूछते भी नही बन रहा था किसी से। हारकर इकोनोमिक्स वाले डिमरी सर के पास गये सब मिलकर और उनसे पूछा तो पता चला कि उनके बेटे की मृत्यु हो गई। घोर सन्नाटा छा गया था हमारे बीच। कई दिनों तक हमारा स्कूल बंक करना बंद हो गया। सर की खीझ या गुस्सा या दु:ख अकसर हमपर निकल जाता था। वे कई बार पूरे लेक्चर में सिर्फ़ डांटते ही रह जाते थे। पूरी क्लास में एक मूक समझौता था कि सर की डांट चुपचाप खानी है और जाने क्यों ऐसा होता था कि एक को डांट पड़े तो पूरी क्लास अपराध भाव से भर जाती थी। किसी और को यदि जवाब आता भी था तो भी वह उत्तर देकर सर की डांट को भंग नहीं करता था। डांट खाकर ज़्यादा संतुष्टि मिलती थी।
बोर्ड की परीक्षाएँ शुरु होने वाली थीं और तैयारी के लिये हमारी छुट्टियाँ पड़ चुकी थीं। एक बार स्कूल के अहाते में मिल गये। मैं शायद एडमीशन कार्ड लेने स्कूल गया हुआ था। कंधे पर बड़ी आत्मीयता से हाथ रखकर पूछा, महेन्द्र कितने नंबरों की उम्मीद कर रहे हो एकाउंट्स में? मैनें कहा, सर 90+ तो आएंगे ही। चाहे तो शर्त लगा लें। एक निरीह सी दृष्टि उन्होने मेरी ओर देखा, जैसे कुछ याद सा आ गया हो। फ़िर हंसकर बोले, मैं जानता हूँ तुम ले आओगे। शुभकामनाएं दीं और कंधे झुकाते हुए अंदर चले गये। मैं खड़ा उनको अंदर जाते देखता रहा और सोचता रहा, पता नहीं अब इन्हे दोबारा देख पाऊँगा कि नहीं। नहीं देख पाया दोबारा आजतक। अब कोई उम्मीद भी नहीं है। जब दिल्ली जाता हूँ तो अकसर स्कूल की ओर भी जाता हूँ। दिल्ली हाट के बाजू में ही है। एक बार स्कूल छूटने के वक़्त गया और बच्चों के एक झुंड से पूछा, “आर के शर्मा सर पढ़ाते है क्या यहाँ?” उन्होने हैरानी से मेरी ओर देखकर कहा इस नाम के कोई टीचर नहीं हैं यहाँ।
लौट आया और फ़िर नहीं गया कभी। हालांकि कभी कभी जब वहां से गुज़रता हूँ तो आँखे पुराने अवशेष टटोलने लगती हैं… पुराने दोस्तों के अवशेष, छोटी छोटी बतकहियों के अवशेष, एक चुटकुला जो रास्ते में सोहन से छुट गया था, एकाउंट्स की किताब के पन्नों के चिथड़े और चाकू सर के अवशेष… लौटना अकसर खाली हाथ ही होता है।

Tuesday, 1 July 2008

मेरे पास तुम्हारे बालों में खोंसने के लिये चाँद नहीं है


मेरे पास तुम्हारे बालों में खोंसने के लिये चाँद नहीं है
न ही मैं कोई उपमान गढ़ सकता हूँ
तुम्हारी देह की गोलाईयों पर
अपने रुक्ष नखों से तुम्हारी देह की स्निग्धता पर
खजुराहो के मंदिर तो ढाल सकता हूँ
लेकिन रिक्त ही रह जायेंगे मुझसे उनके शिला-लेख
इसलिये कि मेरा प्रेम तो ठेठ गँवई और अनपढ़ है

तुम्हारी पिंडलियों में जो मछलियाँ लहराती हैं
उन्हें मैं अपने पोरों से सहलाकर
तुम्हारे बदन में चिंगारियाँ तो भर सकता हूँ
पर नहीं जानता वे जादुई शब्द
जिन्हे सुनकर तुम्हारे जिस्म में उठने लगें लहरें
और तुम मुझे वे मछलियाँ दे दो
मेरा आदिम प्रेम तो पोरों पर गूँगा बैठा है

तुम्हारा पार पाने के लिये
मैं वसनहीन सागरमाथा तो लांघ सकता हूँ
पर जिन कृमिजा तन्तुओं में बाँधा जाता है प्रेम
उन्हे साधना तो मैनें सीखा ही नहीं
मेरा प्रणवजाल तो एक ही वाक्य में सिमट जाएगा

वह भाष्य भी निर्लब्ध है मेरे अप्राज्ञ राग को
जिससे तुम्हे प्रतीति हो
कि स्पर्श जो प्रेम रच सकता है वह काव्य नहीं
और निर्वाक्य अधरों पर भी बजती है दैहिक रंजनी