Sunday, 28 December 2008

पैदा होने के अफ़सोस में

मेरे लिये 27 दिसंबर के बारे में पहली खास बात यह है कि इस दिन मिर्ज़ा ग़ालिब पैदा हुए थे और दूसरी यह कि उसी दिन मैं भी पैदा हुआ। वैसे तथ्यों का क्रम अगर चाहें तो बदल सकते हैं। इस बार 27 दिसंबर को यानि कल 34 वसंत देख लिये। ज़ाहिर है कि 34 में से कुछ तो पतझड़ भी रहे होंगे।

अपने से दस-दस साल छोटे लोगों के साथ काम करता हूँ तो लगता है "उम्र हो चली है" वाली अवस्था दूर नहीं है, मगर फिर सोचता हूँ Age is irrelevant if you are not a bottle of wine. उम्र का सवाल बड़ा पेचीदा है, तन बुढ़ाता है मगर मन नहीं बुढ़ाता। यह हर आदमी के साथ होता है मगर मेरे साथ तो ऐसा है कि तन भी नहीं बुढ़ा रहा। सिवाय कनपटी पर गिने-चुने सफ़ेद बालों के उम्र वही दस साल पीछे चल रही है। इससे फ़ायदे भी हुए हैं और नुकसान भी। दो फ़ायदे मैं कभी नहीं भूल सकता। पहला यह कि 2 अक्टूबर '94 को जब उत्तराखंड रैली के लिये हम लोग लालकिले गये और पुलिस के घेरे में फ़ंस गए तो बाकी सारे दोस्त तिहाड़ में एक हफ़्ता काटकर आए और उनके सिर पर केस भी डाल दिये गए मगर मुझे उस घेरे में से मेरे कमउम्र दिखने के कारण पुलिस ने भगा दिया। दूसरी बार जब फ़ौज के जवान कालेज के सारे दोस्तों की ट्रेन में ठुकाई कर रहे थे तो मैं किनारे बैठकर उनका पिटना देख रहा था।

जहां तक नुकसान की बात है पहली बार अठ्ठारह का होते ही जब मतदान का मौका मिला तो म्युनिसिपैलिटी के उस स्कूल में बरसों बाद घुसा जहाँ क ख ग सीखा था। अधिकारियों ने वोट डालने की आज्ञा ही नहीं दी। वे मानते रहे कि मैं फ़र्जी मतदान करने आया हूँ। अच्छे खासे हंगामे के बाद भी मैनें वोटर आई डी दिखाने से मना कर दिया क्योंकि वोटर आई डी उसी साल बनकर आए थे और उनका प्रयोग शुरु नहीं हुआ था। ड्यूटी पर एक मित्र न होता तो शायद पहला वोट देने से वंचित रह जाता। बाकी नुकसान जो हुए हैं, वे थोड़े निजी किस्म के हैं इसलिये…
पहली बार जब जन्मदिन जानने की जिज्ञासा हुई तो अपनी जन्मपत्री उठाई जो मुझसे भी लंबी निकली। तारीख का कुछ पता नहीं चला। फिर पिताजी की डायरी उठाई तो पता चला कि इतनी जल्दबाज़ी में धरती पर आया कि नए साल के आने का इंतज़ार भी न कर सका। उस उम्र में जन्मदिन पर बड़ा उत्साह रहता था। उत्साह तो अभी भी कायम है मगर उसपर थोड़ी थकान चढ़ गई है और यह भी भाव पैदा हो चला है कि जन्मदिन अपने को बरगलाने के लिये सबसे उत्तम दिन है और अपने को बरगलाने में मैं आज भी कोई कमी नहीं छोड़ता। सो शैंपेन की बोतल लाकर गटकता हूँ, ठाठ से उपहार स्वीकार करता हूँ। राजेश के यह कहने पर भी बाज नहीं आता कि, "पैदा होकर कौनसा तीर मार लिया?"
खैर यह जन्मदिन इसलिये खास था कि बेटे, जिसे अभी तक हम फुंटी कहकर ही काम चला रहे हैं, के साथ यह पहला था और अगर कहूँ कि वह खासा उत्साहित था तो झूठ होगा। उसे तो अभी भी अपने डाइपर गीले करने से फ़ुर्सत नहीं।




Thursday, 11 December 2008

जौ का रस

मैं बीयरहारी जीव हूँ। बीयर शुरु करवाने का श्रेय हमारे एक डाक्टर साहब को जाता है जिन्होनें मुझे और मेरी दीदी को बीयर पीने की सलाह दी, कि हम थोड़ा वज़न बढ़ा सकें। दीदी ने तो क्या पीनी थी मगर मुझे घर में बैठकर बीयर पीने का बहाना मिल गया। बीयर का कार्यक्रम साप्ताहिक होता है और यह परंपरा पिछले कुछ 7-8 सालों से चली आ रही है। अपवाद तभी होता है जब कुछ यार-दोस्त जुट जाएँ। इंग्लैंड में जब था तो यह दैनिक कार्यक्रम में तब्दील हो गया था और साप्ताहांत में तो हम तीन लोग मिलकर तीस-तीस लीटर तक बीयर पी जाते थे। वहां बीयर में अल्कोहोल यहां के मुकाबले कम होती है। सच तो यह है कि इंग्लैंड की बीयर की गिनती दुनिया की सबसे सौफ़्ट बीयर में होती है।
दिल्ली में बाद के कुछ सालों में सलीके की सरकारी शराब की दुकानें खुल गईं थीं, हालांकि ऐसी भी सरकारी दुकानें थीं जहां कर्मचारी सरकार से ज़्यादा पैसा बना लेते थे। ऐसी एक दुकान पर जाकर हमारे एक पहाड़ी शेर मित्र ने एक कर्मचारी को लगभग लतिया दिया था। वैसे ये मित्र बंगलौर आने के बाद भी नहीं सुधरे और वक्त-बेवक्त लोगों को लतियाते रहते हैं। बंगलौर जो शहर है यहां के स्थानीय गुंडों को उत्तर भारतीयों का यहां आना पसंद नहीं है। पसंद तो और भी कई लोगों को नहीं मगर इन लोगों की मुखरता से आए दिन मुठभेड़ होती रहती है। हमारे ये मित्र इन जैसे लोगों से या तो टकराए नहीं हैं अभी तक या टकरा गए हैं तो या तो लतियाए जा चुके हैं या उन्हें लतिया चुके हैं, जिसकी संभावना बहुत क्षीण है। मगर इनका विरोध हमेशा बहुत हिंसक होता है। यह पराक्रम ही है कि आप बंगलौर में रहते हुए यहां के स्थानीय लोगों से उलझें। मेरा साबका जब भी ऐसे लोगों से पड़ा है, इंट्युशन ने कहा है कि चुप रहने में ही समझदारी है। एक ही बार दो सांड़ सरीखे लोगों से मेरी मुठभेड़ हुई थी तो मैं कार के भीतर था, इसलिये सुरक्षित था।
एक दूसरे मित्र हैं। हैं ये भी पहाड़ी शेर, मगर शेर जैसा सब्र इनमें नहीं है। बोलने में इनकी ज़बान जितनी अटकती है, हाथ खुलने में उतना ही फ़्लो है। शराब की दुकानों के यहां पर ठेके दिये जाते हैं और दुकान में ही पीने की सुविधा भी मौजूद होती है। वैसे इनके अलावा सुपर-स्टोर में भी शराब मिलती है। ये लाइसेंसशुदा दुकानें अकसर बीयर से लेकर हर तरह की शराब के ज़्यादा पैसे लेते हैं, जिसका कोई विरोध नहीं होता। एक बीयर के कैन पर आजकल ये लोग पांच रुपए तक ज़्यादा ले लेते हैं। हमारे ये मित्र एक दिन मेरे और अपने लिये बीयर लेने गए हुए थे। जब दुकानदार ने ज़्यादा पैसे काटे तो इन्होनें विरोध किया। इनका प्यार का स्वर भी इनके शरीर की तरह काफ़ी भारी है, जिसे मैं और इनके दूसरे नज़दीकी मित्र तो समझते हैं मगर दुकान पर मौजूद बकासुर सरीखा साकी नहीं समझ पाया। उसे लगा ये उसपर चिल्ला रहे हैं। उसने इन्हें एक चपाटा जड़ दिया। इन मित्र ने भी प्रत्युत्तर में उसे एक झापड़ रसीद कर दिया। जबतक इन्हें अपना दुस्साहस समझ में आता 6-7 लोग इनके पीछे पड़ चुके थे। ये समझदारी करते हुए सीधे घर की ओर भागे। स्कूल-कालेज की फ़ुटबाल की कप्तानी ने इन्हें भागने में बहुत मदद दी और ये उन लोगों से काफ़ी आगे निकल गए मगर गलती से एक गली पहले ही मुड़ गए। गली के कुत्तों ने भी इनका ठिकाना बताने में उन लोगों की काफ़ी मदद की। सामने देखा तो एक ऊँची दीवार जिसे पार कर पाना आसान नहीं था। भागने में जितनी रील बचाई थी, दीवार पर चढ़ने में उतनी फ़ुटेज खा गए। तबतक सब लोगों ने इन्हें पकड़ लिया और घेरा बनाकर इनका भरता बनाया। इनके फ़ोन करने के बाद जबतक मैं वहां पहुंचा, ये लुट-पिट चुके थे। मैं पचास किलो का प्राणी वैसे भी क्या मदद कर सकता था। ये तकरीबन दो साल पहले की बात है। तबसे मैं कई बार सोच चुका हूँ कि जो मेरे पहले पहाड़ी मित्र हैं अगर वे मेरी जगह होते तो क्या करते? उन सब लोगों से चिरंजीवी या रजनीकांत की तरह लड़ते? या अपने को इतने सारे लोगों के सामने कमज़ोर जानकर उनको शांत करवाने की कोशिश करते?
मज़ेदार बात ये है कि हमनें उस शाम भी बीयर पी और इन मित्र के पिटने पर खूब हँसे भी। यह बीयर की पैदा की हुई ज़िंदादिली थी या इन मित्र के अंदर ही कुछ ऐसा था कि चेहरे पे कुछ यूँ भाव आ रहे थे:
"साक़िया शौक़ से भर भर के पिला जाम हमें
हो के बेहोश तेरी राह में क़ुर्बां होंगे"

पिछले साप्ताहांत पर मेरी सासु माँ के दुराग्रह पर यह सिलसिला टूट गया था। श्रीमती जी ने समझाया कि थोड़ी सी बीयर से कुछ नहीं होता, मगर उनके लिये यह भी हर दूसरी शराब की तरह है। वे बहुत खुश थीं और मुझे रातभर सपने में ये शेर सुनाई देता रहा:

"मसाइब और थे, पर दिल का जाना
अजब एक सानिहा सा हो गया है"

Sunday, 7 December 2008

बल बल जाऊँ मैं तोरे रंगरेजवा

एक पोस्ट में मैनें कहा था कि कुछ रचनाओं में अमरत्व के गुण होते हैं। ग़लत नहीं कहा था। इस बार "छाप तिलक सब छीनी" कैलाश खेर की आवाज़ में सुना और फिर से प्रभावित हुआ। कैलाश की आवाज़ भी उतनी ही दिलकश है जितना ख़ुसरो का लिखा दिलफ़रेब है। (बीच में कबीर भी शामिल हैं वैसे)

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Friday, 5 December 2008

मानव श्रंखला

उम्मीद कर रहा था कि बंगलौर में भी लोग इकठ्ठे होंगे और मोमबत्तियां जलाएंगे। ऐसा हुआ मगर बहुत ही छोटे स्तर पर और लोगों को इसके बारे में पता नहीं लगा। मुझे भी अखबार से ही पता लगा और अब प्रशासन ने यहां पर किसी भी रैली या गैदरिंग पर सुरक्षा को या खतरे को देखते हुए रोक लगा दी है। तो मेरी जो इच्छा थी कि central business district को मानव श्रंखला से घेरकर मिलकर "सारे जहां से अच्छा" गाएं, वह मन में ही रह गई।
दूसरी ओर मैंने देखा कि एक पाकिस्तानी बड़ी मेहनत से नेट पर पंजाबी लोकसंगीत संजो रहा है। पंजाबी लोकसंगीत पाकिस्तान और भारत का साझा है।
आजकल जो एक चीज़ राहत दे रही है, वह संगीत है। इससे ऊपर कोई और चीज़ नज़र नहीं आ रही। इसलिये परसों जो वहां लगाया, वह आज यहां लगा रहा हूँ।

Wednesday, 3 December 2008

अफ़सोस और उम्मीद के गीत

ऐसे समय में मुझे ब्रेख़्त से ज़्यादा कुछ नहीं सूझ रहा…


वे जो शिखर पर बैठे हैं, कहते हैं:
शांति और युद्ध के सार तत्व अलग-अलग हैं
लेकिन उनकी शांति और उनका युद्ध
हवा और तूफ़ान की तरह हैं
युद्ध उपजता है उनकी शांति से
जैसे मां की कोख से पुत्र
मां की डरावनी शक्ल की याद दिलाता हुआ
उनका युद्ध खत्म कर डालता है
जो कुछ उनकी शांति ने रख छोड़ा था।

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विवाहित जोड़े
बिस्तरों पर लेटे हैं
जवान औरतें
अनाथों को जन्म देंगी।

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हर चीज़ बदलती है।
अपनी हर आखिरी सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो।
लेकिन जो हो चुका, सो हो चुका।
जो पानी एक बार तुम शराब में
उंडेल चुके हो, उसे उलीच कर
बाहर नहीं कर सकते।

जो हो चुका, सो हो चुका है।
वह पानी जो एक बार तुम शराब में उंडेल चुके हो
उसे उलीच कर बाहर नहीं कर सकते
लेकिन
हर चीज़ बदलती है
अपनी हर आखिरी सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो।

Monday, 17 November 2008

घुन्ना

मैं प्रेम-गीत पढ़ता हूँ और हँस देता हूँ
क्या मैनें लिखी कोई कविता तुम्हारे नाम?
या गुलदस्ते में सजाकर दिया था तुमनें अपना प्रेम?
हम जानते थे प्रेम-कविताओं की क्षुद्रता
हँसते थे और हँसते-हँसते रो देते थे
तब प्यार हमें ले गया था वहाँ
हर चीज़ जहाँ से छोटी नज़र आती है।
हमारे लिये न कविताएँ थीं,
न चाहिये थे हमें बिछोह के गीत।

एक प्रेम बेआवाज़ घुल जाता है हवा में;
विदेह होता है एक प्रेम
एक प्यार ऐसा भी तो होता है।
खंडित स्मारक पर बैठा हूँ मैं
पढ़ता हूँ एक प्रेम-गीत
पढ़ता हूँ और हँसता हूँ अकेला।

Friday, 7 November 2008

चंद ज़रूरी लोगों के नाम

कितना कुछ बदल गया?
कुछ लोग आगे निकल गये, कुछ रह गए पीछे
साथ कोई न रहा,
शांत लहर के नीचे जन्म ले रही हैं मछलियाँ

शहर चमचमाकर नए हो गए
मगर पुरानी पड़ गईं उनकी स्मृतियाँ,
बासी किताबों पर पीलापन चढ़ गया
और बाकी बचे खतों को कुतर रही है उदासी,

ढहती दीवारों पर उठती है नई धूप
और अवसाद पर भी जम जाती है स्नेह की परत

अंधेरा अब भी वही है,
कोई बदलाव नहीं उसके भारीपन में
न उदासी में,
मुझे अंधेरे कोने में बैठना अब भी भाता है,

बावजूद इसके कि दुनिया घूमती है,
हाशिये पर उतर गए समय के बावजूद
तुम्हारे साथ रहता हूँ मैं आज भी उसी युग में
जिस युग में हम मिले थे आखरी बार
और पहली बार

कितना आशातीत था हमारा अलग होना,
और कितना असंभव
एक दूसरे को सिर्फ़ याद करते हुए जीवित रह जाना

कुछ लोग और चंद बातें
अभिशप्त होती हैं सिर्फ़ दस्तावेज़ बनकर रहने के लिये
न उनका वर्तमान में कोई स्थान होता है, न भविष्य में,
मैं तो तुम्हारे अतीत में भी मर चुका हूँ न?

बड़ा कठिन लगता है मुझे
अच्छे लोगों के साथ गुज़ारे दिनों को याद करना,
फिर चाहे वे अच्छे दिन हों या बुरे
प्रेम कोई हिमालय तो नहीं
जिसे रखा जा सके हमेशा ताज़ा और पवित्र।

Tuesday, 4 November 2008

हेरमान हेस्से, एक बार फिर

हेरमान हेस्से की दो और कविताओं का अनुवाद कर पाया हूँ जिन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये और, शिरीष भाई के अनुनाद के लिये दो अनुवाद मैनें अपने दफ़्तर का एक ज़रूरी काम स्थगित करके किये, जोकि अच्छी बात नहीं है, मगर मैं जब भी हेरमान की कविताएँ लेकर बैठता हूँ सिटिंग लंबी हो जाती है और कुछ न कुछ अनुवाद करके ही उठता हूँ। सो आज के लिये ये दो कविताएँ:


बिना तुम्हारे

मेरा तकिया ताकता है मुझे हर रात
किसी कब्र के खालीपन में
सोचा नहीं था
इतना कठिन होगा अकेला होना
न मिल पाना तुम्हारे बालों की बिछावन

अकेला लेटा हूँ मैं सुनसान घर में
झूलते मद्धम दिये के साथ
और धीरे से फैलाता हूँ हाथ
तुम्हारे हाथों के लिये
बढाता हूँ अपना गरम मुँह हौले से तुम्हारी ओर
चूमता हूँ अपने को ही निरुत्साह और थकान से
और अचानक उठ बैठता हूँ
मेरे चारों ओर तनी हुई है सर्द रात की चुप्पी
खिड़की से बाहर चमकता है एक साफ तारा
कहाँ हैं तुम्हारे सुनहरे बाल
कहाँ है तुम्हारा खूबसूरत चेहरा?

अब हर हर्ष में पाता हूँ मैं दु:ख
और शराब में ज़हर
जानता नहीं था
इतना कठिन होगा अकेला होना
अकेला और तुम्हारे बिना।



फूल भी


फूल भी पाते हैं मृत्यु
हालांकि वे निष्पाप होते हैं
ऐसे ही हमारा अंतस निष्पाप होता है
और झेलता है सिर्फ़ दुख
हम खुद ही यह समझना नहीं चाहते

जिसे हमनें ग्लानि पुकारा
उसे तो सूर्य निगल गया है
पवित्र फूलों के भीतर से निकल
आता है वह हमें मिलने
खुशबू की तरह, बच्चों की करुण दृष्टि की तरह

और जैसे फूल मुरझाते हैं
हम भी मरते हैं
मरते हैं मुक्ति की मृत्यु
मरते हैं पुनर्जन्म के लिये।

Saturday, 1 November 2008

सचेतन में रहेगी पीड़ा

अकेला बैठ अपनी कुर्सी पर
मैं सोचता हूँ,
सोचता हूँ और हैरान होता हूँ
चुप हो जाता हूँ,
इतना चुप कि बेआवाज़ी भी सन्न हो जाती है

कैसी अफ़ीम घुली थी उन दिनों में
जब सड़क पर गुज़रते लोगों से बेपरवाह
मैं चूमता था उसका चेहरा हाथों में लेकर?

पतझड़ में जब पेड़ ठूँठ हो रहे थे
मैं पूछ रहा था अपने से
देखा क्यों नहीं कभी
कैसा होता है पेड़ों का हरियाना?

जर्जर होकर बिखरता हूँ मैं भीतर
देखता हूँ अपना विदीर्ण होना
और जानता हूँ बरसों बाद
मुझे सोचना नहीं पड़ेगा
कैसा था बिखराव का दर्द।

Thursday, 30 October 2008

बुरा समय

हेस्से की कविताओं का सिलसिला अभी शुरु ही हुआ है। ख़याल तो ये है कि किताब में जो 31 कविताएँ हैं सभी का अनुवाद कर डालूँ। देखें कितना हो पाता है। फ़िलहाल के लिये एक और कविता।

अभी हम चुप हैं
और कोई गीत नहीं गाते
हर कदम भारी हो गया है
यह रात थी, जिसे आना ही था

मुझे अपना हाथ दो
शायद हमारा रास्ता अभी बहुत लंबा हो
बर्फ़ गिर रही है
बेहद मुश्किल होती हैं अनजाने देश में सर्दियाँ

कहाँ गया वह समय
जब हमारे लिये एक लौ, एक अनल जलती थी?
मुझे अपना हाथ दो
शायद हमारा रास्ता अभी बहुत लंबा हो।

Saturday, 18 October 2008

हेरमान हेस्से की कविताएँ

नोबेल से सम्मानित जर्मन साहित्यकार हेरमान हेस्से मुख्य रूप से अपने तीन उपन्यासों सिद्धार्थ, स्टेपेनवौल्फ़ और मागिस्टर लुडी के लिये जाने जाते हैं मगर उन्होनें कविताएँ भी लिखीं और पेंटिंग्स भी बनाईं। उनका नाम पहली बार जर्मन सीखते हुए पढ़ा था। उस दौरान किसी ने (नाम याद नहीं) जर्मन-साहित्य का तेज़ी से हिन्दी में अनुवाद किया था, जिसे पढ़ने संयोग बन नहीं पाया, हालांकि शायद एक अनुवादित उपन्यास मैनें खरीदा भी था। एक दिन अचानक हेरमान की कुछ कविताएँ हाथ लग गईं जो मैनें तुरंत खरीदकर संभालकर फ़ुर्सत में पढ़ने के लिये रख लीं। पहली फ़ुर्सत, या यूँ कहें मूड कल ही हुआ और पढ़ते-पढ़ते तीन कविताओं के अनुवाद भी कर डाले। वही अनुवाद यहाँ दे रहा हूँ। मैं अनुवाद के मामले में अनाड़ी आदमी हूँ और अनुवाद का यह दूसरा ही प्रयास है इसलिये भूल-चूक माफ़।

1. सारी मौतें

मैं मर चुका हूँ सारी मौतें
और मरूँगा सारी मौतें एक बार फिर
पेड़ के भीतर लकड़ी की मौत
पहाड़ के भीतर पत्थर की मौत
मिट्टी की मौत रेत के भीतर
पत्तों के भीतर गर्मियों की चटकती घास की मौत
और खून से लथपथ बेचारे आदमी की मौत

मैं फिर जन्म लूँगा फूल बनकर
पेड़ और घास बनकर फिर जन्म लूँगा
मछली और हिरण, चिड़िया और तितली,
और हर रूप में
इच्छा ले जाएगी मुझे
उस अंतिम पीड़ा तक
मानव की पीड़ा तक

ओ कंपित तने हुए धनु
लालसा की प्रचंडता जब
जीवन के दोनों धुरों को
खींचेगी एक-दूसरे की ओर
फिर एक बार और कई कई बार
ढूँढ निकालोगे तुम मुझे मृत्यु से लेकर जन्म तक
स्रष्टि के पीड़ादायी पथ पर,
स्रष्टि के वैभवशाली पथ पर।

2. एलिज़ाबेथ

एक कहानी सुनाता हूँ तुम्हें,
बहुत रात हो चुकी है
क्या तुम मुझे सताओगी
प्यारी एलिज़ाबेथ?

मैं इसके बारे में कविताएँ लिखता हूँ
वैसे ही जैसे तुम;
मेरी पूरी प्रेम-गाथा
यह सँझा और तुम हो

दिक होकर
इन गीतों को मत फ़ेंक देना
जल्द ही तुम सुनोगी इन्हें
सुनोगी और कुछ नहीं समझ पाओगी।

3. कितने कठिन हैं…

कितने कठिन हो गए हैं दिन
कोई आग तपा नहीं पाती मुझे
सूरज हँसता नहीं मेरे साथ
सबकुछ सूना है
सबकुछ ठंडा और कठोर
प्यारे, स्वच्छ तारे भी देखते हैं मुझे
नीरसता से
जबसे मैनें दिल ही दिल में जाना
कि मर सकता है प्रेम।

Thursday, 9 October 2008

गाव (The Cow)

कायदे से मुझे फ़िल्म से संबंधित कोई भी पोस्ट यहाँ नहीं डालनी चाहिये क्योंकि फ़िल्म के लिये मैनें एक अलग ही ब्लोग बनाया है जहाँ पहली पोस्ट पर कोई भी नहीं आया और अगली पोस्ट पर भी दो एक लोग ही आए। यहाँ वही दूसरी पोस्ट दोबारा डाल रहा हूँ। उद्देश्य है चित्रपट को प्रमोट करना।
ईरानी सिनेमा का नाम सुनते ही एक दृष्यबंध सामने खड़ा हो जाता है जिसमें कथ्य से लेकर चाक्षुकता तक बहुत ज़्यादा विविधता की संभावना बनती है और इस संभावना की वजह से अपेक्षा भी बनती है। यह हैरानी का विषय है कि सिनेमा, जिसपर हमेशा विकसित देशों का आधिपत्य रहा है, उसमें ईरान जैसे नगण्य देश ने अपनी जगह बना ली है और जैसे विश्व के लिए सत्यजित राय ही भारतीय आर्ट सिनेमा का चेहरा है, वैसा ईरान के साथ नहीं है। वहां एक से ज़्यादा फ़िल्मकार हुए हैं जिन्होनें सिनेमा जगत में अपनी पहचान बनाई है। इसकी वजह निश्चित तौर पर हालीवुड की तरह तकनीकी उत्कृष्टता नहीं, वरन कलात्मक श्रेष्ठता है। एक समय खत्म हो सकने की कगार पर खड़े ईरानी सिनेमा ने विश्व सिनेमा में अपने लिये एक खास जगह बनाई है। यदि ईरानी सिनेमा को बचाने का श्रेय किसी को दिया जा सकता है तो वह है प्रसिद्ध ईरानी निर्देशक दारिउश मेहरजुइ और यदि यह श्रेय किसी फ़िल्म को दिया जा सकता है तो वह उनकी दूसरी फ़िल्म गाव (गाय) है। अताउल्ला खुमैनी द्वारा ईरान में फ़िल्में बनाने की आज्ञा दिये जाने के पीछे इस फ़िल्म का खुमैनी पर प्रभाव माना जाता है।यह दूसरी फ़िल्म थी जिसे ईरान के शाह ने फ़ंड किया था। उद्देश्य था उजड़ रहे ईरानी सिनेमा को बचाना मगर गाव के बनते ही उसपर पाबंदी लगा दी गई। शाह का मानना था कि इस फ़िल्म से बाहरी दुनिया के मन में ईरान की ग़लत छवि बनेगी। फ़िल्म को चोरी से कई समारोहों में दिखाया गया और उसे तत्काल बहुत प्रसिद्धि मिली।गाव को बनाने के लिये दारिउश को बहुत ही सीमित संसाधन दिये गए थे और इसका प्रभाव फ़िल्म में जहाँ-तहाँ दिखाई भी देता है मगर कलात्मक दृष्टिकोण से फ़िल्म में कोई ख़ामी नहीं आई है। फ़िल्म के कई दृष्यों को देखते हुए आप बार-बार महसूस करते हैं कि फ़िल्म चाक्षुक कविता बन पड़ी है या यूँ कहें कि ये दृष्य फ़िल्म से बाहर निकलकर बेहद आर्टिस्टिक पेंटिंग सरीखे लगते हैं। यदि आप इन दृष्यों के पार देखने की कोशिश करेंगे तो आपको वहाँ ईरानी जीवन-शैली सर्वत्र बिखरी दिखाई पड़ेगी।फ़िल्म कई स्तरों पर संवाद की गुंजाईश बनाती है और हर संभावना को समझने के लिये ईरान के जीवन और इतिहास में झांकना शायद आवश्यक हो। हसन एक साधारण व्यक्ति है मगर जो चीज़ उसे विशेष बनाती है वह उसकी इकलौती गाय है। यह गाय उस उजाड़ और रेगिस्तानी गाँव की इकलौती गाय भी है और लोगों के कौतुहल का विषय भी।कुछ समीक्षकों का मानना है कि गाव बनाते समय दारिउश पर इतालवी नेओरिआलिज़्म का प्रभाव था। कुछ इसे सही नहीं मानते। दारिउश का क्या कहना है, यह जानने से पहले इसके कारणों की ओर एक नज़र डाल लेना समीचीन होगा। दारिउश के पास यह फ़िल्म बनाने के लिये बहुत ही सीमित साधन थे। संभवत: यह एक कारण हो कि फ़िल्म में इतालवी नेओरिआलिज़्म का प्रभाव दिखाई देता हो या वे सचमुच ही इस फ़िल्म बनाने की इस विधा के प्रभव में रहे हों। कुछ समय पहले रिलीज़ हुई इस फ़िल्म की डीवीडी में दारिउश का एक इन्टरव्यु भी शामिल किया गया था जिसमें उन्होनें इतालवी नेओरिआलिज़्म के प्रभाव में यह फ़िल्म बनाए जाने की बात स्वीकार की है।फ़िल्म में यत्र-तत्र कई चरित्र हैं जो कहानी के प्लाट के बाहर भी बहुत कुछ कहते हैं। इन सब-प्लाट्स में संभवत: कोई सामाजिक संदेश छिपा हुआ है। उजाड़ में खड़ा एक गांव जो अपने-आप में बेहद सीमित भी है और पूर्ण भी शायद रेनेसां से पहले के छोटे-छोटे दुनिया से कटे हुए समाजों की याद दिलाता है। दारिउश एक पिछड़े समाज की दकियानूसी को सामने लाने में छोटे-छोटे दृश्यों और संवादों का प्रयोग करते हैं। गाँव के लोग बैठकर हसन की गाय के बारे में चर्चा करते हैं और खिड़की से चाय लिये हुए हाथ नमूदार होता है। एक युवक एक पागल को गाँवभर के बच्चों के मनोरंजन का साधन बनाए रहता है। यह दकियानूसीपन आगे जाकर भय और अंधविश्वास तक जाता है। चौपाल पर बैठकर गाँव के बुज़ुर्ग तमाम तरह की आशंकाओं से व्यथित हैं जब बोलोरियों द्वारा फिर से गाँव में चोरी करने की बात सामने आती है। बोलोरी सिर्फ़ चोर नहीं हैं, वे समुद्री डाकुओं की तरह हैं जिन्हे कोई जानता नहीं है। वे रात के अंधेरे में आकर गाँव की सम्पत्ति पर अपना हाथ साफ करते हैं। वे एक ऐसी सत्ता हैं जो सीमांत पर मौजूद है, दिखती है मगर फिर भी मानव होने के गुण/दुर्गुण से परे हैं। फ़िल्म में वे हर समय भय के सबसे बड़े कारण के रूप में मौजूद रहते हैं। हसन की गाय मात्र गाय होने से ऊपर की चीज़ है। सिर्फ़ नहलाने के लिये वह उसे गाँव से बाहर ले जाता है, उसके श्रंगार के लिये सामान खरीदता है, दो पत्नियों को छोड़कर वह गाय के पास ही सोता है। और तो और वह उसे लाड करते हुए उसके साथ चारा भी खाता है।हसन की अनुपस्थिति में गाय जब मर जाती है तो पूरे गाँव में अफ़रातफ़री मच जाती है। तमाम अंधविश्वासों के बीच वे उसके मरने का कारण खोजने की कोशिश करते हैं। गाँव का सबसे समझदार माना जाने वाला इस्लाम भी इस बारे में उलझन में है। गाँव के लोग इसमें शैतान की बुरी नज़र का प्रभाव मानते हैं। गाँव की सभा में हसन से उसकी गाय के मरने की बात छुपाने पर चर्चा होती है और यह चर्चा अकसर बुद्धिमत्ता से परे की चर्चा होती है। गाय को अंतत: एक सूखे कुँए में डाल दिया जाता है। फ़िल्म में एक चरित्र है जिसके लिये गाँव और गाँव के लोग बौद्धिक स्तर पर पिछड़े हुए हैं। वह लफ़ंडर किस्म का एक आदमी है जो हर काम में अपनी टांग अड़ाता है मगर उसके तर्क काटने योग्य न तो मुखिया है न ही इस्लाम। यदि फ़िल्म में कोई राजनैतिक संदेश निहित है तो उसका एक छोर इस चरित्र पर जाकर ज़रूर मिलता है। वैसे मूल कहानी के लेखक ग़ुलाम हुसैन सईदी लेफ़्ट विचारधारा के लेखक थे।अंतत: जब हुसैन गाय के ग़म में पागल हो जाता है और गाँव वालों की सारी कोशिशों के बावजूद भी संभल नहीं पाता तो इस्लाम के सुझाव पर गाँववाले उसे किसी अस्पताल ले जाने को तैयार हो जाते हैं। उन्हें यकीन नहीं कि अस्पताल वाले कुछ कर सकते हैं या नहीं मगर इस्लाम का मानना है कि वे “कुछ” तो कर ही पाएंगे।बारिश के बीच जब हुसैन को बांधकर और लगभग घसीटकर ले जाया जाता है। रास्ते में उसके विरोध करने पर इस्लाम उसे सोटी से मार-मारकर घसीटता है। यह गाँववालों की हुसैन के पागलपन से उपजी खीझ और निराशा की परिणिति है जिससे वे खुद भी स्तब्ध हैं। हुसैन अंतत: पहाड़ से गिरकर मर जाता है।
दारिउश ने फ़िल्म में छायांकन पर काफ़ी मेहनत की है और इसका प्रभाव शेड्स और छायाओं के सामंजस्य के रूप में दिखाई देता है मगर अफ़सोस कि जिस कैमरा से काम लिया गया था वह कामचलाऊ क्वालिटी का था और शायद फ़िल्म की मूल प्रति को सहेजकर नहीं रखा गया था। डीवीडी में उपलब्ध प्रिंट में छायांकन का चमत्कार क्वालिटी की वजह से खत्म हो गया है, फिर भी उनकी उत्कृष्टता को नकारा नहीं जा सकता।

Wednesday, 1 October 2008

द बर्मीज़ हार्प (The Burmese Harp)

कुछ दिनों पहले एक नया ब्लोग चित्रपट नाम से शुरु किया था, जहां उत्कृष्ट फ़िल्मों पर चर्चा करना हमारा उद्देश्य था। मगर समय की सनातन कमी के चलते यह काम टलता रहा। कल पहली बार ही उसपर एक जापानी फ़िल्म Biruma no tategoto (The Burmese Harp) पर एक पोस्ट डाली जोकि संभवत: कुछ तकनीकी खराबियों के चलते किसी भी एग्रीगेटर पर प्रकाशित नहीं हुई। सोचा उसे यहाँ एक बार फिर पोस्ट कर दूँ।

"बर्मा की मिट्टी लाल है
और लाल हैं इसकी चट्टाने"

यह लाली ध्वंस की, युद्ध की है जो इस कहानी के साथ शुरू होकर अंत तक साथ रहती है। कुछ तो ताकियामा मिचियो लिखित युद्ध-विरोधी बाल-उपन्यास होने के कारण और कुछ कोन इचिकावा के इस उपन्यास की संवेदनशील व्याख्या के कारण फ़िल्म The Burmese Harp किसी भी कोण से एक युद्ध-आधरित फ़िल्म नहीं लगती। संभवत: फ़िल्म का प्रारूप तैयार करते समय इचिकावा के दिमाग में यह स्पष्ट था कि उन्हें युद्धरत मनुष्य के मानवीय पक्ष को उजागर करना है।

फ़िल्म में मानवीय संवेदनशीलता को प्रस्तुत करने के लिये हार्प एक प्रतीक है। इसके अलावा पूरी फ़िल्म में ही युद्ध के दृश्यों और उसकी भयावहता को दिखाने के लालच से इचिकावा बचते रहे हैं। बर्मा में भटक गई एक टुकड़ी, जो जापान लौटने की हरसंभव कोशिश कर रही है, जब थककर जंगल में सुस्ताने के लिये लेटती है तो एक-एक जवान के चेहरे से विशाद और निराशा झरती है। ऐसे हर मौके पर वे उदासी से उबरने के लिये “हान्यू नो यादो” (देश, प्यारे देश) गाते हैं। जवानों के भीतर इस गीत को स्पंदित करता है मिज़ुशिमा का हार्प-वादन, जोकि करुणा, आशा और रूदन के बीच कहीं कानों में बजता है और अज्ञेय की इन पंक्तियों जैसा कुछ चारों ओर गूँजने लगता है:

“अभी न हारो अच्छी आत्मा
मैं हूँ, तुम हो
और अभी मेरी आस्था है।”

टुकड़ी का कैप्टन इनोये खुद एक संगीत-प्रेमी और संगीत-विशारद है और संगीत को उसने अपने सैनिकों में इस तरह घोल दिया है कि जहां हर क्षण मरने का डर उनके सिर पर जमा रहता है वहीं संगीत उनके कंधों पर जीवन-जागरण की तरह विद्यमान रहता है। यह संगीत ही है जिसने युद्ध की भयावहता के बीच भी इन लोगों में, जोकि लम्बे अरसे से अपने परिवार और देश से दूर हैं, भावनाएं बचाए रखी हैं। वे युद्धकाल के पारंपरिक तरीके छोड़कर एक-दूसरे को संकेत देने के लिये भी गाते हैं, हार्प का इस्तेमाल करते हैं। मिज़ुशिमा एक बर्मी का रूप धर लेता है और धोती लपेटकर आगे की टोह लेने सिर्फ़ हार्प लेकर निकल पड़ता है।

एक गांव में जब इस टुकड़ी को फसाने के लिये जाल बिछाया जाता है और इसका आभास होने पर घिरे होने की अनभिज्ञता ज़ाहिर करने के लिये वे गाते हैं और मिज़ुशिमा हार्प पर संगत करता है तो ब्रिटिश टुकड़ी में भी वही भावनाएं प्रवाहित होने लगती हैं जो इस जापानी टुकड़ी में हो रही हैं। संगीत मानवीय सूत्र बन जाता है और ब्रिटिश जवान इनके सुर में अपना सुर मिला देते हैं।

जापान की हार के फलस्वरूप सैनिकों की यह टुकड़ी आत्मसमर्पण कर देती है और मिज़ुशिमा को पहाड़ की चोटी पर युद्धरत एक और जापानी टुकड़ी के पास युद्ध रोककर आत्मसमर्पण करने का संदेश देने के लिये भेजा जाता है। वह सिर्फ़ अपना हार्प लेकर जाता है और अपनी ही साथी टुकड़ी की गोलाबारी से बचते हुए उनतक पहुँचता है।
इस टुकड़ी और मिज़ुशिमा के बीच संवाद में एक मौलिक अंतर स्पष्ट दिखता है। यह अंतर है दूसरी टुकड़ी की युद्ध-मानसिकता का। वे सभी युद्ध से इतना ग्रसित हैं और युद्ध बाहर से ज़्यादा उनके भीतर इतना पैठ चुका है कि मिज़ुशिमा की तमाम कोशिशों के बावजूद वे आत्मसमर्पण करने को राज़ी नहीं होते और अंतत: मारे जाते हैं।

इधर मुदोन भेजी जा चुकी कैप्टन इनोये की टुकड़ी मिज़ोशिमा के न लौटने पर परेशान होती रहती है मगर उनके अंदर कहीं भरोसा है कि मिज़ोशिमा ठीक है। मिज़ोशिमा को एक बौद्ध भिक्षु बचा लेता है। भिक्षु के वेश में मुदोन जाते हुए जब मिज़ोशिमा इधर-उधर बिखरी जापानी सैनिकों की लाशें देखता है तो फ़िल्म में एक सैनिक का मानवीय पक्ष अपने चरम के साथ उपस्थित होता है। मिज़ोशिमा मन ही मन ठान लेता है कि सभी लाशों का अंतिम संस्कार करना उसका मानवोचित कर्तव्य है और वह इसमें जुट जाता है। मुदोन पहुँचकर भी वह अपनी टुकड़ी से नहीं मिलता बल्कि दीक्षा लेकर अपने अभियान में जुट जाता है। उसकी टुकड़ी और कैप्टन का यह विश्वास कि वह जीवित है उन सभी घटनाओं के क्रम से और भी अधिक दृढ़ हो जाता है जब या तो वे मिज़ोशिमा को भिक्षु के रूप में या उसके हार्प-वादन को गाहे-बगाहे मुदोन में पहचान लेते हैं।

मिज़ोशिमा की अनवरत चुप्पी और अपनी पहचान छिपाने की कोशिशें हमारे सामने इचिकावा की योग्यता को उजागर करती हैं। बिना प्रत्यक्ष संवाद के वह जिस तरह अपनी प्रतिबद्धता और आस्था अपने मिशन में दर्शाता है वह कैप्टन के फ़िल्म के अंत में सैनिकों के सामने मिज़ोशिमा का पत्र पढ़ने से भी पहले दर्शक के सामने उजागर हो जाती हैं। इचिकावा का चमत्कार फ़िल्म में पात्रों के अभिनय में स्पष्टत: दिखाई देता है चूंकि यह अभिनय कहीं भी सायास नहीं नज़र आता। मिज़ुशिमा का एक सैनिक से एक भिक्षु में परिवर्तन अनायास या नाटकीय नहीं है। यह तथ्य एक गुण की तरह उसकी पूरी टुकड़ी में पहले से ही गाहे-बगाहे दिखता रहता है और परिस्थितियाँ मिज़ोशिमा को ऐसा सशक्त कदम लेने और उसपर बने रहने के लिये प्रेरित भी करता है। साथी सैनिकों द्वारा भिक्षु मिज़ुशिमा को लौट आने के लिए प्रेरित करने के लिये “हान्यू नो यादो” गाने और मिज़ुशिमा द्वारा अपनी पहचान उजागर करते हुए हार्प में संगत करने पर एक और नाटकीय सक्षमता प्रकट होती है। वह यह कि हार्प के द्वारा जवाब देते हुए मिज़ोशिमा यह भी कह रहा है कि अब मैं नहीं लौटूँगा।

फ़िल्म का सिनोप्सिस देने से मैं बच रहा हूँ क्योंकि मेरा प्रयास सिर्फ़ फ़िल्म के बारे में अपने विचार साझा करने से है और फ़िल्म की व्यक्तिगत व्याख्याओं पर संवाद आरंभ करने से है। ऊपर जो भी लिखा है उसमें कहानी सिर्फ़ उतनी भर ही आई है जितनी अपने विचार प्रेषित करने के लिये मुझे ज़रूरी लगी इसलिये मात्र इतने को ही कहानी न समझ लें। घटनाओं का क्रम आगे भी बढ़ता है और कहानी इससे भी अधिक विस्तार से चलती है।

Monday, 22 September 2008

माँ की उपस्थिति और यादों की पगडंडी

बरसों पहले जो लिखा था आज वह यकायक मेरे दिमाग में कौंध गया:

कुछ दिनों पहले ही तालस्ताय का लिखा एक वाक्य पढ़ा था, “जब आप सुदूर यात्रा पर जाते हैं तो आधी यात्रा तक पीछे छुटे शहर की यादें पीछा करती हैं। आधी यात्रा के बाद ही हम उस जगह के बारे में सोच पाते हैं जहाँ हम जा रहे हैं।” सोचता हूँ, क्या यह बात बिल्कुल सही है? पहाड़ों से लौटते हुए मैं कई कई दिनों तक सिर्फ़ पहाड़ों के बारे में ही सोचता रहता हूँ और अपनी दिनचर्या में गड़बड़ा जाता हूँ जिसक खामियाजा मुझे अकसर भुगतना पड़ता है।

मगर यह अनायास ही नहीं है। परसों माँ को दिल्ली से अपने साथ लेकर आया हूँ और सलीके से चार साल में यह पहली बार है कि हमनें खूब सारी बातें कीं और ज़ाहिर है इतने लंबे अंतराल के बाद की गई बात में उन विषयों को भी छुआ गया, जिनपर पहले कभी चर्चा करने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई या चर्चा करने से बचा किये। इस दौरान साल में एक बार की गई अपनी दिल्ली यात्रा में मैनें महसूस किया कि माँ-पिता के बुढाने की गति बढ़ गई है और यह भी कि हर दुख-तकलीफ़ एक दूसरे से छिपाने की आदत भी हमें पड़ गई है, जोकि इस बार कुछ हद तक ज़ाहिर हुई हैं।
माँ ने (हमारे यहाँ पहाड़ों में माँ को तू ही कहा जाता है) अपना आधा जीवन गाँव में ही बिताया है, इसलिये वह आज भी पूरी तरह गाँव से ही जुड़ी हुई है। पिछले लगभग 35-40 सालों का दिल्ली जीवन भी उसकी सोच और जीवन-शैली को नहीं बदल पाया और वह आज भी पहाड़ी किस्म की हिन्दी ही बोलती है। फ़सक मारना (गप्पें मारना) पहाड़ों के रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ा है। मैं तो इसे एक विधा ही मानता हूँ और मेरी माँ को ईश्वर ने विशेष तौर पर इस विधा से नवाज़ा है।
परिवार भर के छोटे-छोटे बच्चे जब तब इकठ्ठे होकर माँ से अपने माँ-पिताओं के बचपन के किस्से सुनाने को कहते और फ़िर माँ की बातें सुन-सुनकर हँस-हँसकर दोहरे हो जाते। माँ परिवार की सबसे बड़ी बहू है और पिताजी और चाचा-बुआओं में उम्र का बहुत बड़ा अंतर है।
बातों का क्रम जब शुरु हुआ तो बचपन की कई निरर्थक बातें भी दोहराई गईं, जिनमें यूँ तो कोई सार नहीं मिलता मगर अर्थ बड़े गूढ़ निकल आते हैं। गाँव से नया-नया आकर मेरे कालोनी में गुम हो जाने पर अपनी बिल्डिंग से निकलकर दूसरी बिल्डिंग में भटकते हुए यह दोहराना, “हमरौ घर काहूँ गोइ ह्यूनल?” मुझे अब भी धुँधला सा याद है। या बारिश के कीचड़ में पत्थर फेंकते हुए अपना ही सर फुड़वा लेने पर माँ के पूछने पर हँसते हुए यह कहना कि कुछ नहीं हुआ। ऐसे ही सर फूट गया थोड़ा सा।
फिर हर साल गाँव में गर्मियों की छुट्टियाँ गुज़ारने जाना और रैगाड़ में थककर चूर हो जाने तक नहाना या बेमतलब यूँही घूमने निकल पड़ना। डरते-डरते जागर में बैठना (जागर एक धार्मिक अनुष्ठान होता है जिसमें किसी निर्धारित व्यक्ति के शरीर में देवता का आह्वाहन किया जाता है। इसके लिये हुड़का, थाली, दाड़िम की सींकों वगैरह का प्रयोग किया जाता है)।
इन सब बातों में कोई अर्थ नहीं, मगर जब इन सब बातों की याद आती है और जब वर्तमान से इनका तालमेल बैठाने की कोशिश करता हूँ तो तारतम्य के सूत्र खोने लगते हैं। स्कूल के दिनों में ही मुझे लगने लगा था कि मैं उस पीढ़ी से हूँ जो ट्रांसिशन से गुज़र रही है। इस पीढ़ी ने एक ओर तो बरसों-बरस से चली आ रही भारतीय जीवन-शैली देखी है और दूसरी ओर भारत के पूँजीवादी वर्ग में प्रवेश के कारण हुए बदलावों को भी इसी पीढ़ी ने जिया है। अब कहीं तो लोग अतीत को पीछे छोड़ इन बदलावों को खुशी से भोग रहे हैं और कुछ मेरे जैसे उसी अतीत को ॠषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों की तरह बार-बार देखते हैं जोकि मात्र कपोल-कल्पना है। आज भी यदि मैं सब छोड़कर किसी छोटे शांत कस्बे में बस जाना चाहता हूँ तो उसके पीछे अतीत में लौटने की आकांक्षा ही है। मैं अतीत और वर्तमान के बीच त्रिशंकु की तरह अटका हुआ हूँ। मेरी पत्नी जी को इस तरह की कोई दुविधा नहीं। वह दिल्ली में ही पैदा हुई और वहीं बढ़ी हुई। उसका कोई गाँव नहीं।
बहरहाल, यह ट्रांसिशन हर बार बेहद यातनादायक होता है और मैं कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाता। ऐसे में कुमाऊँनी गाने सुनने के अलावा क्या किया जा सकता है? जागर सुनने की बात चल रही थी। जागर सिर्फ़ देवताओं को बुलाने का विश्वास-अविश्वास भर नहीं है। इस प्रक्रिया में जो गाया जाता है उसमें लोक-कथाएँ छुपी हैं, जोकि ज़ाहिर है मुझे ठीक से समझ नहीं आतीं। चलिये यही सुन लिया जाए।
हो सकता है मेरी बची-खुची शाम ठीक से बीत जाए।

Saturday, 13 September 2008

भारत की ट्रैफ़िक संस्कृति भाग - 2

ट्रैफ़िक संस्कृति का बनना-बिगड़ना दो पक्षों पर निर्भर करता है: प्रशासन और जनता। पहले प्रशासन की बात करें। बात ट्रैफ़िक की हो तो प्रशासन के भी कई हिस्से होते हैं जोकि इससे जुड़े होते हैं। मुख्य रूप से ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने वाली अथारिटी, सड़क निर्माण विभाग, म्युनिसिपैलिटि इत्यादि। इनके अलावा अप्रत्यक्ष रूप से तो योजना मंत्रालय से लेकर शहर का प्लानिंग विभाग तक अनगिनत विभाग संबद्ध होते हैं। अगर सीधा-सीधा सड़कों की बात करें तो आपको एक मूल अंतर फिर से दिखाई देगा। पश्चिम में सड़कें सिर्फ़ सफ़र के लिए होती हैं और भरसक कोशिश की जाती है कि घर, दफ़्तर इत्यादि सड़कों से दूर रहें। अपने यहां चूंकि सड़क आज भी विलासिता है इसलिये लोगों की पूरी कोशिश होती है कि जितना संभव हो सके, सड़क के पास घर या दफ़्तर हो। बीसियों सालों से उजाड़ पड़े द्वारका (दिल्ली में) में फ़्लैट्स की कीमतें मेट्रो के वहां पहुंचते ही आसमान छूने लगीं। यह बात और है कि वहां रहने वाले लोग शायद ही कभी मेट्रो का इस्तेमाल करें। मेरे एक मित्र का घर द्वारका में मेट्रो स्टेशन के बिल्कुल सामने है। दो साल पहले ही वे उस घर की कीमत 35लाख आंक रहे थे। मेट्रो स्टेशन के पास तो शोरगुल रहेगा न? तो कीमत कम होनी चाहिये। मगर ऐसा नहीं है। इसकी वजह यह है कि कमर्शियल तौर पर इस्तेमाल करने पर उस मकान का भरपूर लाभ उठाया जा सकता है और कनेक्टिविटी की दृष्टि से वह घर उत्तम जगह पर है। कनेक्टिविटी आज जेट एज के दौर में भी कितनी बड़ी चीज़ है हमारे लिए। इसके पीछे नियमों में जो गड़बड़ी उजागर होती है वह यह है कि जिसका जहां जी चाहे आफ़िस खोल सकता है, रिहायशी इलाकों में भी। रोकने वाला जो है उसकी जेब में कुछ डाल दीजिये और बस। और तो और पर्याप्त पार्किंग जैसी मूलभूत सुविधा के बारे में भी नहीं सोचा जाएगा। होगा क्या? यही कि उस दफ़्तर में आने वाले लोग अपनी गाड़ियां सड़कों पर खड़ी रहेंगीं और उसकी वजह से एक लेन ठप पड़ जाएगी। फिर ट्रैफ़िक जाम। आज ही पढ़ा कि बंगलौर की सड़कों का 25% पार्किंग की भेंट चढ़ जाता है।
इंग्लैंड में जिस भी स्टोर्स में गया, एक बात मैनें ज़रूर नोटिस की। स्टोर के आकार से बड़ी पार्किंग की उपलब्धता। ऐसा क्यों? इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो यह कि वहां हर व्यक्ति गाड़ी लेकर चलता है और ग्रोसरी स्टोर्स में प्रतियोगिता इतनी उग्र है कि सिर्फ़ पार्किंग न मिलने की वजह से कोई भी ग्राहक नहीं छोड़ना चाहेगा। दूसरी वजह है प्रशासन। प्रशासन आपको कुछ भी बनाने की इजाजत तभी देगा जबकि आप रोज़मर्रा के संभावित ट्रैफ़िक से कुछ प्रतिशत ज़्यादा की पार्किंग व्यवस्था करेंगे। यह बात सिर्फ़ ग्रोसरी स्टोर्स पर ही लागू नहीं होती। किसी भी तरह के व्यावसायिक संस्थान में हमेशा पर्याप्त पार्किंग की व्यवस्था होती है। अगर कोई छोटी सी मार्किट है तो उसमें दो पार्किंग होती हैं। एक तो उपभोक्ताओं के लिये और दूसरी दुकानदारों के लिये जोकि दुकानों के पीछे होती है।
इधर प्रशासन, माने डेवेलेपमेंट अथारिटी इस बारे में सोचती नहीं। अगर नियम बनाए भी गए हैं तो उनका पालन नहीं होता। यह पहली समस्या है। फिर बात आती है सड़कों की। जब मैं अपना लाइसेंस बनवाने गया तो इंटरव्यु में ट्रैफ़िक इंस्पेक्टर ने कुछ साइनबोर्ड दिखाए और उनका मतलब पूछना शुरु किया। जोकि आसान से धीरे-धीरे मुश्किल साइनबोर्ड्स तक गया। कुछेक का जवाब मैं नहीं दे पाया। मैनें कहा कि ये साइनबोर्ड्स मैनें आजतक सड़कों पर नहीं देखे तो इनके बारे में पूछने की फ़ार्मैलिटी क्यों? इसपर मुझे फेल कर दिया गया। इंस्पेक्टर की गलती नहीं थी। मेरी भी नहीं थी। गलती प्रशासन की थी। साइनबोर्ड्स लगाने का काम इतना कैज़ुअली किया जाता है यह जगजाहिर है। अगर लगा तो ठीक नहीं तो रामभरोसे। और तो और साइनबोर्ड्स का तो आकार, रंग वगैरहा भी निर्धारित नहीं होते। वैसे भी सड़कें व्यावसायिक और पालिटिकल साइनबोर्ड्स से ही इतनी भरी होती हैं कि कुछ और देख पाना संभव नहीं हो पाता। इसपर यदि आपको साइनबोर्ड्स नहीं दिखाई दिया और गलती हो गई तो ज़िम्मेदारी आपकी। लेन सिस्टम अपनाने की बात भी अक्सर कही जाती है। जहां लेन होती है वहां भी कोई इस ओर ध्यान नही देता। मगर ऐसा क्यों है? इसके कई कारण हैं। मुख्य कारण तो यही है कि लोगों को ट्रैफ़िक के नियमों की ओर जागरुक नहीं किया जाता। लाइसेंस कैसे बनाए जाते हैं यह तो जगजाहिर है। लेन सिस्टम वहीं अपनाया जा सकता है जहाँ पर लेन बनाई गई हों। अब सोचिये कि भारत के किसी शहर की कितनी सड़कों पर लेन बनाई जाती हैं? सड़क के दोनो ओर कार्नर लेन मार्किंग पर हमेशा मिट्टी की परत चढ़ी रहती है। बाईं ओर की लेन अक्सर पार्किंग के लिये इस्तेमाल की जाती है और कहीं भी कोई गाड़ी खड़ी मिलने या लोगों के सड़क पर चलने की संभावना के चलते इस लेन को इस्तेमाल ही नहीं करना चाहता। फिर होता यह है कि इस लेन पर धीरे-धीरे मिट्टी की चादर बिछ जाती है और ड्राइविंग के लिये यह लेन सुरक्षित नहीं रह जाती। अब देखिये कि तीन लेन की सड़क में से एक लेन इस्तेमाल न हो पाने के कारण 33% सड़क तो यूँही खत्म हो जाती है।
हम बात कर रहे थे लेन सिस्टम की तो किसी भी शहर को देख लीजिये आपको आधे से ज़्यादा सड़कों पर लेन ही नहीं दिखेंगीं। यह अधूरा काम लोगों को लेन सिस्टम फ़ालो न करने के लिये प्रेरित है। सब सड़कों पर लेन न बनाकर प्रशासन जनता को यही संदेश प्रेषित करता है कि लेन सिस्टम सिर्फ़ एक फ़ार्मेलिटी है और नतीजा सामने आता ही है। लोगों को लेन सिस्टम के मूलभूत नियम भी नहीं मालूम। लोग दायें-बायें मुड़ते हुए इंडिकेटर देते हैं जबकि इंडिकेटर तब दिया जाना चाहिये जब आप एक लेन से दूसरी लेन में जा रहे हों। दूसरी बात सड़कों पर दायें-बायें मुड़ने के निशान अकसर नहीं बनाए जाते और यदि बनाए जाते हैं तो बिल्कुल सिग्नल के पास जबकि ये निशान वहां होने चाहिये जहां पर लोग लेन बदलते हैं मतलब सिग्नल से कम से कम 400-500 मीटर की दूरी पर ताकि लोग सही समय पर अपनी लेन निर्धारित कर लें। इसके लिये सड़कों पर दिशा-निर्देश सूचक साइनबोर्ड्स भी लगे होने चाहिये जोकि दिल्ली में हाल के सालों में लगने लगे हैं मगर बंगलौर में उनका अब भी सर्वथा अभाव है।
लेन सिस्टम तभी ठीक से अपनाया जा सकता है जबकि गति सम्बंधित नियम ठीक से अपनाए जाएं। किसी सड़क के एक स्ट्रैच पर बड़ी गाड़ियों के लिये गति-सीमा 40 होती है और छोटी गाड़ियों के लिये 50 या 60। वैसे तो इस नियम का पालन किया ही नहीं जाता, यदि किया भी जाए तो कई कठिनाइयां आएंगीं। एक बस जो 40 की गति पर चल रही है और उसके लिये बायीं लेन निर्धारित है। यदि उस बस को दायीं ओर जाना है तो इस प्रक्रिया में उन सभी गाड़ियों की गति बाधित होगी जो उस बस के पीछे 60 की गति से चल रही हैं। यह प्रक्रिया हमारी सड़कों पर इतने बार दोहराई जाती है कि बंगलौर की औसत गति 10 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई है। इसकी वजह है शहर की प्लानिंग। हर 100 मीटर पर एक मोड़ या कट होता है और उसके लिये कोई सिग्नल या लेन हो ज़रूरी नहीं। इसका असर ट्रैफ़िक की गति पर दिखाई पड़ता है।
बंगलौर में एक और चीज़ जो देखने में आती है वह है हर सिग्नल के पास स्पीड-ब्रेकर। मेरे अनुसार यह भी प्रशासन की ग़ैर-जिम्मेदारी का एक नमूना ही होता है। प्रत्यक्ष रूप से प्रशासन नियमों का पालन करवाने में असफल रहता है इसलिये ऐसे अप्रत्यक्ष तरीके अपनाता है। स्पीड-ब्रेकर की ऊँचाई और चौड़ाई नियमों में बंधी है मगर प्रशासन खुद इस ओर इतना लापरवाह होता है कि कई बार ऐसे स्पीड-ब्रेकर बनाए जाते हैं जिन्हें पार करने में ज़ेन जैसी लो ग्राउण्ड क्लियरेंस वाली गाड़ियों का तला उनसे टकरा जाता है। इन स्पीड-ब्रेकर्स पर अकसर ज़ेब्रा नहीं बनाए जाते जिसकी वजह से इन्हे रात में, और कई बार दिन में भी, देख पाना कठिन होता है। नतीजन होती हैं दुर्घटनाएं। इन दुर्घटनाओं में जो नुकसान होता है उसकी जिम्मेदारी प्रत्यक्ष रूप से प्रशासन पर होनी चाहिये। बंगलौर-मैसूर हाइवे पर एक जगह लोग सड़क पार करते हैं इसलिये प्रशासन ने वहां पर एक स्पीड-ब्रेकर बना दिया है। होना यह चाहिये था कि पैदल-पार पथ या सड़क पार करने वालों के लिये आप्श्नल रेड सिग्नल जैसा कुछ बनाया जाता, मगर प्रशासन ने स्पीड-ब्रेकर बनाकर छोड़ दिया, वह भी हाइवे पर। मैं रात को वहां से गुज़रा और मुझे वह स्पीड-ब्रेकर नहीं दिखाई दिया। दुर्घटना होते होते बची। प्रशासन की नज़र में नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं?

Thursday, 11 September 2008

भारत की ट्रैफ़िक संस्कृति भाग - 1

अभी पिछले दिनों पेन्सुल्वेनिया, अमेरिका से एक दल बंगलौर आया। उन्हें आमंत्रित करने के पीछे उद्देश्य था कि वे यहां की ट्रैफिक-स्थितियों का अवलोकन करें और विस्तृत सुझाव प्रस्तुत करें। उन लोगों ने शहर के दो-चार चक्कर काटने के बाद दो टुक शब्दों में कहा कि यहां भी वही टेक्नोलोजी इस्तेमाल हो रही है जो अमेरिका में होती है इसलिये इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है मगर बेहद बेसिक चीज़ें जैसे सड़कों पर गड़्ढ़े भरे होने चाहिये और लाइट की सही व्यवस्था होनी चाहिये आदि पर काम करने की सख्त ज़रूरत है।
यह ऐसे समय पर हुआ है जबकि मैं अपने भारत लौटने के बाद से ही रोज़ देर से दफ़्तर पहुँच रहा हूँ। 13 किलोमीटर तय करने में डेढ़ घंटे लगते हैं। जब मैं यहां से अप्रेल में गया था तब मुझे लगभग 45 मिनट लगते थे यानि 4-5 महीनों में 45 मिनट का अंतर आ गया। इस वजह से इस बारे में काफ़ी दिनों से सोच रहा था। दरअसल ट्रैफिक के बारे में उस समय सोचना शुरु किया जब बाइक हाथ लगी थी ’93 में। हालांकि उस दौरान ट्रैफिक की खास समस्या दिल्ली में थी नहीं। मगर यह बात शुरु से कचोटती रही है कि हमारी सड़कें इतनी खस्ताहाल रहती हैं, लोगों में ट्रैफिक-सेंस नहीं है और सरकारी मशीनरी भी ट्रैफिक को उतना ही हल्के तौर पर लेती है जितने हल्के तौर पर सड़क पर चलता हुआ आम आदमी।
बंगलौर अनपेक्षित रूप से और अचानक विकसित हो गया। विकसित का मतलब सिर्फ़ साफ़्टवेयर कंपनीज़ का यहां आना है, इंफ़्रास्ट्रक्चर के संदर्भ में तो सिर्फ़ बेड़ागर्क ही हुआ है जैसाकि भारत में हर बढ़ते शहर के साथ अनिवार्य रूप से होता ही है। मगर यहाँ के बारे में जो तथ्य मुझे रोचक लगता है वह यह कि बंगलौर सिलिकान सिटी बनने से पहले रिटायरमेंट हब हुआ करता था इसलिये यहां का माहौल काफ़ी लेडबैक टाइप हुआ करता था। भीड़ थी ही नहीं और दो-चार ही खासमखास इलाके थे जिनकी देखभाल प्रशासन को करनी होती थी। जब इस शहर का आकार बढ़ने लगा तो प्रशासन ने अपनी काम करने की गति में कोई सुधार करने की नहीं सोची। लोग आनन-फ़ानन में ज़मीन के बढ़ते दामों का फ़ायदा उठाने के चक्कर में गली-गली में इमारतें खड़ी करने लगे। सड़क जैसी बेसिक चीज़ के बारे में किसी ने सोचा ही नहीं। वैसे सड़क यहां पर न दस साल पहले बेसिक चीज़ थी न आज है। यह हाल कमोबेश पूरे भारत पर लागू होती है मगर बंगलौर इस मामले में अग्रणी है। चैन्नई और हैदराबाद में बंगलौर के मुकाबले बहुत बेहतर सड़कें हैं। मेरे नए फ़्लैट के आगे सड़क नहीं थी और लोगों ने फ़्लैट इसी शर्त पर खरीदे थे कि बिल्डर सड़क बनाकर देगा। जो काम प्रशासन का है उसके लिये पैसा हमारी ही जेब से जा रहा है। गाड़ी खरीदते वक़्त जो रोड-टैक्स आप भर रहे हैं सो अलग है। वैसे कुछ दिनों पहले ही खबर थी कि रोड टैक्स से मिले पैसों में से सिर्फ़ 55 करोड़ रुपये ही सड़कों के निर्माण और रख-रखाव पर खर्च किये गए हैं जबकी टैक्स लगभग 1700 करोड़ वसूला गया है। जहां तक मुझे याद पड़ता है बंगलौर में रोड-टैक्स पूरे देश में सबसे ज़्यादा अर्जित किया जाता है, दिल्ली से भी ज़्यादा। तो पैसे की कमी नहीं है। कमी है विज़न की। प्रशासन जिन लोगों के हाथ में है उन्हें या तो ट्रैफिक का क ख ग भी नहीं मालूम या फ़िर उन्हे इसमें कोई रुचि नहीं है। वे सिर्फ़ अपनी डयूटी बजाकर घर जाते हैं।
भारतीयों के दो कैरेक्टरिस्टिक हैं जिनके बारे में मैनें कुछ साल पहले सोचा था: हमें घिचपिच और भीड़-भड़क्के में रहने की आदत है और दूसरा हमें शोर से प्यार है। इसके दो उदाहरण हैं मेरे पास। हमारे शहरों में, कस्बों, कालोनियों में घर इतने पास पास बनाए जाते हैं, इतने चिपका चिपका कर कि एक के घर में झाड़ू लगे तो दूसरे के घर में उसकी आवाज़ जाती है। और जहां तक शोर की बात है तो हमारा शोरप्रेम तो जग जाहिर है। लोग सड़क को अपने बाप की जागीर समझकर वहां तंबू गाड़कर जगराता करते हैं और अपने साथ पूरे मोहल्ले को ज़बर्दस्ती जगाते हैं। सड़क पर चलते हुए लोग हार्न इस तरह बजाते हैं जैसे रफ़ी के गाने सुना रहे हों। इंग्लैंड में एक बार हम चार सहकर्मियों ने गाड़ी किराए पर ली और दो-चार शहर घूमने का विचार बनाया। तय किया गया कि गाड़ी मैं चलाऊँगा। गाड़ी गोडाउन से निकालने के बाद घर तक लेकर जानी थी जोकि एक किलोमीटर की दूरी पर था। यह काम मेरे एक सहकर्मी अंजाम देना चाहते थे। उन्होनें गाड़ी चलानी शुरू की और सड़क तक आए। आगे एक गाड़ी सड़क पर क्लीयरेंस मिलने का इंतज़ार कर रही थी। मेरे सहकर्मी का हाथ स्वत: ही हार्न पर चला गया जिसका मुझे पहले से ही अंदेशा हो रहा था। मैनें झट से उनका हाथ पकड़ लिया। 4 महीने में मुझे वहां पर सिर्फ़ तीन बार हार्न सुनने को मिला। यह अनायास ही नहीं कि हम सड़क पर हमेशा हार्न बजाते रहते हैं और न ही सिर्फ़ हमारे यहां की ट्रैफिक-परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि हमें हार्न बजाना पड़ता है।
दोनों ही देशों में यह जो अंतर है यह वास्तव में कल्चरल डिफ़ैरेंस है। उनकी संस्कृति में हार्न बजाने का मतलब गाली देना होता है और अपने यहां यह उस शोर का हिस्सा है जिसमें रहने की हमें आदत पड़ी हुई है। एक घटना याद आ रही है। बरसों पहले जर्मन की कक्षा खत्म होने के बाद कनाट प्लेस में गोपालदास बिल्डिंग के नीचे से मैं अपने घर जाने के लिये बस पकड़ा करता था। पीछे ही सुपर बाजार का आफ़िस था जिसके बाहर मैं और मेरे एक मित्र खड़े थे। सड़क के दूसरी ओर मैनें एक अमेरिकी/यूरोपी महिला को देखा जो चलते चलते केला खा रही थी। मैं यह जानने के लिये ठिठककर रुक गया कि वह छिलके का क्या करती है। जहां चारों ओर गंदगी पड़ी हो वहां हम अपना कूड़ा भी उसमें मिला देने के लिये प्रोन होते हैं और फ़िर भारत में कूड़ेदान ढूंढना भगवान ढूंढने से ज़्यादा दुश्कर है (कूड़ेदानों की कुला संख्या मंदिरों से कम ही होगी)। वह महिला केला खत्म करने के बाद रुकी और उसने चारों ओर नज़र दौडाई। सड़क के इस ओर उसे एक कूड़ेदान दिखाई दिया। उसने सड़क पार की और छिलका उसमें डालकर सड़क पार करके चली गई। उस दिन मुझे लगा कि सफ़ाई रखना कुछ देशों में सिर्फ़ आदत नहीं है वह उनकी संस्कृति में घुलमिल चुका है और मजबूत होकर अब कल्चर बन चुका है। यही ट्रैफिक के साथ भी है। ट्रैफिक के नियमों का पालन करना भी इसी संस्कृति का हिस्सा है, वरना मुझे क्यों वहां कहीं भी ट्रैफिक पुलिस नहीं दिखाई दी और फिर भी लोग नियमों के अनुसार गाड़ियां चला रहे थे।

पुनश्च: यह बकवाद आगे भी जारी रखने का इरादा है क्योंकि आजकल मैं ट्रैफिक के अलावा कुछ नहीं सोच पा रहा हूँ और विस्तार से इस बारे में लिखूँगा।

Saturday, 6 September 2008

तुम्हारी याद से डरता हूँ

कल यूंही तुम्हारी भटकी हुई सी याद आ गई
मैनें डरते-डरते तुम्हारे बारे में सोचा
मेरी परिधि के बाहर जो दुनिया है
उसमें गए तुम्हें
लम्बा अरसा बीता
मगर अनुभव से जानता हूँ
पीड़ा स्मृति सापेक्ष है
तुम अब भी जब-तब
कोंपल सी फूट पड़ती हो
मेरे दुर्दान्त निर्जन में
कुहासे सी फैल जाती हो
क्या प्रत्याशा का अतिरेक अब भी है?
तुम्हारे साथ रहकर भी मेरा युद्ध
तुम्हें पा सकने का रहा
और अब तक चल रहा है
तुम्हें भूल पाने का खेल
तभी डरता हूँ
तुम्हारे बारे में सोचने से
जाने कब
अपनी पराजय के सम्मुख
फिर छोटा पड़ जाऊँ
और अगर झांकना भी पड़े
उस खिड़की के बाहर
तो बस यूँ
जैसे बरसों पहले
अधपढ़ी कोई किताब

Friday, 5 September 2008

शिक्षक दिवस के बहाने प्रताप सर की याद

"पीछे के देख रिया है बे? व्हां के तेरा बाप नाच रिया है? हमारे इतिहास के टीचर दन्तु (उनके सारे दांत झड़ चुके थे) सर की पंचलाइन।

मुझे लगता है शिक्षा का और जो कुछ भी प्रभाव पड़ता हो, चरित्र निर्माण में उसका कोई खास योगदान नहीं होता। यदि होता तो भारत की नब्बे प्रतिशत जनसंख्या चरित्रहीन होती। यहाँ मैं उन तमाम स्कूलों और उन स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों की बात कर रहा हूँ जिनकी ड्यूटी पढ़ाना होती है, मगर सिखाना उनके कर्तव्य की परिधि से आजीवन बाहर रहती है।

हर औसत सरकारी स्कूल और वहाँ के अध्यापकों की यही कहानी होती है। औसत से बेहतर, आज्ञाकारी और शरीफ़ छात्र होने के बावजूद भी मेरी नियति में स्कूल में बिताए कुल जमा दिनों से ज़्यादा डंडे खाने लिखे थे। वो बात और है कि उन डंडों से फ़र्क पड़ना बंद हो गया था। मगर इस सबके बीच ऐसे कितने ही अध्यापक थे जो आज भी पढ़ाने की अपनी रोचक शैली और अपने व्यवहार के कारण बच्चों में अपनी लोकप्रियता के कारण याद आते हैं।

छठी कक्षा में जब गए तो अंग्रेज़ी नाम के खतरनाक जीव से वास्ता पड़ा। मैं इस जीव से दो साल एक छोटे-मोटे पब्लिक स्कूल में पढ़े होने के कारण पहले ही रूबरू हो चुका था इसलिये इस जीव का खतरनाकी गुण मेरे लिये सिर्फ़ रोचक विषय था। दूसरे बच्चों की तरह मेरे पेट में रोमांच से खलबली नहीं मच रही थी। प्रताप सर का नाम पहले ही सुन चुका था। हमारी सरकारी कालोनी में किसी को उनको पीठ पीछे गाली देते नहीं पाया गया था मगर वे सभी के लिये कौतुहल का विषय ज़रूर थे। जो भी उनके बारे में बात करता था दो वाक्य उनके के बारे में ज़रूर बोलता था, "प्रताप सर बहुत अच्छी अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं और सर्दी हो या गर्मी हमेशा सफ़ेद रंग की हाफ़ स्लीव कमीज़ और सफ़ेद ही रंग की पैंट पहनते हैं।"

इसने मेरे भीतर भी उनके लिये कौतुहल पैदा किया और इस कौतुहल में मेरा बेहतर अंग्रेज़ी का आत्मविश्वास भी घुला हुआ था। किस्मत से वही हमारे अंग्रेज़ी के अध्यापक बने और अगले तीन साल तक बने रहे। चौथे साल, जब हम नवीं कक्षा में पहुँचे तो अध्यापक बदल गए और एक दूसरे ही महाशय (सी पी सिंह) पढ़ाने लगे। सिंह सर ज़रा चिड़चिड़े थे और इनमें सरकारी स्कूल के अध्यापक वाली उग्रता भी थी। हमारी क्लास में कई लड़के पिछली कक्षाओं में भी इन्ही से पढ़े थे और कुछ मेरी तरह प्रताप सर से पढ़े थे। क्लास का पहला ही दिन था और सिंह सर ने एक लड़के से कुछेक सवाल पूछे जोकि ज़ाहिर है वह नहीं बता पाया। सिंह सर चिढ़ गये और बोले, "हरामखोर! किस उल्लू के पठ्ठे ने अंग्रेज़ी पढ़ायी थी तुझको?" पीछे से किसी ने उन्हे याद दिलाया, "सर ये तो आपकी ही क्लास में था।"

प्रताप सर के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी। उनके पढ़ाने का तरीका मशीनी था मगर कुछ हद तक रोचक था और उनमें न तो वह ठसका था और न ही वे कोर्स पूरा कराने के शार्टकट अपनाते थे। एक दोस्त ने बरसों बाद कहा था, "दही भाई, हम सरकारी स्कूलों की खर-पतवार हैं।" इतना दावे से कह सकता हूँ कि बाकी अध्यापकों की तरह प्रताप सर ने बच्चों को कभी खर-पतवार नहीं समझा।

प्रताप सर रोज़ एक पन्ने का सुलेख घर से लिखने के लिये देते थे और पूरी क्लास की कापियाँ चेक करने का काम पहले मुझे सौंप दिया। यह मेरे लिये शानदार काम था। इससे क्लास में मेरी थोड़ी बहुत प्रतिष्ठा बनी। कहीं अगर प्रताप सर भी बाकी अध्यापकों की तरह डंडा लेकर चलते तो प्रतिष्ठा के साथ ही मेरा आतंक भी बच्चों के मन में बैठता मगर ऐसा नहीं हुआ। मेरे लिये यही बहुत था कि बच्चे एक-एक करके अपनी कापियां लेकर आते और मुझसे साइन करवाते। उनकी कापियों में साइन करते समय मैं खुद को अध्यापकों के समकक्ष पाता था। साइन करने का तात्कालिक मतलब जो बच्चे लगाते थे वह यह था कि साइन वही करता है जिसका कुछ रुतबा है जैसे टीचर, पिताजी, प्रिंसीपल, गैजेटेड अफ़सर आदि। जब यह काम मेरे लिये ज़्यादा होने लगा तो उन्होनें इस काम के लिये मेरे अलावा तीन लड़के और नियुक्त कर दिये। बच्चे कभी कभी मुझसे पूछकर अपनी कापियों में खुद ही साइन कर लेते।

सातवीं क्लास के पहले दिन उन्होनें कुछ लड़कों का नाम लेकर खड़ा होने को कहा। इसमें मेरा नाम भी था। हम सब एक दूसरे की ओर देख रहे थे। सरकारी स्कूल में नाम लेकर खड़ा करवाने का मतलब सिर्फ़ पिटाई होता है, तबतक यह समझ बन चुकी थी। मगर किस्मत से ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रताप सर सबसे पहले मेरे पास आए और बोले, "महेन्द्र को मानिटर बनाते हैं।" मैं घबरा गया। जाट-गूजरों से भरी क्लास में मुझे सबकुछ मज़ूर है मगर मानिटर बनना नहीं। मैं इन लोगों की उद्दंडता से कुछ अवसरों पर दो-चार हो चुका था और अनुभव अच्छा नहीं रहा था। वे मेरे सर पर हाथ फ़िराते हुए बोले, "नहीं, महेन्द्र को पढ़ने दो। मानिटर किसी और को बनाते हैं।" मैं बच गया।

उनका व्यवहार अजीब था। जितने समय वे हमें पढ़ाते रहे, कभी मिलते तो मुस्कुरा देते मगर जब पढ़ाना छूट गया तो मुस्कुराना भी छूट गया। शायद यह उनकी मितभाषी प्रकृति का ही एक रूप था। उनके सफ़ेद टेरीकाट के कपड़े उनका ट्रेडमार्क होते थे। हमेशा सफ़ेद कपड़ों में। जब हम प्रार्थना के लिये लाइन में लगे होते तो वे अक्सर गेट से आते दिखते थे। उनके एक हाथ में कुछ किताबें होती थीं जिन्हे वे कन्धे से ऊपर सीधा खड़ा करके चलते थे। यह अपने गंजे सर को चमकती धूप से बचाने का कारगर तरीका था। सर्दियों में कभी-कभी एक नीले रंग का कोट डाल लेते। बच्चे कहते थे कि वे ब्रह्मचारी और सन्यासी थे, कुछ कहते कि अपनी बहन की मृत्यु के बाद उन्होनें इस तरह का जीवन अपना लिया था। जो भी था, उनकी छवि एक ऐसे निस्संग अध्यापक की थी जिसे दीन-दुनिया से कोई मतलब नहीं, सिर्फ़ पढ़ाना और पढ़ाकर घर जाना। मुझे याद नहीं पड़ता कि उन्होनें कभी चिढ़कर या गुस्से से किसी बच्चे से बात की हो। इसी निस्संगता और व्यवहार के चलते वे उन चुनिंदा अध्यापकों की लीग में शामिल हो पाए, जो बच्चे जाने-अनजाने बना बैठते हैं, जिन्हें बच्चे न तो गाली देते थे और न ही उन्हें शोहदे जाटों और गूजरों से पिटने का अवसर आया।
(यह सब यूंही एक रौ में लिख दिया है। बातों में कोई सूत्र है न लय)

Monday, 1 September 2008

महोदय अ का शाश्वत लेखन

ब्लोगिंग मज़ेदार चीज़ है। यह किताबों-पत्रिकाओं से दो कदम आगे वाला मंच है जहां बात तुरंत पहुंचती है और हर कोई अपनी ढपली बजा सकता है। इस स्वतंत्रता के परिणाम भी मज़ेदार होते हैं। आदमी की वाचन इन्द्रिय उसकी श्रवण इन्द्रिय से हमेशा से बेहतर काम करती आई है इसलिये स्वतंत्र आदमी सिर्फ़ बोलना चाहता है, सुनना नहीं चाहता। कुछ प्राणी ऐसे होते हैं जो कानों में उंगलियाँ ठूसकर बोलते हैं। वे न अपना कहा सुनते हैं न दूसरों का।

अभी-अभी “अ” महोदय ने कुछ सौ-एक लोगों को मित्रता विषय पर कवितानुमा कुछ भेजा। तकनीक के परिणाम भी मज़ेदार होने लगे हैं। जाने कितना समय खर्च करने इन्होनें इतने सारी ईमेल आई डी इकठ्ठी की होंगीं। किसी ने भी ये कविताएं पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई। उलटा लोग इन महोदय को कोसने लगे। कोसने का तरीका भी मज़ेदार है। ये सभी लोग कोसने के लिये reply all करते हैं। अ साहब तो मज़े से बैठे लोगों की प्रतिक्रियात्मक मेल पढ़ रहे हैं अपने एसी आफ़िस में बैठकर और साथ ही अपनी कुख्याति भी प्रतिष्ठित कर रहे हैं; सुलग रहे हैं हम बेवकूफ़ लोग जिन्हें इन्होनें मेल भेजी है। अब reply all का यह किस्सा दो-तीन दिन चलेगा और इसमें अ महोदय की एक भी मेल नहीं होगी। अ महोदय संत सरीखे हैं, वे क्रांतिकारियों के नेता हैं जो कार्यकर्ताओं में ओज भरकर खुद समाधि लगाकर बैठ जाते हैं। सिर धुनेंगे हम लोग।
ईमेल आई डी इकठ्ठी करने का यह प्रशंसनीय प्रयास है। मेरे विचार से वक़्त आ गया है कि लोगों को अपना नज़रिया बदल लेना चाहिये। हम सभी लोगों को चाहिये कि अ महोदय को एक प्रशंसा-पत्र दिया जाए। इन्होनें हिंदी ब्लोगजगत में छितरे लोगों को सिर्फ़ एक मेल से ही एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जोड़ दिया है। इन reply all मेल के जरिये कितनों को तो मैं जानने लगा हूँ। ब्लोगवाणी, नारद और चिठ्ठाजगत सरीखे एग्रीगेटर्स को या तो अपनी दुकान समेट लेनी चाहिये या इन महोदय को अपना सी ई ओ नियुक्त कर देना चाहिये। उड़नतश्तरी जी की हज़ारों टिप्पणियाँ और इसमें ज़ाया घंटों के वक़्त की करामात वैसी कारगर नहीं जैसी अ महोदय की कारगुज़ारी। आउटसोर्सिंग हब हमारे इंडिया को ऐसे ही नवयुवकों की ज़रूरत है जो इस तरह के नए-नए आइडिया लाकर हमारी अर्थव्यवस्था को आगे पहुंचा सकें। क्या फ़र्क पड़ता है अगर इससे हमारे जैसे कुछ कुमति कुढ़ते हैं। छोटे लोगों को दूरदृष्टि कहां होती है? कोसी में बिहार डूब रहा है। तरह-तरह की तस्वीरें, ख़बरें रोज़ अखबारों में आ रही हैं मगर कोई यह नहीं सोचता इस क्षणिक सागर का इस्तेमाल बड़े-बड़े लग़्ज़री क्रूज़ को तैराकर किया जा सकता है। आधा यूरोप उमड़ आएगा बाढ़ के बीच कंधे पर हनुमान की तरह दो बच्चों को चढ़ाकर पेड़ की डालों पर बैठे लोगों को देखने। कितना पैसा मिलेगा इससे। अपनी सरकार ब्राईट साइड देखती ही नहीं है। फ़्रांस तो इतने सालों तक न्यूक्लियर कचरा तक बेचता रहा। सरकार को मुनाफ़ाखोर होना चाहिये तभी देश प्रगति करेगा। इसके लिये अ जैसे प्रयोगधर्मी लोगों की ज़रूरत है।
अ महोदय को हतोत्साहित नहीं होना चाहिये। उन्हें लगे रहना चाहिये, ठेलते रहना चाहिये ऐसे ही। नज़ीर अक़बराबादी, ग़ालिब जैसे कितने ही लोग हैं जिनकी कद्र लोग उनके जीते जी न कर पाए। क्या हुआ अगर महोदय अ आज चैन्नई में गुमनाम पड़े हैं। कभी न कभी तो लोग समझेंगे।
जहाँ लेखक शाश्वत लिखने और अमर होने के फ़ेर में पड़े हैं वहाँ महोदय अ जैसे लोग सबको पीछे छोड़कर अपने लेखन की कैम्पेनिंग करके सबसे आगे निकल जाएंगे; आप चाहे इसे चिरकुटिया लेखन माने बैठे रहें। यहाँ एक से एक दिग्गज लेखक बैठे ठाले हैं, न कोई पढ़ता है उनको न कोई टिपियाता है और दूसरी ओर अ महोदय हैं जिनको मैं कम से कम उतने बार पढ़ चुका हूँ जितनी बार उन्होनें अपने करिश्माई लेखन की झलकियां मुझे ई मेल पर दी हैं। और तो और उन्हें यह सौभाग्य भी प्राप्त हुआ है कि मैनें उन्हें एस टी डी करके हड़काया भी है कि कृपया मुझे ऐसे मेल न भेजा करें। किसी भी दिग्गज लेखक को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ आजतक। ऐसे ही तो पैर जमते हैं साहित्य की कबड़्ड़ी के मैदान में। मैं हतभाग्य; मुझे क्या मालूम मैं क्या पाप कर बैठा। कल कहीं अ बड़े लेखक बन गए तो आज हड़काने वाले लोग चंवर डुलाएंगे उनके। उन्हें निराश नहीं होना चाहिये।

Sunday, 31 August 2008

याद

याद?
मुझे कुछ याद नहीं
मुझे नहीं सताती किसी की याद
इस समय को जीने के बाद
जो बचता है मेरे पास
वह कल की अंधी खोह में खोजती-टटोलती
मेरी दो आँखें और दो हाथ होते हैं

याद?
याद मेरे लिये
पेशानी पर खिंच आई लकीरें हैं
याद है चेहरे पर बिसूर गई एक मुस्कुराहट
और है भविष्य में व्याप्त नाउम्मीदी

Sunday, 24 August 2008

यारों से बातचीत

गलबहियाँ डाली ही नहीं कभी
शिकवे रह गए अनकहे ही
ग़ुरूर के पुठ्ठों पर धौल ही मारते रहे
सहलाना तो भूल ही गए
जो चोट मैंने तुमसे खाई
उसकी सुईयाँ तुम्हें भी चुभी ही होंगीं
जैसे तुम्हारे लिये रचे गये मेरे श्राप
मुझे भी अपवित्र कर गए
चलो उन निरापद दिनों की ही बात करते हैं
तब अपने बदहाल दिनों का आसमान
न साफ़ था न मैला
मगर अपना-अपना था
तुमनें मुझे न काटा न चाटा
तुम सिर्फ़ दोस्त ही बने रहे
निर्लिप्त दोस्त
वे बीयर की बोतलों
और गोश्त की हांडी पर
चढ़े हुए दिन थे
उफ़नते और धांस की महक भरे दिन
जो एक ही गिलास में ढलते थे
और एक ही थाली में उतरते थे
हाथ धुलने के साथ ही झगड़े भी
एक ही नाली में बहते थे
ऐसा कुछ है क्या कि
जब अपना कहने को कुछ नहीं होता
तब सब अपने होते है?
चलो इन बचकाने सवालों में भी नहीं उलझते
मेरा सच तो यह है कि
जब अपना आसमान साफ होने लगे
तब दूसरों का मैल काटता है
तुम्हारा सच भी ऐसा ही कुछ होगा
दरअसल तुम और मैं
समानांतर सच में जीने वाले दोस्त हैं
जो सिर्फ अपने आसमान का मैल
धुलने का इंतज़ार करते हैं
और अब जो मैल धुल गए हैं
तो क्या कुछ भी कहने को बाकी है?

Tuesday, 19 August 2008

शब्द

वक़्त की किताब पर
लिखा एक शब्द
घिस-घिसकर मिट जाएगा
भुला दिया जाएगा
रौंद दिया जाएगा
पैरों तले
रेशा-रेशा जिसका
उखड़ जाएगा
एक दिन धुल जाएगा
जिसका अस्तित्व
लेकिन हज़ारों सालों बाद भी
जो प्रतिध्वनित होगी
वह
उस शब्द की गूँज होगी।

Friday, 15 August 2008

ब्लोगर्स की जमात के बीच मेरी ग़ैर-मौजूदगी और याचनात्मक प्रोमोश्नल मेल

तकरीबन नौ दिन हुए वापस आए और जितनी मुझे उम्मीद थी, मेरी मसरूफ़ियत उससे भी कई गुना बढ़ गई है। पिछले सप्ताहांत के लिये किये जाने वाले कामों की एक लिस्ट बनाई थी जो बीस की संख्या पार कर गई। पूरा सप्ताहांत उसमें निकल गया, फ़िर भी कुछ काम रह गए। सो, कल के लिये भी काम बचे हुए हैं।
देवी जी को लेकर डाक्टर के पास जाना भी इस दौरान लगा रहा। प्रसव के आखिरी दिनों में डाक्टर हफ़्ते से पहले देवी जी के दर्शन करना चाहती है और नर्सिंग होम घर से काफ़ी दूर है, इसलिये उसी में आधा दिन चला जाता है। फ़िर भारत पहुंचने के बाद आफ़िस के काम और भी बढ़ गए हैं और मेरे काउंटरपार्टस मुझसे उन सारे कामों की आशा भी कर रहे हैं जोकि मेरे नहीं हैं और उन सारे कामों की भी जो मैं इंग्लैंड में होने की वजह से पहले नहीं कर सकता था। इसके अलावा वे लोग जितना ज़्यादा हो सके काम निकलवा लेना चाहते हैं क्योंकि बच्चे के आते ही मैं तकरीबन पन्द्रह दिनों की छुट्टी पर चला जाऊँगा। इस दौरान मैं गधे की तरह काम कर रहा हूँ और चक्की के न जाने कितने पाटों के बीच पिस भी रहा हूँ।
इस सबके बीच ब्लोगिंग करने का वक़्त ही नहीं निकल पा रहा, जिसकी गर्मी मुझतक पहुँच रही है। मैनें दो बातें इस दौरान नोटिस कीं।
पहली यह कि ब्लोगजगत और सिनेमाजगत में खास अंतर नहीं है। जबतक आप अपनी मौजूदगी दर्ज करवा सकते हैं तबतक लोग आपको याद रखेंगे, वरना धीरे-धीरे भूलने लगेंगे। (ज्ञान जी और संजीत जी जैसे लोग अपवाद हैं) बीच-बीच में कुछ हलके-फ़ुलके पोस्ट मैं गानों-ग़ज़लों की शक्ल में अपने दूसरे ब्लोग पर डालता रहा। इसमें कोई खास झंझट नहीं है। सिर्फ़ दस-पन्द्रह मिनट लगते हैं। इसलिये सोचा जबतक इस ब्लोग पर कुछ ना डाल सकूं तबतक दूसरे और तीसरे ब्लोग को ही कम से कम सक्रिय रखूँ। मगर मैं शायद इसी ब्लोग की वजह से पहचाना जाता हूँ इसलिये जितने भी लोग मेरे इस ब्लोग को देखते हैं उन्हें लगा होगा मैं ग़ायब हो गया हूँ। हालांकि काफ़ी अंतराल के बाद दो-एक पुरानी लिखी कविताएँ पोस्ट कर दीं, जिनपर मेरा traffic feed बताता है कि ज़्यादा लोग पढ़ने के लिये नहीं आए।
इसकी कई वजहें हो सकती हैं। शायद लोगों को मेरा लिखा पसंद नहीं आया या अंतराल ने मुझे उनके मानस से साफ कर दिया। मगर मुझे लगता है कि मेरे पोस्ट डालने के समय में अंतर की वजह से लोगों को मेरे पोस्ट के बारे में पता ही नहीं लगा क्योंकि इंग़्लैंड में मैं भारत के सुबह के तकरीबन चार-पांच बजे समय पोस्ट किया करता था और यहां पोस्ट डालने का वक़्त शाम के आठ से दस के बीच हो गया है।
खैर, इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात जो मैं उपस्थिति की कर रहा था, वह हमेशा प्रमुख कारक रहता है। जैसाकि मैनें कहा कि मेरे पास ब्लोग्स पढ़ने का समय नहीं था तो टिप्पणी करने का कहाँ से होता? सिर्फ़ दो-चार ब्लोग्स पर टिप्पणी करके या सिर्फ़ पढ़कर हट जाया करता था। इसका सीधा प्रभाव मुझे अपनी पाठक संख्या पर दिखाई दिया। मैं टिप्पणी नहीं कर रहा तो लोग काहे मेरे ब्लोग पर टिप्पणी करेंगे?
यहां लौटने के बाद जो काम मैं अपने बचे-खुचे समय में करता रहा वह था पढ़ने का। इसी दौरान अचानक ब्रेख़्त की कविताओं का एक पुलिंदा, जो मैनें सालों पहले प्रिंट-आउट लेकर रख लिया था हाथ लगा। मुझे लगा और कुछ नहीं तो चलो कुछ एक कविताओं का अनुवाद ही कर लिया जाए। इसी समय विजय गौड़ जी ने मुझे धर दबोचा और वो अनुवाद अपने यहाँ पोस्ट कर दिये। फ़िर लगा कि चलो अब गंभीरता से अगर अनुवाद करना है तो पहले कुछ पढ़ लिया जाए। फलस्वरूप आज तकरीबन पांच किताबें खरीद लाया।
पाठक न मिलने के रोने के बीच मैनें जिस दूसरी बात का नोटिस लिया वह यह कि एक ओर मेरे जैसे लोग हैं जो शांति से इस ग़म में घुट रहे हैं कि कोई पढ़ नहीं रहा और दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो तमाम ब्लोगर्स की मेल आई-डी उठा-उठाकर उन्हें मेल भेज रहे हैं कि आओ मेरा ब्लोग पढ़ो; मैं गुरु-गंभीर विषय पर बहुत ही सार्थक चिंतन कर रहा हूँ और अगर आपने यह नहीं पढ़ा तो क्या जिये आप सरीखा। इस दौरान दिन में बीसियों ऐसे मेल या तो मैं उड़ाता रहा या तंग आकर लोगों को प्रेम-पूर्वक या गुस्से में लिखता रहा ऐसे मेल न करने के लिये।
मेरे तईं यह बेहयाई है कि लोग बग़ैर जाने-पहचाने किसी को भी मेल भेज देते हैं और अक्सर मेरी प्रतिक्रिया नरम नहीं होती। मुझे दिन में लगभग दस प्रोमोशनल काल्स मेरे मोबाईल पर आती हैं जिनसे मैं खासा परेशान हूँ और अब इसी तरह ही याचनात्मक मेल कि आईये मेरा ब्लोग पढ़ लीजिये। इस तरह की मेल मुझे चौराहों पर खड़े उन भिखारियों की याद दिलाती है जो नकली दयनीयता पैदा करके लाखों का धंधा हर साल कर जाते हैं। हालांकि ब्लोगर्स के मामले में मुझे यह दयनीयता नकली नहीं लगती। वे ब्लोगर-जीव सच ही दयनीय हैं जो अनजाने लोगों को अपना ब्लोग पढ़वाने के लिये मेल भेजते हैं।
मेरा विचार और माथा दोनों गरम है। आपका कया हाल है?

Thursday, 14 August 2008

पहचान

1

जिनकी कोई पहचान नहीं होती
वे खोजते रहते हैं उसे
किताबों में
हाथ की लकीरों में
अजनबी चेहरों में
और आने वाली पीढ़ी में।


2

अजनबी चेहरों में
खोजते रहते हैं हम
अपनी पहचान तमाम उम्र
और जो हमारे हाथ लगता है
वह एक मसखरा होता है
जिसका कोई चेहरा नहीं हुआ करता
और खो देते हैं हम
अपनी रही सही पहचान भी।

Wednesday, 6 August 2008

पुराना सामान

इस चहारदीवारी के भीतर
अनाप-शनाप सामान की तरह
तुम भी भर दी गई हो
रोज़ वही दीवारें, वही सामान
वही तुम

अब इतने बरसों बाद
हम मिलते हैं एक-दूसरे से
रेडियो-टीवी की तरह
मेरी पुरानी साइकिल
आमंत्रण नहीं देती अब
हम एक-दूसरे को देखते हैं पलभर
थकान भरी आखों से
और फेर लेते हैं मुँह

ये सब सामान
जो मैंने शौक से इकठ्ठे किये
मुझे भर देते हैं ऊब से
इन्हें रोज़ वहीं पड़े देखना
मेरी आदत है बीते कई सालों से

एक दिन
तुम मर जाओगी
ठीक वैसे ही जैसे
इस सामान को निगल जाएगा समय
और फ़िर सबकुछ
मेरी यादों में तह हो जाएगा
धूल फ़ांकती
किसी पुरानी किताब की तरह

Monday, 4 August 2008

प्रोफ़ेश्नलिज़्म और पढ़ा-लिखा आदमी

प्रोफ़ेश्नलिज़्म का पढ़ाई से कितना लेना-देना है? ज़्यादा नहीं, ऐसा मुझे लगता है। सैकड़ों उदाहरण जमा हो गए हैं मेरे पास। ज्ञान जी की पिछली पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए अचानक इस बारे में भी सोचने लगा और तभी से लगातार सोच रहा हूँ। मेरे घर में पिछले करीब दो सालों से एक कुक मेरे अपने फ़्लैट में शिफ़्ट होने तक (मैं अपने घर में फ़रवरी में शिफ़्ट हुआ) काम कर रही थी। खाना बनाने में वह शैफ़ाली की कसौटी पर खरी उतरी। शैफ़ाली के खाने के पंजाबी शौक होने और कुक के तमिल होने की वजह से यह बहुत मुश्किल था, मगर उसने कभी निराश नहीं किया। मज़े की बात कि उसका नाम भी अन्नपूर्णा है। कई बार ऐसा हुआ की हमारी सफ़ाई करने वाली बाई बगैर बताए नहीं आती थी। ऐसे हर मौके पर अन्नपूर्णा बग़ैर हमारे कुछ कहे सारे बर्तन-भांडे भी धो देती थी और पूरे घर की भी सफ़ाई कर देती थी। हम ऐसे हर मौके पर उसे यह सब काम करने के लिये मना करते रहे, पैसे की बात तो बहुत दूर की है। जब भी हमनें कहा कि हम ऐसे अचानक आ पड़े काम के लिये उसे अलग से पैसे देंगे तो वह साफ़ मना कर देती और कहती “पैसे की बात करके मुझे छोटा ना करें।” यह एक टयूनिंग तो थी ही हम लोगों के बीच में क्योंकि उसे ज़रूर लगता होगा कि हम उसका बेज़ा इस्तेमाल नहीं करेंगे और दूसरी ओर हम इस ओर से जागरूक थे कि उसे उसकी मेहनत का उचित मुआवज़ा मिले। तमाम तंगी के बीच वह अपनी इकलौती संतान (लड़की) को एक छोटे स्तर के पब्लिक स्कूल में पढ़ा रही है और अकसर सत्र के शुरु में उसे एक साथ फ़ीस भरनें में दिक्कत होती है। पिछली बार उसने हमसे उधार मांगा। जब हमें उधार मांगने का कारण पता चला तो मैंने शैफ़ाली से कहा कि उधार देने की ज़रूरत नहीं है। हम फ़ीस ही भर देंगे, जिसपर शैफ़ाली तुरंत तैयार हो गई। यह दोनों पक्षों का एक-दूसरे पर सहज विश्वास की वजह से हुआ और इस विश्वास के उपजने की वजह क्या अन्नपूर्णा का प्रोफ़ेश्नलिज़्म नहीं है? कारपोरेट-जगत में अकसर पहले आपको अपनी अपरिहार्यता सिद्ध करनी होती है, उसके बाद ही कंपनी आपका विश्वास भी करती है और आपका महत्व भी समझती है। यह सिद्धांत हर जगह लागू होता है; मुख्य सिद्धांत के रूप में कारपोरेट-जगत में भी और घरेलू नौकरों के साथ भी जो इस बारे में संभवत: कोई सिद्धांत भले ही न गढ़ पाएँ, मगर कई अपने व्यवहार में इसे जाने-अनजाने अपनाते हैं। ऐसी ही एक सफ़ाई वाली बाई भी थी हमारे घर पर जो अन्नपूर्णा की तरह काम के मामले में पूरी तरह प्रोफ़ेशनल है। हम इन दोनों की कमी आज भी महसूस करते हैं अपने घर में। शैफ़ाली ने तो पूरी कोशिश की कि इन दोनों को किसी भी तरह अपने पास ले आए। कुछ आसार तो हैं देखें क्या होता है।
मेरे विदेश-प्रवास के दौरान श्रीमति जी और उनकी माता यहाँ बंगलौर में दुकेले थे। इस बीच कई नए कुक्स और सफ़ाई वाली बाइयों से साबका पड़ा और हर बार शैफ़ाली ने अन्नपूर्णा और नागम्मा को और भी शिद्दत से याद किया। मेरा मानना है कि प्रोफ़ेश्नलिज़्म का पढ़ाई से कोई लेना देना नहीं। यह कल्चर के रूप में कंपनियां अपने यहाँ लागू तो कर देती हैं और ऊपरी तौर पर उसका रूप भी बहुत प्रोफ़ेशनल लगता है मगर अंदर ही अंदर तमाम तरह की राजनीति चलती रहती है। किसी भी कारपोरेट में आधे से ज़्यादा लोग सच्चे प्रोफ़ेशनल नहीं होते। कम या ज़्यादा यह बात अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे काम करने वालों पर भी लागू होती है, घरेलू नौकरों को मिलाकर मगर अन्नपूर्णा जैसे सच्चे प्रोफ़ेशनल लोग आपको ज़रूर टकराएंगे।
यहाँ भी देखें।

Sunday, 3 August 2008

वे सब हमारे ठाने हुए द:ख थे

कितने बदनसीब थे हम
कि सोते रहे फूलों की सेज पर
और गाते रहे
बहती नदियों के किनारे बैठकर खिलखिलाते गीत
जब चाँद लुट रहा था
अपनी तमाम सुँदरता और धब्बों के साथ
हम गुलज़ार किये थे
सनमख़ानों में आराईशी ख़ियाबां
हमनें कब परवाह की
किस गिर्दाब में गुमगश्ता है ख़ाम ज़िंदगी
हमारे गले तक भरी हुई थी शराब
मुँहभर गालियों के साथ
हम गाते रहे
अपनी बिछड़ गई प्रेमिकाओं के शोकगीत
और रोते रहे
फ़िर अकेले छुट जाने का अफ़सोस
नीम नशे में हमनें कोसा अपने वजूद को
और उन माओं को
जिन्होनें हमें पैदा किया अजाने
उन पिताओं को भी नहीं बख़्शा
जो पराए लगे ज़िंदगीभर
कोठे के रंगीन अन्धेरे कोनों में
झुरझुराते चाँद के नीचे सुनते रहे
किसी की कच्ची-पक्की तानें
लुटाते रहे
अपने अधपके इल्म की अधजली वाहवाही
कूड़े के ढेर पर जब ज़िंदगी
अपने होने की तस्दीक़ कर रही थी
हम मसरूफ़ थे
अपने वजूद के हवाले देने में
और किसी की नकली भावनाओं को
अपने अब्तरी आंसुओं से चरितार्थ करने में
ताउम्र इस तौर रंजीदा थे हम
कि जाना ही नहीं क्या होती है तकलीफ़
इस कदर डूबे रहे हम अपने दु:खों की रूमानियत में
कि रोने में ही सुख मिला किया हमें
जिन्होनें आफ़तें देखी नहीं
वे हम थे
हमारी आत्मा से जो टपकते थे
वे सब हमारे ठाने हुए नकली दु:ख थे

Friday, 1 August 2008

पहाड़, शहर और तुम

एक ओर वह शहर है
जहाँ मैं रहता हूँ
दूसरी ओर वे पहाड़
जहाँ मैं पैदा हुआ
इन दोनों के बीच हो तुम
मैं मानव हूँ
मुझे बेहद प्यार है
तुमसे, अपने शहर से और अपने पहाड़ों से
जबतक ज़िंदा हूँ
भूलेगी नहीं पहाड़ों की दुर्गमता
शहर की कुटिलता भी नहीं बिसरेगी
अपने हर ऐब के साथ वे
मेरे ही रहेंगे
मैं उन्हें उसी तरह प्यार करूँगा
जैसे तुम्हें चूमता हूँ हर बार
पिछली रात की तुम्हारी
असहज चुप्पी तोड़ने के लिये।

Tuesday, 29 July 2008

पहाड़

पहाड़ साथ नहीं जाते किसी के
वे वहीं खड़े रहते हैं जैसे टूटा हुआ पिता
झुके कंधे लिये
अपने से बाहर निकलती सड़क को देखता है
जो धकेले जा चुके हैं
उनके पीछे छुटे सामान के साथ
आबाद रही पगडंडियों पर रखे हैं हरे घाव
किसी की स्मृति में नहीं रहते वे
न रखते हैं किसी की याद
अपने पथरीले जिस्म में
वे खड़े रहते हैं
बगैर किसी के लौट सकने की
गुँजाईश के साथ

पहाड़ वहीं खड़े रहते हैं
जैसे टूटा हुआ पिता झुके कंधे लिये
अपने से बाहर निकलती सड़क को देखता है
और पहाड़ वे पिता हैं
जो और उठ उठ जाते हैं
खुद को अकेला पाकर
उनकी जड़ें व्याप्त हैं
उनके अस्तित्व से भी आगे
जितने ऊँचे हैं वे
उससे भी ज़्यादा गहरे हैं

Wednesday, 23 July 2008

हज़ारों मील की दूरी नहीं

हज़ारों मील की दूरी नहीं तुम्हारे मेरे बीच
तुम्हारी आवाज़ में तुम्हारा चेहरा तो देख सकता हूँ
शब्दों के कंपन पर थाम सकता हूँ तुम्हें
अपने ठंडे हाथों में

हज़ारों मील की दूरी नहीं तुम्हारे मेरे बीच
तुम्हारे मेरे बीच गिरजे हैं, मदिरालय हैं
चिकनी सड़कें, खूब सारी घास, अनंत नीला पानी है
तुम्हारे मेरे बीच साथ बिताए दिन हैं
अच्छे दिनों की यादें है तुम्हारे मेरे बीच
बुरे दिनों के दुस्वप्न हैं
फ़िर भी हज़ारों मील की दूरी नहीं तुम्हारे मेरे बीच
तुम्हारे मेरे बीच गर्भ में पलता एक शिशु है
जो जोड़ता है हमें एक दूसरे से
जीवन के यकीन से
ईश्वर के मनुष्य पर विश्वास से
इसलिये हज़ारों मील की दूरी नहीं तुम्हारे मेरे बीच

Sunday, 13 July 2008

परिभाषाएँ

शायद जो अपना बदलना इतने सालों से मुल्तवी कर रहा था वह यकायक मेरी ग़ैरमौजूदगी पाकर पिछले दो-चार सालों में बदल गया। यह भी हो सकता है कि घट तो सभी कुछ रहा हो पर मेरी ही आँखें बदली हुई रही हों। जो भी हो आज जब मैक्स म्युलर भवन में घुसा तो यकायक लगा कहीं और ही चला आया हूँ। सिक्योरिटी पर रमेश नहीं था। जो था मैं उसे नहीं जानता था, वह भी मुझे नहीं जानता होगा मगर उसने रोका नहीं। शायद रमेश से मेरी रोज़ की दुआ सलाम मेरे कपड़ों से टपक रही थी, जिसे उसने देख लिया होगा। आम का वह पेड़ काटा जा चुका था जो फल नहीं देता था, आम देने वाला पेड़ सलामत था। यूँ भी वहाँ कौन उस पेड़ के फल खाता था जो वो पेड़ फल देने का अपना फ़र्ज़ पूरा करता; सिवाय रेहाना के जो कभी-कभी बगीचे में गिरी अमियाँ बटोर लेती थी घर पर चटनी बनाने के लिये। कहती थी उसकी दादी बहुत अच्छा मुरब्बा और चटनी बनाती है आम से। मुझसे कहती थी पेड़ पर चढ़कर बड़ी-बड़ी अमियाँ तोड़ने के लिये। मैं हँस देता था उसके भोलेपन पर। “यह कोई जगह है क्या पेड़ पर चढ़ने की?” मैं कहता। जहाँ भी पेड़ हो वहाँ पेड़ पर चढ़ा जा सकता है, यह उसका तर्क होता था। कोई झिझक या शर्म नहीं करती थी। जब मैं कहता, “मैक्स म्युलर जैसी सोफ़िस्टिकेटेड जगह पर तो अपना गंवारपन घर रखकर आया करो।”, तो वह मुँह घुमाते हुए कहती, “आम के पेड़ पर चढ़ना गंवारों का काम है और अल्फ़ांज़ो खाना तुम जैसे सोफ़िस्टिकेटेड लोगों का काम है क्यों? यू डबल स्टैंडर्ड।” और खुद ही पेड़ पर लपक पड़ती। दोनों ही पेड़ कुछ इस तरह के थे कि तना दस फ़ीट एकदम सीधे, उसके बाद शाखें फटती थीं। चाहकर भी उनपर चढ़ा नहीं जा सकता था। मगर यह उसका गुस्सा नहीं होता था। वह जानती थी मेरी झिझक। दो-चार बार फ़ुदककर खुद भी वहीं बेंच पर बैठ जाती और हसरत से लटकते आमों को देखती थी। जाने क्यों उसे पेड़ों पर चढ़ने का इतना शौक था। मैं उसे चिढ़ाने के लिये कहता था कि तुम्हारे अंदर रामपुर के बब्बन हज्जाम का भूत है तभी तुम घड़ी-घड़ी पेड़ पर चढ़ने लगती हो। उसके पूर्वज रामपुर से आकर दिल्ली में बस गये थे।

मेघदूत ओपन थियटर उसे सिर्फ़ इसलिये पसंद था क्योंकि वहाँ मंच की पृष्ठभूमि में विशाल बरगद का पेड़ था। नाटक के बीच में वह फ़ुसफ़ुसाकर कहती, “काश मैं यह बरगद का पेड़ होती। अल्काज़ी से लेकर सुरेखा सीकरी की कितनी ही अनगिनत प्रस्तुतियों का साक्षी रहा है यह पेड़। इससे ज़्यादा नाट्य-कला संपन्न कोई होगा दुनियां में?” मार्च-अप्रैल की गुलाबी शामों को कभी जब हम फ़िरोज़शाह रोड़ पर रिपर्टरी का कोई नाटक शुरु होने से पहले टहल रहे होते तो कच्चे जामुन देखकर वह या तो पेड़ पर चढ़ने की ज़िद करती या पत्थर उठाकर जामुन गिराने की। बिल्कुल छोटे से बच्चे की तरह कहती, “रेहाना को जामुन खिलाओ।” मैं अकसर उसे हाथ पकड़कर खींच ले जाता था। उसे समझना कभी-कभी मुश्किल लगता था। मैं खीझकर उससे पूछता था कि तुम कैसे इतनी आसानी से गोर्की और जैनेन्द्र से जामुन और आम पर छलांग मार देती हो? उसके जवाब अक्सर बड़े हिंसक होते थे। वह कहती, “मुझे तुम्हारे सांस्कृतिक गलियारों के उन हरामखोरों की तरह गंभीरता ओढ़ना नहीं आता और क्या बुद्विजीवी जामुन नहीं खाते?” मैं खिलखिलाकर हँस देता। उसे मेरा खिलखिलाकर हँसना बड़ा अच्छा लगता था मगर ऐसे मौके कम ही आते थे। हम खुद ही एक-दूसरे को खिलखिलाकर हँसने के मौके कम ही दिया करते थे। वह कहती थी सुख जितना बड़ा होता है वह दु:ख भी उतना ही बड़ा लेकर आता है। तमाम आधुनिकता के बीच यह छोटा सा अंधविश्वास उसने अपने और मेरे लिये बचाकर रखा हुआ था।

सोचने लगा कि अगर रेहाना कटा हुआ पेड़ देखती तो क्या कहती? छोटी सी किताबों की दुकान पर ताला लटक रहा था और उसके आगे काफ़ी कुर्सियाँ समेटकर रखी हुई थीं जैसे अरसा बीता हो दुकान खुले हुए। कफ़ैटेरिया भी पूरी तरह बदल चुका था। खुले आंगन में वो बड़ी हरी छतरियाँ नहीं थीं जिनके नीचे बैठकर रेहाना और मैंने जर्मन के आ, बे, से, डे से लेकर गोएथे पर जाने कितनी बहसें की थीं। दो साल तक हर शाम हम अक्सर एक साथ होते थे, क्लास शुरु होने से पहले और उसके बाद भी। एक दिन जब क्लास में पहुँचा तो वह मेरे पास आई और बोली, “हाई। आई एम रेहाना। आप मयूर विहार में रहते हैं न?” वह भी वहीं रहती थी। उस दिन पहचान हुई और उसी दिन से हमनें घर साथ जाना शुरु कर दिया। साथ आते नहीं थे क्योंकि मैं ऑफ़िस से सीधा आता था और वह कॉलेज से। बस में भी अकसर हमारी बहसें गरमागरम होती थीं और पता नहीं कैसे हमारी आवाज़ें हमारे कद से भी ऊँची हो जाती थीं। एक दिन सीढियाँ उतरते हुए मैनें उसे समझाने के लिये एक पूर्वसर्ग का उच्चारण किया “त्सुअर”। उसने कहा कि यह गलत उच्चारण है और सही उच्चारण “सुअर” है। मैं ठठ्ठा मारकर हँसा। अपनी बात मज़ाक में उड़ी जान उसने ज़ोर देकर कहा कि वह सही कह रही है। ऐसे उठते उठते हमारी आवाज़ तेज़ हो गई और हमारा ध्यान इस ओर तब गया जब पीछे से हँसी की आवाज़ें सुनाई दीं। कुछ लोग जो एडवाँस जर्मन सीख रहे थे, हमारी बातें सुनकर हँस रहे थे। वह अक्सर मुझसे जानबूझकर उलझती थी। मेरा तर्क जानकर वह खुद दूसरी ओर हो जाती थी और लड़ने बैठ जाती।

प्रकाश जब भी हमें कफ़ैटेरिया में बैठा देखता, खुद ही मेरे लिये एक चाय और उसके लिये एक कॉफ़ी ले आता था। वह रेहाना को चिढ़ाने के लिये आंटी कहता था। रेहाना अकसर उसे छेड़ती थी, “प्रकाश दिख रहा है उत्तराखण्ड-प्रेम। अगर मैं अकेले बैठूँ तो मजाल है कि तुम कभी मेरे लिये बगैर मांगे कुछ लाओ।” प्रकाश के पास हमेशा नया जवाब होता था। मगर एक बार उसने वह कह दिया जिससे हम दोनों ही हमेशा बचते रहे थे। उसने कहा, “रेहाना आंटी अब तो आप भी उत्तराखण्डी ही हो गई हो हमारे भैया की होकर।” मैनें एकदम से उसे कुछ और लाने के लिये भेज दिया। रेहाना भी किसी को हाय करती हुई उठकर चली गई और दस मिनट बाद लौटी। ऐसे मौके जब भी आते थे, सहजता लाने का जिम्मा उसका होता था, मैं हमेशा ऐसी परिस्थितियों से बचता था। वह शायद मेरी यह आदत जानती थी। हम एक-दूसरे की सिर्फ़ संगति साथ लेकर चलते थे, उससे ज़्यादा कुछ लेकर चलने के लिये हम तैयार नहीं थे, मगर जल्दी ही हमें महसूस होने लगा कि कुछ था जो हमें धकेलता था और जिससे हम बचने की भरसक कोशिश करते थे। उसका मानना था कि अगर संबंध ढोने की हद तक खींचोगे तो वह बोझ बन जाएगा और उसके अनुसार दुनिया के हर संबंध कि गत यही होती है कि उसे ढोया जाए। इसीलिये वह आज़ाद रहना चाहती थी; रात से लेकर सुबह तक आज़ाद और सुबह से लेकर शाम तक आज़ाद। मगर जाने कैसे उसकी शामें मेरे लिये होती थीं, सर्दियों की नीली शामें, वसंत की गुलाबी शामें, बरसात की हरी शामें, और पतझड़ की पीली शामें। गर्मियों की शामें हम नहीं मिलते थे। मैक्स म्युलर भवन बंद रहता था तब। गर्मियों की सलेटी शामें हम अपने-अपने घरों में चाय पीते हुए बिताते थे।

आज भी गर्मियों की ही एक शाम थी और हमेशा की तरह हम साथ नहीं थे। कफ़ैटेरिया के काउंटर पर प्रकाश नहीं था, कोई भी पहचाना हुआ चेहरा नहीं था। शायद वेंडर ही बदल गया था। जो चाय मेरी टेबल पर खुद आ जाती थी, उसके लिये दस मिनट इंतज़ार करना पड़ा। सच, कुछ चीज़ें अपने बदलने की खबर नहीं देतीं। लाइब्रेरी में घुसा तो वहाँ भी न संदीप दिखाई दिया न आशा। जो बैठी थी उसने सोचा मैं यहाँ नया हूँ और मदद के लिए मेरे पास चली आई। मुझे अजीब सा लगा। जिस जगह से मेरा जीवन जुड़ा हुआ है मैं उसी के लिये अजनबी हो गया हूँ। फ़िर रेहाना की एक बात, जो वह अकसर मुझे कहती थी, याद आ गई। “शहरों से यादें मत जोड़ो, उनसे बाहर निकलते ही वे तुम्हे पराया कर देते हैं।” अकेले यहाँ आना परायेपन के अहसास को और हवा दे रहा था। उस लड़की को शुक्रिया कहकर कुछ सीडीज़ देखने लगा। वही सब पुराने रेकार्डस् जो हम साथ सुना करते थे। उसे खासतौर पर ब्लिक्सा बारगैल्ड को सुनना पसंद था और मैं राईनहार्ड मे का दीवाना था। ब्लिक्सा बारगैल्ड की सीडी दिखाई दी तो मैनें उसे बाहर खींच लिया। बारकोड के स्टीकर पर धूल चिपकी हुई थी। शायद हमारी ही चिपकाई हुई धूल थी। वह कहती थी कि अपने-अपने अंगूठे के छाप छोड़ देते हैं जगह-जगह। कभी अगर हम साथ न हुए तो ये छाप तो साथ होंगे। उसने कफ़ैटेरिया के बगल में झाड़ियों के नीचे से कुछ मिट्टी ली और उसपर पानी डालकर थोड़ा सा कीचड़ बना लिया और अपने अंगूठे से उस स्टीकर पर एक छाप बना दी। फ़िर मुझसे भी ऐसा ही करवाया। वह कीचड़ अब धुल चुका था और उसकी जगह नई धूल ने ले ली थी मगर मुझे लग रहा था कि उस धूल में हमारे अंश अब भी हैं, जैसे मैं अपनी और उसकी धूल को पहचान रहा हूँ।

याद आया कि रिसेप्शन पर गरिमा ज़रूर मिल जाएगी। एग्ज़िबिशन गैलेरी से होकर अंदर गया। वहां पर लगी फ़ोटो प्रदर्शनियाँ मैं हमेशा देखता था। उन तस्वीरों में मुझे जर्मन लोगों का चरित्र और उनका दृष्टिकोण अलग से झांकता नज़र आता था। मैं रेहाना से कहता था कि सौ तस्वीरें रख दोगी तो भी उसमें से किसी जर्मन की खींची तस्वीर पहचान लूंगा और फ़िर खुद ही अपने दावे पर डर जाया करता था। हालांकि रेहाना ने मुझे कभी चुनौती ही नहीं दी। पता नहीं कैसे, वह मुझे भीतर से लेकर बाहर तक अच्छी तरह पहचानती थी। इस कदर कि कई बार मैं अपने आपको उसके सामने नंगा महसूस करता था। उसका मुझे इस तरह जानना मुझे अच्छा नहीं लगता था; लगता था जैसे कुछ गोपनीय नहीं बचा है मुझमें, जैसे वह यह भी जानती हो कि मै क्या सोच रहा हूँ। कई बातें जो हम अपने आप से भी छुपाकर रखना चाहते हैं, जिन्हें अपना हिस्सा होते हुए भी सौतेला कर देते हैं, मुझे महसूस होता था मेरे उन विचारों को भी रेहाना जानती थी। वह हँस देती थी सिर्फ़। उसे मेरा डर मेरे आसपास डैने फ़ैलाए दिख जाता था। रिसेप्शन पर पहुंचा तो पता चला गरिमा छुट्टी पर थी। हमेशा की तरह किसी हिल-स्टेशन पर निकल गई होगी घुमक्कड़ी करने।

कोई भी पुराना परिचित चेहरा नहीं दिखाई दिया तो मैं टहलता हुआ बाहर आ गया। वह सिक्योरिटी गार्ड वहीं था। इस बार उसने मेरी ओर देखने की चेष्टा भी नहीं की। कागज़ पर पेन घुमाते हुए वो एक आँख बना रहा था जिसमें दरारें पड़ी हुईं थीं। मैनें गेट से बाहर निकलकर सड़क पार की और बस स्टैंड के पीछे वाले केयोस्क से एक चाय ली और एक सिगरेट सुलगाई। धुओं के छल्लों के बीच मैनें देखा कि केयोस्क में दोनों लड़के वही थे जो पहले हुआ करते थे। जिसने चाय आगे बढ़ाई वह मुझे देखकर मुस्कुरा दिया। मैनें भी होंठ थोड़े से खींच लिये और फ़िर धुंए के छल्ले बनाने लगा। पैसों के लिये जेब में हाथ डालने लगा तो अजीब सा लगा। हमेशा रेहाना ही मेरी जेब से पैसे निकालकर उस लड़के को देती थी। पहली बार जब हम वहाँ पर चाय पी रहे थे तो मेरे एक हाथ में चाय थी और दूसरे में सिगरेट। जब मैनें उसे कहा कि मेरी जेब से पाँच रुपए का सिक्का निकालकर चाय के पैसे दे दे तो उसने कुटिल सी मुस्कान अपने चेहरे पर खींचकर मुझसे पूछा, “तुम्हारी जेब फटी तो नहीं है न?” मैनें कहा, “फटी क्यों होगी?” वह बोली, “लड़कों को सुविधा होती है न फटी जेब से।” रेहाना जैसी बिंदास लड़की से टकराकर अक्सर मेरे दब्बू व्यक्तित्व पर कई खरोंचें पड़ जाती थीं।

स्टैंड के पीछे वाली सरदार सोबा सिंह की बनाई कोठी अब भी वही उजाड़ सी लग रही थी जैसे अब भी अपने होने का मातम मना रही हो। कोठी का पेंट पीला पड़ चुका था और दीवारों पर पिछली बारिश के हरियाए पानी के निशान पड़े हुए थे। एक पुरानी सी कार पोर्च में खड़ी थी जिसे देखकर लगता था जैसे आखरी बार सालों पहले चली हो। उसपर एक मटमैले रंग की दरी लटक रही थी। पास ही एक मोटरसाईकल भी कमोबेश उसी हालत में खड़ी थी। सबकुछ बड़ा बेतरतीब सा था वहाँ या शायद मुझे ही बेतरतीबी ज़्यादा महसूस हो रही थी। एक पल के लिये भी मुझे नहीं लगा कि यह वही जगह है जहाँ हमनें इतना समय साथ हँसते हुए बिताया था। हँसी के अतीत पर थकान और निर्ममता चढ़ गई थी। चाय खत्म हुई तो मैं टहलता हुआ अग्रसेन की बावड़ी की ओर निकल पड़ा। रेहाना को यहाँ आना बड़ा अच्छा लगता था। बावड़ी में ही एक कुँआ था जिसमें अब भी पानी था। चौकीदार कहता था कि यह कुँआ हर साल बलि मांगता है और पिछले दस सालों में उसने खुद ही यहाँ दस आत्महत्याएँ देखी हैं। रेहाना को रोमांच हो आता था ऐसी बातें सुनकर। कुँआ सच में बहुत गहरा था और उसकी कोई चहारदीवारी भी नहीं की गई थी। उस तक जाने के लिये एक चबूतरे पर चढ़ना होता था जहाँ से कनाट प्लेस की ऊँची इमारतें साफ़ दिखतीं थीं। उसे वहाँ खड़ा होना इसलिये भी अच्छा लगता था क्योंकि उसके अनुसार वह चबूतरा उसके भविष्य की दो संभावनाओं को एक साथ एक ही फ़्रेम में दिखाता था। “और क्या हैं वे भविष्य की दो संभावनाएँ?” एक बार जब मैनें पूछा तो उसने कहा कि या तो वह इन मीनारों की तरह ऊंची उठ जायेगी या इस कुँए की तरह ज़मीन में धंस जाएगी। बीच की कोई संभावना उसने अपने लिये कभी जानी ही नहीं।

माल्टा दूतावास से बाएँ मुड़कर जब बावड़ी के खंडहर पर पहुँचा तो चौकीदार नदारद था। टहलता हुआ बावड़ी की सीढियों पर जा बैठा। घुट सन्नाटा और ठहरा हुआ हरा पानी। कहीं दूर से धीमी-धीमी आती गाड़ियों की आवाज़ें। एकबारगी भ्रम होता कि हम शायद किसी जंगल के बीच बैठे हुए हैं। लगा फ़िर से उन्ही दिनों में पहुँच गया हूँ जब हम अकसर वहाँ जाया करते थे। रेहाना को यहाँ बैठकर बातें करना बहुत अच्छा लगता था। हम अकसर मेरे वाकमैन पर कुछ न कुछ सुनते थे वहाँ बैठकर। ईयरफ़ोन का एक सिरा वह अपने कान में डाल लेती थी और दूसरा मेरे कान में। हम यूँही एक-दूसरे के सिर से सिर टिकाए गाने सुनते वहाँ पर कई बार घंटों बिता देते थे। उसे बावड़ी की सीढियों पर बैठकर फ़रीदा खानम की ग़ज़लें सुनना पसंद था। वह कहती थी कि फ़रीदा खानम को सुनते हुए इन सीढियों पर चलो तो स्वर्ग के दरवाज़े तक पहुँच जाओगे। “स्वर्ग का रास्ता बावड़ी के हरे, सड़े पानी से होकर जाता है मुझे नहीं पता था।” मैं मज़ाक करता था। वह झूठमूठ रूठते हुए कहती, “देख लेना स्वर्ग तो तुम्हे यहीं मिलेगा।” एक ग़ज़ल वह अकसर बार-बार सुनने की ज़िद करती थी:
दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया


कई बार सुना मगर स्वर्ग के दरवाज़े नहीं खुले। वह कहती थी, “जब तुम अपनी फ़िल्म में मेरा कैरेक्टर डालोगे तो ये ग़ज़ल बतौर मेरी सिग्नेचर ट्यून बैकग्राऊंड में बजाना।”
मै पूछता, “तुम देखोगी फ़िल्म?”
“तुम बनाओगे तो ज़रूर देखूँगी।” उसका जवाब होता।
“मैं तुम्हें कैसे बताऊँगा कि मैनें फ़िल्म बना ली है और कहाँ ढूढूँगा तुम्हें? रामपुर तो तुम जाओगी नहीं वापस।” मैं पूछता था। इसका कोई जवाब न उसके पास होता न मेरे पास। दरअसल जवाब तो हमारी जेबों में थे मगर हमारे हाथ इतने अकड़े हुए थे कि हम जेब से उन्हें बाहर ही नहीं निकालना चाहते थे। रामपुर वापस जाने की बात पर वह खिलखिलाकर हँस देती और मुद्दा उसी हँसी में ख़ाक हो जाता। हम साथ-साथ ऐसे जीते थे जैसे अलग होना लाज़िमी हो और इस बात का कोई अफ़सोस न उसे हो न मुझे। अफ़सोस तो हमारी रूहों में जम चुका था मगर हम इस बात को हाशिये पर रखते हुए दिन बिताते थे। हमारी ज़िद और इच्छा थी किसी भी तरह के संबंध से स्वतंत्र रहने की। हमनें इस बारे में खुलकर कभी बात नहीं की। अगर कभी इस तरह की कोई बात निकलती भी थी तो हम बातें पलटकर सुविधाओं के गलियारों से निकलना बेहतर समझते थे और हमेशा एक-दूसरे के लिये अपनी ज़रूरत स्वीकारने से बचते थे। जाने क्यों एक भारीपन हमेशा हमारे साथ रहता था, तब भी जब हम एक साथ हमारी दुनियाँ मे होते थे और तब भी जब अलग-अलग अपनी दुनियाओं में होते।

एक बार हम मानवीय संबंधों पर बात कर रहे थे। यूँ तो हम दोनो का मानना एक ही था मगर उसकी सोच ज़्यादा मुखर थी। उसने मेरी ओर एक सवाल उछाला था, “संबंधों की मिथ्याप्रतीति में अपेक्षा और उपेक्षा के बीच आदमी कितने संबंध साध पाता है? हर संबंध में या तो अपेक्षा आ जाती है या उपेक्षा।”
मैं अवाक रह गया था उसकी यह परिभाषा सुनकर। मैनें कहा, “रेहाना तुम शब्दों की जादूगरनी हो।”
“मैं रूप की भी जादूगरनी हूँ।” उसने पलकें जल्दी-जल्दी झपकाते हुए कहा और हम देर तक खिलखिलाते हुए हँसते रहे। वही खिलखिलाना जिससे अकसर हम बचते थे। इस हँसी के बीच हमारी परिभाषाएँ अपनी जड़े मजबूत कर रही थीं और हम अपनी दिशाएँ; यह जानते हुए भी कि इसका अर्थ क्या होगा। खाईयाँ हमारी ही खोदी हुई थीं मगर जैसे उन्हें पाटना हमारा काम न था, हम इस ओर से मुँह फेरे खड़े रहे।
उठकर कुछ सीढ़ियाँ और उतरने लगा। वाकमैन तो था नहीं, मोबाइल निकाला और एक इअरफ़ोन कान में लगाकर फ़रीदा ख़ानम की वही ग़ज़ल सुनने लगा। रेहाना की ओर वाला इयरफ़ोन हवा में ही झूल रहा था। शब्द बेड़ियों से छूटकर भागने लगे:
पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गई वो सोहबतें
ज़मीं निगल गई उन्हें या आसमान खा गया


“एवरी रिलेशनशिप कम्स विद एन एक्स्पायरी डेट।” यह उसका मूलमंत्र था। मैनें उसे छेड़ते हुए एक बार पूछा था, “क्यों? कितने संबंधों में पड़ चुकी हो अबतक?” उसने जिन जलती नज़रों से मुझे देखा था मैं दोबारा नहीं भूला उन्हें।
“मैं आजतक किसी रिलेशनशिप में नहीं पड़ी और न पड़ूँगी कभी। मानवीय व्यवस्था ऐसी है कि संबंध बनने के बाद एकदम ढोने की स्थिति में आ जाते हैं।” उसने कहा था। हालाँकि इस दावे का खोखलापन हर शाम को साबित होता था जब हम साथ होते। साथ न होने पर भी मैं उसकी रूह की तपन रात को करवटें बदलते हुए महसूस करता था और मेरे नाम से उसकी भी नसें फड़कनें लगती थीं। उसने मेरी आवाज़ एक कैसेट में रिकार्ड करके अपने पास रख ली थी और अकसर उसे सुनती थी। हम मरते थे एक-दूसरे के साथ के लिये मगर सच्चाई से इस तरह मुँह चुराते थे कि अगर कभी सच्चाई सामने आ जाए तो बावड़ी के कुँए में कूदकर आत्महत्या कर लेंगे।

“तुम्हारी थ्योरी क्या है स्त्री-पुरुष को लेकर?” उसने यह सवाल हमारी मुलाक़ात के एक हफ़्ते बाद ही पूछा था। ये वे दिन थे जब हम पर एक-दूसरे का व्यक्तित्व हावी होने लगा था। हमारी सोच इतनी ज़्यादा मिलती थी कि जान-पह्चान होने के कुछ दिनों बाद ही हम एक-दूसरे का सिर्फ़ वो कोना टटोलने लगे थे जहाँ हमें कोई ऐसा विषय मिले जिसपर हमारा मतभेद हो। वह शनिवार का दिन था और हम श्रीराम सेंटर में एक नाटक देखने के लिये आए हुए थे और वहीं कैफ़े में बैठकर कुछ खा रहे थे।
“स्त्री-पुरुष संबंध का जो आधार समाज ने बनाया है उससे मुझे बहुत ज़्यादा आपत्ति नहीं है। मैरिज इंस्टिट्यूशन में एक ही कमी है कि वहाँ स्त्री-पुरुष हर समय साथ रहते हैं। इससे संबंध मोनोटोनस होने लगता है और अकसर जो उल्लास शुरुआती दिनों में होता है वह मर जाता है। इसलिये मैं मानता हूँ कि विवाह या लिव इन की जगह लिव आउट जैसा कुछ होना चाहिये।” मैं उसकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगा। उसने कहा, “मैं सुन रही हूँ। कहते रहो।” और हौले से मुस्कुरा दी।
“मैं जानता हूँ कि मैं किसी भी संबंध को ज़्यादा दिन नहीं घसीट सकता और यह भी जानता हूँ कि मजबूरी की इस व्यवस्था में लोग शादी करके एक ही व्यक्ति के साथ पड़े रह जाते हैं। पुरुष क्योंकि ज़्यादा आज़ाद है, इसलिए वह ऊब से बचने के लिये कुछ हद तक विवाहोत्तर संबंध बना लेता है। स्त्रियों के लिये तो वह विकल्प भी नहीं है। उन्हें घुटना पड़ता है। पश्चिम में जहाँ व्यक्तिगत आज़ादी ज़्यादा है, वहाँ मैरिज इंस्टिट्यूशन टूट रहा है। नीदरलैंड में तो शादी करना हेय समझा जाता है।”
उसने मुझे लगभग टोकते हुए कहा, “तो तुम मानते हो कि पश्चिमी व्यवस्था आदर्श है?”
“नहीं। वे संबंध को मात्र शारीरिक उत्सर्जन का माध्यम मानते हैं और विलगाव के बावजूद भी संबंध बना लेते हैं। वहाँ तो कई बार संबंध सिर्फ़ इसलिये टूट जाते हैं क्योंकि पार्टनर को लाल रंग का सोफ़ा पसंद है या वह गोल्फ़ को बोरिंग मानता है। यह पराकाष्ठा है। आदर्श की बात नहीं करता मगर बेहतर स्थिति लाई जा सकती है। विवाह किया है या नहीं यह बात मायने नहीं रखती, संबंध को एकरस होने से बचाना ज़रूरी है और उसके लिये ज़रूरी है व्यक्तिगत स्वतंत्रता जोकि अकसर वित्तीय स्वतंत्रता होने के बाद भी कई बार नहीं आती। जबतक दो जन साथ रह रहे हैं तबतक किसी न किसी चोर-दरवाज़े से समझौता नाम की चीज़ घुस ही जाती है। यही अकसर संबंधों के टूटने का कारण भी बनता है। अंडरस्टैंडिंग और समझौता किस हद तक किया जाए यह तय नहीं किया जा सकता और फ़िर अपेक्षाएं पनपने लगती हैं। मैं इन अपेक्षाओं से बचना चाहता हूँ मगर संबंध को तोड़कर नहीं, उसे बनाए रखकर। जितने की इच्छा होगी उतना मैं अपने साथी के लिये करूँगा, मगर नहीं चाहूँगा कि उसे मुझसे कोई अपेक्षा हो और ऐसा होने की संभावना तभी ज़्यादा बनेगी जब हम साथ न रहकर समानांतर रहें।” एक लंबी सांस लेकर मैं चुप हो गया।
“एकरसता और उससे बचने की बात करने का मतलब है कि संबंध को कैसे बेह्तर घसीटा जाए। उसके लिये तो डोपामाईन की डोज़ ले लो।” उसने कहा।
“एन्ड्रोजन, एस्ट्रोजन, डोपामाईन और नोरापिनेफ़्रिन, सभी की ही डोज़ ली जा सकती हैं मगर उन्हें विकसित होने में तो अभी समय लगेगा और फ़िर औक्सीटोनिक और वैसोप्रेसिन बाधा नहीं डालेंगे क्या आपके पैशन में? रसायनिक प्रक्रिया की बात करना बेमानी है। प्रेम इंजेक्शन के बल पर नहीं किया जा सकता। मै सिर्फ़ यह कह रहा हूँ कि संबंधों में नए अर्थ कैसे भरे जाएँ, उन्हें कैसे नए मानी दिये जाएँ।” मैनें कहा।
वह लगभग चीख पड़ी, “बस इसीलिये मुझे यह सब खटकता है। संबंधों में नए मानी भरना, नए अर्थ देना; माई फ़ुट। मानी उस चीज़ में भरे जाते हैं जो बेमानी होती है। मुझे तुम्हारी इस थ्योरी से भी ज़्यादा उम्मीद नहीं है। सपाट शब्दों में कहूँ तो मानवीय समाज नीलगायों के एक झुँड से ज़्यादा कुछ नहीं है। वह चाहता है कि उसके आसपास उसके जैसे ही जीव रहें। इससे सुरक्षा की भावना बनी रहती है मगर इससे ज़्यादा कोई ज़िम्मेदारी वह कुदरती तौर पर नहीं लेना चाहता। बाघ आक्रमण कर दे तो वह सिर्फ़ अपनी जान बचाकर भागता है, घास दिख जाए तो खुद खाना चाहता है और क्रमबद्व सामाजिक विकास ने तो ऐसी-ऐसी संस्थाएं खड़ी कर दी हैं कि मनुष्य जितना लाचार पहले था, उससे कहीं ज़्यादा लाचार हो गया है। संबंध उससे निभते नहीं मगर तोड़ने का माद्दा भी उसमें नहीं है। फ़िर सामनें आती हैं संबंधों की विकृतियाँ। इससे बेह्तर है कि अपनी स्वतंत्रता बनाए रखो और एकला चलो रे।” वह सांस लेने के लिये रुकी। “मैनें किसी अविवाहित व्यक्ति को न किसी का बलात्कार करते देखा है न ही किसी विवाहित से संबंध बनाते। ज़्यादातर अविवाहित लोग सोच-समझकर अविवाहित रहते हैं और ज़्यादातर विवाहित लोग सब-कांशियसली विवाह का निर्णय लेते हैं। वे सिर्फ़ लकीर पीटते हैं।” वह कहती गई और मैं इस रिबैलियस के हिलते हाथों की लय पर थिरकते बड़े-बड़े गोल झुमकों को ध्यान से देख रहा था। मैं अविवाहितों के उसके तर्कों को आँकड़ों और तथ्यों से ग़लत सिद्व कर सकता था मगर जानता था कि मेरी ही तरह उसपर कोई विचार थोपना संभव नहीं है। तर्क अलग-अलग थे मगर विचार एक ही से थे यह जानकर हमको प्रसन्नता हुई। यह समझने में काफ़ी वक़्त निकल गया कि यह प्रसन्नता हमपर कितनी भारी पड़ने वाली है मगर उन दिनों तो हम दोनों एक दूसरे को बौद्विक स्तर पर अन्वेषित करने का सुख भोग रहे थे।

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ़ गई, ये मैं कहाँ समा गया

फ़रीदा खानम अब भी गा रही थी इस ओर तब ध्यान गया जब अचानक चौकीदार की आवाज़ सुनाई दी। वह पहचान गया था। “कहाँ थे सा’ब? कितने सालों बाद आए हो?” उसने पूछा।
“बस भई अब यहाँ आना हो नहीं पाता। जर्मनी चला गया था। एक महीना पहले ही लौटा हूँ।” मैनें कहा।
“जर्मनी? ये कहाँ है?” उसने पूरी मासूमियत से पूछा।
मुझे हँसी आ गई। मैनें उसे बताया, “गोरों के देश भई।”
“अच्छा-अच्छा। मैडम कहाँ हैं? उनको साथ नहीं लाए? अच्छा बच्चों के साथ होंगीं शायद घर पर।”
“नहीं। अकेला ही आया हूँ।” मेरा जवाब देने का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था और उसके सवाल थे कि खत्म ही नहीं हो रहे थे।
“मैडम को भी ले गए न गोरों के देश या अकेले ही गए थे?” उसने पूछा।
मुझे उत्तर देने से पहले ही अगले प्रश्न से डर लगने लगा। मैनें बताया, “मैडम अमेरिका चली गई थी।” उसने अमेरिका का नाम सुना हुआ था।
“अमरीका? सा’ब कुछ समझ नहीं आया। आप गोरों के देश और मैडम अमरीका?” उसकी सारी हैरानी उसके चेहरे से टपक रही थी। वह चुप नहीं हुआ। अपनी ही रौ में कहता रहा, “हाँ सा’ब आप लोग थे भी अलग से। आपका तो तरीका ही समझ में नहीं आता था मुझे। यहाँ तो जो भी आता है एक कोने में जाकर चूमा-चाटी करता है और एक आप लोग थे जो बावड़ी में बैठकर बस गाने सुनते रह्ते थे या पता नहीं क्या-क्या बात करते रहते थे।”
मैं हँस दिया। मैनें उससे कहा, “कुँआ नहीं दिखाओगे आज?”
वह उत्साहित हो गया, “आओ ना सा’ब क्यों नहीं दिखाऊँगा, ज़रूर दिखाऊँगा।” हम बातें करते-करते चबूतरे पर चढ़ने लगे। कुँए का पानी अब भी हरा था। न उसकी गहराई बदली थी, न दूर खड़ी मीनारों की ऊँचाई। रेहाना के प्रतिमान अब भी वैसे ही खड़े थे और वह ऊँचाइयाँ छूने की कोशिश में तीन साल पहले अमेरिका चली गई थी। वहाँ की एक युनिवर्सिटी ने उसे “मैक्स-म्युलर एंड हिज़ इन्टरप्रिटेशन ऑफ़ वेदाज़” विषय पर पी एच डी करने के लिये आमंत्रित किया था। और भी प्रतियोगी थे इस स्कालरशिप के लिये मगर चयनकर्ता समिति को रेहाना उसके दो बेबाक़ जवाबों की वजह से पसंद आ गई। उन्होनें पूछा कि वह मुस्लिम होकर हिंदुओं के धर्मग्रंथों पर शोध करने को क्यों उत्सुक है? क्या वह इसे महज़ अमेरिका के लिये एक टिकट के तौर पर ले रही है? रेहाना ने कहा, “वेद रचने की शुरुआत जब हुई थी तब धर्म अपने घुटनों पर चलते थे। ऋग्वेद लिखे जाने के बाद हिंदु धर्म को अपने आज के रूप में विकसित होने में सैकड़ों साल लगे। यही बात कमोबेश सारे धर्मों और धर्मग्रंथों पर लागू होती है, इसलिये वेदों को मात्र धर्मग्रंथ मानकर उनका अध्ययन करना बहुत बड़ी भूल होगी। वैसे भी शोध में धर्म का चश्मा पहनना ग़लत होगा, इसलिये इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि शोधार्थी का धर्म क्या है। मैंने धर्मग्रंथों को उस युग के परिपेक्ष्य में देखकर ही पढ़ा है जिस युग में वे रचे गये थे और उसी अनुसार उनकी व्याख्या भी की है।” दूसरा सवाल भी उसके धर्म को लेकर ही था। एक चयनकर्ता ने उससे पूछा कि इस बात की क्या गारंटी है कि रेहाना मुस्लिम होने के नाते वेदों के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रस्त नहीं है। उसने कहा कि इसका जवाब वह पहले ही सवाल में दे चुकी है मगर फ़िर भी यदि उसका मुस्लिम होना उन्हें खटक रहा है तो वह भी एक सवाल पूछना चाहती है कि इस बात की क्या गारंटी है कि अमेरिका के एक ईसाई देश होने के नाते यूनिवर्सिटी उससे वेदों की ईसाई धर्म के पूर्वाग्रहों के आधार पर व्याख्या करने को नहीं कहेगी? उसने यह भी साफ़ कर दिया था कि आवश्यकता पड़ने पर वह मैक्स म्युलर को कटघरे में खड़ा करने से भी नहीं चूकेगी। मैं उससे अकसर कहता था कि तुम्हारी बेबाक़ी मुझे लूट लेती है। वह मुस्कुराते हुए हमेशा एक ही जवाब देती थी, “लुटवाते-लुटवाते खत्म हो जाओगे और फ़िर पूछोगे मुझसे कि रेहाना मैं कहाँ ग़ायब हो गया?”

ये सुबह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
मैं आईने में ढूंढता हूँ मैं कहाँ चला गया

“सा’ब ये क्या गा रहे हो?” चौकीदार ने मुझे टोका। मैनें उससे पूछा, “फ़रीदा ख़ानम का नाम सुना है कभी?” उसने ना में सिर हिलाया।
“याद है सा’ब आप एकबार कुँए में गिरते-गिरते बचे थे और मैडम ने आपका हाथ पकड़ लिया था?” उसने याद दिलाया। हम एक बार वहीं चबूतरे पर खड़े हुए बहस कर रहे थे कि भारत में अब अच्छे ग़ज़ल गायक क्यों नहीं होते। मैं यह साबित करने की कोशिश कर रहा था कि गायक तो हैं मगर भारत में ग़ज़ल के साथ प्रयोग करने का मतलब है कि आप नहीं बिकेंगे। आज का दौर सिर्फ़ जगजीत और पंकज उदहास जैसे ग़ज़ल गायकों के लिये है, जो आसान सी ग़ज़लें भारी संगीत के साथ ठेलते रहते हैं। सूडो-इन्टेलेक्चुअल्स के लिये ये ग़ज़ले रेफ़ेरेन्स के काम आ जाती हैं। वे आराम से वाइन के ग्लास खनकाते हुए बग़ैर उर्दु समझे घंटों ग़ज़लों पर पूरी गंभीरता से बहस करने की सुविधा पा जाते हैं और शौक से डींगें हाँकते हैं अपने कला-सम्पन्न होने की। आज के दौर में तो बेग़म अख़्तर भी फ़ेल हो जातीं। मैं गाकर रफ़ी की गाई एक ग़ज़ल उसे सुनाने लगा और गाते-गाते पीछे की ओर चलने लगा। इस प्रक्रिया में मैं बिलकुल भूल गया कि पीछे कुँआ भी है। मेरा एक पैर बिल्कुल कुँए के मुहाने पर था जब उसने कूदकर मुझे खींच लिया और कसकर मुझसे चिपक गई। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। वह बग़ैर कुछ कहे कुछ देर यूँही मुझसे चिपकी रही। मैं अपने पेट और छाती के बीच उसकी तेज़ धड़कने महसूस कर रहा था। उसका बदन ऐसे कांप रहा था जैसे अभी छटपटाकर गिर पड़ेगी और दिल इतना तेज़ धड़क रहा था कि बस फट पड़ेगा। घबरा तो मैं भी गया था मगर उससे भी बड़ा डर मेरे अंदर पैठ गया। मुझे लगा कि कहीं वह क्षणिक आवेग में कुछ ऐसा न कह दे कि हम दोनों ही एक-दूसरे से नज़र न मिला पाएँ। ऐसे मौके कम ही आते थे मगर जितने भी आए, हमारी खुद की गढी हुई परिभाषाएँ हमारे बीच आ जाती थीं और अपने साथ एक असहजता ले आती थीं। खैर, ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैनें उसे चबूतरे की सीढियों पर बैठाया और उसके पर्स से बोतल निकालकर पानी पिलाया। अगले दो दिनों तक वह गुमसुम सी रही और मुझसे बात करने में हिचकती रही। मैं जानता था कि वह सच्चाई से मुँह छिपा रही थी पर मैं ही कौनसा ईमानदारी बरत रहा था। ऐसे तमाम मौकों पर हम एक-दूसरे से मुँह चुराने लगते थे।

अपने संबंध की जो सीमा हमनें तय की थी वह हम दोनों के बीच ही इतनी निजी थी कि हमनें कभी एक-दूसरे तक से उसपर खुलकर बात नहीं की और न ही कभी मौखिक तौर पर यह जानने या तय करने की कोशिश की कि हमारा संबंध किस ओर जा रहा और इसकी नियति क्या होगी। मुझे लगता है अगर मैं जर्मनी और वह अमेरिका न जाती तो आज इतने सालों बाद भी हम एक-दूसरे से यूँही मिलते और वैसे ही बावड़ी की सीढियों पर बैठकर फ़रीदा ख़ानम को सुन रहे होते। इस संबंध में किसी बदलाव की पहल न वह करती और न मैं, मगर शायद भीतर ही भीतर हम दोनों चाहते थे कि पहल दूसरा करे। यदि कोई पहल कर भी देता तो भी यह मुश्किल ही था कि दूसरा अपनी उन परिभाषाओं को ताक पर रखकर तैयार हो जाता, जिनकी हम इतनी डींगें हाँकते थे। लोग यही समझते थे कि हम जल्दी ही शादी कर लेंगे। जब उसके अमेरिका जाने की खबर आई तो कई दिनों तक दोस्त मुझे कुरेदते रहे और समझने की कोशिश करते रहे कि हमारा संबंध किस दिशा में जा रहा है और अगर टूट रहा है तो क्यों? हम दोनों के एक-दूसरे के प्रति व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया था; आने का कोई कारण भी नहीं था और यही बात दोस्तों को परेशान करती थी। हमारे पास जो जवाब थे उनकी व्याख्या इतनी लंबी थी कि किसी को भी समझाने में एक जीवन बीत जाता।
गरिमा शायद हमारे संबंध की जटिलता समझती थी और कई बार उसने मुझसे कहा था, “ये क्या पागलपन है? तुम दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है।”
मैं कहता, “ज़रूरत है इसीलिये तो साथ हैं। और क्या उम्मीद कर रही हो तुम? ”
“शादी या कम से कम साथ ज़िंदगी बिताना।”, उसने कहा।
मैनें कहा, “उसकी नौबत ही नहीं आएगी। हम जल्दी ही एक-दूसरे से ऊब जाएँगे।” अगले छ: सालों तक हम एक-दूसरे से नहीं ऊबे। उसके अमेरिका से गाहे-बगाहे ख़त आते रहते थे और मैं भी उसे लिखता था मगर वहाँ भी हम अपनी बात करने से बचते थे और देखे गए शहरों का वर्णन करते थे या रोज़मर्रा की ज़िंदगी का ज़िक्र। हमारे अंदर इतनी दरिद्रता भर गई थी कि बाँटने के लिये कुछ और नहीं था और जो था उसे हमनें सिर्फ़ अपने-अपने लिये सहेजकर रख लिया था। जो हमें एक-दूसरे से बाँटना चाहिए था वही हमारे बीच दीवार बनकर खड़ा था।
गरिमा का समझाना जारी रहा, “अगर ऐसा ही है तो साथ ही क्यों होते हो तुम? जिस संबंध की कोई नियति ही तुम्हारे पास नहीं है उसे रोक दो, आगे ही मत बढ़ने दो।”
“तुम हर संबंध को ढर्रे में ढालने पर तुली रहती हो, यहीं गलती करती हो। क्या हम ऐसे ठीक नहीं हैं? क्या इससे ज़्यादा की अपेक्षा करनी चाहिये? हर संबंध के लिए नीड़ नहीं बसाया जाता। कुछ को फ़्रेम में जड़कर रख देना चाहिये, ताज़गी बनी रहती है।” मैनें कहा।
उसने पूछा, “अगर तुम लोग अपने संबंध और एक-दूसरे को इतनी सहजता से ही लेते हो तो फ़िर साथ रहने की बात पर कई बार तुम लोग इतने असहज क्यों हो जाते हो?”
वह हमारे बीच के उन असहज क्षणों को जाने कैसे पकड़ लेती थी जिन्हें हम हमेशा छोड़ देना चाहते थे। उसकी इस बात का कोई जवाब मेरे पास नहीं था, रेहाना इसके जवाब में शायद ज़रूर कुछ कहती मगर गरिमा मेरी दोस्त थी रेहाना की नहीं। गरिमा ने रेहाना से कभी इस बारे में बात नहीं की; शायद उसे भी अपने अधिकार-क्षेत्र की परिधि पता थी और उसने उसके बाहर जाकर कुछ कहने की चेष्टा कभी नहीं की। करती भी, तो भी कुछ नहीं हो सकता था। किसी और का इस बारे में मुझसे या रेहाना से बात करना पेचीदगी को सिर्फ़ बढ़ा ही सकता था।

चौकीदार कुछ देर में आने का कहकर चला गया। मैं वहीं बावड़ी की सीढ़ियों पर बैठ गया। फ़रीदा आपा अब भी गा रही थीं:
गये दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
उठो अमलकशों उठो कि आफ़ताब सर पे आ गया

बावड़ी के हरे पानी को देखता रहा। यह भी जाने कितने सालों से ऐसे ही पड़ा है, बगैर किसी बहाव के, इसलिये सड़ांध मारने लगा है और रंग भी हरा पड़ गया है। हमारे संबंध पर भी हमारी तमाम बौद्विक परिभाषाओं के बावजूद काई जम गई थी, तब भी जब हम इतने सालों से दूर् थे। हालांकि हम दोनों ही कोई ठहराव नहीं आने देते थे और किसी न किसी बहाने एक-दूसरे को खंगालते रहते थे, इसीलिये शायद हम अब भी एक-दूसरे की ज़रूरत तो थे मगर तो भी हमारे संबंध का कोई निश्चित आकार नहीं था और कोई निश्चित संबंध बने बिना भी हम दोनों की परिभाषाओं को ठेंगा दिखाती हमारे संबंध की असफलता हमारे सामने खड़ी थी। हमनें क्या दिया एक-दूसरे को सिवाय परिभाषाओं के? ये कुछ सवाल अकसर मेरे सामने सिर बाये खड़े रहते थे। रेहाना को भी यही सवाल ज़रूर परेशान करते थे। जर्मनी में जब भी उसके पत्र आते, उसके वाक्य तार से खिंचे-खिंचे लगते, जैसे कुछ और ही था जो वह कहना चाह रही थी या और भी कुछ कहना चाह रही थी। मैं उनमें सिर्फ़ एक पंक्ति पढ़ना चाह्ता था, जो उसने कभी नहीं लिखी। पूरे पत्र को बार-बार पढ़कर मैं अपने मतलब का अर्थ उसमें से निकालना चाहता था। हर बार पत्र को टटोलता कि कोई तो ऐसा शब्द मिले जिससे कुछ उम्मीद बने। न ऐसा होना था न हुआ। समय बीतता रहा और हम संपर्क में बने रहे। एक बार उसने लिखा था कि हम स्वंय से झूठ बोलते हैं और बहुत उत्कंठा से आशा करते हैं कि दूसरे हमपर विश्वास कर लें जबकि दूसरे हमारी बेवकूफ़ी पर मुस्कुरा रहे होते हैं। मनुष्य इतना कपटी है कि अपने आप को भी ज़िंदगी भर छलावे में रख सकता है। जाने क्यों उन दिनों नीत्शे की एक पंक्ति उसे बेहद पसंद थी, “वी हैव द आर्ट टु सेव आवरसेल्व्स फ़्राम द ट्रुथ।” मुझे उसके पत्रों में एक अजीब सी बेचैनी दिखाई देती थी। प्रत्यक्षत: उसने कभी कुछ नहीं लिखा मगर जिस स्तर पर हम एक-दूसरे को समझते थे, वहाँ कई बातें अनकही रहकर भी प्रेषित हो जाती थीं।

हालांकि अमेरिका जाने के शुरुआती दिनों में वह बहुत उत्साहित थी। अपने पत्रों में वह सिर्फ़ अपनी बात करती थी। उसके पहले तीन पत्र कम से कम पन्द्रह पन्नों के थे। उसने लिखा था, “मेरे पास एक अस्तित्वपरक नक्शा है, जिसपर सब जगह लिखा है, ‘आप यहाँ पर हैं’। मुझे लगता ही नहीं कि जीवन मेरे अस्तित्व के परे भी कुछ हो सकता है। लगता है जैसे मैंने वह अवस्था पा ली है जहाँ महसूस होता है कि मैं जीवन से नहीं हूँ, जीवन मुझसे है। फ़िलहाल यह मेरी उपलब्द्वि है।” वह जीवन से इतनी लबालब लगती थी कि अगर अपने नोट्स के बारे में भी बात करती थी तो उसमें भी उसका रोमांच टपकता था। वह अपने काम और नए जीवन को लेकर बहुत खुश थी। छ: महीने के अंदर ही उसने अनपेक्षित रूप से अपना पहला पेपर प्रकाशित करवा दिया था जिसपर एक प्रशंसा-पत्र भारतीय संस्कृति मंत्रालय से उसे भेजा गया था। मैक्स-म्युलर विरोधी और उनके समर्थक, दोनो ही खेमों में इस पेपर की चर्चा हुई थी। मैनें बधाई देने के लिये उसे फ़ोन किया था। वह खुशी से चहक रही थी। मुझे बड़ा अच्छा लगा। मैनें पूछा, “क्या बात है? तुम्हारी आवाज़ से ज़रूरत से ज़्यादा ही खुशी टपक रही है?”
उसके अतिउत्साही स्वर का स्तर बना रहा, “पता है ऑस्कर अब्बा कहते थे, ‘टु लव वनसैल्फ़ इज़ द बिगेनिंग ऑफ़ अ लाइफ़लौंग रोमांस।’ तो बस जान लो कि जितना प्यार मैं अपने-आप को पहले करती थी, उससे कहीं ज़्यादा अब करती हूँ। मुझे लगता है मैनें अमेरिका आकर बिल्कुल सही निर्णय लिया।”
मैनें इस टिप्पणी की वही व्याख्या की जो उसने प्रेषित की थी। वह सच में अपने निर्णय से खुश थी। वह लीक पीटने वालों में से नहीं थी। संभावनाओं के जंगल में घुसकर हमेशा अपने लिये पगडंडी बनाना उसकी आदत थी। अमेरिका जाने का निर्णय भी इन्ही में से एक था, जिसे उसका संपन्न परिवार उसके फ़ितूर से ज़्याद कुछ मानने के लिये लंबे अरसे तक राज़ी नहीं हुआ। मगर नतीजे उसके परिवार के सामने आने लगे।

डेढ़ साल बाद ही उसे मैक्स म्युलर पर सेमिनारों की एक ॠंखला के लिये जर्मनी और इंग्लैंड आमंत्रित किया गया। मैं उससे मिलने म्युनिख गया था और उसका पेपर भी सुना। अलग से प्रभावित होने की ज़रूरत नहीं थी। मैं उससे शुरु से ही प्रभावित था। मगर इस बार वह मुझे कुछ उदास सी लगी। उन दिनों भी नीत्शे उसकी ज़बान पर था मगर कुछ नकारात्मक स्वर में। “वेनएवर आई क्लाईम्ब आई एम फ़ॉलोव्ड बाय अ डॉग कॉल्ड ईगो।” उसने मुझे कहा, “मुझमें कुछ गलत पनप रहा है; शायद अहम। मुझे इससे बचना होगा।” उसका स्वर सुनकर तो लगा जैसे वह कह तो रही हो, “मुझे बचना होगा” मगर उसका अर्थ हो, “मुझे बचा लो।” पर कैसा अहम, मैं समझ नहीं पाया। मुझे उसके व्यवहार में कोई भी परिवर्तन नज़र नहीं आया और अहम किस बात का? अभी भी वह सफ़लता से मीलों दूर थी यह वह भी जानती थी। मुझे लगा था कि वह अपने को लेकर दुविधा में है। संभवत: यह दुविधा हम दोनों को लेकर थी, मगर उसने इस ओर कुछ इशारा नहीं किया। मैं भी इस कोने को छेड़ने से बचता रहा। अगले हफ़्ते वह इंग्लैंड के लिये रवाना हो गई और मैं हनोवर वापस आ गया। वापस जाकर उसने पत्र में लिखा था, “मैं बुरी तरह से उलझन में हूँ। क्या मुझे यही सब चाहिये था? जबतक व्यस्त रहती हूँ इस सब की ओर ध्यान नहीं जाता मगर बिस्तर पर पसरते ही सबकुछ टूटा-टूटा लगता है। लगता है जैसे सबकुछ बिखर रहा है और अगली सुबह मैं इस बिखरे हुए को समेटने की जुगत में लग जाती हूँ। पता नहीं यह बिखराव क्या है। मेरा अपने आप से ही संघर्ष बढ़ने लगा है। यह दुविधा कहां से पैदा हो गई? तुम शायद विश्वास नहीं करोगे, कई बार मुझे ज़ोरों से इच्छा होती है बच्चे खिलाने की। यह क्या हो रहा है? मैं ऐसी कभी नहीं रही। क्या उम्र अपनी मांग मुझपर हावी कर रही है? मुझे लगता है ट्वेंटी फ़ाईव इज़ द राईट एज टु टेक रौंग डिसीज़न्स। पहली बार मुझे लग रहा है कि मैनें शायद अमेरिका आकर सही निर्णय नहीं लिया, मगर मुझे यह भी नहीं पता कि सही निर्णय क्या होता।” यह संकेत था, चुनौती थी, याचना थी या मात्र उलझन ही थी, मैं नहीं समझ पाया। मैं कारण जानना चाहता था मगर न वह समझा पायी न मैनें उसे ज़्यादा कुरेदा। अगले डेढ़ साल भी गुज़र गये और अब उसकी पी एच डी पूरी हो चुकी थी। भविष्य को लेकर वह एक महीना पहले तक उहापोह में थी जब मैनें उससे आखरी बार हनोवर से फ़ोन पर बात की थी। यहाँ आकर जब बात हुई तो उसने बताया कि यूनिवर्सिटी अपने ईंडिक स्टडीज़ विभाग में उसे लेने के लिये उत्सुक है और जर्मनी से भी उसे ऐसा ही एक आमंत्रण आया है मगर वह भारत वापस आकर काम करना चाहती है। उसे दस दिन के अंदर निर्णय लेना था क्योंकि जर्मनी और अमेरिका, दोनों की युनिवर्सिटीज़ जल्द से जल्द किसी को रखकर काम शुरु कर देना चाहती थीं मगर भारत में कोई काम इतनी जल्दी मिलना मुश्किल लग रहा था। मैनें उसे कहा था निर्णय लेते ही मुझे सूचित करने के लिये मगर आज पच्चीसवाँ दिन है और हमारी दोबारा बात नहीं हुई। मैनें मेल लिखा तो उसने जवाब में सिर्फ़ वक़्त पर सूचित करने की बात कही थी और कुछ नहीं कहा।
बावड़ी के ऊपर गहरे रंग के जामुन लटक रहे थे। कुछ जो पूरे पक चुके थे, वे रह-रहकर बावड़ी के पानी में गिरते और काई थोड़ी फट जाती। अंदर का ठहरा हुआ पानी थोड़ा मचलता और काई को किनारे ठेलकर एक बूँद हवा में उछलकर फ़िर पानी में ग़र्क हो जाती। हिलता हुआ पानी ठहर जाता और काई फ़िर अपनी जगह ले लेती। शाम हो चुकी थी और अंधेरा बावड़ी की दीवारों में पैठ गया था। फ़रीदा आपा आखरी शेर पर थीं;
"जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिये
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया"