Monday, 15 October 2012

मौसम


पतझड़ उतरा ही है अभी 
अौर पेड़ों के सजने में
बाकी है कुछ िदन

एक िदन अचानक
उसका जाना
आिखरी बार हुआ

जब 
पेडों पर िखल रहे होंगे पत्ते 
वह जा चुकी होगी दूर

10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

नये पत्ते, पुरानी डालें।

Ek ziddi dhun said...

प्यारी सी कविता, दिल को छूने वाली।

पारुल "पुखराज" said...

कविता बहुत अच्छी लगी

PD said...

कविता बढ़िया है..
अब अगली कविता क्या अगले साल ही लिखेंगे? :)

महेन said...

@PD इंशा अल्लाह शायद एक तो लिख ही लूँगा ;)

स्वप्नदर्शी said...

bahut saadi, pyaari kavita!

सुशील छौक्कर said...

पसंद आई ये रचना।

expression said...

बहुत सुन्दर....

अनु

Shashwat Shriparv said...

आखिरी बार उनका जाना....
अभी बैठा हूँ आस लगाये कि
कि आखिर शायद आखिर न हो......

Umar Chand Jaiswal said...

pahali bar aap ki kavitaye pada. achha laga.