Saturday, 1 October 2011

ग़रीबी रेखा के ठीक ऊपर

On the Way to Daarjiling - Raghu Rai



वे कौन लोग होते हैं
जो किसी अपरिचित की शवयात्रा में
चलते हैं हुजूम के साथ
उदासी चेहरों पर लादे
कौन होते हैं वे
आधी रात पीली रोशनी के नीचे 
स्थिर खड़े रहते हैं
जिनके चेहरे पर स्थायी शून्य होता है
क्या वे तब भी वैसे ही होते हैं
जब हम उन्हें सड़क से गुज़रते नहीं देख रहे होते

बस अड्डे के विश्रामग्रहों में
कुछ लोग पुरानी मूर्तियों की तरह
एकटक देखते रहते हैं ज़मीन
ध्यान से देखने पर उनके चेहरों पर
पाई जा सकती है धूल की मोटी परत
और यह भी समझा जा सकता है
वे
कैसे कर लेते हैं अपने चेतन को
मूर्तियों की तरह
जड़
न वे उस यात्रा के बारे में सोच रहे होते हैं
जो वे करने जा रहे हैं
न उन दिनों के बारे में
जो उन्होंने अभी बिताये ही हैं

इसे ईश्वर का अन्याय ही कहना चाहिए
कि वे हमारी स्मृति में ऐसे ही
आधे-अधूरे, उदास-व्यथित दर्ज हो जाते हैं
हालांकि उनका भी होता है एक घर
जहाँ उनके चेहरे
दीवार पर लटकी तस्वीरों जैसे जड़ नहीं दीखते
खीझ का भाव उनके चेहरों पर भी
जाता है
जब उनके हाथ से फिसल जाती है पदोन्नति
अपने बच्चों को सोंटे लगाते हुए
वे भी सोच रहे होते हैं
औरत के साथ सोने की यातना के बारे में
रूखी हँसी हँसने की कला उन्हें भी आती है
कभी-कभी तो सचमुच मुस्कुराते हुए भी
देखा जा सकता हैं
उन्हें
कौतुहल और दुविधा से घिरा पाया जाता है उन्हें भी
जब वे किसी जगह पहली बार जाते हैं

उनमें से कुछ तो
इतने अँधेरे से गुज़र चुके होते हैं
कि उनपर नहीं पड़ती किसी की छाया
यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि
बार-बार देखने के बाद भी
नहीं पहचाने जा सकते उनके चेहरे
करिश्माई लगते हैं उनमें से कई चेहरे 
रघु राय की तस्वीरों में
हालांकि यह बताने की ज़रुरत नहीं
कि वे भी नहीं बना पाते इतिहास में अपनी कोई जगह
वे लोग इतने आम होते हैं
कि बम-विस्फोट में जब उनके चीथड़े उड़ जाते हैं
तो पहचान करने के लिए
नहीं मिलता उनके सामान में कुछ भी विशिष्ट

अगर करनी ही पड़े तो उनकी तुलना
 
महरौली के खंडहरों से की जा सकती है
जो सर्वत्र बिखरे पड़े हैं
जिनका पुरातात्विक मूल्य तो निश्चित नहीं किया जा सकता
लेकिन ढहाया भी नहीं जा सकता जिन्हें

8 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

प्रवीण पाण्डेय said...

न ढहे, न रहे, बस समय के साथ बहे।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 03-10 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में ...किस मन से श्रृंगार करूँ मैं

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया सर!

सादर

Bhushan said...

उस आम आदमी का चेहरा सभी हाशियों से बाहर ही रहता है. उस पर कोई आयोजना प्रभावित नहीं होती.

डॉ .अनुराग said...

महेन डियर इस कविता की शुरूआती पंक्तिया इसके शीर्षक की तरह दिल ओर दिमाग पर बरसो पहले कुछ ऐसे ही सोची गयी किसी बात को रिकॉल करवाती है ...मेरे लिए ये कविता आत्मा के "बज़र" के माफिक है ...
well said bro.....

मुनीश ( munish ) said...

सच है , कड़वा है ।

सुशील छौक्कर said...

आम से चेहरों को कौन पढता है आजकल। कौन झाड़ता है उनके चेहरों पर पड़ी धूल। एक अलग ही दुनिया में विचरते हुए से रहते हैं कुछ लोग। ये वाली तो बेहद ही पसंद आई। और हां रघु राय किस खूबसूरती से चेहरों के भावों को कैद करते हैं। एक दो बार देखी है इनकी फोटो प्रदर्शनी।