Friday, 27 May 2011

डायरी से एक बेतरतीब नोट

कागज़ के फूल बनाते हुए गुरुदत्त क्या सोच रहे थे? प्यासा बनाते हुए उनके मन में क्या चल रहा था? गुरुदत्त खूब पीते थे, लगातार सिगरेट फूंकते थे। काम करने में जो सलीका था, निजी ज़िंदगी में वह नदारद था। निजी जीवन में बेतरतीबी पसरी रहती थी मगर काम दिमाग में करीने से लगा रहता था। गीता से बनती नहीं थी। जीवन से खुश नहीं थे मगर अपने बारे में बात नहीं करते थे। सोने के लिये नींद की गोलियों पर निर्भर रहना पड़ता था। गुरुदत्त और गीता के बारे में सोचते हुए यकायक समझ में आता है कि दो बेहद संवेदनशील लोग ज़रूरी नहीं एक दूसरे के पूरक भी हो सकें।
प्यासा वे चालीस के दशक में ही लिख चुके थे जब मुंबई में ठीक से पाँव भी नहीं जमे थे। कागज़ के फूल बाद की बात है। कड़वे अनुभवों की तीव्रता को वे अपनी सृजनात्मकता से अलग रख पाते थे। उन्हें लेकर कोई दुश्चिंता नहीं थी। वे समझते थे असल ज़िंदगी की कड़वाहट को कला में बदला जा सकता है। देव आनंद जब कहते हैं, ''ही वॉज़ ऐ यंग मैन। ही शुड्न्ट हैव मेड डिप्रेसिंग मूवीज़।'' तो मुझे यह एक बनिये की टिप्पणी लगती है। अफ़सोस कि सिनेमा जैसे व्यापक कला समूह पर शुरु से ही बनियों का आधिपत्य रहा है।
कागज़ के फूल में गजब की इन्टेन्सिटी है मगर साथ ही चरित्रों से उपजता और प्रेषित होता विचलित करने की हद तक का ठहराव भी है। कागज़ के फूल सिर्फ़ एक ट्रैजिक मूवी नहीं है, वह वैसा बन पाने की चेष्टा है जो गुरुदत्त नहीं बन सके। सिन्हा हो पाने की साध गुरुदत्त ज़रूर मन में पाले रहे होंगे; उन्हें एक पड़ाव पर लगा होगा कि जैसा वे होना चाहते हैं वैसे हैं नहीं। यहीं सिन्हा का जन्म हुआ होगा और यहीं से फ़िल्म में एक तरह की इन्टेन्सिटी और नशीलापन है जो बाकी फ़िल्मों में नहीं दिखाई देता। प्यासा में भी वह एलिमेंट नहीं है। कागज़ के फूल सिनेमैटिक आर्ट की दृष्टि से बनाई गई फ़िल्म नहीं है, वह परदे पर एक भावुक कविता है बस; दिल को मरोड़ कर रख देने वाला एक वक्तव्य।
सिन्हा शांति से कहता है, ''हम एक दूसरे को कितनी अच्छी तरह समझते हैं। लोग एक-दूसरे को क्यों इतनी अच्छी तरह समझते हैं?'' यह दरअसल किसी को ठीक से न समझ पाने की लाचारगी है। लिखा चाहे अबरार अल्वी ने हो मगर यह क्या दरअसल गुरुदत्त की किसी को ठीक से समझ पाने की चेष्टा ही नहीं कह रही? शांति क्या वह यूटोपिक चरित्र नहीं है जो गुरुदत्त अपने पास चाहते रहे थे, जिसे अपने पूरक हो पाने की उम्मीद करते थे? ''दो बीघा ज़मीन भी एक ट्रैजिक फ़िल्म है लेकिन वह तठस्थ होकर बनाई गई एक पेंटिंग की मानिंद है। उसमें जो एलियनेशन इफ़ैक्ट है वह कागज़ के फूल में नहीं है। कागज़ के फूल किसी की डायरी का पन्ना है, निजी ज़िंदगी का टिमटिमाता हिस्सा जो जलने बुझने के बीच कहीं है?

19 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अनुभव की सांध्रता में ही ऐसी फिल्में बनती हैं।

Puja Upadhyay said...

कुछ तीन हफ्ते पहले कागज के फूल फिर से देखी थी...इत्तिफाकन कल ओडिसी भी गयी थी, गुरुदत्त पर एक फोटो-बुक लिखी गयी है उसे ढूँढने, मिली नहीं.

'कागज़ के फूल किसी की डायरी का पन्ना है, निजी ज़िंदगी का टिमटिमाता हिस्सा जो जलने बुझने के बीच कहीं है?' ये वाकई ऐसी फिल्म है जिसके लिए 'poetry on screen' जैसे बिम्बों का जन्म हुआ होगा.
कागज के फूल और गुरुदत्त पर लिखे इस लाजवाब लेख के लिए आभारी हूँ.
आपने वोंग कर वाई की निर्देशित 'इन द मूड फॉर लव' देखी है? कभी देखिएगा...पसंद आएगी.

शेष said...

महेन जी,
मैं अरविंद शेष हूं। जनसत्ता में नौकरी करता हूं। आपके ब्लॉग में नीचे कॉपीराइट की सूचना लगी है। इसलिए आपकी इजाजत जरूरी है। अगर आपको असुविधा न हो तो आपके इस पोस्ट को जनसत्ता के संपादकीय पन्ने पर छपने वाले साभार स्तंभ समांतर में छापना चाहता हूं। आलेख के साथ लेखक का नाम और ब्लॉग/ साइट का पता भी प्रकाशित होता है।

अगर इस बारे में मेरे ईमेल arvindshesh@gmail.com पर सूचित कर सकें तो आभारी रहूंगा।
अरविंद शेष

Gyandutt Pandey said...

हाय! बहुत दिनो बाद देखा! How is your kid?

Pratibha Katiyar said...

काश की ये पोस्ट और बड़ी होती...सुन्दर है जितना है.

महेन said...

आपकी बात सही है प्रवीण भाई।

पूजा, अभी तक तो यह फ़िल्म देखने का इत्तेफ़ाक नहीं हुआ है। जल्दी ही इंतज़ाम किया जाएगा।

ज्ञान जी, हमारा फुन्टी ही है जिसकी वजह से आप हमें बार बार नहीं देख पाते।

प्रतिभा जी, शॉर्ट इज़ स्वीट। अपनी कुव्वत बड़ा लिख सकने की नहीं है।

डॉ .अनुराग said...

मुझे लगता है गुरुदत्त एक एक्स्केपिस्म टेंडेंसी की ओर आहिस्ता आहिस्ता मुड रहे थे अनजाने में ...कई भावुक कविताएं विश्व सिनेमा में सफल रही है ...सच कहूँ तो एक उम्र ओर एक वक़्त के बाद किसी डाइरेक्टर को अपना सफहा पूरा दिखाने की छूट मिलनी चाहिए ....वैसे भी लिखने वाला ओर निर्देशक दोनों अपनी जिंदगी के हिस्से अक्सर परदे पर दिखाते रहे है .मसलन राज कपूर ....मसलन गुलज़ार ...मसलन ऋषिकेश मुखर्जी ...होलीवुड में तो लिस्ट लम्बी है......
फिर भी कागज के फूल की उदासी आपको कही छूती है ...आप इसके कई टुकडो से इत्तेफाक रखते हो ..सबसे खूबसूरत बात इसमें वहीदा के किरदार के ग्रे शेड्स को किनारे से दिखाया गया है .....जिसका तजुर्मा हर आदमी अपने तरीके से कर सकता है ...
गुरुदत्त एक इमोशनल आदमी थे ....शायद अपनी चीजों के लिए पोजेसिव....नहीं जानता वे पति कैसे थे तय है की कही कुछ था उन दोनों के दरमियाँ जो भरना रह गया था ...
पर फिर भी कागज के फूल एक ऐसा सफहा है जिससे कई लोग कई सालो तक रिलेट करेगे ....

ANIL YADAV said...

बहुत खूब।

पारुल "पुखराज" said...

बड़ी जल्दी की उन्होंने ..

मुनीश ( munish ) said...

I have seen a bulky book on him in Japanese here and how quality conscious people are they is anybody's guess. They admire him here.

singhSDM said...

ज़िन्दगी कि तल्ख़ बयानी पेश की आपने..... यह कहना बिलकुल दुरुस्त है कि " दो बेहद संवेदनशील लोग ज़रूरी नहीं एक दूसरे के पूरक भी हो सकें" गुरुदत्त और गीता दोनों बेहतरीन आर्टिस्ट थे..... प्यासा और कागज़ के फूल सिनेमा कि दो कालजयी कृतियाँ हैं..... बहरहाल पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाई... !

अजेय said...

बहुत अच्छा लिखा है. इस फिल्म को फिर से देखूँगा.

Mired Mirage said...

महेन, लेख बढ़िया लगा.गुरुदत्त और गीता दत्त के बारे में मैंने भी काफी सोचा है और तब तो और भी अधिक जब ताई उनके बारे में बताती थीं. वे बायस्ड हो सकती थीं किन्तु उन्होंने गीता दत्त को प्राय: उदास व पति द्वारा उपेक्षित ही देखा.
अच्छा पति न होने पर भी अच्छे कलाकार को तो महान मानना ही होगा.
घुघूती बासूती

Rahul Singh said...

फिल्‍म खतम होने पर कुरसी से उठने में दो मिनट वक्‍त लगा था और जरुरत हुई थी एक गिलास पानी की.

वर्षा said...

इसे पढ़ने के बाद फिल्म देखने की फिर से इच्छा जागी।

Dilbag Virk said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच

Sunil Deepak said...

महेन जी, आप का आलेख बहुत अच्छा लगा.

चाहे कथा, कविता, चित्र हो या सिनेमा, बात केवल कहने या बनाने वाले की नहीं देखने वाले की संवेदना और मानसिक स्थिति की भी नहीं है क्या? जिसमें किसी को नींद की गोली मिलती है, दूसरा उसी में अपनी अंतरव्यथा को प्रतिबिम्बित पा सकता है. पर यह कहना कि उदास फ़िल्में ही बनाना कला है, बाकि सब बनियापन, कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है क्या?

महेन said...

सुनील जी, मेरे कथन से आहत हों तो क्षमा चाहूँगा. बनियेपन से मेरा तात्पर्य था फिल्म को सिर्फ पैसा कमाने के माध्यम के रूप में देखना. देव आनंद की हलकी-फुलकी फ़िल्में मुझे भी पसंद हैं. पर उनका यह कथन गुरुदत्त की कला और फिल्मों को सिरे से ख़ारिज करता है जोकि दोषपूर्ण रवैया है.

दीपक बाबा said...

बहुत उम्दा लेख लगा गुरुदत्त पर.. ब्लॉग भी बढिया लगा फालो कर रहे हैं.