Tuesday, 15 February 2011

यूँही निर्मल वर्मा - 1


ऐसे लमहे भी होते हैं, जब हम बहुत थक जाते हैं स्मृतियों से भी और तब ख़ाली आँखों से बीच का गुज़रता हुआ रास्ता ही देखना भला लगता है… शायद, क्योंकि बीच का रास्ता हमेशा बीच में बना रहता है… स्मृतिहीन और दायित्व की पीड़ा से अलग।

हर शहर का अपना आत्मसम्मान होता है। जब हम उसे पूरी तरह प्रतिष्ठा नहीं दे पाते, तो वह भी हमारे प्रति उदासीन हो जाता है।

कभी-कभी घर बदलते समय जब हम अपना सामान सन्दूक़ में रखते हैं, तो कुछ चीज़ें कभी पीछे नहीं छूट पातीं, कोई बहुत पुराना पिक्चर-पोस्टकार्ड, शराब की बोतल का कोई लेबल, किसी कन्सर्ट का प्रोग्राम इन चीज़ों को हम अवश्य रख लेते हैं, चाहे सन्दूक़ में जगह न हो, चाहे जगह बनाने के लिये हमें एक-दो क़मीज़ें या स्वेटर ही क्यों न बाहर फेंकना पड़े।
ज़िन्दगी का रास्ता तय करते समय बहुत-सा सामान पीछे छोड़ना होगा, यह जानता हूँ, किन्तु सोचता हूँ, किसी न किसी तरह एंगुई की स्मृति को बचाकर आख़िर तक खींच लाना ही होगा।

स्मृतियों में वे जिप्सी-स्मृतियाँ है, जिनका कोई घर-ठिकाना नहीं।

कोपनहेगन में रात नहीं होती, शाम और सुबह के दो धुँधले बिन्दुओं बीच रात का महज़ हलका-सा भ्रम होता है जैसे एक झीना-सा सफ़ेद परदा हो, जो रात होते ही गिर जाता है और सुबह होने पर फिर उठ जाता है।

बहुत ही पीले गाल, तिकोना चेहरा, माथे पर पसीने की बूँदें क्षण-भर के लिये भ्रम हुआ मानों वह सीधे सार्त्र के किसी उपन्यास से बाहर निकलकर वहाँ आ गयी हो।

कभी-कभी सोचता हूँ, यात्रियों का सुख सब कोई जानते हैं, दु:ख अपने में अकेला छिपा रहता है।

और अब जहाज़ का डेक है… सूना और उजाड़। समुद्र की अधीर लहरें पल-छिन ऊँची होती जा रही हैं। तट के पीछे कोपनहेगन फीकी-मैली धुन्ध में डूब गया है।
सब कुछ पीछे रह गया है, सिर्फ़ समुद्री पक्षियों का झुण्ड अब भी जहाज़ के संग-संग उड़ता चला आ रहा है।

हम यात्री किसी भी जगह पहली बार नहीं जाते; हम सिर्फ़ लौट-लौट आते हैं उन्हीं स्थानों को फिर से देखने के लिये, जिसे कभी, किसी अजाने क्षण में हमनें अपने घर के कमरे में खोज लिया था। क्या यह कभी सम्भव है कि हम ओसलो में घूमते रहें और अचानक गली के नुक्कड़ पर इब्सन के किसी पात्र से भेंट न हो जाये। या पहली बार आइफ़ल-टॉवर के सामने फैली पेरिस की छतों को देखकर हमें 'अपने' पेरिस की याद न हो आये जिसे हमनें बाल्ज़क के उपन्यासों और रजिस्ताँ की कविताओं से चुराकर ख़ास अपनी निजी अल्बम में चिपका लिया था।

हर शहर के दो चेहरे (या शायद ज़्यादा?) होते हैं, एक वह जो किसी पिक्चर-पोस्टकार्ड या गाइड बुक में देखा जा सकता है एक स्टैण्डर्ड चेहरा, जो सबके लिये एक-सा है; दूसरा उसका अपना निजी, जो दुलहिन के चेहरे-सा घूँघट के पीछे छिपा रहता है। उसका सुख, उसका अवसाद, उसके अलग मूड, बदली के दिन अलग और जब धूप हो तो बिल्कुल अलग; हर बार जब घूँघट उठता है, लगता है, जैसे चेहरा कुछ बदल गया है, जैसे वह बिलकुल वह नहीं, जो पहले देखा था।
क्योंकि दरअसल अजनबी शहरों की यात्रा एक क़िस्म का बहता पानी है, जिस प्रकार एक यूनानी दार्शनिक के कथनानुसार एक ही दरिया में दो व्यक्ति नहीं नहाते, हालाँकि दरिया वही रहता है, उसी तरह दो अलग-अलग यात्री एक ही शहर में नहीं आते, हालाँकि शहर वही रहता है।

आधुनिकता -  यदि वह सिर्फ़ एक ख़ाली शब्द नहीं, आसपास की हर चीज़ को ऐसे अन्दाज़ से देखने और परखने की क्रिया है, जो हमसे पहले किसी भी पीढ़ी के पास नहीं था।

टूटी हुई दीवारों के मलबे के नीचे हम सबकी आत्मा का एक अंश दब गया है… क्योंकि जिस सदी में हम जीते हैं, हममें-से हर व्यक्ति उसका गवाह है, और गवाह होने के नाते जवाबदेह भी…

चारों ओर घनी धूप फैली है, दूर पहाड़ियों पर अलसाये से इक्के-दुक्के बादल बिखर आये हैं। ऐसी शान्त सुनहरी घड़ी में मृत्यु बहुत दूर दूर की चीज़ लगती है, उसके बारे में कुछ भी सोचना असम्म्भव सा प्रतीत होता है।

सफ़ेद रातों में शराबियों की डगमागाती छायाएँ।

धुन्ध की जामुनी चादर जो इतनी झीनी और पतली है कि उसके पीछे हर चीज़ मायावी सी जान पड़ती है… लहरों में भीगती, डूबती और सरसराती सी एक अयथार्थ लोक की धुन्ध।
चट्टानों के शिखरों पर घास के कुछ टुकड़े हैं जिनपर सागर-पक्षियों का झुण्ड चक्कर काट रहा है उनकी छाया नंगी चट्टानों पर मँडराती है और ग़ायब हो जाती है; रात के धुँधले आलोक में उनके फड़फड़ाते डैने जैसे किसी बहुत पुराने दु:स्वप्न के स्मृति-अंश हों। मध्यरात्रि की डूबती धूप में डबडबाये द्वीप… एक ज़बरदस्त चाह।

भूली-बिसरी स्मृतियों का अकेलापन। ऐसी रात में यह लगता है कि मृत्यु के परे भी स्मृतियाँ जीवित रहती हैं, कि स्मृतियों का अकेलापन किसी भी शहर में अपने शहर से हज़ारों मील दूर भी टूटता नहीं।

एक छोटा सा शब्द, जिसका कोई चेहरा नहीं है, महज़ नाम।

अनुभव के जिस परिचित दायरे से शब्द निकलते हैं, उस रात की अनुभूत परिधि के सम्मुख वे अजनबी हैं, जैसे किसी दूसरे ग्रह के प्राणी। जो सच है, जो उस रात की उस घड़ी में सच था, वह अब महज़ अर्ध-स्वप्नों, स्मृतियों का पुंज रह गया है आकारहीन, स्वरहीन धुँधली धुन्ध के लोंदे सा! वह एक पुल था हज़ारों सदियों के कुहरे को काटता हुआ, अतीत के उस सीमान्त को छूता हुआ जहाँ मौन, शब्दों के अभाव से नहीं, उनके अधूरेपन से उत्पन्न होता है ऐसा पुल जो जितना कुछ जोड़ता है, उतने में ही टूट जाता है। सोचता हूँ आज नहीं, उस रात सोचा था, जैसे वह लौ बिलकुल अकेली, बिल्कुल नंगी हो गयी है, जिसे हम अपने अस्तित्व से ढँके रहते हैं। कितनी जल्दी वह आस-पास के अँधेरे को निगल रही थी भूखी-प्यासी लौ, लपलपाती, हाँफती, खुली हवा में साँस लेती हुई। कुछ भी ऐसा नहीं रहा था, जिसपर उँगली रखकर कह सकें, यह आज है, यह कल। यह वह कल है, जो कभी जीवित था और अब बीत गया है। वह कड़ी जो हमें आसपास की दुनिया से जोड़ती है, जो हमें जीने का झूठा-सच्चा अर्थ देती है, वह कड़ी इस क्षण अचानक टूट गयी है। इसके टूटने के संग हम बिलकुल अकेले हो जाते हैं, सर्वथा मुक्त। मुक्त और एकदम कितने अर्थहीन। संगीत कितना अर्थहीन है और, इसलिये कितना पूर्ण।

3 comments:

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

loved it... He is 'THE' boss..

डॉ .अनुराग said...

कहते है समीक्षकों में जमकर बहस हुई थी....इस छायावाद के लेकर........
but as pankaj said......

i loved it too.

प्रवीण पाण्डेय said...

घटनाओं के इर्दगिर्द सिमट जाते हैं शब्द, शहर और उनके प्रतीक।