Thursday, 30 September 2010

थोड़ा


थोड़ी सी उद्दिग्नता बची रहेगी ह्रदय में
आँखों मे बची रहेगी सुंदरता देखने की थोड़ी बहुत समझ
शब्दों में अर्थ खोजने की हिम्मत बची रहेगी
बची रहेगी अभी कुछ दिन और जीने की इच्छा
थोड़ी सी उदासी बची रहेगी हँसी के साथ
उष्णता बची रहेगी स्पर्श में थोड़ी बहुत
शिशु की मुस्कान में बची रहेगी थोड़ी उम्मीद
और पुलक बची रहेगी एक लड़की की चुप्पी में
जब हम जानेंगे अभी बचा हुआ है
थोड़ा बहुत प्रेम हमारे आसपास

Sunday, 26 September 2010

दीवार में एक खिड़की रहती थी पढ़ते हुए और सोनसी के बारे में सोचते हुए

तुम्हारे बारे में सोचते हुए
मुझे बहुत सी बातें याद आती हैं
मसलन सबसे पहले याद आती है
एक खिड़की जो दीवार में रहती थी
तुम्हारे बारे में सोचते हुए उस खिड़की के पार
हमारा आधा-आधा दिवा:स्वप्न याद आता है
उसकी ओट में बैठी गुड़िया
उस खिड़की से फूटती पगडंडी नहीं भूलती मुझे
और पगडंडी पर चलते हुए चाय की दुकान
वहां से दाएं चलकर पेड़ों के झुरमुट में छुपा तालाब
तालाब की ढलान से शुरू होने वाली चटख हरी दूब
और गहरे हरे रंग के पेड़ नहीं भूलते
तुम्हारे बारे में सोचते हुए
लेकिन मैं उस हाथी को अकसर भूल जाता हूँ
जिसकी सवारी हमें कभी नसीब नहीं हुई
और उसके पीछे छुटती जाती जगह को भी
मगर सबसे अहम
खिड़की के इस ओर खड़ा मैं
यह भूल जाता हूँ कि मैनें
तुम्हारे बारे में सोचना शुरु किया था
खिड़की के इस ओर खड़े होकर अकेले

यह अजीब है कि वह खिड़की और उसके परे
सच कुछ भी नहीं था
तुम जो एक सच थीं
समय के आवर्त में छिटककर दूर होती रही हो
मेरे पास तो जो है 
बस वह खिड़की और उसके पीछे का झूठ भर है