थोड़ी सी उद्दिग्नता बची रहेगी ह्रदय में
आँखों मे बची रहेगी सुंदरता देखने की थोड़ी बहुत समझ
शब्दों में अर्थ खोजने की हिम्मत बची रहेगी
बची रहेगी अभी कुछ दिन और जीने की इच्छा
थोड़ी सी उदासी बची रहेगी हँसी के साथ
उष्णता बची रहेगी स्पर्श में थोड़ी बहुत
शिशु की मुस्कान में बची रहेगी थोड़ी उम्मीद
और पुलक बची रहेगी एक लड़की की चुप्पी में
जब हम जानेंगे अभी बचा हुआ है
थोड़ा बहुत प्रेम हमारे आसपास
15 टिप्पणियाँ:
सच है, थोड़ा प्रेम बचा रहेगा तो सब कुछ बचा रहेगा।
थोड़ी बहुत
समझ आ जाएगी
कविता हमें भी
शायद
कहते थे कि कलियुग में जो ईश्वर को मन से कुछ क्षणों के लिए भी याद कर ले, वह सतयुग की बरसों की तपस्या के बराबर होगा| इसी आधार पर थोडा सा प्रेम (कलियुग में) अगर सच्चाई का अंश भी हो तो जीवन में धनात्मक उत्प्रेरक बनकर उन्नतिशील कर सकता है| ऐसा भी नहीं कि प्रेम नहीं है, जो है उसे गतिशील ऊर्जा की संभवत: आवश्यकता हो|
प्रिय महेन,बेहतरीन कविता !
अनहद नाद पर पोस्ट करने के लिए सहमति चाहूंगा.
बिलकुल शौक से पोस्ट कीजिये प्रियंकर भाई..
महेन भाई, कविता दिल पर असर छोड़ती है। जाने क्यूं यह अशोक वाजपेयी की याद दिला रही है।
आपके द्वारा रचित ये पंक्तियाँ मुझे बेहद पसंद है. लिखते रहिये महेंद्र सर!
धीरेश भाई मुझे तो ये डबराल जी की याद दिलाती है।
वाह वाह !! याद रह गई ये बात ..... कमाल !!
ओह....क्या कह दिया....
लाजवाब !!!!
मर्म तक पहुँच मोहित कर देने वाली रचना...
कि अपनी बात इतनी खूबसूरती से और इतने कम शब्दों में कह दी आपने..शानदार महेन भाई....अद्भुत...सुन्दर!
पहली बार आपक ब्लाग देखा डाक्टर अनुराग जी के ब्लाग से लिन्क मिला। अभिभूत हूँ आपकी रचना पढ कर। अब तो रोज़ आना पडेगा। बहुत बहुत शुभकामनायें।
यह थोड़ा तो सच में बहुत ज्यादा है ...
इस थोडे बहुत में बहुत कुछ बचा रहता है। इस थोडे से प्यार से ये प्यारा संसार बसा हुआ है। फिर से शानदार रचना पढने को मिली।
मैं चाहता हूँ / मंगलेश डबराल
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