Thursday, 30 September 2010

थोड़ा


थोड़ी सी उद्दिग्नता बची रहेगी ह्रदय में
आँखों मे बची रहेगी सुंदरता देखने की थोड़ी बहुत समझ
शब्दों में अर्थ खोजने की हिम्मत बची रहेगी
बची रहेगी अभी कुछ दिन और जीने की इच्छा
थोड़ी सी उदासी बची रहेगी हँसी के साथ
उष्णता बची रहेगी स्पर्श में थोड़ी बहुत
शिशु की मुस्कान में बची रहेगी थोड़ी उम्मीद
और पुलक बची रहेगी एक लड़की की चुप्पी में
जब हम जानेंगे अभी बचा हुआ है
थोड़ा बहुत प्रेम हमारे आसपास

15 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सच है, थोड़ा प्रेम बचा रहेगा तो सब कुछ बचा रहेगा।

सोतड़ू said...

थोड़ी बहुत
समझ आ जाएगी
कविता हमें भी
शायद

Neeraj Mathpal said...

कहते थे कि कलियुग में जो ईश्वर को मन से कुछ क्षणों के लिए भी याद कर ले, वह सतयुग की बरसों की तपस्या के बराबर होगा| इसी आधार पर थोडा सा प्रेम (कलियुग में) अगर सच्चाई का अंश भी हो तो जीवन में धनात्मक उत्प्रेरक बनकर उन्नतिशील कर सकता है| ऐसा भी नहीं कि प्रेम नहीं है, जो है उसे गतिशील ऊर्जा की संभवत: आवश्यकता हो|

Priyankar said...

प्रिय महेन,बेहतरीन कविता !

अनहद नाद पर पोस्ट करने के लिए सहमति चाहूंगा.

महेन said...

बिलकुल शौक से पोस्ट कीजिये प्रियंकर भाई..

Ek ziddi dhun said...

महेन भाई, कविता दिल पर असर छोड़ती है। जाने क्यूं यह अशोक वाजपेयी की याद दिला रही है।

Ankit Dangi said...

आपके द्वारा रचित ये पंक्तियाँ मुझे बेहद पसंद है. लिखते रहिये महेंद्र सर!

महेन said...

धीरेश भाई मुझे तो ये डबराल जी की याद दिलाती है।

अमिताभ मीत said...

वाह वाह !! याद रह गई ये बात ..... कमाल !!

रंजना said...

ओह....क्या कह दिया....

लाजवाब !!!!
मर्म तक पहुँच मोहित कर देने वाली रचना...

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

कि अपनी बात इतनी खूबसूरती से और इतने कम शब्दों में कह दी आपने..शानदार महेन भाई....अद्भुत...सुन्दर!

निर्मला कपिला said...

पहली बार आपक ब्लाग देखा डाक्टर अनुराग जी के ब्लाग से लिन्क मिला। अभिभूत हूँ आपकी रचना पढ कर। अब तो रोज़ आना पडेगा। बहुत बहुत शुभकामनायें।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

यह थोड़ा तो सच में बहुत ज्यादा है ...

सुशील कुमार छौक्कर said...

इस थोडे बहुत में बहुत कुछ बचा रहता है। इस थोडे से प्यार से ये प्यारा संसार बसा हुआ है। फिर से शानदार रचना पढने को मिली।

सोनू said...

मैं चाहता हूँ / मंगलेश डबराल