Sunday, 26 September 2010

दीवार में एक खिड़की रहती थी पढ़ते हुए और सोनसी के बारे में सोचते हुए

तुम्हारे बारे में सोचते हुए
मुझे बहुत सी बातें याद आती हैं
मसलन सबसे पहले याद आती है
एक खिड़की जो दीवार में रहती थी
तुम्हारे बारे में सोचते हुए उस खिड़की के पार
हमारा आधा-आधा दिवा:स्वप्न याद आता है
उसकी ओट में बैठी गुड़िया
उस खिड़की से फूटती पगडंडी नहीं भूलती मुझे
और पगडंडी पर चलते हुए चाय की दुकान
वहां से दाएं चलकर पेड़ों के झुरमुट में छुपा तालाब
तालाब की ढलान से शुरू होने वाली चटख हरी दूब
और गहरे हरे रंग के पेड़ नहीं भूलते
तुम्हारे बारे में सोचते हुए
लेकिन मैं उस हाथी को अकसर भूल जाता हूँ
जिसकी सवारी हमें कभी नसीब नहीं हुई
और उसके पीछे छुटती जाती जगह को भी
मगर सबसे अहम
खिड़की के इस ओर खड़ा मैं
यह भूल जाता हूँ कि मैनें
तुम्हारे बारे में सोचना शुरु किया था
खिड़की के इस ओर खड़े होकर अकेले

यह अजीब है कि वह खिड़की और उसके परे
सच कुछ भी नहीं था
तुम जो एक सच थीं
समय के आवर्त में छिटककर दूर होती रही हो
मेरे पास तो जो है 
बस वह खिड़की और उसके पीछे का झूठ भर है

10 comments:

स्वप्नदर्शी said...

bahut dino baad, bahut khoob!

प्रवीण पाण्डेय said...

किसी की याद में यादों का संसार छिपा होता है।

prkant said...

@ यह अजीब है कि वह खिड़की और उसके परे
सच कुछ भी नहीं था
तुम जो एक सच थीं
समय के आवर्त में छिटककर दूर होती रही हो
मेरे पास तो जो है
बस वह खिड़की और उसके पीछे का झूठ भर है.
.......इस झूठ के मुकाबले यह सच , जो जिए जा रहे हैं हम ,कितना दयनीय है! यह जानते-बूझते भी कि खिडकी सच नहीं है ,उसे खोलने और उसके पार झाँकने को बार-बार मचलता मन हमारे जिन्दा होने की घोषणा लगता है.

अभिषेक ओझा said...

किसी की सोच कहाँ से कहाँ ले जाती है कभी कभी.

डॉ .अनुराग said...

तभी तो कहता हूँ बस अपने आप पास को बटोर लो कागजो में .....कविता बन जायेगी........आमद सुखद है !

अजेय said...

काफी गहरे मे सो रही थी आप की 'खिड़्की'...! एक खिड़की मेरे स्वप्न मे भी कौन्धती रहती है. उसे कविता न बना पाया आज तक.

MUFLIS said...

खिड़की के उस पार से
उभरते हुए अलफ़ाज़ ,
तसव्वुरात और खयालात ...
सब सच हैं . . .

बहुत अच्छी कृति बन पडी है
बिलकुल उसी "सोचना शुरू किये जाने की तरह ही"

रंजना said...

यह अजीब है कि वह खिड़की और उसके परे
सच कुछ भी नहीं था
तुम जो एक सच थीं
समय के आवर्त में छिटककर दूर होती रही हो
मेरे पास तो जो है
बस वह खिड़की और उसके पीछे का झूठ भर है !!

क्या कहूँ ?????

Vandana ! ! ! said...

बहुत सुन्दर! आपकी सभी रचना बहुत अच्छी है.

सुशील कुमार छौक्कर said...

सारे प्यारे रंगबिरंग़े सुंदर शब्द तो आप अपने पास रखते है और कभी इधर ब्लोग पर टेप देते है। इसलिए हमारे पास क्या बचा रह जाता है जो कुछ कहे बस पढ़कर आंनद लिए जाते है।