कोई दस-बारह सालों बाद पहाड़ों की ओर रुख किया इसलिए काफी उत्साहित और रोमांचित था. पहाड़ मुझे बहुत आकर्षित करते हैं और इस बार कुछ लोगों से भी लम्बे अरसे के बाद मिलने का मौका मिल रहा था इसलिए मौका और भी ख़ास था. इन कुछ लोगों में से एक मेरी फेवरेट चाची भी थीं. इन दस बारह सालों में वे माँ से नानी बन चुकी हैं और चेहरा झुर्रियों से सिकुड़ने लगा है. उनका छोटा बेटा जो कभी दादी-दादी कहकर मुझपर लटका रहता था अब मैं उसके कंधे तक भी नहीं पहुँचता. चाचा के बचे-खुचे बाल बाल सफ़ेद हो गए और दोनों बेटियां ससुराल जा चुकी हैं. चाची के अलावा इतने सालों में सब कुछ बदल गया है. नौले के ऊपर बांज का पेड़ आखिरकार गिर गया और गिरा भी यूँ कि अगर पेड़ की दो शाखें नौले के दोनों ओर फैलकर सही अंतराल पर ज़मीन से नहीं टकराती तो तीसरी शाख नौले की छत तोड़ते हुए उसमें घुस जाती. छोटी गाड़ पिछली बार जब गया था तभी सूख चुकी थी और इस बार कोसी में भी पानी बहुत कम दिखा. कुछ सालों बाद शायद वह भी गायब हो जायेगी. चीड़ पहले से ज़्यादा फ़ैल चुका है. चीड़ चाहे यूरोप के माकूल हो, हिमालय के माकूल तो नहीं ही है. इससे शायद गरमी भी बढती है. पिछली बार जागेश्वर गया था जहाँ चारों ओर देवदार हैं. वहां और मेरे यहाँ के मौसम में बहुत अंतर नज़र आया. इस बार तो ज़्यादातर दोपहरों को पसीने से तर रहता था. मौसम की दुर्दशा पर अफ़सोस हुआ और चिंता भी. पता नहीं हम किस ओर जा रहे हैं.
बहुत से लोगों से मिल सका मगर समय की सनातन कमी के चलते बहुत से लोगों से मिलना रह गया और जिनसे नहीं मिल सका उन्हें अभी तक पता भी नहीं कि मैं बंगलौर से बाहर भी गया था. जब आ पड़ेगी तो हाथ जोड़ लूँगा. इस बार मेरा उद्देश्य परिवार के साथ एकजुट होना था और ढेर सारी तस्वीरें खींचना था. एस एल आर कैमरे पर पानी की तरह पैसा बहाने और फोटोग्राफी के गुर न सीख पाने के अफ़सोस के बाद पहली बार उसका इस्तेमाल कर पा रहा था. मैंने अपने आप से वादा किया था कि खुद फोटोग्राफी सीखूंगा. उसमें अभी वक़्त लगेगा मगर बतौर एक्सपेरिमेंट कुछ तस्वीरों पर नज़र फिराई जा सकती है.
ब्लॉग पर तस्वीरों कि क्वालिटी में कुछ खराबी मैंने महसूस की. यही और कुछ और तस्वीरें पिकासा में भी डाली हैं जो इधर देखी जा सकती हैं: http://picasaweb.google.co.in/getmahendram/Devbhoomi02#


















12 टिप्पणियाँ:
aap ek lambe samay ke bad pahado me pahuche aur idhar ham kafi samay ke baad aapke blog par padhaare....
tasveerein pasand aai, kuchh to kafi pratik roop liye hue hai...
i think u've done justice with SLR. extreme long shots of landscapes are missing though !
सुन्दर चित्र हैं ।
Thanks everyone for reading & leaving comments.
Munish Bhai, landscape wasn't good from my village and I didn't get a chance to visit any other place. More importantly, I wanted to capture objects, which I could to a very limited extent.
सच कहूँ तो तुम्हे पढने आया था ......पर तस्वीरे (बकोल इतनी ख़राब क्वालिटी के ) भी .......लाज़वाब है ...... आते रहा करो..यार....इस भागती दौड़ती जिंदगी में ....हमें वक़्त को इन सफ्हो पर दर्ज करना पड़ेगा...
तस्वीरें तो कमाल की आई हैं. एक फोटोग्राफर की नजर से ली गयी तस्वीरें हैं.
फोटो अच्छी हैं.... फिर फोटोग्राफर शायद कैमरे से महत्वपूर्ण होता है..... हालांकि दो फोटो रिपीट करने के बजाय कुछ बेहद खूबसूरत (बोले तो हमारी) डाल सकता था...
अनुराग भाई, फ़ुर्सत की हमारी टोकरियां छोटी होती जा रही हैं। इतना भी वक़्त निकल पाता है गनीमत है।
अभिषेक भाई, अभी फ़ोटोग्राफ़र का शऊर पैदा करने में तो देर है। कोशिश जारी है।
राजेश (अभी भी तेरा नाम नहीं लगता), कोशिश करके देखता हूँ। पता नहीं इतने महारथियों की तस्वीर का बोझ मेरा ब्लॉग उठा पायेगा या नहीं।
कई तस्वीरें रहस्यमय आकर्षण पैदा कर रही हैं। और एक तो किसी नामचीन पेंटर के चटख रंगों का कमाल सा लगती है।
बेहद अच्छी तस्वीरे है.. खासकर त्रिशूल के साथ जलती लौ को बहुत अच्छा कैप्चर किया है...
सब सुदर तस्वीरें हैं पर मुझे तो बेलन, चिमटा और सूप वाली तस्वीर अच्छी लगी... लाजवाब, बावजूद इसके कि आपने कोई रिफ्लेक्टर का उपयोग नहीं किया है. आँगन में उतरी गोल रोशनी का चित्र भी एक कल्पना सा ही है.
तस्बीरों की अपनी जुबाँ होती है..जिसे समझ पाने का सलीका सीखना जिंदगी जीना सीखने मे मदद करता है..यही समझ आता है..तस्बीरें देख..यह चित्र खुद मे एक पोस्ट सा लगता है...
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