Wednesday, 28 October 2009

चुप्पी की कोई तो वजह होगी

नाड़ा देखा है? उसके के दो सिरे होते हैं; एक ओर से खींचो तो दूसरी ओर से छोटा हो जाता है। अपनी हालत पस्त है और कुछ नाड़े जैसी भी। शायद उससे भी ज़्यादा पस्त। मैं अपने को कई सिरों से खींचने की कोशिश करता रहता हूँ और जो सिरा छोड़ता हूँ वो सिकुड़ जाता है। कभी पढ़ने लगता हूँ तो पढ़ता ही रह जाता हूँ बाक़ी सारे काम बंद हो जाते हैं। फिर फिल्मों का नंबर आता है तो बाकी सब रुक जाता है। यह भी भूल जाता हूँ कि आखिरी किताब जो पढ़ी थी उसमें क्या था। यह क्रम चलता रहता है - किताबें, फिल्में, नाटक, कवितायें, ब्लॉग, संगीत, काम, परिवार। क्रम चलता रहता है और टूटता रहता है।

भाई कहा करते थे, एक ही काम करो और उससे चिपके रहो। मुझसे कभी नहीं हुआ और आज भी नहीं होता। किसी भी काम में मन अचानक रमने लगता है। इस आदत का भी मानसिक बीमारी में कोई नाम ज़रूर होगा या शायद बच्चों की तरह अपनी आदत कुछ ऎसी है कई हर नई चीज़ देखकर मचल जाते हैं। भाई यह भी कहा करते थे कि मुझमें किसी काम को लेकर गंभीर होने की आदत नहीं है। इस मामले में उनकी बात सोलह आने सही थी। आज भी अपनी यह आदत बरक़रार है। पिछले दिनों दो हफ्ते छुट्टी लेकर babysitting कर रहा था। दो-तीन दिनों में ही मुझे इस काम में मज़ा आने लगा और जल्दी ही अपने बेटे की आदतों के बारे में बहुत कुछ समझने भी लगा। यहाँ तक कि कुछ ही दिनों में मैंने रात भर जागने की उसकी आदत भी ख़त्म कर दी। अब बाप-बेटे आराम से आठ बजे तक सोते हैं।

काफ़ी वक़्त से उठापटक चल रही है कि केरल में कहीं छोटे से कसबे में ज़मीन लेकर बस जाऊं या कम से कम रिटायर होकर रहने का इन्तेजाम कर लूँ। नासा वाले तो पहले ही दावा कर चुके हैं कि उत्तर भारत में जलस्तर ज़मीन में खतरनाक स्तर तक नीचे जा चुका है। इस अवधारणा पर मेरा वैसे भी पूरा विश्वास है कि तेल से पहले पानी ख़त्म होने वाला है। जाने ऐसा क्यों लगता है इसकी शुरुआत भारत से ही होगी। वैसे स्पेन तो पिछले कुछ सालों से पानी खरीद ही रहा है। इधर चेन्नई में भी पानी खरीदना ही पड़ता है मगर उसपर तो अभी सरकार सब्सिडी देती है। उत्तर भारत में मानसून अब काफ़ी कम हो चुका है। दिल्ली में तो मैंने ठीक से बारिश होते हुए कब से नहीं देखी। शायद लोग समझते नहीं कि अपना देश मानसून से बना हुआ देश है। दक्षिण इस मामले में खुशनसीब है। केरल में तो आधा साल बारिश ही होती रहती है। मुझे अपने आसपास बहुत सारे पेड़ चाहिए जो केरल में हैं ही। कुछ दिन सिर्फ़ इस बारे में ही पता करने में निकल गए। फ़िर एक दिन अचानक जैकी चान की फिल्में देखनी शुरू कीं तो तमाम फिल्में देख डालीं। पिछले कुछ दिनों से पब में बैठकर बीयर पीने का चस्का चढ़ा है। आजकल यह सिलसिला बदस्तूर जारी है मगर कमबख्त आदत किसी चीज़ की नहीं पड़ती। जो काम आज शुरू किया कल वो बंद होना ही है।

ब्लोगिंग में कम से कम दोस्त लोग आते जाते लापता रहने का सबब पूछ जाते हैं मगर मैंने देखा है कि बाक़ी हर महफ़िल में अपना आना-जाना unnoticed ही चला जाता है इसीलिए पढने-लिखने वालों के बीच हो या फिल्में देखने वालों के बीच, अपन चुप पाये जाते हैं। एक बार एन एस डी का एक नाटक देखकर मै और मेरा एक मित्र बाहर आए। नाटक पर बात चल रही थी कि एक बुजुर्ग हमारे पास आए। वे मुझसे बातें करने लगे मगर जब विषय घूमकर नाटक पर पहुँचा तो वे मेरे मित्र से मुखातिब हो गए। मैंने बस पकड़ी और घर आ गया। तो मैंने सोचा आदमी का एक सिर होता है इसलिए सिरा भी एक होना चाहिए; हरफनमौला सिर्फ़ किताबों के नायक होते हैं मगर मेरे नाड़े के आज भी कई सिरे हैं। ब्लोगिंग भी उनमें से एक सिरा है। काफी दिनों से बाकी सिरों की गांठें सुलझाने में उलझा हुआ हूँ इसलिए ब्लोगिंग छूटी हुई है। फ़िर अपन न तो प्योर साहित्यकार हैं न रोज़ विषयों का जुगाड़ कर सकने की कुव्वत अपने में है। अपन उस किस्म के जानवर हैं जो अपने अंधेरे बिल में बैठकर जो पसंद हो वो करते हैं। ऐसे जानवरों को क्या कहते होंगे भला?