Wednesday, 11 February 2009

संशय के बाद

अपने डर को छुपाकर उसे
लिखने थे प्रेमगीत
किसी को दिखानी नहीं थीं
अपनी कंपकंपाती उँगलियाँ
और उन उँगलियों के बीच
उलझा संशय
उसकी आत्मा अब भी गीली थी
प्रेम और उसके इतिहास की भाप में
उसे प्रेम के दुश्चक्रों से बाहर निकलना था
खुद को दिए दिए फिरना कुछ भी हो
उसे इनकार हो चला था
उसके प्यार हो पाने से
जिन्होंने गढा था यह फिकरा
उनके लिए कोई जगह नहीं थी
उसकी कविता में
यही उसका प्रतिशोध था
उसने ठान लिया था
अपने निरुद्देश्य प्रेम की तरह उसे
नहीं लिखनी थी निरुद्देश्य कवितायें