Sunday, 15 November 2009

दूसरा प्यार

दूसरे प्यार में नहीं लिखी जाती
पहली अर्थहीन प्रेम-कविता
पहला थरथराता चुंबन
नहीं लेता कोई दूसरे प्यार में
दूसरे प्यार के बारे में
नहीं लिखता कोई अभिज्ञान
और ना ही होता है शिला-लेखों में उसका वर्णन

दूसरा प्यार नहीं रखा जाता छुपाकर
बटुए की चोर-जेब में
क्या तुमने सुनी है
कोई किंवदन्ति दूसरे प्यार के बारे में
या किसी राजकुमारी की कहानी
जिसे मिला हो दूसरा राजकुमार

दूसरे प्यार के बीच
होता है महा-राशि जल
और एक टूटा हुआ पुल
पहले प्यार की तरह
दूसरे प्यार में
नहीं होती ऐसी सड़क
जिसके दूसरे छोर पर कोई न हो

वास्तव में
दूसरे प्यार तक हो जाते हैं हम इतने व्यावहारिक
कि संभलकर चलते हैं सारे दांव
और दूसरा प्यार बना देता है हमें इतना बनिया
कि मुनाफ़ाखोर हो जाता है प्रेम

दूसरे प्यार का ढ़ोंग सिर्फ़ वो करते हैं
जो बार-बार पड़कर प्यार में
खो देते हैं उसका अर्थ
या वो बेचारे जिन्हे
मिला ही नहीं होता पहला प्यार

16 comments:

'अदा' said...

सब सच है...
भेदता सा....पर सच है..

'अदा' said...

सब सच है...
भेदता सा....पर सच है..

गिरिजेश राव said...

धन्य हुए प्रभु एक अनछुए विषय पर इतनी सुन्दर, फ्रैंक, तथ्यपरक और संवेदनशील कविता पढ़वाने के लिए।
इस कविता को चर्चा वालों को पहले नम्बर पर रखना चाहिए। जाने कितने अनकहे संकेतों को उजागर करती है ये कविता।
हार्दिक धन्यवाद।

अभिषेक ओझा said...

बड़े दिनों बाद. दुसरे प्यार का अनुभव तो नहीं :) पर ये नया कंसेप्ट सा लगा...

Udan Tashtari said...

उत्कृष्ट रचना!!

सागर said...

सर्वथा सत्य वचन... सत्य कविता है एंड वाइस वरसा...

डॉ .अनुराग said...

बहुत दिनों बाद खामोशी तोडी.........पर वो भी बेमिसाल .शब्दों के साथ.....

डॉ .अनुराग said...

बहुत दिनों बाद खामोशी तोडी.........पर वो भी बेमिसाल .शब्दों के साथ.....

सुशील कुमार छौक्कर said...

पहले प्यार और दूसरे प्यार के बीच के सच को सादे सुन्दर शब्दों से लिख दिया आपने। अद्भुत।
ऐसा भी लगा कि शायद आपके ही ब्लोग पर इसे कहीं पढा था। पर हो सकता है भ्रम हो क्योंकि कई लोग मिलते है तो लगता है कि शायद इनसे तो मिले हुए है। सच कुछ लोग होते है जो कम लिखते पर जब लिखते है तो बहुत खूब लिखते है। उन्हीं में से आप एक हो।

अजेय said...

महेन भाई हमें तो रोज़ किसी न किसी से प्यार हो जाता है, आप कहाँ दूसरे का रोना रो रहें हैं....? par kavitaa sundar hai.

रंगनाथ सिंह said...

श्रीमान जी दूसरा प्यार शीर्शक से खींचा चाला आया था। उम्मीद से कहीं ज्यादा सुदंर रचना है। बहुत ही सुंदर कविता है। मैंने इसे अपने ब्लाग पर लगाया है। सुंदर कविता के लिए बधाई स्वीकार करें।

सागर said...

इस कविता को जितनी बार पढता हूँ नया सा लगता है... मैं इसे एक ऐतिहासिक कविता कह सकता हूँ... जो सर्वदा प्रासंगिक है...

varsha said...

दूसरे प्यार का ढ़ोंग सिर्फ़ वो करते हैं
जो बार-बार पड़कर प्यार में
खो देते हैं उसका अर्थ
या वो बेचारे जिन्हे
मिला ही नहीं होता पहला प्यार
perfect.

Shashwat said...

लाजवाब

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

सागर का आभार... उसकी वजह से ये कविता पढने को मिली...
नही पता था कि किसी ने ’दूसरे प्यार’ पर भी लिखा है... शाम बन गयी महेन जी.. बहुत सुन्दर..

vandana gupta said...

वास्तव में
दूसरे प्यार तक हो जाते हैं हम इतने व्यावहारिक
कि संभलकर चलते हैं सारे दांव
और दूसरा प्यार बना देता है हमें इतना बनिया
कि मुनाफ़ाखोर हो जाता है प्रेम

लाजवाब अभिव्यक्ति