Friday, 13 March 2009

नोस्टाल्जिया का नशा

कभी किसी नये रास्ते से गुज़रते हुए पुरानी सी महक नासापुटों में पैठती है तो आदमी वहां पहुँच जाता है जहाँ से वह बहुत पहले गुज़र चुका है। एक छोटी सी तान से अकसर सालों का फासला तय करके वही क्षण वापस आ खडा होता है जिसे भुला दिया गया था या जिसे हम डायरी के पुराने पन्ने पर धूल फांकने के लिए छोड़ आये थे। बीते ज़माने में दोस्तों की टांगों का तकिया बनाकर नीमनशे में बुझती आखों के लैंपपोस्ट से पढ़ी कोई कविता दोबारा नज़रों के सामने गुज़र जाए तो यकायक वो भूले नाम दिमाग में धींगामुश्ती करने लगते हैं, जिनका इन बीच के सालों में कोई ज़िक्र ही नहीं उठा। कभी यूँ भी होता है कि इत्र या डेओ की महक से बरबस कोई याद आ जाता है जिसे भुलाना अपने आप में ताजमहल खड़ा कर लेने से कम नहीं रहा होगा। और तो और एक पुराना इश्तेहार अगर बजने लगता है तो अपने साथ जाने कितने वाकये ज़िन्दा कर देता है या रसोई में दाल में लगा तड़का भी लंबा सफर तय करा लाता है कई बार।

नोस्टाल्जिया कई तरह का होता है। याद के कई दरवाज़े होते हैं और याद कई सूत्रों से जुड़ी होती होगी, तभी तो कभी कभी बेतार की तार से कुछ अप्रत्याशित याद आ जाता है। जैसे मेरे साथ तो कुछ यूँ है कि कभी-कभी खड़ी कटी हुई मूली देखकर मुझे बचपन के सर्दियों के दिन या आ जाते हैं जब मैं अपने दिल्ली के घर के बगीचे से ताज़ी मूली खोदकर दाल-चावल के साथ घर की देहरी में बैठकर बड़े चाव से खाता था। कई बार कोशिश की मगर वह समां रिवाइव नहीं हो पाया। सुबह सुबह की हवा की ताज़गी और महक झट उन दिनों में पंहुचा देती है जब गर्मियों की सुबह उठकर ६-७ किलोमीटर फुटबाल स्टेडियम तक फुटबाल खेलते हुए जाया करते थे या उन दिनों की जब दिल्ली की सड़कें कमोबेश खाली हुआ करती थीं और सुबह सुबह डी टी सी की बसों से दोस्त के साथ मिलकर रेसिंग साइकिल पर होड़ लगाया करता था। अस्बसटस की छत वाली इमारतें देखकर कालोनी का म्युनिसिपलिटी का वो स्कूल याद आता है जहाँ टाट-पट्टी पर बैठकर दुनियादारी के पहले सबक लिए थे। वो स्कूल आज भी वहीं खड़ा है और जब मौका लगता है दिल्ली जाकर देख आता हूँ मगर सरकार ने व्यापार करने से क्या हाथ झाडे, वो सरकारी कालोनी ही गिरा दी गई जहाँ बीस-बाईस साल गुजारे। सालों इस्तेमाल न किए गए रबर के छोटे से पुर्जे की महक से पिताजी की पहली और अब तक की आखरी फिएट के अन्दर की रबरी आबो-हवा याद आ जाती है जो इस पीढी की कारों में कतिपय ही उपलब्ध है।


नोस्टाल्जिया कैसा भी हो सकता है, किसी भी चीज़ का, किसी भी बात का या किसी भी बात से। मसलन कतार से खड़े नारियल के पेड़ देखकर केरल में बिताये दिन याद आते हैं और हरियाले झुरमुट को देखकर गाँव की याद आती है। यह तो फ़िर भी तार्किक लगता है, मेरी श्रीमती को तो बारिश के बरसने से दिल्ली में माँ के हाथ के बने पकोडे तक याद आते हैं। नोस्टाल्जिया का कोई सर-पैर होना कतई ज़रूरी नहीं। ये बेबात की बात मुझे युहीं नहीं सूझी। हुआ कुछ यूँ कि कुछ सालों से चली आ रही परम्परा को तोड़ते हुए मैंने दो हफ्ते पहले बीयर की कैन लेने की बजाय बोतल ले ली। बचपन में जब पिताजी बीयर पीते थे तो उस दौर में बोतल ही मिला करती थी। पिताजी बीयर को कांच के गिलास में उड़ेला करते थे। गिलास की तली और दीवारों से फुदककर तैरकर ऊपर जाते और अंततः हवा में विलीन होते हवा के बुलबुले मुझे बाँध लेते। किताबें परे सरकाकर मैं देर तक वो प्रक्रिया देखता रहता था। मद्धम पीले रंग में मुझे दो चीज़ें बेहद पसंद रही हैं। एक तो बीयर का रंग और दूसरा माकूल लैंप शेड के बल्ब की पीली रौशनी। दोनों का नशा पुरजोर होता है। ऐसी ही मद्धम पीली रौशनी में देखे पहले पहला नाटक "रक्त-कल्याण" का वातावरण भी शायद इसी वजह से नहीं भूलता। खैर, मुझे लगता है कि बीयर से मेरी मुहब्बत का आगाज़ भी उसी किसी वक़्त हुआ होगा पिताजी के गिलास में बीयर देखकर। गौना होने में ज़रूर कुछ साल लग गए। जब कायदे से घर पर बैठकर बीयर पीनी शुरू की तो सबसे पहले एक बोन चाइना का बीयर मग लाया। पारदर्शिता के अभाव में उससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले तो उसे विस्थापित करने के लिए कांच के दो बीयर मग आ गए, जो आज तक चल रहे हैं। बीयर को गिलास में देखकर जो सुरूर होता था वह उसे पीकर कभी नहीं हुआ। फ़िर धीरे धीरे बोतल की जगह कैन ने ले ली और सुरूर सिर्फ़ पीने तक सीमित हो गया। कैन बोतल से इसलिए जीत गई क्योंकि मुझे एक बार में 650ml बीयर पीना पसंद नहीं और बोतल में यह स्वतंत्रता नहीं रहती। दो हफ्ते पहले अचानक सोचा कि यु बी एक्सपोर्ट पी जाए। यह बीयर अक्सर सिर्फ़ बोतल में ही उपलब्ध होती है और इसके कैन मिलना मुश्किल होता है। साथ ही किंगफिशर की नई किंगफिशर ब्लू भी ले आया। नीले को मादकता का पर्याय माना गया है। सोचा कि देखें नीली बीयर मादकता पैदा कर पाती है या नहीं। मेरी मत कहाँ गई थी जो सोच बैठा कि किंगफिशर ब्लू नीली होगी। वह तो पीली ही निकली। खैर, जब बीयर मग में उड़ेली तो उसमें से उठते हुए बुलबुले देखकर मैं बेतरह नोस्टालजिक हो गया। पिताजी की बीयर से लेकर अपनी सैंडपाईपर और कार्ल्सबर्ग तक सब याद आ गया। मोहल्ला गुंजायमान कर देने वाले दोस्तों के बीयर-दारु-प्रदत्त ठहाके भी याद आ गए। अफ़सोस ये सब ऐसे वक़्त में हो रहा है जब मैं बीयर की अपनी डोज़ द्विसाप्ताहिक कर चुका हूँ और उसपर भी भारी राशनिंग लगा चुका हूँ।

18 comments:

डॉ .अनुराग said...

दरअसल ये नोस्टाल्जिया ही है जो कंक्रीट की बड़ी बड़ी रंग बिरंगे शीशे दार इमारतों के पीछे ओर बिजली के तारो पे चलती इस बेदर्द दुनिया में हम जैसे दीवानों को जिंदा रखता है ओर दिल को धड़कने का सबब देता है........ओर दिल धड़कता है आहिस्ता आहिस्ता.......

poemsnpuja said...

ek cheez ka nostalgia main bhi add kar rahi hoon. wo hai geeton ka nostalgia...kisi ko impress karne ke liye barson riyaj karke gaye gane ka nostalgia, ya kisi ka hamein dekh kar gaye gaye geet ka nostalgia.
kuch geet to bas mahaul ke karan yaad rah jaate hain jismein pahli baar sune gaye.
bada nostalgic ho gaye aap ko padh kar, bade kareene se likha hai yaadon ko.

mehek said...

kyakya na yaad dila diya es post ne,hame gili mitti ki khushbuka nasha hai,aur bhigi ret sagar ka aani,khair,behad umda post rahi,ji halka halka hua.bahut badhai.

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

नोश्टाल्जिया के लिये सुकून और इफरात का समय होना चाहिये। आपाधापी का माहौल उसे रुचता नहीं।

शिरीष कुमार मौर्य said...

महेन प्यारे मैं बीयर का बेहद दीवाना हूं पर उससे मेरा वज़न बढ़ता है!

पता नहीं यह तथ्य कहां तक सच है कि बीयर से वज़न बढ़ता है!

अपने राम कल एक पेटी लाने वाले हैं और इसका पूरा श्रेय तुम्हारी इस पोस्ट को जाता है!

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अब तो आप अगर दिल्ली के बारे में ऐसी बातें करेंगे तो बच्चे आपकी दिमाग़ी हालत पर तरस ही खाने लगेंगे.

ओम आर्य said...

aapki hin in panktiyon ko aapke najar kar raha hoon jo ab padhne ke baad meri apni hai.

बीते ज़माने में दोस्तों की टांगों का तकिया बनाकर नीमनशे में बुझती आखों के लैंपपोस्ट से पढ़ी कोई कविता दोबारा नज़रों के सामने गुज़र जाए तो यकायक वो भूले नाम दिमाग में धींगामुश्ती करने लगते हैं, जिनका इन बीच के सालों में कोई ज़िक्र ही नहीं उठा।

महेन said...

तो शिरीष भाई, मेरा भी उस पेटी पर कुछ हक बनता है. संभल कर रखना. गाँव जाने के कुछ आसार बन रहे हैं... साथ बैठकर ताल में पांयचे डुबाकर टल्ली होंगे.

सुशील कुमार छौक्कर said...

ये पोस्ट तो कल ही पढ ली थी। पर जब कमेट करना लगा तो नेट चला गया। फिर सोचा थोडी देर बाद कर देगे। पर फिर ध्यान नही रहा। पर आज जब दरियागंज गया किताबों के बाजार में तो वहाँ बीच मार्किट में एक बोर्ड टंगा मिला जिस पर लिखा था कि ठंडी बीयर। उसे पढते ही आपकी याद आ गई। और कल की पोस्ट भी। फिर सोचा कि इस बाजार पर एक पोस्ट लिखी जा सकती है कुछ ख्याल भी दिमाग आ गए। अगर लिखी गई तो आपका जिक्र भी आऐगा। कुछ इस तरह से कि ठंडी बीयर को देखकर महेन जी हमें छोड चले गए नीली बीयर ढूढने। अगर आप इजाजत दे तो। और हाँ कुछ दिन पहले हमारा छोटा भाई कह रहा था कि भाई रिलांयस में बीयर की कैन आने लगी है। पीनी चाहिए। आपके के लिए लाऊँ। खैर ये सब .....। वैसे हमें नही पता कि नोस्टाल्जिया क्या होता है पर एक चीज कह सकता हूँ कि दो ब्लोग को पढने तुरंत दोड़ जाता हूँ जैसे ही इनकी कोई पोस्ट आती है एक आपका और दूसरा अनुराग जी का। अरे कमेट तो बहुत बडा हो गया............

ANIL YADAV said...

आज से भागने की बीमारी है। यादाश्त अच्छी हुई तो और भी क्रॉनिक।

ravindra vyas said...

बड़ी मुश्किल हो रही है। समझ नहीं आ रहा कि काम करता रहूं या निकल पड़ूं... सुनहरी आभा और वह श्वेत धवल झग झग...

Ek ziddi dhun said...

ये नोस्टेलिजया कमबख्त बड़ी प्यारी और जानलेवा बीमारी है। कसम से शुरू के कई पैरे तो मैं सोचता ही रहता हूं। कोई गंध, वक्त का टुकड़ा, हवा का झोंका, जगह, कोई जानवर उदास करके छोड़ देता है।
कई बार ये उदासी लंबी खिंच जाती है और सांस अटका देती है और कई बार ये लंबे वक्त तक नहीं आती तो सांस लेना फिज़ूल लगने लगता है।

रवीन्द्र दास said...

gad-gad ho gaya.
yahi to samuhik nasamajhi hai jo hamsabko bandh ke rakhti.

अभिषेक ओझा said...

'नोस्टाल्जिया कई तरह का होता है।'तभी तो हम 'वो कागज की कश्ती' आज भी बिना सेंटी हुए नहीं सुन पाते.

गौतम राजरिशी said...

आपकी लेखनी का दीवाना हो गया साब...
एंड नाऊ फिलिंग नोस्टाल्जिक...

मुनीश ( munish ) said...

Dear Mahen,
I feel Beer is essentially an outdoor drink and itz class apart . I can do a compartive study of Vodka v/s rum V/s gin v/s Brandy even. Whisky i don't like generally.Beer,however, is unique. When it comes to brands ,i'll say try Kalyani Black Label. It is a UB product and u'll c the difference.Among the foreign ones i think Haakebeck and Foster's are pretty good.Among Indian ones even Sandpiper is nice . I don't know u smoke or not ,but itz not the complete experience without a fag or two.Hey nice blog yaar!

हर्षवर्धन said...

नॉस्टैल्जिया तो अजीब होता है कोई भूली हुई फोटो दिख जाए तो, खैर यही सब जिंदगी में जीवन प्रवाह बनाए रखता है।

महामंत्री - तस्लीम said...

नोस्‍टाल्जिया ही क्‍या किसी भी चीज का नशा, नशा ही होता है।

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SBAI TSALIIM