Wednesday, 11 February 2009

संशय के बाद

अपने डर को छुपाकर उसे
लिखने थे प्रेमगीत
किसी को दिखानी नहीं थीं
अपनी कंपकंपाती उँगलियाँ
और उन उँगलियों के बीच
उलझा संशय
उसकी आत्मा अब भी गीली थी
प्रेम और उसके इतिहास की भाप में
उसे प्रेम के दुश्चक्रों से बाहर निकलना था
खुद को दिए दिए फिरना कुछ भी हो
उसे इनकार हो चला था
उसके प्यार हो पाने से
जिन्होंने गढा था यह फिकरा
उनके लिए कोई जगह नहीं थी
उसकी कविता में
यही उसका प्रतिशोध था
उसने ठान लिया था
अपने निरुद्देश्य प्रेम की तरह उसे
नहीं लिखनी थी निरुद्देश्य कवितायें

11 comments:

आवारा प्रेमी said...

उसे लिखे थे प्रेम गीत.
अच्छी कविता है.

Mired Mirage said...

हम्म! क्या कहूँ ? प्रतिशोध में भी कविता लिखी जा सकती है, प्यार में भी।
घुघूती बासूती

अल्पना वर्मा said...

प्रेम..कांपती उँगलियाँ..भीगी आत्मा..संशय..प्रतिशोध..और कविता का निरुद्देश्य होना..

सब कुछ एक लय में बंधा दिखा.

बेहद सुन्दर प्रस्तुति..

मीत said...

Hm. Makes sense boss. Bahut mushqil kaam hai kavita karna.... bahut sahi likha hai.

डॉ .अनुराग said...

जिन्होंने गढा था यह फिकरा
उनके लिए कोई जगह नहीं थी
उसकी कविता में
यही उसका प्रतिशोध था
उसने ठान लिया था
अपने निरुद्देश्य प्रेम की तरह उसे
नहीं लिखनी थी निरुद्देश्य कवितायें






अच्छा लगा तुम्हारी वापसी देखकर .बीच में कहाँ गुम हो जाते हो ......पर अगर ऐसी कविता के साथ लौटेगे तो कोई शिकायत नहीं

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

मैं समझ न पाया। बेलाग सच तो शायद गद्य में लिखा जाता है।
बुरा न मानें - मैं सोचता था कि कविता तो भावनाओं पर अच्छी पैकेजिंग चढ़ाती है।

सुशील कुमार छौक्कर said...

उसने ठान लिया था
अपने निरुद्देश्य प्रेम की तरह उसे
नहीं लिखनी थी निरुद्देश्य कवितायें

गज़ब।
कल ही सोच रहा था कि कई दिन हो गए महेन जी का लिखा हुआ पढे। फिर देखा तो पूरा एक महीना हो गया। खैर आज पोस्ट आ ही गई।

neeshoo said...

महेन जी अति सुंदर कविता ।पढ़कर आनंदित हुए । बधाई

महेन said...

धन्यवाद दोस्तों...
मैं आलसी हूँ और आजकल वक़्त की कमी पैसे की कमी से भी बड़ी हो गई है डागटर साब. दोस्तों की पोस्ट पढने का भी वक़्त नहीं मिलता.
ज्ञान जी... कुछ लोग उलझाऊ प्रवृति के होते हैं और लिखते भी वैसा ही हैं. मैं भी शायद उसी तरह का हूँ. पैकेजिंग चढ़ाने में गडमड हो जाता हूँ. सीख रहा हूँ बात तो प्रभावी तरीके से कहना.

shyam kori 'uday' said...

... सुन्दर रचना।

bhootnath( भूतनाथ) said...

अब तो हम भी यही सोच रहे हैं कि कुछ लिखे कि ना लिक्खें......!!