अपने डर को छुपाकर उसे
लिखने थे प्रेमगीत
किसी को दिखानी नहीं थीं
अपनी कंपकंपाती उँगलियाँ
और उन उँगलियों के बीच
उलझा संशय
उसकी आत्मा अब भी गीली थी
प्रेम और उसके इतिहास की भाप में
उसे प्रेम के दुश्चक्रों से बाहर निकलना था
खुद को दिए दिए फिरना कुछ भी हो
उसे इनकार हो चला था
उसके प्यार हो पाने से
जिन्होंने गढा था यह फिकरा
उनके लिए कोई जगह नहीं थी
उसकी कविता में
यही उसका प्रतिशोध था
उसने ठान लिया था
अपने निरुद्देश्य प्रेम की तरह उसे
नहीं लिखनी थी निरुद्देश्य कवितायें
11 टिप्पणियाँ:
उसे लिखे थे प्रेम गीत.
अच्छी कविता है.
हम्म! क्या कहूँ ? प्रतिशोध में भी कविता लिखी जा सकती है, प्यार में भी।
घुघूती बासूती
प्रेम..कांपती उँगलियाँ..भीगी आत्मा..संशय..प्रतिशोध..और कविता का निरुद्देश्य होना..
सब कुछ एक लय में बंधा दिखा.
बेहद सुन्दर प्रस्तुति..
Hm. Makes sense boss. Bahut mushqil kaam hai kavita karna.... bahut sahi likha hai.
जिन्होंने गढा था यह फिकरा
उनके लिए कोई जगह नहीं थी
उसकी कविता में
यही उसका प्रतिशोध था
उसने ठान लिया था
अपने निरुद्देश्य प्रेम की तरह उसे
नहीं लिखनी थी निरुद्देश्य कवितायें
अच्छा लगा तुम्हारी वापसी देखकर .बीच में कहाँ गुम हो जाते हो ......पर अगर ऐसी कविता के साथ लौटेगे तो कोई शिकायत नहीं
मैं समझ न पाया। बेलाग सच तो शायद गद्य में लिखा जाता है।
बुरा न मानें - मैं सोचता था कि कविता तो भावनाओं पर अच्छी पैकेजिंग चढ़ाती है।
उसने ठान लिया था
अपने निरुद्देश्य प्रेम की तरह उसे
नहीं लिखनी थी निरुद्देश्य कवितायें
गज़ब।
कल ही सोच रहा था कि कई दिन हो गए महेन जी का लिखा हुआ पढे। फिर देखा तो पूरा एक महीना हो गया। खैर आज पोस्ट आ ही गई।
महेन जी अति सुंदर कविता ।पढ़कर आनंदित हुए । बधाई
धन्यवाद दोस्तों...
मैं आलसी हूँ और आजकल वक़्त की कमी पैसे की कमी से भी बड़ी हो गई है डागटर साब. दोस्तों की पोस्ट पढने का भी वक़्त नहीं मिलता.
ज्ञान जी... कुछ लोग उलझाऊ प्रवृति के होते हैं और लिखते भी वैसा ही हैं. मैं भी शायद उसी तरह का हूँ. पैकेजिंग चढ़ाने में गडमड हो जाता हूँ. सीख रहा हूँ बात तो प्रभावी तरीके से कहना.
... सुन्दर रचना।
अब तो हम भी यही सोच रहे हैं कि कुछ लिखे कि ना लिक्खें......!!
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