Friday, 30 January 2009

मुझपे तेरे ये भरम जाने कितने झूठे होंगे

एक बार फिर देखा; वही पुरानी तस्वीरें, वही उलझी सी लिखावट वाले सलीके से तह किये हुए पत्र। वही लापरवाही से लिखे गहरे-हलके अक्षर। सब समेटकर बड़े से लिफ़ाफ़े में डाल दिये। बगल की फ़व्वारे की दुकान से लकड़ी के महंगे विंड-चाईम्स के खनकने की आवाज़ रह-रहकर गूँज उठती थी। छोटे-छोटे फव्वारों से पानी की अल्हड़ थिरकन उठकर माहौल को वैसे ही रोमांटिक बना रही थी जैसी पहले बनाया करती थी। उधर छोटे से रेस्तराँ में कोई बैरा को ऑमलेट के लिये आवाज़ लगा रहा था। सामने छोटे से मंच पर, जो आजतक अपनी पहली प्रस्तुति के लिये तरस रहा था, बड़ा सा मटमैला सफ़ेद पड़ा परदा लटक रहा था। उसके पीछे एक कोने से बेतरतीब पड़े लकड़ी के बेंच झाँक रहे थे, जिन्हें किसी ने यूँही निरुद्देश्य वहाँ छोड़ दिया था। उनपर धूल की इतनी मोटी परत जमी हुई थी कि लगता था जैसे वे बने ही मिट्टी से हों। मंच के बगल की दीवार पर गहरे हरे रंग की बेल पूरी चढ़कर अब छज्जी तक पहुँच चुकी थी। दर्शक-दीर्घा में पत्थर की सीढ़ियाँ घास से घिरी हुई थीं; ऐसी बेतरतीब घास जो पत्थर को भी निगल लेना चाहती हो। उसी घास पर मैनें वह लिफ़ाफ़ा फ़ैला दिया जो पिछले दो सालों से मेरे हिस्से की तरह मेरे साथ रहा था। मेरे पसीने और उसके जिस्म की महक के अलावा त्रिवेणी की उस दर्शक-दीर्घा की घास की पनियायी महक भी इस लिफ़ाफ़े का हिस्सा थी, जहाँ वह मेरे साथ इस कदर सुरक्षित महसूस करती थी कि अंधेरा घिरने पर भी कभी घर जाने की जल्दी नहीं मचाती थी। जब भी हम मिले त्रिवेणी कला संगम ही हमारा अड्डा रहा और यही दर्शक-दीर्घा हमारे बैठने की जगह। वहाँ जो रोज़ आने-जाने वाले लोग थे वे हमें दर्शक-दीर्घा वाला जोड़ा कहते थे, हालांकि जोड़ा हम किस हद तक थे मैं नहीं जानता। ऐसा कोई विचार भटकता हुआ भी मेरे पास कभी नहीं आया। मैं हमेशा से जानता था कि मैं इस कहानी में पहला तो क्या दूसरा भी नहीं हूँ। सुविधा कहें या नैतिकता या मात्र प्रेम, किनारे मुझे ही लगाया जाएगा, यह मैं पहले ही दिन से जानता था।

“मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं अभी।” मैनें पहली बार उसे खुद के आफ़िस के लोगों के साथ शिमला न जाने का कारण बताया। इतने दिनों तक मैं सबको कहता रहा कि मैं खुद पहाड़ी हूँ; मुझे क्या ज़रूरत है पैसे खर्च करके पहाड़ देखने की, मगर उनकी ज़िद थी कि अगर ट्रिप पर जाएँ तो सब जाएँ। मुझे सच में जाने की इच्छा नहीं थी। सारे पहाड़ एक से ही होते हैं और फ़िर मेरे पास सच ही में पैसे नहीं थे। किराया, राशन और बाकी का खर्चा मिलाकर मेरे पास बचता ही क्या था। फ़िर घर पर भी पैसे भेजने होते थे और फ़ीस के पैसे बचाने होते थे सो अलग।


“देखिये, सिर्फ़ दो हज़ार रुपए की बात है।” उसने कहा। मुझे समझ नहीं आया कि उसे कैसे समझाऊँ कि दो हज़ार रुपए मेरे लिये कारूं के ख़ज़ाने से कम नहीं है, मगर क्या कहता; सिर्फ़ मुस्कुरा दिया। जब उसने हार मानने से इंकार कर दिया तो मुझे संक्षेप में उसे अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बताना पड़ा।
“हम्म्म।” बस इतनी सी आवाज़ उसने निकाली और कुछ सोचती हुई चली गई। मैनें राहत की सांस ली। किसी की भी ग़रीबी ऐसा मुद्दा है जिसे कोई भी रातों-रात नहीं मिटा सकता। इस विचार ने मुझे राहत दी कि अब मैं बच जाऊँगा। मगर थोड़ी ही देर में वह वापस आकर मेरे पास खड़ी हो गई। मैं अपने काम में इतना डूबा हुआ था कि मुझे उसके आने का पता ही नहीं चला। तबतक सारे लोग, जो चाय पीने के लिये पेंट्री में गए हुए थे, वापस आ चुके थे। जब मेरा ध्यान उसकी ओर गया ही नहीं तो उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। फ़िर मेरे कान के पास मुँह लाकर बोली, “आप एक मिनट मेरे साथ आएँगे?”

मैं उत्सुकतावश उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। दफ़्तर में ट्रेनिंग रूम के साथ एक छोटा सा खुला केबिन होता था जहाँ लोग बतियाने के लिये बैठा करते थे। हम सब लंच भी वहीं किया करते थे। वह वहाँ एक कुर्सी पर बैठ गई और मैं अपनी आदत के मुताबिक उसके सामने मेज़ पर बैठ गया। मुझे बहुत हैरानी हुई जब उसने मुझे बताया कि वह सिर्फ़ यह सोचकर जाने के लिये तैयार हुई थी कि मैं भी जाऊँगा। मैं उसे ठीक से नहीं जानता था मगर अच्छी लड़की थी यह अपने अन्तरज्ञान के आधार पर कह सकता था। मेरी अपनी व्यस्तताएँ इतनी होती थीं कि किसी के साथ ज़्यादा घुलना-मिलना मेरे लिये संभव नहीं हो पाता था, खासकर दफ़्तर में। सबसे एक तरह की दूरी बनाए रखना मेरे लिये संयत होकर काम करने में मददगार होता था। इस वजह से मैं हर साथी कर्मचारी से एक हद के बाद कटा हुआ रहता था। दूसरी ओर मेरी तटस्थ प्रवृति के कारण कई बार लोग मुझपर मेरे अनचाहे ही विश्वास करने लगते थे। ऐसी अनपेक्षित अपेक्षाओं से मैं भागता था। उसकी बात सुनकर भी चौंका मगर जानने की उत्सुकता भी थी।

मैनें पूछा, “मेरे जाने या न जाने से तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है? मेरा मतलब है, तुम्हारा कार्यक्रम मेरे होने से क्यों निर्धारित होगा?”
वह मेरे बेबाक सवाल पर हँस पड़ी, “ग़लत मत समझिये। मुझे यहाँ लोग खास पसंद नहीं हैं। सिर्फ़ एक-आध हैं जो सही किस्म के लगते हैं और आप उनमें सबसे पहले हैं।”
“अच्छा तो मुझे अपने सही होने की कीमत चुकाने के लिये कहा जा रहा है?” मैनें हलके अंदाज़ में कहा।
वह खुलकर हँसी, “आपका सेंस आफ़ ह्यूमर काफ़ी अच्छा है।”
“प्रत्युन्नमति”, मैं बोला।
“क्या? प्रत्युन्नमति? ये क्या होता है?” उसने पूरी सुलभता से पूछा।
मैनें कहा, “सेंस आफ़ ह्यूमर।”
“उसे सेंस आफ़ ह्यूमर ही रहने दीजिये न। अच्छा, फ़िलहाल अगर आप बुरा न मानें तो मेरे पास एक सुझाव है। आपकी मर्ज़ी है अगर आपको पसंद न आए तो आप मना भी कर सकते हैं। पर मैं सचमुच चाहती हूँ कि आप साथ चलें।” उसने कहा।

मैं सुनने को उत्सुक था। आखिर पहली बार कोई मेरे साथ कहीं जाना चाहता था या बेहतर शब्दों में कहूँ तो मुझे अपने साथ ले जाना चाहता था। मैंने कहा, “बताओ। बुरा लगेगा तो कह दूँगा।”
वह बोली, “देखिये अगर बात सिर्फ़ पैसों की है तो मैं आपकी मदद कर सकती हूँ। आप मुझसे पैसे ले लें और जब भी सुविधा हो लौटा दीजियेगा।”
“ऐसे अवसरों पर मैं पारंपरिक औपचारिकता परे सरका देता हूँ। मुझे क्या आपत्ति हो सकती है सिवाय इसके कि मैं नहीं जानता कि तुम्हें पैसे लौटाने की क्या जुगत भविष्य में कर पाऊँगा। अगर ऐसी ही हालत रही तो यह लौटाना शायद कभी न हो पाए।” मैनें कहा।
जवाब में उसने एक श्लोक सुनाया, जो उसके बार-बार दोहराने की वजह से मुझे अच्छी तरह से रट गया था। आज भी जस का तस याद है;

“यानि कानि च मित्राणि, कृतानि शतानि च।
पश्य मूषकमित्रेण, कपोता: मुक्तबन्धना:॥”

फिर उसने मुझे इसका अर्थ भी समझाया, “सैकड़ों मित्र बनाने चाहिये। मित्र चूहे की सहायता से ही कबूतर बन्धन से मुक्त हो गए थे।”
“तो हममें से चूहा कौन है और कबूतर कौन?” मैनें उसके मुँह से श्लोक निकलने की हैरत के बावजूद हलके अंदाज़ में पूछा।
“इससे फर्क पड़ता है क्या?”


अरज :- कुछ महीनों पहले यूँही कुछ लिखने का सोचा था जिसका यह पूर्वार्ध है। अब चूंकि बात पुरानी हो चुकी है और विचार बदल चुका है इसलिए इसे आगे बढ़ाने का कोई विचार नहीं। इस अंश को यूँही पोस्ट कर दिया। आप चाहें तो गरिया-लतिया भी सकते हैं कि यूँही आपका वक़्त जाया किया।

10 comments:

अल्पना वर्मा said...

इतने अंश से एक बात पता चली..
“यानि कानि च मित्राणि, कृतानि शतानि च।
पश्य मूषकमित्रेण, कपोता: मुक्तबन्धना:॥”
लेकिन दोस्त बनाना आसान है-निभाना कठिन!इस का भी कोई श्लोक कहीं होगा??

फिर ट्रिप पर जा पाए या नहीं???आगे जारी रखें..

poemsnpuja said...

is khyal ko yahan chod diya thik hai...par aage wali kahani kab dekhne ko milegi?
flow bahut accha hai...jeeta jaagta, sans leta hua sa.khoobsoorat kahani hai.

डॉ .अनुराग said...

ऐसा करो आज रात कुछ ख्यालो को वापस शाम साथ बिताने के लिए बुला लो...अच्छा लगेगा अगर इसे अंजाम मिला तो.....
वैसे भी तुम उन लिखने वालो में से हो....जो बहुत अच्छा लिखते है ओर जितने पाठको तक पहुचना चाहिए नही पहुँच पा रहे......
बहुत खूबसूरत है दोस्त

Gyan Dutt Pandey said...

अच्छा ही लिखा है।
हमें कोई श्लोक सुनाने वाली मित्र न मिली, और अब क्या मिलेगी?!

Mired Mirage said...

आगे बढ़ाने का विचार कर ही डालिए। अब तक की कहानी रोचक लगी। आगे क्या हुआ जानने की उत्सुकता है।
घुघूती बासूती

सुशील कुमार छौक्कर said...

महेन जी, दर्शक दीर्घा वाले जोड़े को आज भी वो त्रिवेणी की हरी घास बुला रही है कि कब आओगे। वह अभी भी वैसे ही दिलों को लुभा रही है निस्वार्थ। और हाँ कोई दूसरा ख्याल पुरानी यादों में से निकाल लाईए। मेघदूत,कमानी,या फिर एल टी जी से जुड़ा कोई ख्याल ही कह दीजिए बस इस खुमारी को उतरने मत दीजिए। आपने जो पहले ही दिन से शब्दों और भावों की खुमारी चढ़ाई है उस खुमारी को बस बढाते जाईए।

अभिषेक ओझा said...

शुरू से बंधे हुए चल रहे थे... परिवेश में पुरी तरह डूबे हुए.


और जाते-जाते चूहा या कबूतर होने से क्या फर्क पड़ता है इस पर भी थोड़ा दिमाग ने जोर लगाया !

आपकी गरियाने-लतियाने वाली बात पर बहुत सोचा लेकिन ऐसा कहीं नहीं लगा की वक्त जाया हो गया हो. और लिखिए भाई हम हैं ना... अपनी कहानी लगने लगती है आपकी हर पोस्ट.

Tarun said...

बहुत रोचक लिखा है महेन दाज्यू

पुनीत ओमर said...

सच कहूं तो मै कुछ और ही उम्मीद कर रहा था, पर आप तो बात बीच में ही अधूरी छोड कर चल दिये.

sandhyabarya said...

please is kahani ko jari rakhe ....
bahut badhiya
thanks