Friday, 23 January 2009

"बैले दे ज़ू" देखकर पीयर के लिए

इससे तो बेहतर है
अनजान लोगों से बतियाया जाए कुछ भी
किताबों में घुसा लिया जाए सिर
एक के बाद एक चार-पांच फ़िल्में देख डाली जाएं
पूरी रात का सन्नाटा मिटाने के लिये
टके में जो साथ हो ले
ऐसी औरत के साथ काटी जाए दिल्ली की गुलाबी ठंडी शामें
गुलमोहर के ठूँठ के नीचे
या दोस्तों को बुला लिया जाए मौके-बेमौके दावत पर

तुम्हे प्यार करते रहना खुद से डरने जैसा है
और डर को भुलाने के लिये जो भी किया जाए सही है।

11 comments:

Parul said...

कहने जैसी बात नहीं है,बात तो बिल्कुल सादा है
दिल ही पर क़ुरबान हुए,और दिल ही को बीमार किया

मीना कुमारी

Nirmla Kapila said...

bhai khyaal achha hai shubh kaamnaayen

शिरीष कुमार मौर्य said...

बढ़िया - दो टूक कहने वाली कविता ! अच्छी लगी महेन।

विनय said...

bahut sundar

---आपका हार्दिक स्वागत है
गुलाबी कोंपलें

Gyan Dutt Pandey said...

कविता में सलाहें अच्छी हैं।
हम तो इस दशा में शुतुर्मुर्ग या छुईमुई बन जाते हैं। अनकम्यूनिकेटिव!

डॉ .अनुराग said...

तुम आदमी ऐसे हो.....बस कभी कभी लगता है पढ़कर फ़ौरन बात की जाये.....सचमुच !

सुशील कुमार छौक्कर said...

क्या कहे महेन जी,मार ही डाला। अद्भुत।
दोस्तों को बुला लिया जाए मौके-बेमौके दावत पर

अजी बुलाओ ना।

poemsnpuja said...

dar ko bhulane ke liye jo bhi kiya jaaye sahi hai...kahin isliye blogging to nahin?

अभिषेक ओझा said...

'इससे तो बेहतर है'

'इससे' क्या ये सब तो हर चीज से बेहतर है !

महेन said...

टिप्पणियां पढ़कर मज़ा आया... सभी मित्रों को धन्यवाद... यह कवितांश लुईस बेन्युएल की फ़िल्म belle de jour को देखते हुए लिखी थी. पीयर से सद्भावना उमड़ने की वजह से... न तो यह तकलीफ मेरी है न ही मुझे फिलहाल ऐसा कोई दर्द है. दोस्तों से गुजारिश है कि इस फ़िल्म को एक बार ज़रूर देखें. वैसे इसके बारे में चित्रपट पर एक पोस्ट लिखने का विचार बन रहा है.

समर्थ वाशिष्ठ / Samartha Vashishtha said...

बढ़िया! एकदम।