Saturday, 10 January 2009

द्वितीय विश्व-युद्ध के रहस्यमयी हथियार - २


यह असंभव था कि जर्मनी के आत्मसमर्पण के बाद मित्रदेश मिलकर भी जापान पर काबू न पा सकते। ऐसे में अमेरिका के जापान के ख़िलाफ़ परमाणु हथियार प्रयोग किए जाने के क्या कारण हो सकते थे? दरअसल इवो-जीमा और ओकिनावा में जापान की सशक्त रक्षात्मक प्रणाली से बौखलाए अमेरिका को लगा कि यदि युद्ध इसी रूप में चलता है तो अकेले अमेरिका ही अपने दस लाख सैनिक तक गँवा सकता है जोकि उसे मंज़ूर नहीं था। इसी बौखलाहट के चलते सेना के विभिन्न अंग अलग-अलग तरह के उपाय सोच रहे थे। मुख्य रूप से दो उपाय अमेरिका के सामने थे और दोनों ही बेहद घातक। इनमे से एक कोई नई चीज़ नहीं था हालांकि उसका प्रयोग सीमित था और दूसरा विज्ञान का ताज़ा चमत्कार - ज़हरीली गैस और परमाणु बम।

ज़हरीली गैस का प्रयोग प्रथम विश्व-युद्ध के दौरान भी किया गया था और अगले बीस सालों में कई नई और ज़्यादा मारक गैसों की खोज की गई। मगर इनका प्रयोग इतना सीमित रहा कि उँगलियों पर ऐसे किस्सों को गिना जा सकता है। प्रथम विश्व-युद्ध में जर्मन, फ्रांस और ब्रिटिश सेनाओ ने इन गैसों का प्रयोग किया था और इसकी वजह से लगभग एक लाख लोग मारे गए। सबसे पहले जर्मन सैनिकों ने ज़हरीली गैस क्लोरीन का प्रयोग १९१५ में फ्रांसिसी सैनिकों के ख़िलाफ़ किया था। इस गैस को सफोकेटिंग गैस भी कहा जाता था क्योंकि यह फेफडों में घुसकर वहां तरलता पैदा कर देती थी और आक्सीजन को घुसने से रोक देती थी। इससे आदमी का दम घुट जाता था। इसके अलावा फोस्जीन और डीफोस्जीन का भी प्रयोग किया जाता था। मगर सबसे घातक मानी जाने वाली गैस ब्लिस्टर गैस थी जोकि दरअसल मस्टर्ड गैस (दिक्लोरेथिलसल्फाइड) थी। सर्वज्ञात है कि सद्दाम हुसैन ने इसी गैस का प्रयोग ईरानी सेना और ईराकी नागरिकों के ख़िलाफ़ अस्सी के दशक में किया था।

कुल मिलाकर ज़हरीली गैसों का प्रयोग दूसरे विश्व-युद्ध में बिल्कुल नहीं हुआ। इसके पीछे मुख्यतः तीन कारण थे; एक तो यह कि १९२५ में जिनेवा प्रोटोकॉल में ज़हरीली गैसों का युद्ध में प्रयोग निषेध कर दिया गया था। दूसरा यह कि हालांकि सभी देशों ने ज़हरीली गैसों का भण्डार खड़ा किया मगर उसका प्रयोग करने से यह सोचकर डरते रहे कि दूसरा देश भी उनके ख़िलाफ़ ज़हरीली गैसों का प्रयोग कर सकता है। मगर जो कारण सबसे प्रमुख है वह हिटलर का पहले विश्व-युद्ध के दौरान अपना निजी अनुभव था। १९१८ में बेल्जियम में लड़ते हुए हिटलर, जोकि उस समय जर्मन एम्पायर सेना में कोर्पोरल था, एक गैस हमले में फंस गया और तीन महीने के लिए अपनी आँखें गँवा दी। हिटलर के मन में इससे जो भय पैदा हुआ उसकी वजह से उसने, फ़्युह्रर बनने के बाद, साफतौर पर ज़हरीली गैसों के प्रयोग करने पर पाबन्दी लगा दी। यह बात और है कि बाकी सभी देशों की तरह जर्मन सेना भी ज़हरीली गैसें विकसित करती रही और उसका भण्डार खड़ा करती रही। यदि हिटलर के मन में ज़हरीली गैसों को लेकर भय न होता तो शायद दूसरा विश्व-युद्ध ज़्यादा घातक होता। क्योंकि किसी भी देश के इनके प्रयोग करने की स्थिति में अन्य देश अपने को रोक नहीं पाते और यह तय है कि हिटलर ज़रूर इनका प्रयोग करता। जिनेवा प्रोटोकॉल के बाद और दूसरे विश्व-युद्ध के शुरू होने के बीच भी एक-आध बार इन गैसों का प्रयोग किया गया था जैसे इटली ने इथोपिया में १९३५ में इनका प्रयोग किया जिससे लगभग १५००० लोग मारे गए। जापान एक ऐसा देश रहा जिसने १९३७ से लेकर १९४५ तक ज़हरीली गैसों का प्रयोग चीन के ख़िलाफ़ खुलकर किया। १९९५ में एक धार्मिक मत के आतंककारियों ने टोकियो के सबवे में एक गैस-हमला किया। इस हमले में ११ लोग मारे गए थे और कुल हताहतों की संख्या पाँच हज़ार से ज़्यादा थी। इस हमले में सरीन नामक गैस का प्रयोग किया गया था जोकि जापान ने ही दूसरे विश्व-युद्ध के दौरान खोजी थी और चीन में इसका प्रयोग भी किया था।

जापान के इन रासायनिक हथियारों के चीन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल की दूसरे विश्वयुद्ध ख़त्म होने के लगभग ४०-५० सालों तक ख़ास चर्चा नहीं हुई। १९९५ में कागानावा विश्वविद्यालय में कार्यरत प्रोफेसर काइची त्सुनाइशी के हाथ इम्पीरियल जापानी सेना का एक मेमोरेंडा लगा जिससे विश्व को जापान द्वारा चीन में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का पता लगा। जापानी सेना ने हिरोशिमा में तकरीबन ५० लाख गैस-शेल्स का उत्पादन १९३१ से १९४५ तक किया था। बाकी का उत्पादन चीन के मंचूरिया प्रान्त में किया गया। जब विश्व-युद्ध ख़त्म हुआ, उस समय भी चीन का काफ़ी बड़ा हिस्सा जापान के कब्जे में था। जब जापानी सेना लौटने लगी तो उन्हें महसूस हुआ कि ज़हरीली गैसों के भण्डार को, जो उन्होंने चीन में इकठ्ठा किया है, ठिकाने लगना ज़रूरी है। इस भण्डार को चीन में जगह-जगह गाड़ दिया गया। अगले चार दशकों तक इस भण्डार के बारे में किसी को पता नहीं चला। अस्सी के दशक के अंत तक संयोगवश ऐसे कई भंडारों का खुलासा होने लगा जिसके चलते चीन और जापान के राजनैतिक संबंधों में खटास पड़ने लगी। १९८९ में दोनो देशों में इन भंडारों को खोजने और नष्ट करने को लेकर बातचीत शुरू हुई और १९९९ में दोनों देशों ने एक मेमोरेंडम (Memorandum on the Destruction of Japanese Discarded Chemical Weapons in China Between the governments of the People's Republic of China and Japan) पर हस्ताक्षर किए। जापानी विदेश मंत्रालय के अनुसार १९९९ के अंत तक ऐसे सात लाख रासायनिक हथियार चीन में मौजूद थे जबकि चीन के अनुसार इनकी संख्या बीस लाख तक थी।

मानव-जाति को उन संयोगों और घटनाओं का ऋणी होना चाहिए जिनके कारणवश रासायनिक हथियारों का प्रयोग दूसरे विश्व-युद्ध में नहीं हुआ क्योंकि इनका प्रभाव अल्पकालिक नहीं होता। प्रथम विश्व-युद्ध के ख़त्म होने के बाद भी कितने ही लोग जो इन रासायनिक हथियारों के प्रभाव में आए थे, पूर्ण रूप से अपाहिज हो गए थे। ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं, ज़हरीली गैस कितनी भयानक हो सकती है इसका उदाहरण अपने देश में ही मौजूद है। भोपाल-त्रासदी को पच्चीस साल होने को आए मगर अभी तक उसकी भयावहता लोगों के ज़हन में ज़िन्दा है। वह भी तब जबकि वह कोई सैनिक अभियान नहीं था और mass-destruction करना भी वहां उद्देश्य नहीं था।

अगली पोस्ट में हम सबसे अधिक विनाशक और विवादस्पद परमाणु बम के बारे में चर्चा करेंगे।

पहला भाग यहाँ पढ़ें।

5 comments:

safat alam said...

बहुत ही अच्छे और मधूर लेख प्रस्तुत करते हैं आप, दिल की गहराई से बहुत बहुत धन्यवाद। खूब लिखें और लिखते रहें, हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं, और हम ईश्वर से आपकी सफलता के लिए प्रार्थना करते है।

Gyan Dutt Pandey said...

बहुत काम की जानकारी है पोस्ट में। धन्यवाद।

अभिषेक ओझा said...

ये श्रृंखला हद रोचक है... कम से कम मेरे लिए. ऐसी चीजों के बारे में एक बार विकिपीडिया के लूप में घुसता हूँ तो निकल ही नहीं पाता. अपने इंटेरेस्ट की बात चल रही है.

वर्षा said...

विनाशकारी चीजों की अच्छी जानकारी

Amit Singh said...

बहुत की रोचक ढंग से आपने जानकारी दी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! लिखते रहिये!