Tuesday, 6 January 2009

द्वितीय विश्व-युद्ध के रहस्यमयी हथियार


गाज़ा-पट्टी पर इज़राइल बमबारी कर रहा है। कल सुबह की चाय अख़बार में मृत बच्चे की तस्वीर देखते हुए पी। दिनभर समाचारों में भी मृत या घायल बच्चे दिखाए जाते रहे।

फ़िर एक मेल के जरिये पर्ल-हार्बर के हमले की तस्वीरें देखने को मिलीं और कल से बैठा हुआ nanking masscare के बारे में पढ़ रहा था। अचानक यह भ्रम टूटने को हुआ की हम पहले से बेहतर युग में जी रहे हैं। जाने कैसे वक्त के साथ-साथ यह धारणा मजबूत होती गई कि तमाम आधुनिकताओं से सज्जित मनुष्य का आज उसके कल से बेहतर है, मगर कुछ समय में यह भ्रम टूटा है। भटकते-भटकते हुए दिमाग जापान पर हुए परमाणु हमलों की ओर चला गया। अपनी और मित्र देशों के दस लाख सैनिकों की जान बचाने का ढोंग करने के लिए ट्रूमन ने तक़रीबन सवा दो लाख जापानियों को परमाणु बम के हवाले कर दिया, जिनमे से ज्यादातर नागरिक थे। संभवतः हिरोशिमा और नागासाकी अमेरिका के गिनी-पिग बन गए।

दूसरे विश्व-युद्ध के दौरान विज्ञान और तकनीक ने जिस गति से प्रगति की वह अचंभित करने वाला था, हालाँकि इस प्रगति के पीछे युद्ध में सफलता हासिल करना ही मुख्य उद्देश्य था और इसीलिए अस्त्र-शस्त्रों का जो जखीरा अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और जर्मनी ने इतने कम समय में खड़ा किया वह चमत्कार से कम नहीं लगता। वह भी तब जबकि अभी भी कई तथ्य अप्रकट ही हैं, जैसे क्या दूसरे विश्व-युद्ध के समय टेलीपोर्टिंग, अदृश्य करने की तकनीक और टाइम-मशीन जैसे आविष्कार किए जा चुके थे या नहीं। जहाँ लो सीक्रेट हथियारों और अविष्कारों के बारे में भी दुनिया को विश्व-युद्ध ख़त्म होने के कम से कम पच्चीस सालों बाद पता चला वहां इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी कई तथ्य गुप्त ही होंगे और कई गुप्त सबूत तो संभवतः X-Files के हवाले होकर अब तक गुम भी हो चुके होंगे।

आज भी अकसर "फ़िलाडेल्फिया - एक्सपेरिमेंट" की चर्चा उठती है जिसे आजतक सिर्फ़ अफ़वाह ही माना जाता है क्योंकि इसके बारे में न तो कोई सबूत मौजूद है और न ही कोई सरकारी बयान। माना जाता है कि अमेरिका ने १९४३ में अमेरिकी जलसेना के एक जहाजी बेड़े यू एस एस एलरिज को गायब करके कालयात्रा कराई गई और उसे समय में आगे ले जाकर वापस लाया गया था और टेलीपोर्ट करके फ़िलाडेल्फिया नेवल यार्ड से नोर्फोक, वर्जिनिया भेजा गया था। हालाँकि एल्डरिज की लॉग-बुक में ऐसे किसी परीक्षण का ज़िक्र नहीं है मगर एक अत्यन्त गुप्त प्रोजेक्ट "रेनबो" के अस्तित्व के बारे कोई शक नहीं है, जिसके अंतर्गत फ़िलाडेल्फिया - एक्सपेरिमेंट किए जाने की बात उठती है। वैसे जानकार तो यह कहते हैं कि प्रोजेक्ट रेनबो का उद्देश्य राडार पर बड़े ओब्जेक्ट्स की दृश्यता कम करना भर था। सच जो भी हो निश्चित ही रोचक होगा और सम्भव है घातक भी।

बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। थ्योरी के रूप में माना जाता है या उस समय माना गया कि यदि कोई वस्तु चुम्बकीय दबाव में हो तो ऐसे में उसके आसपास किरणों का स्वरूप बिगड़ जायेगा और राडार की तरंगों का भी। इससे वह वस्तु एक तरह से अदृश्य हो जायेगी। माना जाता है कि इस तरह के दो प्रयोग किए गए थे और उनमे से पहला प्रयोग २२ जुलाई १९४३ को फ़िलाडेल्फिया नेवल यार्ड में किया गया था। इसके लिए बड़े जनरेटर चालू किए गए। ऐसा करते ही धुंध छा गई और उसने पूरे बेड़े को ढँक लिया और जब धुंध छंटी तो जहाज गायब हो गया था। इसके बाद जनरेटर को बंद करते ही धुंध और जहाज वापस अपनी जगह पर आ गए। माना जाता है कि उसी साल अक्टूबर में जहाज फ़िर से गायब हुआ और नोर्फोक में प्रकट हुआ, फ़िर नोर्फोक से गायब होकर फ़िलाडेल्फिया में प्रकट हुआ। फ़िलाडेल्फिया - एक्सपेरिमेंट तथाकथित रूप से विश्व-युद्ध के बाद भी चालू रहा और इसे मोन्टोक-प्रोजेक्ट नाम दिया गया था। यदि जहाज के कर्मचारियों की गिनती न भी की जाए तो भी सैकड़ों लोगों ने इस अभियान के कभी न कभी प्रत्यक्ष गवाह होने की बात मानी है। कार्लोस आलेंदे या कार्ल एलेन नामक एक नाविक को इस प्रोजेक्ट का पहला प्रत्यक्ष गवाह माना जाता है। इस विषय पर मात्र अफवाहें ही हों ऐसा नहीं है। इसे लेकर कई किताबें लिखीं जा चुकी हैं और दो फिल्में भी बनीं - १९८४ में The Philadelphia Experiment और १९९३ में बनी The Philadelphia Experiment-२।

ऐसे कितने ही आविष्कार थे जो उस समय किए गए होंगे और जिनके बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। सच जो भी हो और जितना भी हो मगर ऐसे अभियानों की चर्चा आज ६० साल बाद भी रहस्यमय, रोमांचकारी और डर पैदा करती है। जब लिखने बैठा था तो परमाणु बम के इतिहास के बारे में सोचकर लिखना शुरू किया था मगर वो अगली बार के लिए स्थगित। शायद गुप्त हथियारों के बारे में लिखते लिखते ही दस-बारह पोस्ट निकल जाएँ। इरादा तो कुछ ऐसा ही है।

7 comments:

Amit said...

bahut hi rochak jaankaari di aapne...

अजित वडनेरकर said...

बेहद दिलचस्प। ज्ञानवर्धक। इसके बारे मे पढ़ते रहे हैं मगर एक साथ आपके सौजन्य से ही पढ़ेंगे। बेटे को भी पढवाऊंगा। अगली किस्त की प्रतीक्षा रहेगी प्यारे महेन...

Gyan Dutt Pandey said...

दिलचस्प! वैसे इस युग में किसी जबरदस्त वैज्ञानिक खोज को रहस्य के पर्दे में रखा जा सकता कठिन है। सूचना का विस्फोट उसे छितरा ही देगा।

महेन said...

ज्ञान जी,
ठीक विपरीत मेरा मानना है कि ऐसे कई तथ्य हैं जिन्हें आज भी गुप्त रखा जा रहा है किसी भी तरह की खोज को मिलकर... जैसे एलियन या यू एफ ओ के अस्तित्व की बात... आर्नोल्ड द्वारा पहली बार यू एफ ओ देखे जाने से लेकर आजतक कई बार उन्हें देखा गया है और निश्चित तौर पर एक से अधिक देशों के पास यू एफ ओ और एलियन प्रयोगों के लिए उपलब्ध हैं.

Rohit Tripathi said...

very interesting post.. aur bhi likhiyega gupt hatiyaro ke barein mein.. aapki inke bare mein jankar adbhut hai.. bahut hi rochak post

Rohit Tripathi

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अभिषेक ओझा said...

मुझे तो मून कांस्पीरेसी थेओरी बहुत पसंद है... रोचक लगी ये पोस्ट !

mukesh thakur said...


nice post