Monday, 5 January 2009

बहुत दुविधा है भाई


किसी अच्छी ख़बर की आस बड़ी हो गई है। दिन-रैन इंतज़ार कि कोई ख़बर आने को है। मगर क्या ख़बर? ऐसा क्या होने को है जिसकी उम्मीद है? कुछ भी तो नहीं... फिर? ऐसा भी कोई देखा है जो बेमतलब और अनजान आस के लिए सारे काम छोड़कर बार-बार मैजिक आई से झाँककर कर देखता है कि कोई खड़ा तो नहीं बाहर, बार-बार ई-मेल खंगालता है, दौड़कर जाता है और लेटरबॉक्स टटोलता फिरता है? ऐसा क्यों होता है कि अकेलापन कई बार शरीर से बाहर झाँकने लगता है, सामने खड़ा मुँह चिढाने लगता है और हम अपने को बेबस पाते हैं? और ऐसा भी क्या अकेलापन कि पचास लोगों के बीच कहीं से उग आए? कोई कारण तो हो। सवाल मुश्किल होता है और उत्तर ऐसा कि ख़ुद से उसकी उम्मीद नहीं की जा सकती। किसी और से उत्तर की आशा भी बेवकूफ़ी लगती है।


दरअसल दिन रात में फ़र्क करना ही भारी पड़ने लगता है। दिन को सोओ और रात को जागो या रात को सोओ, दिन को जागो, फ़र्क पड़ना बंद हो जाता है। हर वक्त घटाटोप ही लगता है। हर तरफ़ ऐसी बेतरतीबी पसर जाती है कि सरदी की रातें पसीने से तर हो जाती हैं; हफ्ते के दिनों में फ़र्क करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में ब्रांडी की बोतल भी फटने को होती है। आधी रात की चुप्पी में हौले से उठो तो लगता है उस घर में नहीं उठे जहाँ सोये थे। दीवारों के सुर बदल जाते हैं। लोग बात करते हैं तो जवाब नहीं आता ज़बान तक; फिर अपने से ही पूछा जाता है ये सवाल कि ये लोग एकालाप क्यों कर रहे हैं। मैं तो इनसे बात कर नहीं रहा... मुझे तो किसी होनी का इंतज़ार है... मैं तो मुन्तजिर हूँ... इनसे बात कैसे करूँ?


अब कोई पूछे तो क्या बताऊँ किस बात का इंतज़ार है? क्या होने वाला है? चुप रहकर किस-किस को नाराज़ किया जाए? मगर बात करके भी किस-किस को मनाया जाए?




11 comments:

विवेक said...

क्या कहें...शब्द छोटे हो जाते, जब सिर्फ ध्वनियां जरूरी नहीं होतीं...जरूरी होते हैं..चेहरे पर उभऱते भाव...टिप्पणी में आप भाव पढ़ना जानते हैं न...

poemsnpuja said...

kamaal ka likha hai...
aisa intezaar to kamobesh ham sabhi karte hain, par use itni khoobsoorti se likh nahin paate.

Amit said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने...

सुशील कुमार छौक्कर said...

क्या लिखूँ महेन जी। आपका लिखा पढकर नि:शब्द सा हो जाता हूँ।

अभिषेक ओझा said...

कभी-कभी हर २ मिनट पे ईमेल रिफ्रेश, पुराने मेसेज... ये दुविधा तो लगता है सबके साथ होती है.

Manoshi said...

इस आवाज़ का कोई जोड़ नहीं।

सोतड़ू said...

कल ही मैं सोच रहा था कि जिन लोगों को हमेशा किसी के साथ रहने की आदत होती है, जिन्हें हमेशा किसी का साथ चाहिए वो मिलनसार हैं या अकेलेपन से डरने वाले..... मुझे लगा कि अगर आप एक दिन अपने साथ नहीं बिता सकते तो शायद ही दूसरों के साथ ईमानदार रह पाएं....
लेकिन ये भी सच है कि हमेशा सिर्फ़ अपने साथ नहीं रह सकते- अपने प्यारे (आग लगे बस्ती में)को भी दोस्तों की ज़रूरत होती है...

महेन said...

चल भई तू हैबरनेशन से बाहर आ ही गया...
कालिगुला पढ़ा है तूने? नहीं पढ़ा तो पढ़...
"The world as it is is unbearable. That's why I need the moon, or happiness, or immortality, or something that may sound insane"

आस कई चीज़ों की है और बढ़ी भी...

costume jewelry said...

how can you write a so cool blog,i am watting your new post in the future!

Gyan Dutt Pandey said...

अच्छी खबर हमें भी बताइयेगा।

technology said...

It seems different countries, different cultures, we really can decide things in the same understanding of the difference!
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