Thursday, 30 October 2008

बुरा समय

हेस्से की कविताओं का सिलसिला अभी शुरु ही हुआ है। ख़याल तो ये है कि किताब में जो 31 कविताएँ हैं सभी का अनुवाद कर डालूँ। देखें कितना हो पाता है। फ़िलहाल के लिये एक और कविता।

अभी हम चुप हैं
और कोई गीत नहीं गाते
हर कदम भारी हो गया है
यह रात थी, जिसे आना ही था

मुझे अपना हाथ दो
शायद हमारा रास्ता अभी बहुत लंबा हो
बर्फ़ गिर रही है
बेहद मुश्किल होती हैं अनजाने देश में सर्दियाँ

कहाँ गया वह समय
जब हमारे लिये एक लौ, एक अनल जलती थी?
मुझे अपना हाथ दो
शायद हमारा रास्ता अभी बहुत लंबा हो।

Saturday, 18 October 2008

हेरमान हेस्से की कविताएँ

नोबेल से सम्मानित जर्मन साहित्यकार हेरमान हेस्से मुख्य रूप से अपने तीन उपन्यासों सिद्धार्थ, स्टेपेनवौल्फ़ और मागिस्टर लुडी के लिये जाने जाते हैं मगर उन्होनें कविताएँ भी लिखीं और पेंटिंग्स भी बनाईं। उनका नाम पहली बार जर्मन सीखते हुए पढ़ा था। उस दौरान किसी ने (नाम याद नहीं) जर्मन-साहित्य का तेज़ी से हिन्दी में अनुवाद किया था, जिसे पढ़ने संयोग बन नहीं पाया, हालांकि शायद एक अनुवादित उपन्यास मैनें खरीदा भी था। एक दिन अचानक हेरमान की कुछ कविताएँ हाथ लग गईं जो मैनें तुरंत खरीदकर संभालकर फ़ुर्सत में पढ़ने के लिये रख लीं। पहली फ़ुर्सत, या यूँ कहें मूड कल ही हुआ और पढ़ते-पढ़ते तीन कविताओं के अनुवाद भी कर डाले। वही अनुवाद यहाँ दे रहा हूँ। मैं अनुवाद के मामले में अनाड़ी आदमी हूँ और अनुवाद का यह दूसरा ही प्रयास है इसलिये भूल-चूक माफ़।

1. सारी मौतें

मैं मर चुका हूँ सारी मौतें
और मरूँगा सारी मौतें एक बार फिर
पेड़ के भीतर लकड़ी की मौत
पहाड़ के भीतर पत्थर की मौत
मिट्टी की मौत रेत के भीतर
पत्तों के भीतर गर्मियों की चटकती घास की मौत
और खून से लथपथ बेचारे आदमी की मौत

मैं फिर जन्म लूँगा फूल बनकर
पेड़ और घास बनकर फिर जन्म लूँगा
मछली और हिरण, चिड़िया और तितली,
और हर रूप में
इच्छा ले जाएगी मुझे
उस अंतिम पीड़ा तक
मानव की पीड़ा तक

ओ कंपित तने हुए धनु
लालसा की प्रचंडता जब
जीवन के दोनों धुरों को
खींचेगी एक-दूसरे की ओर
फिर एक बार और कई कई बार
ढूँढ निकालोगे तुम मुझे मृत्यु से लेकर जन्म तक
स्रष्टि के पीड़ादायी पथ पर,
स्रष्टि के वैभवशाली पथ पर।

2. एलिज़ाबेथ

एक कहानी सुनाता हूँ तुम्हें,
बहुत रात हो चुकी है
क्या तुम मुझे सताओगी
प्यारी एलिज़ाबेथ?

मैं इसके बारे में कविताएँ लिखता हूँ
वैसे ही जैसे तुम;
मेरी पूरी प्रेम-गाथा
यह सँझा और तुम हो

दिक होकर
इन गीतों को मत फ़ेंक देना
जल्द ही तुम सुनोगी इन्हें
सुनोगी और कुछ नहीं समझ पाओगी।

3. कितने कठिन हैं…

कितने कठिन हो गए हैं दिन
कोई आग तपा नहीं पाती मुझे
सूरज हँसता नहीं मेरे साथ
सबकुछ सूना है
सबकुछ ठंडा और कठोर
प्यारे, स्वच्छ तारे भी देखते हैं मुझे
नीरसता से
जबसे मैनें दिल ही दिल में जाना
कि मर सकता है प्रेम।

Thursday, 9 October 2008

गाव (The Cow)

कायदे से मुझे फ़िल्म से संबंधित कोई भी पोस्ट यहाँ नहीं डालनी चाहिये क्योंकि फ़िल्म के लिये मैनें एक अलग ही ब्लोग बनाया है जहाँ पहली पोस्ट पर कोई भी नहीं आया और अगली पोस्ट पर भी दो एक लोग ही आए। यहाँ वही दूसरी पोस्ट दोबारा डाल रहा हूँ। उद्देश्य है चित्रपट को प्रमोट करना।
ईरानी सिनेमा का नाम सुनते ही एक दृष्यबंध सामने खड़ा हो जाता है जिसमें कथ्य से लेकर चाक्षुकता तक बहुत ज़्यादा विविधता की संभावना बनती है और इस संभावना की वजह से अपेक्षा भी बनती है। यह हैरानी का विषय है कि सिनेमा, जिसपर हमेशा विकसित देशों का आधिपत्य रहा है, उसमें ईरान जैसे नगण्य देश ने अपनी जगह बना ली है और जैसे विश्व के लिए सत्यजित राय ही भारतीय आर्ट सिनेमा का चेहरा है, वैसा ईरान के साथ नहीं है। वहां एक से ज़्यादा फ़िल्मकार हुए हैं जिन्होनें सिनेमा जगत में अपनी पहचान बनाई है। इसकी वजह निश्चित तौर पर हालीवुड की तरह तकनीकी उत्कृष्टता नहीं, वरन कलात्मक श्रेष्ठता है। एक समय खत्म हो सकने की कगार पर खड़े ईरानी सिनेमा ने विश्व सिनेमा में अपने लिये एक खास जगह बनाई है। यदि ईरानी सिनेमा को बचाने का श्रेय किसी को दिया जा सकता है तो वह है प्रसिद्ध ईरानी निर्देशक दारिउश मेहरजुइ और यदि यह श्रेय किसी फ़िल्म को दिया जा सकता है तो वह उनकी दूसरी फ़िल्म गाव (गाय) है। अताउल्ला खुमैनी द्वारा ईरान में फ़िल्में बनाने की आज्ञा दिये जाने के पीछे इस फ़िल्म का खुमैनी पर प्रभाव माना जाता है।यह दूसरी फ़िल्म थी जिसे ईरान के शाह ने फ़ंड किया था। उद्देश्य था उजड़ रहे ईरानी सिनेमा को बचाना मगर गाव के बनते ही उसपर पाबंदी लगा दी गई। शाह का मानना था कि इस फ़िल्म से बाहरी दुनिया के मन में ईरान की ग़लत छवि बनेगी। फ़िल्म को चोरी से कई समारोहों में दिखाया गया और उसे तत्काल बहुत प्रसिद्धि मिली।गाव को बनाने के लिये दारिउश को बहुत ही सीमित संसाधन दिये गए थे और इसका प्रभाव फ़िल्म में जहाँ-तहाँ दिखाई भी देता है मगर कलात्मक दृष्टिकोण से फ़िल्म में कोई ख़ामी नहीं आई है। फ़िल्म के कई दृष्यों को देखते हुए आप बार-बार महसूस करते हैं कि फ़िल्म चाक्षुक कविता बन पड़ी है या यूँ कहें कि ये दृष्य फ़िल्म से बाहर निकलकर बेहद आर्टिस्टिक पेंटिंग सरीखे लगते हैं। यदि आप इन दृष्यों के पार देखने की कोशिश करेंगे तो आपको वहाँ ईरानी जीवन-शैली सर्वत्र बिखरी दिखाई पड़ेगी।फ़िल्म कई स्तरों पर संवाद की गुंजाईश बनाती है और हर संभावना को समझने के लिये ईरान के जीवन और इतिहास में झांकना शायद आवश्यक हो। हसन एक साधारण व्यक्ति है मगर जो चीज़ उसे विशेष बनाती है वह उसकी इकलौती गाय है। यह गाय उस उजाड़ और रेगिस्तानी गाँव की इकलौती गाय भी है और लोगों के कौतुहल का विषय भी।कुछ समीक्षकों का मानना है कि गाव बनाते समय दारिउश पर इतालवी नेओरिआलिज़्म का प्रभाव था। कुछ इसे सही नहीं मानते। दारिउश का क्या कहना है, यह जानने से पहले इसके कारणों की ओर एक नज़र डाल लेना समीचीन होगा। दारिउश के पास यह फ़िल्म बनाने के लिये बहुत ही सीमित साधन थे। संभवत: यह एक कारण हो कि फ़िल्म में इतालवी नेओरिआलिज़्म का प्रभाव दिखाई देता हो या वे सचमुच ही इस फ़िल्म बनाने की इस विधा के प्रभव में रहे हों। कुछ समय पहले रिलीज़ हुई इस फ़िल्म की डीवीडी में दारिउश का एक इन्टरव्यु भी शामिल किया गया था जिसमें उन्होनें इतालवी नेओरिआलिज़्म के प्रभाव में यह फ़िल्म बनाए जाने की बात स्वीकार की है।फ़िल्म में यत्र-तत्र कई चरित्र हैं जो कहानी के प्लाट के बाहर भी बहुत कुछ कहते हैं। इन सब-प्लाट्स में संभवत: कोई सामाजिक संदेश छिपा हुआ है। उजाड़ में खड़ा एक गांव जो अपने-आप में बेहद सीमित भी है और पूर्ण भी शायद रेनेसां से पहले के छोटे-छोटे दुनिया से कटे हुए समाजों की याद दिलाता है। दारिउश एक पिछड़े समाज की दकियानूसी को सामने लाने में छोटे-छोटे दृश्यों और संवादों का प्रयोग करते हैं। गाँव के लोग बैठकर हसन की गाय के बारे में चर्चा करते हैं और खिड़की से चाय लिये हुए हाथ नमूदार होता है। एक युवक एक पागल को गाँवभर के बच्चों के मनोरंजन का साधन बनाए रहता है। यह दकियानूसीपन आगे जाकर भय और अंधविश्वास तक जाता है। चौपाल पर बैठकर गाँव के बुज़ुर्ग तमाम तरह की आशंकाओं से व्यथित हैं जब बोलोरियों द्वारा फिर से गाँव में चोरी करने की बात सामने आती है। बोलोरी सिर्फ़ चोर नहीं हैं, वे समुद्री डाकुओं की तरह हैं जिन्हे कोई जानता नहीं है। वे रात के अंधेरे में आकर गाँव की सम्पत्ति पर अपना हाथ साफ करते हैं। वे एक ऐसी सत्ता हैं जो सीमांत पर मौजूद है, दिखती है मगर फिर भी मानव होने के गुण/दुर्गुण से परे हैं। फ़िल्म में वे हर समय भय के सबसे बड़े कारण के रूप में मौजूद रहते हैं। हसन की गाय मात्र गाय होने से ऊपर की चीज़ है। सिर्फ़ नहलाने के लिये वह उसे गाँव से बाहर ले जाता है, उसके श्रंगार के लिये सामान खरीदता है, दो पत्नियों को छोड़कर वह गाय के पास ही सोता है। और तो और वह उसे लाड करते हुए उसके साथ चारा भी खाता है।हसन की अनुपस्थिति में गाय जब मर जाती है तो पूरे गाँव में अफ़रातफ़री मच जाती है। तमाम अंधविश्वासों के बीच वे उसके मरने का कारण खोजने की कोशिश करते हैं। गाँव का सबसे समझदार माना जाने वाला इस्लाम भी इस बारे में उलझन में है। गाँव के लोग इसमें शैतान की बुरी नज़र का प्रभाव मानते हैं। गाँव की सभा में हसन से उसकी गाय के मरने की बात छुपाने पर चर्चा होती है और यह चर्चा अकसर बुद्धिमत्ता से परे की चर्चा होती है। गाय को अंतत: एक सूखे कुँए में डाल दिया जाता है। फ़िल्म में एक चरित्र है जिसके लिये गाँव और गाँव के लोग बौद्धिक स्तर पर पिछड़े हुए हैं। वह लफ़ंडर किस्म का एक आदमी है जो हर काम में अपनी टांग अड़ाता है मगर उसके तर्क काटने योग्य न तो मुखिया है न ही इस्लाम। यदि फ़िल्म में कोई राजनैतिक संदेश निहित है तो उसका एक छोर इस चरित्र पर जाकर ज़रूर मिलता है। वैसे मूल कहानी के लेखक ग़ुलाम हुसैन सईदी लेफ़्ट विचारधारा के लेखक थे।अंतत: जब हुसैन गाय के ग़म में पागल हो जाता है और गाँव वालों की सारी कोशिशों के बावजूद भी संभल नहीं पाता तो इस्लाम के सुझाव पर गाँववाले उसे किसी अस्पताल ले जाने को तैयार हो जाते हैं। उन्हें यकीन नहीं कि अस्पताल वाले कुछ कर सकते हैं या नहीं मगर इस्लाम का मानना है कि वे “कुछ” तो कर ही पाएंगे।बारिश के बीच जब हुसैन को बांधकर और लगभग घसीटकर ले जाया जाता है। रास्ते में उसके विरोध करने पर इस्लाम उसे सोटी से मार-मारकर घसीटता है। यह गाँववालों की हुसैन के पागलपन से उपजी खीझ और निराशा की परिणिति है जिससे वे खुद भी स्तब्ध हैं। हुसैन अंतत: पहाड़ से गिरकर मर जाता है।
दारिउश ने फ़िल्म में छायांकन पर काफ़ी मेहनत की है और इसका प्रभाव शेड्स और छायाओं के सामंजस्य के रूप में दिखाई देता है मगर अफ़सोस कि जिस कैमरा से काम लिया गया था वह कामचलाऊ क्वालिटी का था और शायद फ़िल्म की मूल प्रति को सहेजकर नहीं रखा गया था। डीवीडी में उपलब्ध प्रिंट में छायांकन का चमत्कार क्वालिटी की वजह से खत्म हो गया है, फिर भी उनकी उत्कृष्टता को नकारा नहीं जा सकता।

Wednesday, 1 October 2008

द बर्मीज़ हार्प (The Burmese Harp)

कुछ दिनों पहले एक नया ब्लोग चित्रपट नाम से शुरु किया था, जहां उत्कृष्ट फ़िल्मों पर चर्चा करना हमारा उद्देश्य था। मगर समय की सनातन कमी के चलते यह काम टलता रहा। कल पहली बार ही उसपर एक जापानी फ़िल्म Biruma no tategoto (The Burmese Harp) पर एक पोस्ट डाली जोकि संभवत: कुछ तकनीकी खराबियों के चलते किसी भी एग्रीगेटर पर प्रकाशित नहीं हुई। सोचा उसे यहाँ एक बार फिर पोस्ट कर दूँ।

"बर्मा की मिट्टी लाल है
और लाल हैं इसकी चट्टाने"

यह लाली ध्वंस की, युद्ध की है जो इस कहानी के साथ शुरू होकर अंत तक साथ रहती है। कुछ तो ताकियामा मिचियो लिखित युद्ध-विरोधी बाल-उपन्यास होने के कारण और कुछ कोन इचिकावा के इस उपन्यास की संवेदनशील व्याख्या के कारण फ़िल्म The Burmese Harp किसी भी कोण से एक युद्ध-आधरित फ़िल्म नहीं लगती। संभवत: फ़िल्म का प्रारूप तैयार करते समय इचिकावा के दिमाग में यह स्पष्ट था कि उन्हें युद्धरत मनुष्य के मानवीय पक्ष को उजागर करना है।

फ़िल्म में मानवीय संवेदनशीलता को प्रस्तुत करने के लिये हार्प एक प्रतीक है। इसके अलावा पूरी फ़िल्म में ही युद्ध के दृश्यों और उसकी भयावहता को दिखाने के लालच से इचिकावा बचते रहे हैं। बर्मा में भटक गई एक टुकड़ी, जो जापान लौटने की हरसंभव कोशिश कर रही है, जब थककर जंगल में सुस्ताने के लिये लेटती है तो एक-एक जवान के चेहरे से विशाद और निराशा झरती है। ऐसे हर मौके पर वे उदासी से उबरने के लिये “हान्यू नो यादो” (देश, प्यारे देश) गाते हैं। जवानों के भीतर इस गीत को स्पंदित करता है मिज़ुशिमा का हार्प-वादन, जोकि करुणा, आशा और रूदन के बीच कहीं कानों में बजता है और अज्ञेय की इन पंक्तियों जैसा कुछ चारों ओर गूँजने लगता है:

“अभी न हारो अच्छी आत्मा
मैं हूँ, तुम हो
और अभी मेरी आस्था है।”

टुकड़ी का कैप्टन इनोये खुद एक संगीत-प्रेमी और संगीत-विशारद है और संगीत को उसने अपने सैनिकों में इस तरह घोल दिया है कि जहां हर क्षण मरने का डर उनके सिर पर जमा रहता है वहीं संगीत उनके कंधों पर जीवन-जागरण की तरह विद्यमान रहता है। यह संगीत ही है जिसने युद्ध की भयावहता के बीच भी इन लोगों में, जोकि लम्बे अरसे से अपने परिवार और देश से दूर हैं, भावनाएं बचाए रखी हैं। वे युद्धकाल के पारंपरिक तरीके छोड़कर एक-दूसरे को संकेत देने के लिये भी गाते हैं, हार्प का इस्तेमाल करते हैं। मिज़ुशिमा एक बर्मी का रूप धर लेता है और धोती लपेटकर आगे की टोह लेने सिर्फ़ हार्प लेकर निकल पड़ता है।

एक गांव में जब इस टुकड़ी को फसाने के लिये जाल बिछाया जाता है और इसका आभास होने पर घिरे होने की अनभिज्ञता ज़ाहिर करने के लिये वे गाते हैं और मिज़ुशिमा हार्प पर संगत करता है तो ब्रिटिश टुकड़ी में भी वही भावनाएं प्रवाहित होने लगती हैं जो इस जापानी टुकड़ी में हो रही हैं। संगीत मानवीय सूत्र बन जाता है और ब्रिटिश जवान इनके सुर में अपना सुर मिला देते हैं।

जापान की हार के फलस्वरूप सैनिकों की यह टुकड़ी आत्मसमर्पण कर देती है और मिज़ुशिमा को पहाड़ की चोटी पर युद्धरत एक और जापानी टुकड़ी के पास युद्ध रोककर आत्मसमर्पण करने का संदेश देने के लिये भेजा जाता है। वह सिर्फ़ अपना हार्प लेकर जाता है और अपनी ही साथी टुकड़ी की गोलाबारी से बचते हुए उनतक पहुँचता है।
इस टुकड़ी और मिज़ुशिमा के बीच संवाद में एक मौलिक अंतर स्पष्ट दिखता है। यह अंतर है दूसरी टुकड़ी की युद्ध-मानसिकता का। वे सभी युद्ध से इतना ग्रसित हैं और युद्ध बाहर से ज़्यादा उनके भीतर इतना पैठ चुका है कि मिज़ुशिमा की तमाम कोशिशों के बावजूद वे आत्मसमर्पण करने को राज़ी नहीं होते और अंतत: मारे जाते हैं।

इधर मुदोन भेजी जा चुकी कैप्टन इनोये की टुकड़ी मिज़ोशिमा के न लौटने पर परेशान होती रहती है मगर उनके अंदर कहीं भरोसा है कि मिज़ोशिमा ठीक है। मिज़ोशिमा को एक बौद्ध भिक्षु बचा लेता है। भिक्षु के वेश में मुदोन जाते हुए जब मिज़ोशिमा इधर-उधर बिखरी जापानी सैनिकों की लाशें देखता है तो फ़िल्म में एक सैनिक का मानवीय पक्ष अपने चरम के साथ उपस्थित होता है। मिज़ोशिमा मन ही मन ठान लेता है कि सभी लाशों का अंतिम संस्कार करना उसका मानवोचित कर्तव्य है और वह इसमें जुट जाता है। मुदोन पहुँचकर भी वह अपनी टुकड़ी से नहीं मिलता बल्कि दीक्षा लेकर अपने अभियान में जुट जाता है। उसकी टुकड़ी और कैप्टन का यह विश्वास कि वह जीवित है उन सभी घटनाओं के क्रम से और भी अधिक दृढ़ हो जाता है जब या तो वे मिज़ोशिमा को भिक्षु के रूप में या उसके हार्प-वादन को गाहे-बगाहे मुदोन में पहचान लेते हैं।

मिज़ोशिमा की अनवरत चुप्पी और अपनी पहचान छिपाने की कोशिशें हमारे सामने इचिकावा की योग्यता को उजागर करती हैं। बिना प्रत्यक्ष संवाद के वह जिस तरह अपनी प्रतिबद्धता और आस्था अपने मिशन में दर्शाता है वह कैप्टन के फ़िल्म के अंत में सैनिकों के सामने मिज़ोशिमा का पत्र पढ़ने से भी पहले दर्शक के सामने उजागर हो जाती हैं। इचिकावा का चमत्कार फ़िल्म में पात्रों के अभिनय में स्पष्टत: दिखाई देता है चूंकि यह अभिनय कहीं भी सायास नहीं नज़र आता। मिज़ुशिमा का एक सैनिक से एक भिक्षु में परिवर्तन अनायास या नाटकीय नहीं है। यह तथ्य एक गुण की तरह उसकी पूरी टुकड़ी में पहले से ही गाहे-बगाहे दिखता रहता है और परिस्थितियाँ मिज़ोशिमा को ऐसा सशक्त कदम लेने और उसपर बने रहने के लिये प्रेरित भी करता है। साथी सैनिकों द्वारा भिक्षु मिज़ुशिमा को लौट आने के लिए प्रेरित करने के लिये “हान्यू नो यादो” गाने और मिज़ुशिमा द्वारा अपनी पहचान उजागर करते हुए हार्प में संगत करने पर एक और नाटकीय सक्षमता प्रकट होती है। वह यह कि हार्प के द्वारा जवाब देते हुए मिज़ोशिमा यह भी कह रहा है कि अब मैं नहीं लौटूँगा।

फ़िल्म का सिनोप्सिस देने से मैं बच रहा हूँ क्योंकि मेरा प्रयास सिर्फ़ फ़िल्म के बारे में अपने विचार साझा करने से है और फ़िल्म की व्यक्तिगत व्याख्याओं पर संवाद आरंभ करने से है। ऊपर जो भी लिखा है उसमें कहानी सिर्फ़ उतनी भर ही आई है जितनी अपने विचार प्रेषित करने के लिये मुझे ज़रूरी लगी इसलिये मात्र इतने को ही कहानी न समझ लें। घटनाओं का क्रम आगे भी बढ़ता है और कहानी इससे भी अधिक विस्तार से चलती है।