Saturday, 28 June 2008

जब एकांत उदास हो जाता है

फ़र्श पर खिड़की के पैताने बैठ
बाहर उड़ती हरियाली और जड़ पड़े पेड़ों को देखता हूँ
जब भी लगता है तुम्हारी याद चली आएगी
दीवारें सटा लेता हूँ कन्धे और पीठ से
मेरा एकांत उदास हो जाता है
कमरे में रौशनी मद्धिम पड़ने लगती है
गिलहरी नहीं लोटती मेरी छाती पर
ना ही टहनियों पर दौड़ती है
गाड़ियों की सरसराहट बहुत दूर जाने लगती है
पार्क में उठती बच्चों की किलकारियाँ मूक हो जाती हैं
ऐसी बोली सोचने लगता हूँ
जिसे समझने में कई साल लगेंगे अभी
ऐसे में डबडबाती एक बूँद खून की
डूबती आँखों में उतारकर
लिखने बैठता हूँ तुम्हारी याद का रोजनामचा
मगर कई बार यूँ हुआ है
सूख गयी है याद से भी पहले वह बूँद

Friday, 27 June 2008

मौसम

यहाँ मैं
ठिठुरते नीले जाड़े में
तुम्हारे माथे की गरमी सेंक रहा हूँ

वहाँ तुम
पीली उबलती धूप में
मेरी आँखों की नमी पी रही हो

पाँच हज़ार मील का सफ़र
मौसम कर रहा है तय

Tuesday, 24 June 2008

प्रेम के आख़री दिन

कुम्हार के चक्के में
जैसे घूमती है मिट्टी
वैसे ही
तुम्हारे दायरे में घूमता है मेरा होना
तुम्हारे बालों से टपकता है बूँद-बूँद
मेरा अस्तित्व
अजाने भय से आशंकित सुहागनें
अपने पति और बच्चों की
मंगलकामनाओं के लिये
जिसपर रोली की तरह
लपेटती हैं मुझे
पीपल का वह पेड़ हो तुम
मैं संचरित होता हूँ
तुम्हारे आस-पास
जैसे कविता के गिर्द
बुने जाते हैं शब्द
या शब्दों के गिर्द
बुनी जाती है कविता
लुटिया में जैसे
ढलता है पानी
वैसे ही
आकार लेती हो तुम
मेरे भीतर

संभव है कभी
चक्का और मिट्टी
पीपल और रोली
कविता और शब्द
लुटिया और पानी
न रहें
किंतु तब भी क्या
उनका सघन संकुल-संबन्ध
बजता नहीं रहेगा
व्योम-व्याप्त वीणा की तरह

तो कहो सुभगे
जीवन के इन आख़री दिनों को
प्रेम के आख़री दिन कैसे कह दिया तुमने?

Monday, 16 June 2008

एक रात जागेश्वर की

कितने दिन बीते
चाँदनी में लकदक
और लिपटी
वह रात
मगर फिर भी
अब तक
मेरी आँखों की गोलाइयों में
शांत तिर रही है

घुट अंधेरे में
मलाई सा लिपटा
चाँद और उसकी
चम्पई चाँदनी
यूँ बिछ गये थे
देवदार के पत्तों पर
कि इक हूल सी उठी थी
मन में
छोटी सी दूधिया नदी
ज्यों गोल चिकने पत्थरों से चिपककर
बहना भूल गई थी दम भर
कहीं दूर
बर्फ़ के फ़ाये
अब भी सुलगते चूल्हे को
मरहम कर रहे थे
ठिठुरता धुँआ
डरते-डरते ढूँढ रहा था
हवा में
अपना रस्ता

अधखुले किवाड़ों से
लपककर वह धुंधली उजास
मेरी बाजुओं को थाम
मेरे पैताने पसर गयी
हौले-हौले
मेरी आँखों में चढ़कर
बस गयी मेरे भीतर
और ढक लिया मुझे
अपनी दोरंगी चादर में

वह तरल उजास
सांस भर पी मैनें
और पोटली में बांध
ले आया था अपने साथ

कितने साल गुज़रे
और अब भी हर रात
मै उस रात को
ओढ़ रहा हूँ
बिछा रहा हूँ

Thursday, 12 June 2008

खेल जो हम एक-दूसरे से खेलते हैं

मैं जब दरी पर लेटकर
ताकता हूँ छत को एकटक
तो कान में तिनका डालकर
सताने आ जाती हो तुम मुझे
अपनी चुप्पी से भी ज़्यादा
तुम्हे मेरी शांति अखरती है
नहीं, असल में तुम्हें डर लगता है
कहीं मैं कविता लिखते-लिखते
गाँव के बाहर झौहड़ में छलांग न मार दूँ
कविता करने वाले पागल होते हैं
यही बताते थे न तुम्हारे बाबा तुमको

जब मैं शब्दों से उकेरने लगता हूँ
पेड़, पहाड़, नदी, दूब और बादल
तुम कूद पड़ती हो पेंटिंग में
बिखेर देती हो अक्षर-अक्षर सारे कमरे में
तुम्हें डर लगता है
कहीं मैं उस पेंटिग में
बांसुरी बजाने वाला गडरिया न बन जाऊँ

मेरी खीझ और झिड़कन तुम्हें
अपनी पसंदीदा धारावाहिक से भी ज़्यादा पसंद हैं
ऐसा कहती हो तुम पेंटिंग से बाहर निकलकर

फिर मिलकर बुहारते हैं हम पूरा घर

तुम्हारे डर और मेरी खीझ के बीच
इस बुहारन में हम हमेशा
कमरे में ही छोड़ देते हैं हमारे हिस्से का प्यार

Monday, 9 June 2008

दूसरा प्यार

दूसरे प्यार में नहीं लिखी जाती
पहली अर्थहीन प्रेम-कविता
पहला थरथराता चुंबन
नहीं लेता कोई दूसरे प्यार में
दूसरे प्यार के बारे में
नहीं लिखता कोई अभिज्ञान
और ना ही होता है शिला-लेखों में उसका वर्णन

दूसरा प्यार नहीं रखा जाता छुपाकर
बटुए की चोर-जेब में
क्या तुमने सुनी है
कोई किंवदन्ति दूसरे प्यार के बारे में
या किसी राजकुमारी की कहानी
जिसे मिला हो दूसरा राजकुमार

दूसरे प्यार के बीच
होता है महा-राशि जल
और एक टूटा हुआ पुल
पहले प्यार की तरह
दूसरे प्यार में
नहीं होती ऐसी सड़क
जिसके दूसरे छोर पर कोई न हो

वास्तव में
दूसरे प्यार तक हो जाते हैं हम इतने व्यावहारिक
कि संभलकर चलते हैं सारे दांव
और दूसरा प्यार बना देता है हमें इतना बनिया
कि मुनाफ़ाखोर हो जाता है प्रेम

दूसरे प्यार का ढ़ोंग सिर्फ़ वो करते हैं
जो बार-बार पड़कर प्यार में
खो देते हैं उसका अर्थ
या वो बेचारे जिन्हे
मिला ही नहीं होता पहला प्यार

Sunday, 8 June 2008

एक अनंत प्रेम-कथा

चूल्हा सुलगाया उसने एक प्रेम-पत्र से
जिसे लिखा था किसी ने उसके नाम
अपने अलस सवेरे के सपनों में बार-बार
फिर गागर भर लाई उस तालाब से
जहाँ कदम्ब के नीचे किसी की भावुक आकांक्षा
देना चाहती थी उसे एक चुंबन
संदूक में तरतीब से बिछाए उसने कपड़े
जैसे किसी ने बुन दिया था उसका नाम
तकिये में गुँथी रुई में
लोरी गाकर सुला रही थी वो
उस बच्चे को जिसमें
देखना चाहता था कोई अपना अक्स
देहरी पर बैठ काढ़े उसने अपने लम्बे बाल
जिन्हे ओढ़कर सो रहा है आज भी कोई
जीने के लिये दो घड़ी उसके साथ

रात में जब एक जिस्म हमबिस्तर हुआ उसका
उसने शिद्दत से याद किया
एक प्रेम-पत्र
एक चुम्बन
तकिये में गुँथा एक नाम
एक अक्स बच्चे में
और अपने बालों में उलझा एक चेहरा

इस तरह पूरी की
उसने अपनी अनंत प्रेम-कथा

Friday, 6 June 2008

नदी जो उसकी आँख से बहती है

वो जिसे छोड़ आया था
रोते हुए धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ते
वो मेरे साथ चली आई थी
हज़ारों मील

आज भी ताज़ा हैं
गीली लकड़ी से सुलगते आँसू
मैं हैरान हूँ देखकर उनकी लकीरें आईने में

याद करना चाहता हूं उसे
जो नदियाँ रो चुकी है अब तक
टटोलकर घुप अन्धेरे में फोन
और माँ की नींद
वह करती है किसी को फोन
और सुबुकती रहती है हौले-हौले
बात नहीं करते वे दोनों
कितना बेमानी लगता है बोलना कई बार
जब शब्द भी भूल जाते हैं अपना मतलब

मुझे याद आते हैं तितली से मचलते ओंठ
जो छ्त के एक कोने में बैठ
बुदबुदा रहे हैं कोई नाम
मेरे दिमाग में पैठकर
किसी की हँसी बोल देती है हल्ला
तितली
बैठ गयी है डरकर किसी और ठौर
धुल गया है वो चेहरा
जो हज़ारों मील चला आया था
मेरे साथ

फ़टी कमीज़ की जेब से निकल आया
एक चिथड़ा ख़त
जिसका अक्षर-अक्षर प्यार में डूबकर भरभरा गया था
अब पढ़ नहीं पाओगे उसे
वो आँखें भी तो वहीं छोड़ आये थे
लिखा गया था जिनके लिये यह ख़त

डर लगता है सोचकर
क्यों लाया सिर्फ़ एक चिथड़ा प्यार
जानता तो पूरा समंदर ले आता
जिसे भर रही हैं आज भी
उसकी आँखों में बहती झीलें

रह-रहकर फड़फड़ाता है अब भी
कमरे के कोने में धूसरित सा चिथड़ा प्यार

Wednesday, 4 June 2008

इंतज़ार

सबसे पहले इंतज़ार होता है
जब प्यार अभी अपना रास्ता
खोज ही रहा होता है
सुबह आँखें खुलते ही
हाथों में
इंतज़ार का कलेंडर
तैयार मिलता है
वह गुफ्तगू भी उसमें दर्ज होती है
जो शायद कभी की ही ना जाए
गाड़ी रोककर उस बस स्टैंड पर
की गई मुलाक़ात
जहाँ से उसने आज तक बस पकड़ी ही नहीं

सुबह और अंधेरे के बीच
बार-बार दरवाज़े तक दौड़ती निगाहें
इंतज़ार ही तो हैं
रात में भी नींद में भीगकर
चेहरे पर खिंच आई मुस्कराहट
क्या वह बिल्कुल अर्थहीन है?
मैं नहीं सोचता इंतज़ार कैसा है
एक संदेश, एक फ़ोन, एक मुलाक़ात
या शायद सिर्फ़ एक पोस्टकार्ड
बेचैन कदमों की आहट
या उदिग्न ह्रदय की चहलक़दमी

सिर्फ़ वे ही तो धुरी होते हैं
हमारी ज़िंदगी की
जिनका हमें इंतज़ार होता है
मगर जाने किस अनबुझ
रासायनिक प्रक्रिया से गुज़रकर
यह बदल जाता है अपेक्षा में
जब दो होंठ बुदबुदाते हैं
"मुझे तुमसे प्यार है"

अबकी शाम प्यार का जश्न मनाया जाएगा
जब इंतज़ार
अपनी गिनी-चुनी साँसे भी ले चुका होगा
इसके बाद क्या बचेगा
इंतज़ार के पास देने को
और क्या बचेगा प्यार के पास पाने को
इससे तो बेहतर है
इंतज़ार कभी ख़त्म ही ना हो

इंतज़ार २

प्यार?
नहीं मैं तुम्हे प्यार नही करता

मैं वहाँ वक्त से १५ मिनट पहले पहुँचा था
जहाँ मिलने का कहकर तुमने कल शाम
रखा था फोन
उस शाम से इस समय तक
सिर्फ़ २४ घंटे ही थे
युग नही थे
तुम अलबत्ता घंटा भर देर से पहुंचीं
मगर उस एक घंटे में भी
सिर्फ़ ६० ही मिनट थे
युग नही थे

कल रात मैं सोया पूरी नींद
मुझे नहीं आए मुलाक़ात के सपने
और न ही ध्यान हटा काम से मेरा
कॉफी हॉउस की उस टेबल पर बैठा
मैं नहीं था किसी भी तरह उतावला
खिड़की से बाहर
मेरी आँखें
नहीं जोह रही थीं किसी की बाट
मैं तो आराम से
चाय की चुस्कियों के बीच
धीरे धीरे
लिख रहा था एक कविता

मैं नही जानता
क्या सोचते हैं
प्यार के बारे में
इस दुनिया के लोग
लेकिन
क्या यह इतना साधारण हो सकता है?

पेड़ और मैं

मैंने नहीं देखा
अपने घर के आगे खड़ा वह पेड़
उसमें किस रंग के फूल खिलते हैं
क्या मालूम
कौन जाने वह
कब रहा होगा ठूंठ

एक सुंदर सा घोंसला बनाया है
उसमें गौरैया ने
कहता है मेरा बेटा
कितनी मेहनत लगी गौरैया की
मैंने नहीं लगाया हिसाब
फल गिरते हैं उसके हर साल
मेरे आँगन में
मेरे पास नहीं है वक्त
उन्हें समेटने का

इसे कटवा देंगे
कहती है मेरी बीवी
इससे भर जाता है आँगन में कूड़ा
दिनरात शोर मचाती हैं
इसपर डेरा डाले चिडियां
और इसकी जड़ें खतरा भी तो हैं
घर की नींव के लिए
मैं हिला देता हूँ हामी में सिर
जैसे पेड़ हिलता है हवा में
और डूब जाता हूँ अपने काम में

आने वाले संकट से बेख़बर
पेड़ और मैं
खुश हैं
और हरे भरे हैं अभी तक।