Friday, 5 December 2008

मानव श्रंखला

उम्मीद कर रहा था कि बंगलौर में भी लोग इकठ्ठे होंगे और मोमबत्तियां जलाएंगे। ऐसा हुआ मगर बहुत ही छोटे स्तर पर और लोगों को इसके बारे में पता नहीं लगा। मुझे भी अखबार से ही पता लगा और अब प्रशासन ने यहां पर किसी भी रैली या गैदरिंग पर सुरक्षा को या खतरे को देखते हुए रोक लगा दी है। तो मेरी जो इच्छा थी कि central business district को मानव श्रंखला से घेरकर मिलकर "सारे जहां से अच्छा" गाएं, वह मन में ही रह गई।
दूसरी ओर मैंने देखा कि एक पाकिस्तानी बड़ी मेहनत से नेट पर पंजाबी लोकसंगीत संजो रहा है। पंजाबी लोकसंगीत पाकिस्तान और भारत का साझा है।
आजकल जो एक चीज़ राहत दे रही है, वह संगीत है। इससे ऊपर कोई और चीज़ नज़र नहीं आ रही। इसलिये परसों जो वहां लगाया, वह आज यहां लगा रहा हूँ।

9 comments:

poemsnpuja said...

pahle se koi khabar nahin thi, shayad isliye log jyada participate nahin kar paaye. dilli ya bombay ki tulna me shayad bangalore ek doosre se us tarah juda nahin hai aisa mujhe lagta hai. wahan par logo ki gathering bahut jaldi ho jaati hai. kuch logo ne pahal to ki, apni apni jagah is dard ko mahsoos karne ki jaroorat hai.

poemsnpuja said...

pahle se koi khabar nahin thi, shayad isliye log jyada participate nahin kar paaye. dilli ya bombay ki tulna me shayad bangalore ek doosre se us tarah juda nahin hai aisa mujhe lagta hai. wahan par logo ki gathering bahut jaldi ho jaati hai. kuch logo ne pahal to ki, apni apni jagah is dard ko mahsoos karne ki jaroorat hai.

महेन said...

पूजा जी,
दर्द तो है ही और जिन्हे दर्द महसूस नहीं हो रहा उन्हे कम से कम शर्म तो महसूस तो हो।
आप या मैं बंगलौर को ठीक से जानते-समझते नहीं इसलिये ठीक से कह नहीं सकते और फ़िर हम यहां के social sphere से भी बाहर हैं।
बहरहाल संभव है कि 6 दिसंबर एक बाद ही ऐसा कुछ हो।

vijay gaur/विजय गौड़ said...

महेन सुंदर गीत है। मनुष्यता के खिलाफ़ जीवन की उम्मीदों को स्थापित करने का आपका अंदाज इस प्रस्तुति की खूबी है, इसलिए भी गीत में एक खास तरह की मिठास है।

मीत said...

क्या बात है भाई !! सही कहा .... संगीत ही राहतबख्श है इन दिनों ..... ई कहाँ से जुगाड़ किया भैय्या ? बहुत्तै बढ़िया है.

Gyan Dutt Pandey said...

सांई की नगरी अति सुन्दर!
बन्धु दिव्यता मिल गई इस श्रवण में।

सुशील कुमार छौक्कर said...

महेन जी कुछ इच्छाएं जहाँ पैदा हुई होती वही की रह क्यूँ जाती हैं? दर्द रोष बन कर सड़्को पर तो निकला है इस बार,बैशक वो पर्याप्त ना हो पर कम से कम शुरुआत तो हुई यही दिल को तसल्ली दे जाती हैं। लोकसंगी की साईट अच्छी ढूढी आपने। यह बिल्कुल सोले आने सच है कि संगीत बैशक दर्द हो या खुशी हर वक्त सूकुन देता है।

महेन said...

मीत भाई, कैलाश खेर की नई एलबम में यह गीत है। कबीर का लिखा है।

fashion jewelry said...

can you email me: mcbratz-girl@hotmail.co.uk, i have some question wanna ask you.thanks