Thursday, 11 December 2008

जौ का रस

मैं बीयरहारी जीव हूँ। बीयर शुरु करवाने का श्रेय हमारे एक डाक्टर साहब को जाता है जिन्होनें मुझे और मेरी दीदी को बीयर पीने की सलाह दी, कि हम थोड़ा वज़न बढ़ा सकें। दीदी ने तो क्या पीनी थी मगर मुझे घर में बैठकर बीयर पीने का बहाना मिल गया। बीयर का कार्यक्रम साप्ताहिक होता है और यह परंपरा पिछले कुछ 7-8 सालों से चली आ रही है। अपवाद तभी होता है जब कुछ यार-दोस्त जुट जाएँ। इंग्लैंड में जब था तो यह दैनिक कार्यक्रम में तब्दील हो गया था और साप्ताहांत में तो हम तीन लोग मिलकर तीस-तीस लीटर तक बीयर पी जाते थे। वहां बीयर में अल्कोहोल यहां के मुकाबले कम होती है। सच तो यह है कि इंग्लैंड की बीयर की गिनती दुनिया की सबसे सौफ़्ट बीयर में होती है।
दिल्ली में बाद के कुछ सालों में सलीके की सरकारी शराब की दुकानें खुल गईं थीं, हालांकि ऐसी भी सरकारी दुकानें थीं जहां कर्मचारी सरकार से ज़्यादा पैसा बना लेते थे। ऐसी एक दुकान पर जाकर हमारे एक पहाड़ी शेर मित्र ने एक कर्मचारी को लगभग लतिया दिया था। वैसे ये मित्र बंगलौर आने के बाद भी नहीं सुधरे और वक्त-बेवक्त लोगों को लतियाते रहते हैं। बंगलौर जो शहर है यहां के स्थानीय गुंडों को उत्तर भारतीयों का यहां आना पसंद नहीं है। पसंद तो और भी कई लोगों को नहीं मगर इन लोगों की मुखरता से आए दिन मुठभेड़ होती रहती है। हमारे ये मित्र इन जैसे लोगों से या तो टकराए नहीं हैं अभी तक या टकरा गए हैं तो या तो लतियाए जा चुके हैं या उन्हें लतिया चुके हैं, जिसकी संभावना बहुत क्षीण है। मगर इनका विरोध हमेशा बहुत हिंसक होता है। यह पराक्रम ही है कि आप बंगलौर में रहते हुए यहां के स्थानीय लोगों से उलझें। मेरा साबका जब भी ऐसे लोगों से पड़ा है, इंट्युशन ने कहा है कि चुप रहने में ही समझदारी है। एक ही बार दो सांड़ सरीखे लोगों से मेरी मुठभेड़ हुई थी तो मैं कार के भीतर था, इसलिये सुरक्षित था।
एक दूसरे मित्र हैं। हैं ये भी पहाड़ी शेर, मगर शेर जैसा सब्र इनमें नहीं है। बोलने में इनकी ज़बान जितनी अटकती है, हाथ खुलने में उतना ही फ़्लो है। शराब की दुकानों के यहां पर ठेके दिये जाते हैं और दुकान में ही पीने की सुविधा भी मौजूद होती है। वैसे इनके अलावा सुपर-स्टोर में भी शराब मिलती है। ये लाइसेंसशुदा दुकानें अकसर बीयर से लेकर हर तरह की शराब के ज़्यादा पैसे लेते हैं, जिसका कोई विरोध नहीं होता। एक बीयर के कैन पर आजकल ये लोग पांच रुपए तक ज़्यादा ले लेते हैं। हमारे ये मित्र एक दिन मेरे और अपने लिये बीयर लेने गए हुए थे। जब दुकानदार ने ज़्यादा पैसे काटे तो इन्होनें विरोध किया। इनका प्यार का स्वर भी इनके शरीर की तरह काफ़ी भारी है, जिसे मैं और इनके दूसरे नज़दीकी मित्र तो समझते हैं मगर दुकान पर मौजूद बकासुर सरीखा साकी नहीं समझ पाया। उसे लगा ये उसपर चिल्ला रहे हैं। उसने इन्हें एक चपाटा जड़ दिया। इन मित्र ने भी प्रत्युत्तर में उसे एक झापड़ रसीद कर दिया। जबतक इन्हें अपना दुस्साहस समझ में आता 6-7 लोग इनके पीछे पड़ चुके थे। ये समझदारी करते हुए सीधे घर की ओर भागे। स्कूल-कालेज की फ़ुटबाल की कप्तानी ने इन्हें भागने में बहुत मदद दी और ये उन लोगों से काफ़ी आगे निकल गए मगर गलती से एक गली पहले ही मुड़ गए। गली के कुत्तों ने भी इनका ठिकाना बताने में उन लोगों की काफ़ी मदद की। सामने देखा तो एक ऊँची दीवार जिसे पार कर पाना आसान नहीं था। भागने में जितनी रील बचाई थी, दीवार पर चढ़ने में उतनी फ़ुटेज खा गए। तबतक सब लोगों ने इन्हें पकड़ लिया और घेरा बनाकर इनका भरता बनाया। इनके फ़ोन करने के बाद जबतक मैं वहां पहुंचा, ये लुट-पिट चुके थे। मैं पचास किलो का प्राणी वैसे भी क्या मदद कर सकता था। ये तकरीबन दो साल पहले की बात है। तबसे मैं कई बार सोच चुका हूँ कि जो मेरे पहले पहाड़ी मित्र हैं अगर वे मेरी जगह होते तो क्या करते? उन सब लोगों से चिरंजीवी या रजनीकांत की तरह लड़ते? या अपने को इतने सारे लोगों के सामने कमज़ोर जानकर उनको शांत करवाने की कोशिश करते?
मज़ेदार बात ये है कि हमनें उस शाम भी बीयर पी और इन मित्र के पिटने पर खूब हँसे भी। यह बीयर की पैदा की हुई ज़िंदादिली थी या इन मित्र के अंदर ही कुछ ऐसा था कि चेहरे पे कुछ यूँ भाव आ रहे थे:
"साक़िया शौक़ से भर भर के पिला जाम हमें
हो के बेहोश तेरी राह में क़ुर्बां होंगे"

पिछले साप्ताहांत पर मेरी सासु माँ के दुराग्रह पर यह सिलसिला टूट गया था। श्रीमती जी ने समझाया कि थोड़ी सी बीयर से कुछ नहीं होता, मगर उनके लिये यह भी हर दूसरी शराब की तरह है। वे बहुत खुश थीं और मुझे रातभर सपने में ये शेर सुनाई देता रहा:

"मसाइब और थे, पर दिल का जाना
अजब एक सानिहा सा हो गया है"

10 comments:

poemsnpuja said...

आपका ये रूप पहली बार पढ़ा है, हालाँकि बानगी तो आपकी प्रोफाइल में ही मिल जाती है. बहुत दिन बाद कुछ इतना अच्छा पढ़ा कि हँसते हँसते लोट पोट हो गए. बहुत ही मजेदार लिखा है. जितनी रील भागने में बचायी थी उतनी फुटेज दीवार पर चढ़ने में खा गए. एक पर एक लाइनें लिखी हैं. मुश्किल वक्त में हंसाने के लिए तहेदिल से शुक्रिया

Mired Mirage said...

हे पचास किलो के प्राणी, जब अब तक जगह जगह की भाँति भाँति की बियर से १०० ग्राम वजन नहीं बढ़ा तो अब क्या बढ़ेगा ? कहें तो मैं डाइट प्लैन कर दूँ ? :D
वैसे पहाड़ी बन्धु युद्ध को यूँ हर समय तैयार रहते हैं यह पता नहीं था, सेना में जाते हैं यह तो पता था ।
घुघूती बासूती

Manoshi said...

अरे! हमें तो शीर्षक से लगा, आयुर्वेद की बात होगी...wheat grass ...निकला बीयर।

सुशील कुमार छौक्कर said...

सुना तो ऐसा ही है कि बीयर या शराब पीने से आदमी थोड़ा मोटा हो जाता हैं। कई दोस्तों को देखा भी हैं। पर आप तो वैसे के वैसे ही हैं। आप पर क्यों असर नही हुआ जी? खैर सुबह सुबह हंसी से शुरुआत हो गई।

शिरीष कुमार मौर्य said...

काश मेरी पी हुई बीयर भी तुम्हें लग जाती ! या फिर बीयर पीकर भी न मुटाने का तुम्हारा गुण मुझे मिल जाता !

अभिषेक ओझा said...

अब क्या कहें अपने लिए तो यही लाइन फिट बैठती है:

"नातजुर्बाकारी से वाइज़ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है"

डॉ .अनुराग said...

कौन सा डॉ है भाई ?ऐसी सलाह दी की आज तक मान रहे हो .वैसे .बियर पीने से वजन नही बढ़ता "abnormal deposition of fat " हो जाता है .खैर मै ये सब सुनाकर बोर नही करना चाहता .लिखा मस्त है बीडू .......लिखते रहो....

Gyan Dutt Pandey said...

बीयरहारी? वाह! बीयर हार गई आपसे!

costume jewelry said...

i agree your idea ! very nice blog

Rohit Tripathi said...

mast post ekdum.. bahut mazedar mai to soch raha tha ki filmo ke tarah jab aapke dost ke samne deewar aa gayi to unhone un sab ki pitai kar dali hogi lekin yaha to ulta ho gaya apna hero hi pit gaya bechara :-)
Rohit Tripathi

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