Sunday, 7 December 2008

बल बल जाऊँ मैं तोरे रंगरेजवा

एक पोस्ट में मैनें कहा था कि कुछ रचनाओं में अमरत्व के गुण होते हैं। ग़लत नहीं कहा था। इस बार "छाप तिलक सब छीनी" कैलाश खेर की आवाज़ में सुना और फिर से प्रभावित हुआ। कैलाश की आवाज़ भी उतनी ही दिलकश है जितना ख़ुसरो का लिखा दिलफ़रेब है। (बीच में कबीर भी शामिल हैं वैसे)

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6 comments:

poemsnpuja said...

is tarah ke soofi gaanon me kailash kher ki aawaj behad acchi lagti hai. aur khusro to khair...kya kaha jaaye. mujhe unka likha aakhiri sher bahut pasand hai
"gori sove sej par, mukh par daare kesh
chal khusro ghar aapne rain bhaye chahun desh"

vijay gaur/विजय गौड़ said...

सुंदर ्प्रस्तति है। आभार।

Gyan Dutt Pandey said...

बहुत नायाब। आप तो हीरे बांटने में लगे हैं।

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह जी कानों में सुरीला रस घोल दिया। वैसे पहले भी कही सुना था। ज्ञान जी बिल्कुल सही कह रहे हैं।

sidheshwer said...

बल बल जाऊँ महेन भाई!

costume jewelry said...

lol,so nice