Wednesday, 3 December 2008

अफ़सोस और उम्मीद के गीत

ऐसे समय में मुझे ब्रेख़्त से ज़्यादा कुछ नहीं सूझ रहा…


वे जो शिखर पर बैठे हैं, कहते हैं:
शांति और युद्ध के सार तत्व अलग-अलग हैं
लेकिन उनकी शांति और उनका युद्ध
हवा और तूफ़ान की तरह हैं
युद्ध उपजता है उनकी शांति से
जैसे मां की कोख से पुत्र
मां की डरावनी शक्ल की याद दिलाता हुआ
उनका युद्ध खत्म कर डालता है
जो कुछ उनकी शांति ने रख छोड़ा था।

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विवाहित जोड़े
बिस्तरों पर लेटे हैं
जवान औरतें
अनाथों को जन्म देंगी।

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हर चीज़ बदलती है।
अपनी हर आखिरी सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो।
लेकिन जो हो चुका, सो हो चुका।
जो पानी एक बार तुम शराब में
उंडेल चुके हो, उसे उलीच कर
बाहर नहीं कर सकते।

जो हो चुका, सो हो चुका है।
वह पानी जो एक बार तुम शराब में उंडेल चुके हो
उसे उलीच कर बाहर नहीं कर सकते
लेकिन
हर चीज़ बदलती है
अपनी हर आखिरी सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो।

8 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया व सार्थक रचना है।बधाई।

अजित वडनेरकर said...

सही सही...
बदल सकता है सब कुछ
अभी तो सिर्फ कुछ ही बदल देने से
काम चल जाएगा।
अच्छी कविता...

जितेन्द़ भगत said...

ब्रेख्‍त बेहद प्रासंगि‍क रचनाकार हैं।

MANVINDER BHIMBER said...

बहुत बढिया व सार्थक ,अच्छी कविता...

Gyan Dutt Pandey said...

भैया, ब्रेख्त की परिवर्तन विषयक अन्तिम पंक्तियां बहुत जमी। यह पढ़वाने को धन्यवाद।

सुशील कुमार छौक्कर said...

महेन जी ब्रेख्त जी पढवाने का शुक्रिया। इस समय भी ये रचना प्रासंगि‍क है।
यह वक्त नहीं शौक मनाने का
यह वक्त है अब कुछ कर जाने का।

poemsnpuja said...

mushkilon aur asmanjas ke is daur me wakai kuch likhne ka man nahin karta hai. kuch kavitayein har daur ke liye hoti hain, aapne inka jikr kiya ham bhi roobaru huye.
banglore me bhi kuch hona chahiye isse sahmat hun, shuruaat bas isliye nahin karti ki nayi hun, bahut kam logo ko jaanti hun. agar aap kuch karne ki soch rahe hain to jaroor participate karungi.

love verma said...

behtarin panktiya behad dhanyavad