Monday, 17 November 2008

घुन्ना

मैं प्रेम-गीत पढ़ता हूँ और हँस देता हूँ
क्या मैनें लिखी कोई कविता तुम्हारे नाम?
या गुलदस्ते में सजाकर दिया था तुमनें अपना प्रेम?
हम जानते थे प्रेम-कविताओं की क्षुद्रता
हँसते थे और हँसते-हँसते रो देते थे
तब प्यार हमें ले गया था वहाँ
हर चीज़ जहाँ से छोटी नज़र आती है।
हमारे लिये न कविताएँ थीं,
न चाहिये थे हमें बिछोह के गीत।

एक प्रेम बेआवाज़ घुल जाता है हवा में;
विदेह होता है एक प्रेम
एक प्यार ऐसा भी तो होता है।
खंडित स्मारक पर बैठा हूँ मैं
पढ़ता हूँ एक प्रेम-गीत
पढ़ता हूँ और हँसता हूँ अकेला।

12 comments:

जितेन्द़ भगत said...

आपने प्रेम को खूबसूरत ढंग से सात्‍वि‍क रूप दि‍या है, बेहतरीन कवि‍ता।

तेरे लिये said...

ये तो बहुत सुंदर लगा।

Manoshi said...

आपके ब्लाग पर पहली बार आई थी। अब आती रहूँगी। बधाई।

sidheshwer said...

प्रेम न बाड़ी ऊपजै..
बहुत अच्छा.
लगता है-
आजकल आपके भीतर का कवि जागा है
और (शायद) पुराने दिनो में ले भागा है

अभिषेक ओझा said...

सोच रहा था प्रेम कहाँ से कहाँ ले जाता है !

अनुपम अग्रवाल said...

घुन्ना है तब तो इतनी सारी और अच्छी बातें बता रहे हैं
अगर बोलते होते तो ना जाने क्या होता

Gyan Dutt Pandey said...

खण्डित स्मारक पर बैठ प्रेमगीत - वाह क्या शब्दप्रयोग है!

ravindra vyas said...

महेन, बहुत प्यारी राह पर जा रहे हो। बस, थोड़ा आहिस्ता आहिस्ता।

Dr. Nazar Mahmood said...

बहुत खूब .
बधाई

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर ! वही प्यार परन्तु प्रत्येक के लिए कुछ अलग सा !
घुघूती बासूती

एस. बी. सिंह said...

प्रेम बेआवाज़ घुल जाता है हवा में।
बहुत सुंदर,बधाई

fashion jewelry said...

cool blog