Friday, 7 November 2008

चंद ज़रूरी लोगों के नाम

कितना कुछ बदल गया?
कुछ लोग आगे निकल गये, कुछ रह गए पीछे
साथ कोई न रहा,
शांत लहर के नीचे जन्म ले रही हैं मछलियाँ

शहर चमचमाकर नए हो गए
मगर पुरानी पड़ गईं उनकी स्मृतियाँ,
बासी किताबों पर पीलापन चढ़ गया
और बाकी बचे खतों को कुतर रही है उदासी,

ढहती दीवारों पर उठती है नई धूप
और अवसाद पर भी जम जाती है स्नेह की परत

अंधेरा अब भी वही है,
कोई बदलाव नहीं उसके भारीपन में
न उदासी में,
मुझे अंधेरे कोने में बैठना अब भी भाता है,

बावजूद इसके कि दुनिया घूमती है,
हाशिये पर उतर गए समय के बावजूद
तुम्हारे साथ रहता हूँ मैं आज भी उसी युग में
जिस युग में हम मिले थे आखरी बार
और पहली बार

कितना आशातीत था हमारा अलग होना,
और कितना असंभव
एक दूसरे को सिर्फ़ याद करते हुए जीवित रह जाना

कुछ लोग और चंद बातें
अभिशप्त होती हैं सिर्फ़ दस्तावेज़ बनकर रहने के लिये
न उनका वर्तमान में कोई स्थान होता है, न भविष्य में,
मैं तो तुम्हारे अतीत में भी मर चुका हूँ न?

बड़ा कठिन लगता है मुझे
अच्छे लोगों के साथ गुज़ारे दिनों को याद करना,
फिर चाहे वे अच्छे दिन हों या बुरे
प्रेम कोई हिमालय तो नहीं
जिसे रखा जा सके हमेशा ताज़ा और पवित्र।

13 comments:

Parul said...

प्रेम कोई हिमालय तो नहीं जिसे रखा जा सके हमेशा ताज़ा और पवित्र। sahi kahaa aapney..aajkal yahi sahi hai

Gyan Dutt Pandey said...

भैया हमें तो यह लाइन खरीदनी है -
ढहती दीवारों पर उठती है नई धूप
और अवसाद पर भी जम जाती है स्नेह की परत

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर व मनोभावों का सुन्दर व सहज चित्रण करती हुई कविता !
घुघूती बासूती

ravindra vyas said...

ऐसा है प्यारे दोस्त कि सब तरफ से ध्यान हटाकर कविताएं लिखने पर ध्यान लगाअो। यह इतनी प्यारी कविता है कि नजर न लगे इसलिए काला टीका लगाने का मन कर रहा है।
जो अच्छी लगती है, अच्छी लगती है, जो नहीं, वो नहीं।
ढेर सारी शुभकामनाएं।
आशा करता हूं तुम्हारी और नई कविताएं जल्द ही पढ़ने को मिलेंगी।

रंजना said...

Bhaavpoorn kavita.....

अभिषेक ओझा said...

ऐसी यादें बहुत कचोटती है !
और अभी जो साथ हैं उनके लिए भय !

बड़ी अच्छी रचना है.

सुशील कुमार छौक्कर said...

अदभुत है जी। और क्या कहे। बार बार पढने का मन करता हैं।

डॉ .अनुराग said...

बड़ा कठिन लगता है मुझे
अच्छे लोगों के साथ गुज़ारे दिनों को याद करना,
फिर चाहे वे अच्छे दिन हों या बुरे
प्रेम कोई हिमालय तो नहीं जिसे रखा जा सके हमेशा ताज़ा और पवित्र।

रविन्द्र जी बात पर गौर करो .पहली बार कुछ कविताओं से ही खीच कर तुम्हारे ब्लॉग पर आया था .....

Ek ziddi dhun said...

`कितना आशातीत था हमारा अलग होना,
और कितना असंभव
एक दूसरे को सिर्फ़ याद करते हुए जीवित रह जाना

कुछ लोग और चंद बातें
अभिशप्त होती हैं सिर्फ़ दस्तावेज़ बनकर रहने के लिये'
मुझे कविताएं अच्छी लगती हैं। क्यों यह बताना मुश्किल होता है। यह भी अच्छी लगी। अच्छा यह भी लगा कि प्रेम को लेकर फ्जी घोषणाएं नहीं हैं। बस हिमाले को लेकर जरूर अभी रोमेंटिसिज्म नहीं टूट पा रहा है। कई लोगों को ब्लाग में नदी को लेकर भी ऐसा ही है।

swapandarshi said...

bahut khoob !!!!

Ravindra ji kee baat ko mera bhee samarthan

poemsnpuja said...

कविता बहुत अच्छी लगी, बिंब बड़ी खूबसूरती से उभर कर आए हैं. मुझे ये लाइन खास तौर से बहुत अच्छी लगी-
कुछ लोग और चंद बातें
अभिशप्त होती हैं सिर्फ़ दस्तावेज़ बनकर रहने के लिए

pallavi trivedi said...

adbhut...adbhut ...adbhut.

गौरव सोलंकी said...

अरे...ऐसा लिखने के बाद अब कुछ और भी लिखने की जरूरत है क्या?
फिर से इसी को बार बार लिखते रहिए। हम पढ़ते रहेंगे। :)