Tuesday, 4 November 2008

हेरमान हेस्से, एक बार फिर

हेरमान हेस्से की दो और कविताओं का अनुवाद कर पाया हूँ जिन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये और, शिरीष भाई के अनुनाद के लिये दो अनुवाद मैनें अपने दफ़्तर का एक ज़रूरी काम स्थगित करके किये, जोकि अच्छी बात नहीं है, मगर मैं जब भी हेरमान की कविताएँ लेकर बैठता हूँ सिटिंग लंबी हो जाती है और कुछ न कुछ अनुवाद करके ही उठता हूँ। सो आज के लिये ये दो कविताएँ:


बिना तुम्हारे

मेरा तकिया ताकता है मुझे हर रात
किसी कब्र के खालीपन में
सोचा नहीं था
इतना कठिन होगा अकेला होना
न मिल पाना तुम्हारे बालों की बिछावन

अकेला लेटा हूँ मैं सुनसान घर में
झूलते मद्धम दिये के साथ
और धीरे से फैलाता हूँ हाथ
तुम्हारे हाथों के लिये
बढाता हूँ अपना गरम मुँह हौले से तुम्हारी ओर
चूमता हूँ अपने को ही निरुत्साह और थकान से
और अचानक उठ बैठता हूँ
मेरे चारों ओर तनी हुई है सर्द रात की चुप्पी
खिड़की से बाहर चमकता है एक साफ तारा
कहाँ हैं तुम्हारे सुनहरे बाल
कहाँ है तुम्हारा खूबसूरत चेहरा?

अब हर हर्ष में पाता हूँ मैं दु:ख
और शराब में ज़हर
जानता नहीं था
इतना कठिन होगा अकेला होना
अकेला और तुम्हारे बिना।



फूल भी


फूल भी पाते हैं मृत्यु
हालांकि वे निष्पाप होते हैं
ऐसे ही हमारा अंतस निष्पाप होता है
और झेलता है सिर्फ़ दुख
हम खुद ही यह समझना नहीं चाहते

जिसे हमनें ग्लानि पुकारा
उसे तो सूर्य निगल गया है
पवित्र फूलों के भीतर से निकल
आता है वह हमें मिलने
खुशबू की तरह, बच्चों की करुण दृष्टि की तरह

और जैसे फूल मुरझाते हैं
हम भी मरते हैं
मरते हैं मुक्ति की मृत्यु
मरते हैं पुनर्जन्म के लिये।

9 comments:

अखिल तिवारी said...

जानता नहीं था
इतना कठिन होगा अकेला होना
अकेला और तुम्हारे बिना।

waah kya baat kahi hai.. achcha anuwad. kavitamay..

hindustan wapis aa gaye kya bandhu?

Udan Tashtari said...

बहुत आभार पढ़वाने का.

सुशील कुमार छौक्कर said...

क्या कहे आपके शुक्रिया के लिए जो आपने अनुवाद करके इतनी सुन्दर रचनाएं पढवाई हैं। ऐसा काम कोई नहीं करता सिवाय अनुवाद करने वालों के, पर आपने शायद हम जैसो के लिए ये कार्य किया हैं कि हम भी विदेशी लेखकों के लेखन को पढ पाये। कल अनुनाद ब्लोग पर हेरमान जी की आपकी अनुवाद की रचनाएं पढी। "मैं जानता हूँ कि तुम जाती हो" दिल को छू गई। और आज की दोनो रचनाएं भी बहुत पसंद आई। आशा करता हूँ कि आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा।

डॉ .अनुराग said...

पहली कविता खासी पसंद आयी

ravindra vyas said...

ठीक जा रहे हो। चलते रहो।

अभिषेक ओझा said...

दोनों पसंद आई... दूसरी याद रह जायेगी.

वर्षा said...

दोनों ही कविताएं अच्छी हैं।

Mohan Vashisth said...

दोनों ही कविताएं बहुत ही बेहतरीन अनुवाद करके पढवाने के लिए धन्‍यवाद

fashion jewelry said...

where you come from!