Saturday, 1 November 2008

सचेतन में रहेगी पीड़ा

अकेला बैठ अपनी कुर्सी पर
मैं सोचता हूँ,
सोचता हूँ और हैरान होता हूँ
चुप हो जाता हूँ,
इतना चुप कि बेआवाज़ी भी सन्न हो जाती है

कैसी अफ़ीम घुली थी उन दिनों में
जब सड़क पर गुज़रते लोगों से बेपरवाह
मैं चूमता था उसका चेहरा हाथों में लेकर?

पतझड़ में जब पेड़ ठूँठ हो रहे थे
मैं पूछ रहा था अपने से
देखा क्यों नहीं कभी
कैसा होता है पेड़ों का हरियाना?

जर्जर होकर बिखरता हूँ मैं भीतर
देखता हूँ अपना विदीर्ण होना
और जानता हूँ बरसों बाद
मुझे सोचना नहीं पड़ेगा
कैसा था बिखराव का दर्द।

12 comments:

सोतड़ू said...

कविता अच्छी लगी। हालांकि मुझे यकीन है कि मुझे कभी समझ नहीं आ पाएगा कि क्यों कोई कविता कहानी, ख़ासकर कविता अच्छी होती है।
तेरी है तो बहुत बढ़िया।
फिर तो तू कविता ही लिखा कर।
चाय भी कविता में मांग, सो भी कविता में ही

शायदा said...

बहुत सुंदर कविता। लेकिन बरसों बाद वाली बात से मन दुखा है...

Gyan Dutt Pandey said...

आशा न छोड़ें। जब कुछ विदीर्ण होगा तभी कुछ नया बनेगा।

डॉ .अनुराग said...

एक उदास मगर सुंदर कविता .....लिखते रहो...कुछ ऐसा ही

Parul said...

इतना चुप कि बेआवाज़ी भी सन्न हो जाती है...acchii baat

सुशील कुमार छौक्कर said...

सही कहा सोतू ने। और मुझे भी हमेशा की तरह ये कविता भी अच्छी लगी।
मैं अकेला बैठ अपनी कुर्सी पर
सोचता हूँ,
सोचता हूँ और हैरान होता हूँ
चुप हो जाता हूँ
इतना चुप कि बेआवाज़ी भी सन्न हो जाती है

अजी काहे इतना गहरा सोचते हो।

मीत said...

वाह !

अभिषेक ओझा said...

उदासी वाली कविता बहुत गहराई से ले आते हैं आप !

Rohit Tripathi said...

wahh.. bahut sundar rachna

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खो देना चहती हूँ तुम्हें..

sidheshwer said...

याद आ गया

लोग जब... उदासी का सबब पूछेंगे..

मुश्किल तो यह होती है सबब के जाहिर होने के वास्ते शब्द नहीं मिलते.महेन भाई, आपको शब्द मिल रहे हैं ,यह अच्छा है.कुछ मेरे वास्ते भी दुआ करो!

एस. बी. सिंह said...

दिल में एक लहर सी उठी है अभी......

runescape gold said...

i think the archive you wirte is very good, but i think it will be better if you can say more..hehe,love your blog,,,