Wednesday, 1 October 2008

द बर्मीज़ हार्प (The Burmese Harp)

कुछ दिनों पहले एक नया ब्लोग चित्रपट नाम से शुरु किया था, जहां उत्कृष्ट फ़िल्मों पर चर्चा करना हमारा उद्देश्य था। मगर समय की सनातन कमी के चलते यह काम टलता रहा। कल पहली बार ही उसपर एक जापानी फ़िल्म Biruma no tategoto (The Burmese Harp) पर एक पोस्ट डाली जोकि संभवत: कुछ तकनीकी खराबियों के चलते किसी भी एग्रीगेटर पर प्रकाशित नहीं हुई। सोचा उसे यहाँ एक बार फिर पोस्ट कर दूँ।

"बर्मा की मिट्टी लाल है
और लाल हैं इसकी चट्टाने"

यह लाली ध्वंस की, युद्ध की है जो इस कहानी के साथ शुरू होकर अंत तक साथ रहती है। कुछ तो ताकियामा मिचियो लिखित युद्ध-विरोधी बाल-उपन्यास होने के कारण और कुछ कोन इचिकावा के इस उपन्यास की संवेदनशील व्याख्या के कारण फ़िल्म The Burmese Harp किसी भी कोण से एक युद्ध-आधरित फ़िल्म नहीं लगती। संभवत: फ़िल्म का प्रारूप तैयार करते समय इचिकावा के दिमाग में यह स्पष्ट था कि उन्हें युद्धरत मनुष्य के मानवीय पक्ष को उजागर करना है।

फ़िल्म में मानवीय संवेदनशीलता को प्रस्तुत करने के लिये हार्प एक प्रतीक है। इसके अलावा पूरी फ़िल्म में ही युद्ध के दृश्यों और उसकी भयावहता को दिखाने के लालच से इचिकावा बचते रहे हैं। बर्मा में भटक गई एक टुकड़ी, जो जापान लौटने की हरसंभव कोशिश कर रही है, जब थककर जंगल में सुस्ताने के लिये लेटती है तो एक-एक जवान के चेहरे से विशाद और निराशा झरती है। ऐसे हर मौके पर वे उदासी से उबरने के लिये “हान्यू नो यादो” (देश, प्यारे देश) गाते हैं। जवानों के भीतर इस गीत को स्पंदित करता है मिज़ुशिमा का हार्प-वादन, जोकि करुणा, आशा और रूदन के बीच कहीं कानों में बजता है और अज्ञेय की इन पंक्तियों जैसा कुछ चारों ओर गूँजने लगता है:

“अभी न हारो अच्छी आत्मा
मैं हूँ, तुम हो
और अभी मेरी आस्था है।”

टुकड़ी का कैप्टन इनोये खुद एक संगीत-प्रेमी और संगीत-विशारद है और संगीत को उसने अपने सैनिकों में इस तरह घोल दिया है कि जहां हर क्षण मरने का डर उनके सिर पर जमा रहता है वहीं संगीत उनके कंधों पर जीवन-जागरण की तरह विद्यमान रहता है। यह संगीत ही है जिसने युद्ध की भयावहता के बीच भी इन लोगों में, जोकि लम्बे अरसे से अपने परिवार और देश से दूर हैं, भावनाएं बचाए रखी हैं। वे युद्धकाल के पारंपरिक तरीके छोड़कर एक-दूसरे को संकेत देने के लिये भी गाते हैं, हार्प का इस्तेमाल करते हैं। मिज़ुशिमा एक बर्मी का रूप धर लेता है और धोती लपेटकर आगे की टोह लेने सिर्फ़ हार्प लेकर निकल पड़ता है।

एक गांव में जब इस टुकड़ी को फसाने के लिये जाल बिछाया जाता है और इसका आभास होने पर घिरे होने की अनभिज्ञता ज़ाहिर करने के लिये वे गाते हैं और मिज़ुशिमा हार्प पर संगत करता है तो ब्रिटिश टुकड़ी में भी वही भावनाएं प्रवाहित होने लगती हैं जो इस जापानी टुकड़ी में हो रही हैं। संगीत मानवीय सूत्र बन जाता है और ब्रिटिश जवान इनके सुर में अपना सुर मिला देते हैं।

जापान की हार के फलस्वरूप सैनिकों की यह टुकड़ी आत्मसमर्पण कर देती है और मिज़ुशिमा को पहाड़ की चोटी पर युद्धरत एक और जापानी टुकड़ी के पास युद्ध रोककर आत्मसमर्पण करने का संदेश देने के लिये भेजा जाता है। वह सिर्फ़ अपना हार्प लेकर जाता है और अपनी ही साथी टुकड़ी की गोलाबारी से बचते हुए उनतक पहुँचता है।
इस टुकड़ी और मिज़ुशिमा के बीच संवाद में एक मौलिक अंतर स्पष्ट दिखता है। यह अंतर है दूसरी टुकड़ी की युद्ध-मानसिकता का। वे सभी युद्ध से इतना ग्रसित हैं और युद्ध बाहर से ज़्यादा उनके भीतर इतना पैठ चुका है कि मिज़ुशिमा की तमाम कोशिशों के बावजूद वे आत्मसमर्पण करने को राज़ी नहीं होते और अंतत: मारे जाते हैं।

इधर मुदोन भेजी जा चुकी कैप्टन इनोये की टुकड़ी मिज़ोशिमा के न लौटने पर परेशान होती रहती है मगर उनके अंदर कहीं भरोसा है कि मिज़ोशिमा ठीक है। मिज़ोशिमा को एक बौद्ध भिक्षु बचा लेता है। भिक्षु के वेश में मुदोन जाते हुए जब मिज़ोशिमा इधर-उधर बिखरी जापानी सैनिकों की लाशें देखता है तो फ़िल्म में एक सैनिक का मानवीय पक्ष अपने चरम के साथ उपस्थित होता है। मिज़ोशिमा मन ही मन ठान लेता है कि सभी लाशों का अंतिम संस्कार करना उसका मानवोचित कर्तव्य है और वह इसमें जुट जाता है। मुदोन पहुँचकर भी वह अपनी टुकड़ी से नहीं मिलता बल्कि दीक्षा लेकर अपने अभियान में जुट जाता है। उसकी टुकड़ी और कैप्टन का यह विश्वास कि वह जीवित है उन सभी घटनाओं के क्रम से और भी अधिक दृढ़ हो जाता है जब या तो वे मिज़ोशिमा को भिक्षु के रूप में या उसके हार्प-वादन को गाहे-बगाहे मुदोन में पहचान लेते हैं।

मिज़ोशिमा की अनवरत चुप्पी और अपनी पहचान छिपाने की कोशिशें हमारे सामने इचिकावा की योग्यता को उजागर करती हैं। बिना प्रत्यक्ष संवाद के वह जिस तरह अपनी प्रतिबद्धता और आस्था अपने मिशन में दर्शाता है वह कैप्टन के फ़िल्म के अंत में सैनिकों के सामने मिज़ोशिमा का पत्र पढ़ने से भी पहले दर्शक के सामने उजागर हो जाती हैं। इचिकावा का चमत्कार फ़िल्म में पात्रों के अभिनय में स्पष्टत: दिखाई देता है चूंकि यह अभिनय कहीं भी सायास नहीं नज़र आता। मिज़ुशिमा का एक सैनिक से एक भिक्षु में परिवर्तन अनायास या नाटकीय नहीं है। यह तथ्य एक गुण की तरह उसकी पूरी टुकड़ी में पहले से ही गाहे-बगाहे दिखता रहता है और परिस्थितियाँ मिज़ोशिमा को ऐसा सशक्त कदम लेने और उसपर बने रहने के लिये प्रेरित भी करता है। साथी सैनिकों द्वारा भिक्षु मिज़ुशिमा को लौट आने के लिए प्रेरित करने के लिये “हान्यू नो यादो” गाने और मिज़ुशिमा द्वारा अपनी पहचान उजागर करते हुए हार्प में संगत करने पर एक और नाटकीय सक्षमता प्रकट होती है। वह यह कि हार्प के द्वारा जवाब देते हुए मिज़ोशिमा यह भी कह रहा है कि अब मैं नहीं लौटूँगा।

फ़िल्म का सिनोप्सिस देने से मैं बच रहा हूँ क्योंकि मेरा प्रयास सिर्फ़ फ़िल्म के बारे में अपने विचार साझा करने से है और फ़िल्म की व्यक्तिगत व्याख्याओं पर संवाद आरंभ करने से है। ऊपर जो भी लिखा है उसमें कहानी सिर्फ़ उतनी भर ही आई है जितनी अपने विचार प्रेषित करने के लिये मुझे ज़रूरी लगी इसलिये मात्र इतने को ही कहानी न समझ लें। घटनाओं का क्रम आगे भी बढ़ता है और कहानी इससे भी अधिक विस्तार से चलती है।

11 comments:

Gyandutt Pandey said...

अरे, आप तो विलक्षण हैं - इस प्रकार के सामान्य से इतर विषय पर भी इतना अच्छा लिखते हैं।
इम्प्रेस्ड! हाईली इम्प्रेस्ड!!

vijay gaur/विजय गौड़ said...

महेन मैं "चित्रपट" पर भी गया था और यहां भी आया हूं। मान गये मित्र तुम तय कर चुके हो तो मजबूरी अपनी भी बन रही है। इंतजार करो जल्द ही हाजिर हौउ शायद। मेरी शुभकामनाऎं चित्रपट के लिए।

महेन said...

ज्ञान जी, जितना हम आपसे इम्प्रेस्ड हैं उतना आप हमसे नहीं हो पाएंगे। अनुरोध है कि चित्रपट ब्लोग पर भी आएं।

भाई विजय, मैनें तो पहले ही कहा था साथ हो लो, मगर आप कन्नी काट गए। खैर, देर आयद, दुरुस्त आयद। जब जी चाहे आपका। यह मंच तो हर उस शख़्स के लिये खुला है जो फ़िल्म माध्यम को समझता हो या उसपर समझ विकसित करना चाहता हो और हालीवुड/बालीवुड के प्रभाव से बाहर निकलकर इस कलाओं के माध्यम को ग्रहण करना चाहता हो।

ravindra vyas said...

महेन, ये एक बेहतरीन पोस्ट है। मुझे छू गई। मुझे बताअो यह फिल्म मैं कैसे देख सकता हूं। क्या इसकी कोई कॉपी मुझे मिल सकती है?

BrijmohanShrivastava said...

सर जी ,बहुत महनत करते हैं आप भी

महेन said...

रवीन्द्र बाबू,
अब बताऊँ तो बताऊँ कैसे? आपने अपनी मेल आई डी तो दी ही नहीं। नहीं तो फ़ोन नंबर ही दे देते। मेरी आई डी है: getmahendram@gmail.com और मुबईलवा है 09845738857

सोतड़ू said...

बब्बा.... इतना टाइम कहां से निकाला से तूने.... मैं तो हॉलीवुड का साइंस फ़िक्शन भी नहीं देख पाता अब....... बढ़िया

महेन said...

यार मैं अपनी रुचियों पर फ़ोकस करने की कोशिश कर रहा हूँ हालीवुड के साइंस फ़िक्शन देखने के लिये दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती सो उनमें ड़ेढ-दो घंटे ही खर्च होते हैं। उतना टाइम मैं निकाल लेता हूँ और वैसे अब उस तरह की फ़िल्में तभी देखता हूँ जब लोग रिकमेंड करते हैं वरना टाइम इस तरह की फ़िल्मों को खोजने और देखने में खर्च करता हूँ। वक़्त किसी तरह किस्तों में निकालना पड़ता है।

poemsnpuja said...

बिल्कुल अलग तरह की फ़िल्म लगी और उसपर आपकी चर्चा भी बहुत अच्छी है. पर बात यही हो जाती है की ऐसी फिल्में मिलना थोड़ा मुश्किल है. दिल्ली में तो फ़िर भी कुछ जगहें पता थी मुझे, बंगलोर का कोई आईडिया नहीं है, शायद आप मेरी कुछ मदद कर सकें.

poemsnpuja said...
This comment has been removed by the author.
महेन said...

पूजा जी, यह सच है कि इस तरह की फ़िल्में मिलना मुश्किल है। किसी भी स्टोर पर ऐसी फ़िल्में शायद ही दिखाई दें। तो भी कुछ रास्ते हैं ऐसी फ़िल्में पाने के। आप मेरी पिछली टिप्पणी से मेरी मेल आई डी लेकर या फ़ोन नंबर लेकर मुझसे बात कर सकती हैं।