Thursday, 30 October 2008

बुरा समय

हेस्से की कविताओं का सिलसिला अभी शुरु ही हुआ है। ख़याल तो ये है कि किताब में जो 31 कविताएँ हैं सभी का अनुवाद कर डालूँ। देखें कितना हो पाता है। फ़िलहाल के लिये एक और कविता।

अभी हम चुप हैं
और कोई गीत नहीं गाते
हर कदम भारी हो गया है
यह रात थी, जिसे आना ही था

मुझे अपना हाथ दो
शायद हमारा रास्ता अभी बहुत लंबा हो
बर्फ़ गिर रही है
बेहद मुश्किल होती हैं अनजाने देश में सर्दियाँ

कहाँ गया वह समय
जब हमारे लिये एक लौ, एक अनल जलती थी?
मुझे अपना हाथ दो
शायद हमारा रास्ता अभी बहुत लंबा हो।

14 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

ये किताब बनती दिक्खे भाई !
मेरी अग्रिम बधाई !
कुछ अनुवाद मुझे भी भेज दो !
अनुनाद मे छाप कर खुशी होगी !
मेल आईडी ब्लोग मे छपा है !

शिरीष कुमार मौर्य said...

ये किताब बनती दिक्खे भाई !
मेरी अग्रिम बधाई !
कुछ अनुवाद मुझे भी भेज दो !
अनुनाद मे छाप कर खुशी होगी !
मेल आईडी ब्लोग मे छपा है !

महेन said...

शुभकामनाओं का शुक्रिया,
काफ़ी नहीं जितना अनुवाद किया।
अनुनाद में अनुवाद मेरी खुशकिस्मती,
व्हाँ तो छपे हैं बड़ी बड़ी हस्ती।
मेल क्या है फ़ुनवा ही लेंगे कभी।
अगले अनुवाद में एक दो दिन हैं अभी।

अभिषेक ओझा said...

बुरे समय में एक ऐसा हाथ ही तो चाहिए ! अच्छी लगी कविता. दो दिन बाद का इंतज़ार रहेगा.

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत ही सुन्दर रचना। पढकर अच्छा लगा। हेस्से की कविताएं कम शब्दों में गहरी बात कह रही हैं। आपके अनुवाद के कार्य की जितनी प्रशंसा की जाए वो कम ही होगीं।
अभी हम चुप हैं
और कोई गीत नहीं गाते
हर कदम भारी हो गया है
यह रात थी, जिसे आना ही था

अजित वडनेरकर said...

बहुत बढ़िया महेन भाई-

मुझे अपना हाथ दो
शायद हमारा रास्ता अभी बहुत लंबा हो
शिरीष भाई की बात से सहमत हूं। इकतस कविताओं को अनुवाद के बीहड़ से गुज़रना होता तो काम काफ़ी लंबा और बीहड़ होता। शायद आपके और पाठक दोनों के लिए। मगर यहां तो निर्मल प्रवाह है....
देर कैसी....संकोच कैसा ?
शुभकामनाएं....

poemsnpuja said...

acchi hai yw kavita bhi, anuvaad kya german se kar rahe hain ya english se...agar english hai to original bhi please sath me de dein

मीत said...

उत्तम है भाई. जारी रहे ....

महेन said...

अजीत भाई,
जर्मन भाषा बोल लेता हूँ फ़िर भी डरता हूँ इस भाषा से। बहुत ही दुरूह भाषा है इसलिये अनुवाद करूँगा भी तो बहुत संभल संभलकर।

पूजा जी,
कविता का अनुवाद जर्मन से किया है और ये तुकांत कविता है। अंग्रेज़ी का जो अनुवाद वह भावानुवाद है इसलिये उसे देने का कोई औचित्य नहीं और जर्मन शायद ही किसी को समझ आए इसलिये उसे भी छोड़ दिया।

Hari Joshi said...

अगली कविता का इंतजार रहेगा। इससे ज्‍यादा कुछ कहना बेमानी है।

MANVINDER BHIMBER said...

मुझे अपना हाथ दो
शायद हमारा रास्ता अभी बहुत लंबा हो
बर्फ़ गिर रही है
बेहद मुश्किल होती हैं अनजाने देश में सर्दियाँ
उत्तम है

Gyan Dutt Pandey said...

सोचने को बाध्य करती है यह कविता। यही सार्थकता है।

Udan Tashtari said...

अच्छा अनुवाद, बधाई.

डॉ .अनुराग said...

अगली कविताओ का इंतज़ार रहेगा