Monday, 22 September 2008

माँ की उपस्थिति और यादों की पगडंडी

बरसों पहले जो लिखा था आज वह यकायक मेरे दिमाग में कौंध गया:

कुछ दिनों पहले ही तालस्ताय का लिखा एक वाक्य पढ़ा था, “जब आप सुदूर यात्रा पर जाते हैं तो आधी यात्रा तक पीछे छुटे शहर की यादें पीछा करती हैं। आधी यात्रा के बाद ही हम उस जगह के बारे में सोच पाते हैं जहाँ हम जा रहे हैं।” सोचता हूँ, क्या यह बात बिल्कुल सही है? पहाड़ों से लौटते हुए मैं कई कई दिनों तक सिर्फ़ पहाड़ों के बारे में ही सोचता रहता हूँ और अपनी दिनचर्या में गड़बड़ा जाता हूँ जिसक खामियाजा मुझे अकसर भुगतना पड़ता है।

मगर यह अनायास ही नहीं है। परसों माँ को दिल्ली से अपने साथ लेकर आया हूँ और सलीके से चार साल में यह पहली बार है कि हमनें खूब सारी बातें कीं और ज़ाहिर है इतने लंबे अंतराल के बाद की गई बात में उन विषयों को भी छुआ गया, जिनपर पहले कभी चर्चा करने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई या चर्चा करने से बचा किये। इस दौरान साल में एक बार की गई अपनी दिल्ली यात्रा में मैनें महसूस किया कि माँ-पिता के बुढाने की गति बढ़ गई है और यह भी कि हर दुख-तकलीफ़ एक दूसरे से छिपाने की आदत भी हमें पड़ गई है, जोकि इस बार कुछ हद तक ज़ाहिर हुई हैं।
माँ ने (हमारे यहाँ पहाड़ों में माँ को तू ही कहा जाता है) अपना आधा जीवन गाँव में ही बिताया है, इसलिये वह आज भी पूरी तरह गाँव से ही जुड़ी हुई है। पिछले लगभग 35-40 सालों का दिल्ली जीवन भी उसकी सोच और जीवन-शैली को नहीं बदल पाया और वह आज भी पहाड़ी किस्म की हिन्दी ही बोलती है। फ़सक मारना (गप्पें मारना) पहाड़ों के रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ा है। मैं तो इसे एक विधा ही मानता हूँ और मेरी माँ को ईश्वर ने विशेष तौर पर इस विधा से नवाज़ा है।
परिवार भर के छोटे-छोटे बच्चे जब तब इकठ्ठे होकर माँ से अपने माँ-पिताओं के बचपन के किस्से सुनाने को कहते और फ़िर माँ की बातें सुन-सुनकर हँस-हँसकर दोहरे हो जाते। माँ परिवार की सबसे बड़ी बहू है और पिताजी और चाचा-बुआओं में उम्र का बहुत बड़ा अंतर है।
बातों का क्रम जब शुरु हुआ तो बचपन की कई निरर्थक बातें भी दोहराई गईं, जिनमें यूँ तो कोई सार नहीं मिलता मगर अर्थ बड़े गूढ़ निकल आते हैं। गाँव से नया-नया आकर मेरे कालोनी में गुम हो जाने पर अपनी बिल्डिंग से निकलकर दूसरी बिल्डिंग में भटकते हुए यह दोहराना, “हमरौ घर काहूँ गोइ ह्यूनल?” मुझे अब भी धुँधला सा याद है। या बारिश के कीचड़ में पत्थर फेंकते हुए अपना ही सर फुड़वा लेने पर माँ के पूछने पर हँसते हुए यह कहना कि कुछ नहीं हुआ। ऐसे ही सर फूट गया थोड़ा सा।
फिर हर साल गाँव में गर्मियों की छुट्टियाँ गुज़ारने जाना और रैगाड़ में थककर चूर हो जाने तक नहाना या बेमतलब यूँही घूमने निकल पड़ना। डरते-डरते जागर में बैठना (जागर एक धार्मिक अनुष्ठान होता है जिसमें किसी निर्धारित व्यक्ति के शरीर में देवता का आह्वाहन किया जाता है। इसके लिये हुड़का, थाली, दाड़िम की सींकों वगैरह का प्रयोग किया जाता है)।
इन सब बातों में कोई अर्थ नहीं, मगर जब इन सब बातों की याद आती है और जब वर्तमान से इनका तालमेल बैठाने की कोशिश करता हूँ तो तारतम्य के सूत्र खोने लगते हैं। स्कूल के दिनों में ही मुझे लगने लगा था कि मैं उस पीढ़ी से हूँ जो ट्रांसिशन से गुज़र रही है। इस पीढ़ी ने एक ओर तो बरसों-बरस से चली आ रही भारतीय जीवन-शैली देखी है और दूसरी ओर भारत के पूँजीवादी वर्ग में प्रवेश के कारण हुए बदलावों को भी इसी पीढ़ी ने जिया है। अब कहीं तो लोग अतीत को पीछे छोड़ इन बदलावों को खुशी से भोग रहे हैं और कुछ मेरे जैसे उसी अतीत को ॠषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों की तरह बार-बार देखते हैं जोकि मात्र कपोल-कल्पना है। आज भी यदि मैं सब छोड़कर किसी छोटे शांत कस्बे में बस जाना चाहता हूँ तो उसके पीछे अतीत में लौटने की आकांक्षा ही है। मैं अतीत और वर्तमान के बीच त्रिशंकु की तरह अटका हुआ हूँ। मेरी पत्नी जी को इस तरह की कोई दुविधा नहीं। वह दिल्ली में ही पैदा हुई और वहीं बढ़ी हुई। उसका कोई गाँव नहीं।
बहरहाल, यह ट्रांसिशन हर बार बेहद यातनादायक होता है और मैं कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाता। ऐसे में कुमाऊँनी गाने सुनने के अलावा क्या किया जा सकता है? जागर सुनने की बात चल रही थी। जागर सिर्फ़ देवताओं को बुलाने का विश्वास-अविश्वास भर नहीं है। इस प्रक्रिया में जो गाया जाता है उसमें लोक-कथाएँ छुपी हैं, जोकि ज़ाहिर है मुझे ठीक से समझ नहीं आतीं। चलिये यही सुन लिया जाए।
हो सकता है मेरी बची-खुची शाम ठीक से बीत जाए।

23 comments:

Arun Aditya said...

पहाड़ की पुकार...गाँव... मां...स्मृतियों की गठरी। बेहतरीन भाव-चित्र।

डॉ .अनुराग said...

हमारा अतीत ही है जो हमें कही किसी कोने में एक अच्छा इंसान बनाये रखने में मदद करता है ....ओर माँ चाहे पहाडो की हो या .......माँ ही होती है......आपको पढ़ना भला लगा ओर अच्छा भी....

संगीता पुरी said...

बहुत ही अच्छा आलेख।

शिरीष कुमार मौर्य said...

महेन मेरा मन भीग गया।
मै भी कुछ दिन पहले अपने बचपन के गांव (नौगांवखाल,पौड़ी) से लौटा हूं और उन्हीं स्मृतियों में जी रहा हूं। तुमने फिर वहीं पहुंचा दिया।

मुझसे दोस्ती करोगे ?

जितेन्द़ भगत said...

गीत(जागर) ने तो जादू-सा कर दि‍या। बोल तो समझ नहीं आए, पर बस कुछ ऐसा था, जो पहाड़ों की तरफ खींच रहा था।

टालस्‍टाय की बात सही है पर मैं उसे रि‍टर्न जर्नी में ज्‍यादा महसूस कर पाता हूँ यानी-
जब मैं पहाड़ों की यात्रा से लौटता हूँ तो आधी यात्रा तक पीछे छुटे पर्वतों की यादें पीछा करती हैं। आधी यात्रा के बाद भी मैं उसी जगह के बारे में सोचता रहता हूँ, जहाँ से मैं लौटा हूँ। और शायद महि‍ने भर खुमारी जाती भी नहीं है।

महेन said...

हा हा हा… दोस्ती? ज़रूर करेंगे भई।

बाकी मित्रगणों को भी धन्यवाद।

अभिषेक ओझा said...

जगह महल का थोड़ा फर्क है बाकी सब अपनी कहानी है...

माँ (मैं भी माँ ही बुलाता हूँ)... गाँव का स्कूल... रांची (छोटा शहर)... हर गर्मी की छुट्टी में गाँव जाना...कानपुर... फिर बड़ी जगहें... बड़े शहर... बड़ी कंपनी. इन सब में गाँव-घर की कमी... वो कंफ्यूजन... ट्रांजिसन फेस....

१५ दिनों के लिए इसी सप्ताह घर जा रहा हूँ... नॉन-स्टाप बात होती है माँ से... घंटो... रोज. अच्छा पोस्ट क्या कहूं बस अपनी ही कहानी है.

Udan Tashtari said...

बहुत दूर तक ले गये यादों की वादियों में. बहुत ही सुन्दर लेखन..वाह!!! बधाई!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

माँ पर लिखा एक एक शब्द विश्व्का उत्तम साहित्य होता है
उन्हेँ मेरे नमन ! गीत पहाडोँ की झाँकी दे गया
स्नेह,
- लावण्या

Gyandutt Pandey said...

मेरे भी अनुभव वैसे ही हैं जैसे आप के। बस कुमाउनी की बजाय अवधी में हैं!
और मा-बाप वैसे ही होते हैं। शायद हर पीढ़ी में।

अफ़लातून said...

'जागर' जैसे ताल और धुन देश के कई भागों में सुनने को मिलती है । एक तारतम्य ?

Ashok Pande said...

राजुली बौराणी ने सुबह सुबह बौरा दिया!

ravindra vyas said...

आपके ब्लॉग पर पहली बार आया। पढ़ा, अच्छा लगा। बधाई।

vijay gaur/विजय गौड़ said...

महेन मुझे लगता है अपने अतीत को याद रखना वर्तमान के बीच त्रिशंकु होना कतई नहीं है। लोककथाएऎं भी हमारे अतीत का हिस्सा ही तो होती हैं। जो कुछ वर्तमान में लिखा जा रहा है यह भविष्य का अतीत ही हो जाना है, जिससे आगे की पीढियां इस दौर को जानेगी।

Ek ziddi dhun said...

माँ ने (हमारे यहाँ पहाड़ों में माँ को तू ही कहा जाता है)..yaar mahendra bhai, pahad mein nahi adhiktar jagah maa ko tu hee kaha jaata hai...ab mai ye lutf nahi le paaya...
aur ye gapp ki vidha bhi purani zindagi kee khaas khoobi rahi hai..kissagoyi bhi....Renu ise gapp rasna kahte hain..kya haal hai?

महेन said...

तो काफी लोगों का हाल मेरे जैसा ही है? मेरे खयाल से अच्छा ही है। अतीत आपको समृद्ध ही बनाता है। हम खुशनसीब हैं कि हमारे पास अतीत के अलग अलग रंग हैं।

विजय बाबू, मेरी व्यथा तो ट्रांसिशन को लेकर है जोकि यातनादायक होती है। गाँव की तो छोड़ें, देहरादून के बाद दिल्ली में रहकर देखें और फिर बंगलौर। आप पाएंगे कि आपकी यातनाएं जगह बदलने के साथ अपने-आप बढ़ती जाएंगीं।

सुशील कुमार छौक्कर said...

महेन जी, आपके इन सुन्दर भावों पढकर अच्छा लगा। माँ पर कितना ही लिखा जाए वह कम ही पडेगा।

vipin said...

महेनदा,बहुत सुंदर लिखा आपने..मेरी पैदाइश तो मेरठ की है..लेकिन जिंदगी का पहला सबक पहाड़ में सिखा..अ,आ,ई सिखने से लेकर अब तक पहाड़ों में पला बड़ा हूं..पहले लोहाघाट,उसके बाद पिछले पच्चीस सालों से हल्द्धानी में हूं..अपना घर है..परिवार है..कुछ बनने के चक्कर में सात-आठ साल पहले दिल्ली आया..ईजा(हम पहाड़ वाले मां को ईजा कहते हैं)हल्द्धानी में छूट गयी...दिल्ली आकर बना-वना तो नहीं हूं..घर छुट गया..आंख खोलते ही ईजा..दिखायी नहीं देती..वो हल्द्धानी में रह गयी...आपने घर की याद दिला दी...सच कहता हूं..जैसे ही दिल्ली वाली बस रूद्रपुर क्रॉस करने के बाद टांडा
वाले मोड़ से मुड़ती है..बस लगता है..अपनी हल्द्धानी आ गयी..बरसाती नहर आ गयी..इनदिनों में उसका पानी मटमैला हो जाता है..लेकिन मुझे उसका वो रूप देखकर बहुत सुकून मिलता है..मेरी नहर भी.. ईजा की तरह बूढ़ी हो गयी है...किनारे के पत्थर कटने लगे हैं..ईजा के बालों में भी बर्फ की थोड़ी चादर चमकने लगी है..पहले हम किराये के मकान में रहते थे..वहां पानी की दिक्कत अकसर रहती थी..छोटे भाई.बहुत छोटे थे..मै और ईजा सुबह-सुबह बरसाती नहर के पास लगे नल से पानी भरके लाते थे...जल्दी जगना पड़ता था..भीड़ लग जाती थी...अब थोड़ा कमाने लगा हूं..मिनरल वाट पीता रहता हूं..लेकिन आपने .. सिर पर बड़ा वाला डिब्बा भरकर..ईजा के साथ पानी लाना याद दिला दिया...
विपिन देव त्यागी

sidheshwer said...

शब्द और लगातार बज रहे है.
यह किसकी कविता की लाइने हैं-
'स्वप्न पहाड़ों के पार थे''बहुत ही उम्दा प्रस्तुति!

swapandarshi said...

Bhaai logo narai mat lagao, mere liye pahaad vapas lautanaa jitanaa mushkil, hai, chahat utani hi baDh jaatee hai. Pahad ke gaav khaskar ab hamaaree peeDhee kee smriti tak hee bache hai. Hamaare gaanv me pichale 20-30 saalo me sabhee log baahar aagaye hai, sirf ek parivaar bachaa hai. Chaar saal pahale, pitaji ke saath zidd karke gaanv gayee thee, par ab vo bachpan waalaa ganv sirf smriti me hai.
200-300 saal se sambhaale huye hamaare poorvajo ke ghar ab dhah gaye hai, ya dhahane kee kagaar par hai.

kabhee-kabhee , unhi paHado ko rockies me, to kabhi catskil mountains me dhoondhtee hoon.

ANIL YADAV said...

थोड़े दिनों तक भकुआने (अवसादग्रस्त तटस्थता)के बाद यह ठहरा ट्रांजिशन छिटका कर चपल तटस्थ कर देता है। तब हम अपने परिवेश के उन कोनों-अंतरों में भी झांक पाते हैं जहां आमतौर पर रैट-रेस में लगा जातक नहीं जा पाता।

भाई तब आप रैट रेस को ताकती कैट हो जाते हो।

महेन said...

अनिल भाई ताकती कैट तो तब होंगे जब ॠषिकेश मुकर्जी की फ़िल्म से बाहर आ पाएंगे। हो तो यूँ भी सकता है कि एक उम्र बाद आपका कहा सच हो जाए और हम तटस्थ हो भी जाएं मगर ऐसे भी एक सुख है कचोटता हुआ सुख।

गौरव सोलंकी said...

कभी कभी मन करता है कि कुछ भी करके उस अतीत को दुबारा रच दें। मेरा सपना है कि इस ट्रांजिशन से पहले के वक़्त पर कभी पूरी एक फ़िल्म बनाऊं...शायद पीरियड फ़िल्म..