Friday, 5 September 2008

शिक्षक दिवस के बहाने प्रताप सर की याद

"पीछे के देख रिया है बे? व्हां के तेरा बाप नाच रिया है? हमारे इतिहास के टीचर दन्तु (उनके सारे दांत झड़ चुके थे) सर की पंचलाइन।

मुझे लगता है शिक्षा का और जो कुछ भी प्रभाव पड़ता हो, चरित्र निर्माण में उसका कोई खास योगदान नहीं होता। यदि होता तो भारत की नब्बे प्रतिशत जनसंख्या चरित्रहीन होती। यहाँ मैं उन तमाम स्कूलों और उन स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों की बात कर रहा हूँ जिनकी ड्यूटी पढ़ाना होती है, मगर सिखाना उनके कर्तव्य की परिधि से आजीवन बाहर रहती है।

हर औसत सरकारी स्कूल और वहाँ के अध्यापकों की यही कहानी होती है। औसत से बेहतर, आज्ञाकारी और शरीफ़ छात्र होने के बावजूद भी मेरी नियति में स्कूल में बिताए कुल जमा दिनों से ज़्यादा डंडे खाने लिखे थे। वो बात और है कि उन डंडों से फ़र्क पड़ना बंद हो गया था। मगर इस सबके बीच ऐसे कितने ही अध्यापक थे जो आज भी पढ़ाने की अपनी रोचक शैली और अपने व्यवहार के कारण बच्चों में अपनी लोकप्रियता के कारण याद आते हैं।

छठी कक्षा में जब गए तो अंग्रेज़ी नाम के खतरनाक जीव से वास्ता पड़ा। मैं इस जीव से दो साल एक छोटे-मोटे पब्लिक स्कूल में पढ़े होने के कारण पहले ही रूबरू हो चुका था इसलिये इस जीव का खतरनाकी गुण मेरे लिये सिर्फ़ रोचक विषय था। दूसरे बच्चों की तरह मेरे पेट में रोमांच से खलबली नहीं मच रही थी। प्रताप सर का नाम पहले ही सुन चुका था। हमारी सरकारी कालोनी में किसी को उनको पीठ पीछे गाली देते नहीं पाया गया था मगर वे सभी के लिये कौतुहल का विषय ज़रूर थे। जो भी उनके बारे में बात करता था दो वाक्य उनके के बारे में ज़रूर बोलता था, "प्रताप सर बहुत अच्छी अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं और सर्दी हो या गर्मी हमेशा सफ़ेद रंग की हाफ़ स्लीव कमीज़ और सफ़ेद ही रंग की पैंट पहनते हैं।"

इसने मेरे भीतर भी उनके लिये कौतुहल पैदा किया और इस कौतुहल में मेरा बेहतर अंग्रेज़ी का आत्मविश्वास भी घुला हुआ था। किस्मत से वही हमारे अंग्रेज़ी के अध्यापक बने और अगले तीन साल तक बने रहे। चौथे साल, जब हम नवीं कक्षा में पहुँचे तो अध्यापक बदल गए और एक दूसरे ही महाशय (सी पी सिंह) पढ़ाने लगे। सिंह सर ज़रा चिड़चिड़े थे और इनमें सरकारी स्कूल के अध्यापक वाली उग्रता भी थी। हमारी क्लास में कई लड़के पिछली कक्षाओं में भी इन्ही से पढ़े थे और कुछ मेरी तरह प्रताप सर से पढ़े थे। क्लास का पहला ही दिन था और सिंह सर ने एक लड़के से कुछेक सवाल पूछे जोकि ज़ाहिर है वह नहीं बता पाया। सिंह सर चिढ़ गये और बोले, "हरामखोर! किस उल्लू के पठ्ठे ने अंग्रेज़ी पढ़ायी थी तुझको?" पीछे से किसी ने उन्हे याद दिलाया, "सर ये तो आपकी ही क्लास में था।"

प्रताप सर के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी। उनके पढ़ाने का तरीका मशीनी था मगर कुछ हद तक रोचक था और उनमें न तो वह ठसका था और न ही वे कोर्स पूरा कराने के शार्टकट अपनाते थे। एक दोस्त ने बरसों बाद कहा था, "दही भाई, हम सरकारी स्कूलों की खर-पतवार हैं।" इतना दावे से कह सकता हूँ कि बाकी अध्यापकों की तरह प्रताप सर ने बच्चों को कभी खर-पतवार नहीं समझा।

प्रताप सर रोज़ एक पन्ने का सुलेख घर से लिखने के लिये देते थे और पूरी क्लास की कापियाँ चेक करने का काम पहले मुझे सौंप दिया। यह मेरे लिये शानदार काम था। इससे क्लास में मेरी थोड़ी बहुत प्रतिष्ठा बनी। कहीं अगर प्रताप सर भी बाकी अध्यापकों की तरह डंडा लेकर चलते तो प्रतिष्ठा के साथ ही मेरा आतंक भी बच्चों के मन में बैठता मगर ऐसा नहीं हुआ। मेरे लिये यही बहुत था कि बच्चे एक-एक करके अपनी कापियां लेकर आते और मुझसे साइन करवाते। उनकी कापियों में साइन करते समय मैं खुद को अध्यापकों के समकक्ष पाता था। साइन करने का तात्कालिक मतलब जो बच्चे लगाते थे वह यह था कि साइन वही करता है जिसका कुछ रुतबा है जैसे टीचर, पिताजी, प्रिंसीपल, गैजेटेड अफ़सर आदि। जब यह काम मेरे लिये ज़्यादा होने लगा तो उन्होनें इस काम के लिये मेरे अलावा तीन लड़के और नियुक्त कर दिये। बच्चे कभी कभी मुझसे पूछकर अपनी कापियों में खुद ही साइन कर लेते।

सातवीं क्लास के पहले दिन उन्होनें कुछ लड़कों का नाम लेकर खड़ा होने को कहा। इसमें मेरा नाम भी था। हम सब एक दूसरे की ओर देख रहे थे। सरकारी स्कूल में नाम लेकर खड़ा करवाने का मतलब सिर्फ़ पिटाई होता है, तबतक यह समझ बन चुकी थी। मगर किस्मत से ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रताप सर सबसे पहले मेरे पास आए और बोले, "महेन्द्र को मानिटर बनाते हैं।" मैं घबरा गया। जाट-गूजरों से भरी क्लास में मुझे सबकुछ मज़ूर है मगर मानिटर बनना नहीं। मैं इन लोगों की उद्दंडता से कुछ अवसरों पर दो-चार हो चुका था और अनुभव अच्छा नहीं रहा था। वे मेरे सर पर हाथ फ़िराते हुए बोले, "नहीं, महेन्द्र को पढ़ने दो। मानिटर किसी और को बनाते हैं।" मैं बच गया।

उनका व्यवहार अजीब था। जितने समय वे हमें पढ़ाते रहे, कभी मिलते तो मुस्कुरा देते मगर जब पढ़ाना छूट गया तो मुस्कुराना भी छूट गया। शायद यह उनकी मितभाषी प्रकृति का ही एक रूप था। उनके सफ़ेद टेरीकाट के कपड़े उनका ट्रेडमार्क होते थे। हमेशा सफ़ेद कपड़ों में। जब हम प्रार्थना के लिये लाइन में लगे होते तो वे अक्सर गेट से आते दिखते थे। उनके एक हाथ में कुछ किताबें होती थीं जिन्हे वे कन्धे से ऊपर सीधा खड़ा करके चलते थे। यह अपने गंजे सर को चमकती धूप से बचाने का कारगर तरीका था। सर्दियों में कभी-कभी एक नीले रंग का कोट डाल लेते। बच्चे कहते थे कि वे ब्रह्मचारी और सन्यासी थे, कुछ कहते कि अपनी बहन की मृत्यु के बाद उन्होनें इस तरह का जीवन अपना लिया था। जो भी था, उनकी छवि एक ऐसे निस्संग अध्यापक की थी जिसे दीन-दुनिया से कोई मतलब नहीं, सिर्फ़ पढ़ाना और पढ़ाकर घर जाना। मुझे याद नहीं पड़ता कि उन्होनें कभी चिढ़कर या गुस्से से किसी बच्चे से बात की हो। इसी निस्संगता और व्यवहार के चलते वे उन चुनिंदा अध्यापकों की लीग में शामिल हो पाए, जो बच्चे जाने-अनजाने बना बैठते हैं, जिन्हें बच्चे न तो गाली देते थे और न ही उन्हें शोहदे जाटों और गूजरों से पिटने का अवसर आया।
(यह सब यूंही एक रौ में लिख दिया है। बातों में कोई सूत्र है न लय)

6 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

शिक्षक दिवस पर आपने अपने गुरु को याद किया अच्छा लगा। आजकल भला कौन याद करता है। एक आध गुरू ही अपने छाप छोड़ पाते है। जिनको याद किया जाता है। किसी के प्रताप सर होते है। और किसी के कोई ओर।

Udan Tashtari said...

शिक्षक दिवस के अवसर पर समस्त गुरुजनों का हार्दिक अभिनन्दन एवं नमन.

अभिषेक ओझा said...

ऐसी ही कुछ यादें हैं... बहुत कम शिक्षक होते हैं जिन्हें हम इसलिए याद रखनते हैं क्योंकि ब्वो बहुत अच्छा पढाते हैं. अधिकतर तो बस इसलिए याद रहते हैं की मारते थे या गाली देते थे. इसी बीच कुछ ऐसे भी प्रभावी शिक्षक मिले जिन्हें शायद छात्र समझ ही नहीं पाते या फिर सामंजस्य नहीं बैठ पाता था... कोशिश करके भी कुछ शिक्षक सारे छात्रों से घुल मिल नहीं पाते.

Gyandutt Pandey said...

अच्छा लिखा मित्र। और रौ में लिखने के कारण असहज चमकाऊ महिमामण्डन नहीं है - अच्छा है।

सोतड़ू said...

दही भाई दो बात,
पहली तो खरपतवार वाली पूरी कर दूं (शायद तुझे याद न हो)
पब्लिक स्कूलों के प्रोडक्ट और सरकारी स्कूलों की खरपतवार।
दूसरी बात ये कि मैं भी प्रताप सर को पसंद करता था और वो भी मेरा कुछ विशेष ख़्याल रखते थे। एक वजह तो ये थी कि मेरी तीनों बहनें उसी स्कूल से पढ़ी थीं, दूसरी मेरे पिताजी भी स्कूल के मामलों में कुछ सक्रिय रहा करते थे (बड़ी दीदी की शादी का वक्त आने से पहले तक) और फिर मैं भी क्लास के `होशियार बच्चों' में से गिना जाता था। ये बात कहते हुए, सोचते हुए मुझे पहले झिझक होती थी लेकिन अब ये कम हो गई है (ख़त्म नहीं हुई)कि... प्रताप सर शायद गे थे। उनकी उनकी पैदाइश, उनका समाज, उनका वक्त-- उसके लिहाज से उनकी कोमलता की ओर देखे तो शायद यही लगेगा। लेकिन जो भी हो वो एक भले आदमी थे और ईमानदार शिक्षक। हालांकि तू पांडे सर से नहीं मिला शायद.... मिस्टर दीपक- वाले पांडे सर वो अकेला आदमी था जो पूरी सरकारी शिक्षा के दौरान मशीनी नहीं लगा। जो सोचता था और सोचने के लिए कहता था।

महेन said...

बंटी भाई, इस ओर कभी सोचा नहीं मगर शायद तेरी बात में दम है। हमें तो ये राज समझ आने में ही 10-15 साल लग गए थे कि नागिया सर स्थापित गे थे।
पांडे सर से मिला तो नहीं मगर दीपक के संदर्भ में उनका नाम कई बार सुना है। शायद दीपक ने फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड लेते हुए उनका नाम लिया था या शायद अपने किसी मैगज़ीन को दिये इंटरव्यू में। खैर तुम लोगों के मुँह से तो ये नाम सुन ही चुका हूँ। उन दो सालों में (11-12वीं में) मुझे मेरे स्कूल में सभी टीचर बहुत ही अच्छे मिले थे। पीछे कहीं चाकू सर के बारे में लिखा भी था।
वो प्राडक्ट और बाइ-प्राडक्ट वाली बात मुझे अक्षरक्ष: याद है। इसलिये कि यह बात तेरे मुँह से सुनकर मैं हतप्रभ: रह गया था। सौ फ़ीसदी सच।