Monday, 1 September 2008

महोदय अ का शाश्वत लेखन

ब्लोगिंग मज़ेदार चीज़ है। यह किताबों-पत्रिकाओं से दो कदम आगे वाला मंच है जहां बात तुरंत पहुंचती है और हर कोई अपनी ढपली बजा सकता है। इस स्वतंत्रता के परिणाम भी मज़ेदार होते हैं। आदमी की वाचन इन्द्रिय उसकी श्रवण इन्द्रिय से हमेशा से बेहतर काम करती आई है इसलिये स्वतंत्र आदमी सिर्फ़ बोलना चाहता है, सुनना नहीं चाहता। कुछ प्राणी ऐसे होते हैं जो कानों में उंगलियाँ ठूसकर बोलते हैं। वे न अपना कहा सुनते हैं न दूसरों का।

अभी-अभी “अ” महोदय ने कुछ सौ-एक लोगों को मित्रता विषय पर कवितानुमा कुछ भेजा। तकनीक के परिणाम भी मज़ेदार होने लगे हैं। जाने कितना समय खर्च करने इन्होनें इतने सारी ईमेल आई डी इकठ्ठी की होंगीं। किसी ने भी ये कविताएं पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई। उलटा लोग इन महोदय को कोसने लगे। कोसने का तरीका भी मज़ेदार है। ये सभी लोग कोसने के लिये reply all करते हैं। अ साहब तो मज़े से बैठे लोगों की प्रतिक्रियात्मक मेल पढ़ रहे हैं अपने एसी आफ़िस में बैठकर और साथ ही अपनी कुख्याति भी प्रतिष्ठित कर रहे हैं; सुलग रहे हैं हम बेवकूफ़ लोग जिन्हें इन्होनें मेल भेजी है। अब reply all का यह किस्सा दो-तीन दिन चलेगा और इसमें अ महोदय की एक भी मेल नहीं होगी। अ महोदय संत सरीखे हैं, वे क्रांतिकारियों के नेता हैं जो कार्यकर्ताओं में ओज भरकर खुद समाधि लगाकर बैठ जाते हैं। सिर धुनेंगे हम लोग।
ईमेल आई डी इकठ्ठी करने का यह प्रशंसनीय प्रयास है। मेरे विचार से वक़्त आ गया है कि लोगों को अपना नज़रिया बदल लेना चाहिये। हम सभी लोगों को चाहिये कि अ महोदय को एक प्रशंसा-पत्र दिया जाए। इन्होनें हिंदी ब्लोगजगत में छितरे लोगों को सिर्फ़ एक मेल से ही एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जोड़ दिया है। इन reply all मेल के जरिये कितनों को तो मैं जानने लगा हूँ। ब्लोगवाणी, नारद और चिठ्ठाजगत सरीखे एग्रीगेटर्स को या तो अपनी दुकान समेट लेनी चाहिये या इन महोदय को अपना सी ई ओ नियुक्त कर देना चाहिये। उड़नतश्तरी जी की हज़ारों टिप्पणियाँ और इसमें ज़ाया घंटों के वक़्त की करामात वैसी कारगर नहीं जैसी अ महोदय की कारगुज़ारी। आउटसोर्सिंग हब हमारे इंडिया को ऐसे ही नवयुवकों की ज़रूरत है जो इस तरह के नए-नए आइडिया लाकर हमारी अर्थव्यवस्था को आगे पहुंचा सकें। क्या फ़र्क पड़ता है अगर इससे हमारे जैसे कुछ कुमति कुढ़ते हैं। छोटे लोगों को दूरदृष्टि कहां होती है? कोसी में बिहार डूब रहा है। तरह-तरह की तस्वीरें, ख़बरें रोज़ अखबारों में आ रही हैं मगर कोई यह नहीं सोचता इस क्षणिक सागर का इस्तेमाल बड़े-बड़े लग़्ज़री क्रूज़ को तैराकर किया जा सकता है। आधा यूरोप उमड़ आएगा बाढ़ के बीच कंधे पर हनुमान की तरह दो बच्चों को चढ़ाकर पेड़ की डालों पर बैठे लोगों को देखने। कितना पैसा मिलेगा इससे। अपनी सरकार ब्राईट साइड देखती ही नहीं है। फ़्रांस तो इतने सालों तक न्यूक्लियर कचरा तक बेचता रहा। सरकार को मुनाफ़ाखोर होना चाहिये तभी देश प्रगति करेगा। इसके लिये अ जैसे प्रयोगधर्मी लोगों की ज़रूरत है।
अ महोदय को हतोत्साहित नहीं होना चाहिये। उन्हें लगे रहना चाहिये, ठेलते रहना चाहिये ऐसे ही। नज़ीर अक़बराबादी, ग़ालिब जैसे कितने ही लोग हैं जिनकी कद्र लोग उनके जीते जी न कर पाए। क्या हुआ अगर महोदय अ आज चैन्नई में गुमनाम पड़े हैं। कभी न कभी तो लोग समझेंगे।
जहाँ लेखक शाश्वत लिखने और अमर होने के फ़ेर में पड़े हैं वहाँ महोदय अ जैसे लोग सबको पीछे छोड़कर अपने लेखन की कैम्पेनिंग करके सबसे आगे निकल जाएंगे; आप चाहे इसे चिरकुटिया लेखन माने बैठे रहें। यहाँ एक से एक दिग्गज लेखक बैठे ठाले हैं, न कोई पढ़ता है उनको न कोई टिपियाता है और दूसरी ओर अ महोदय हैं जिनको मैं कम से कम उतने बार पढ़ चुका हूँ जितनी बार उन्होनें अपने करिश्माई लेखन की झलकियां मुझे ई मेल पर दी हैं। और तो और उन्हें यह सौभाग्य भी प्राप्त हुआ है कि मैनें उन्हें एस टी डी करके हड़काया भी है कि कृपया मुझे ऐसे मेल न भेजा करें। किसी भी दिग्गज लेखक को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ आजतक। ऐसे ही तो पैर जमते हैं साहित्य की कबड़्ड़ी के मैदान में। मैं हतभाग्य; मुझे क्या मालूम मैं क्या पाप कर बैठा। कल कहीं अ बड़े लेखक बन गए तो आज हड़काने वाले लोग चंवर डुलाएंगे उनके। उन्हें निराश नहीं होना चाहिये।

7 comments:

Gyandutt Pandey said...

अ से अमर। आप सही हैं - अगला युग सेल्फ केम्पेनर्स का है!

अभिषेक ओझा said...

अ महोदय से पंगा लेकर आपने अछ्चा नहीं किया... क्यों? ये तो अपने अंत में बता ही दिया है.

Geet Chaturvedi said...

अ को ऐसा अतरंगीपना नहीं करना चाहिए.
र से रिप्‍लाय ऑल तो बिल्‍कुल नहीं करना चाहिए.
ब से बिना वजह ह से हम जैसे लोग परेशान हो जाते हैं.
स से स्‍पैम करना चाहिए.
फिर भी प से प्रकट हो ही जाता है कोई द से दमकता हुआ.
फिर भी, भाई म, म से इनको माफ़ कर देना चाहिए.
अब ग से मुझे गाली मत देने लगना.

डा. अमर कुमार said...

.

आह, आज एक नूतन ज्ञान प्राप्त हुआ, गुरुवर के ज्ञानकोष से...
अ से अमर ..
गुरुवर की दुनिया एक अमर पर ही टिकी हुई है, आनन्दम आनन्दम

अ से अशोक, अनुराग, अभय, अनिल, अजय, अजित, अलका, अन्वेषी, अखिल, अमित, अनिमेष, अत... ख़ैर यहीं बस करता हूँ ।
यदि अ से अनाम न ल उक रहा हो, तो चिन्तियाते रहिये कि अ से अमर काहे नहीं ..

हद है.. ब्लागशिरमौर के दिल में ई अमरवा कीतना पइठ गया रे ?

महेन said...

ग से गीत भाई, ग से गाली नहीं दे रहा। ठ से ठहाका मारकर ह से हँस रहा हूँ।

अमर जी,
अ संकेतात्मक है। महोदय असल में व हैं। इतने दिग्गज अ से हैं (कुछ नाम तो आपने गिना ही दिये हैं) मैनें मरना है क्या उनका छीछालेदर करके? और ज्ञान जी का संकेत ऐसे लोगों के कैम्पेन के द्वारा अमरत्व की ओर है।

डा. अमर कुमार said...

.

दाढ़ी में तिनके का एकाधिकार किसी चोर का ही क्यों रहे ?
क्या हम दाढ़ी भी न खुजायें ?
...खुजली हुई, सो खुजला दिया !
आप आये.. सहला दिया, आभार लो मित्र !


ब्लागिंग में छीछालेदर तो पहले से ही है,
पर मरने से क्यूँ डरता है, यार ?
जो मन करे लिख,
और मस्त रह ..

महेन said...

डा साब, आप बात को कहीं और ले जा रहे हैं। न तो मैं समीर जी की तरह निस्पृह भाव से बैठने के लिये यहां हूँ और न ही किसी की छीछालेदर करने के लिये। मरने-मारने का प्रश्न तो बहुत बड़ी चीज़ है। वो पाश के "जीने पर ईमान ले आना" जैसी बड़ी चीज़ है।
अगर महोदय अ की छीछालेदर करनी होती हो तो उनका नाम देता। इसे मैं उन्हीं लोगों तक सीमित रखना चाहता हूँ जो इन महोदय के कारनामों से त्रस्त हैं।