Saturday, 13 September 2008

भारत की ट्रैफ़िक संस्कृति भाग - 2

ट्रैफ़िक संस्कृति का बनना-बिगड़ना दो पक्षों पर निर्भर करता है: प्रशासन और जनता। पहले प्रशासन की बात करें। बात ट्रैफ़िक की हो तो प्रशासन के भी कई हिस्से होते हैं जोकि इससे जुड़े होते हैं। मुख्य रूप से ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने वाली अथारिटी, सड़क निर्माण विभाग, म्युनिसिपैलिटि इत्यादि। इनके अलावा अप्रत्यक्ष रूप से तो योजना मंत्रालय से लेकर शहर का प्लानिंग विभाग तक अनगिनत विभाग संबद्ध होते हैं। अगर सीधा-सीधा सड़कों की बात करें तो आपको एक मूल अंतर फिर से दिखाई देगा। पश्चिम में सड़कें सिर्फ़ सफ़र के लिए होती हैं और भरसक कोशिश की जाती है कि घर, दफ़्तर इत्यादि सड़कों से दूर रहें। अपने यहां चूंकि सड़क आज भी विलासिता है इसलिये लोगों की पूरी कोशिश होती है कि जितना संभव हो सके, सड़क के पास घर या दफ़्तर हो। बीसियों सालों से उजाड़ पड़े द्वारका (दिल्ली में) में फ़्लैट्स की कीमतें मेट्रो के वहां पहुंचते ही आसमान छूने लगीं। यह बात और है कि वहां रहने वाले लोग शायद ही कभी मेट्रो का इस्तेमाल करें। मेरे एक मित्र का घर द्वारका में मेट्रो स्टेशन के बिल्कुल सामने है। दो साल पहले ही वे उस घर की कीमत 35लाख आंक रहे थे। मेट्रो स्टेशन के पास तो शोरगुल रहेगा न? तो कीमत कम होनी चाहिये। मगर ऐसा नहीं है। इसकी वजह यह है कि कमर्शियल तौर पर इस्तेमाल करने पर उस मकान का भरपूर लाभ उठाया जा सकता है और कनेक्टिविटी की दृष्टि से वह घर उत्तम जगह पर है। कनेक्टिविटी आज जेट एज के दौर में भी कितनी बड़ी चीज़ है हमारे लिए। इसके पीछे नियमों में जो गड़बड़ी उजागर होती है वह यह है कि जिसका जहां जी चाहे आफ़िस खोल सकता है, रिहायशी इलाकों में भी। रोकने वाला जो है उसकी जेब में कुछ डाल दीजिये और बस। और तो और पर्याप्त पार्किंग जैसी मूलभूत सुविधा के बारे में भी नहीं सोचा जाएगा। होगा क्या? यही कि उस दफ़्तर में आने वाले लोग अपनी गाड़ियां सड़कों पर खड़ी रहेंगीं और उसकी वजह से एक लेन ठप पड़ जाएगी। फिर ट्रैफ़िक जाम। आज ही पढ़ा कि बंगलौर की सड़कों का 25% पार्किंग की भेंट चढ़ जाता है।
इंग्लैंड में जिस भी स्टोर्स में गया, एक बात मैनें ज़रूर नोटिस की। स्टोर के आकार से बड़ी पार्किंग की उपलब्धता। ऐसा क्यों? इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो यह कि वहां हर व्यक्ति गाड़ी लेकर चलता है और ग्रोसरी स्टोर्स में प्रतियोगिता इतनी उग्र है कि सिर्फ़ पार्किंग न मिलने की वजह से कोई भी ग्राहक नहीं छोड़ना चाहेगा। दूसरी वजह है प्रशासन। प्रशासन आपको कुछ भी बनाने की इजाजत तभी देगा जबकि आप रोज़मर्रा के संभावित ट्रैफ़िक से कुछ प्रतिशत ज़्यादा की पार्किंग व्यवस्था करेंगे। यह बात सिर्फ़ ग्रोसरी स्टोर्स पर ही लागू नहीं होती। किसी भी तरह के व्यावसायिक संस्थान में हमेशा पर्याप्त पार्किंग की व्यवस्था होती है। अगर कोई छोटी सी मार्किट है तो उसमें दो पार्किंग होती हैं। एक तो उपभोक्ताओं के लिये और दूसरी दुकानदारों के लिये जोकि दुकानों के पीछे होती है।
इधर प्रशासन, माने डेवेलेपमेंट अथारिटी इस बारे में सोचती नहीं। अगर नियम बनाए भी गए हैं तो उनका पालन नहीं होता। यह पहली समस्या है। फिर बात आती है सड़कों की। जब मैं अपना लाइसेंस बनवाने गया तो इंटरव्यु में ट्रैफ़िक इंस्पेक्टर ने कुछ साइनबोर्ड दिखाए और उनका मतलब पूछना शुरु किया। जोकि आसान से धीरे-धीरे मुश्किल साइनबोर्ड्स तक गया। कुछेक का जवाब मैं नहीं दे पाया। मैनें कहा कि ये साइनबोर्ड्स मैनें आजतक सड़कों पर नहीं देखे तो इनके बारे में पूछने की फ़ार्मैलिटी क्यों? इसपर मुझे फेल कर दिया गया। इंस्पेक्टर की गलती नहीं थी। मेरी भी नहीं थी। गलती प्रशासन की थी। साइनबोर्ड्स लगाने का काम इतना कैज़ुअली किया जाता है यह जगजाहिर है। अगर लगा तो ठीक नहीं तो रामभरोसे। और तो और साइनबोर्ड्स का तो आकार, रंग वगैरहा भी निर्धारित नहीं होते। वैसे भी सड़कें व्यावसायिक और पालिटिकल साइनबोर्ड्स से ही इतनी भरी होती हैं कि कुछ और देख पाना संभव नहीं हो पाता। इसपर यदि आपको साइनबोर्ड्स नहीं दिखाई दिया और गलती हो गई तो ज़िम्मेदारी आपकी। लेन सिस्टम अपनाने की बात भी अक्सर कही जाती है। जहां लेन होती है वहां भी कोई इस ओर ध्यान नही देता। मगर ऐसा क्यों है? इसके कई कारण हैं। मुख्य कारण तो यही है कि लोगों को ट्रैफ़िक के नियमों की ओर जागरुक नहीं किया जाता। लाइसेंस कैसे बनाए जाते हैं यह तो जगजाहिर है। लेन सिस्टम वहीं अपनाया जा सकता है जहाँ पर लेन बनाई गई हों। अब सोचिये कि भारत के किसी शहर की कितनी सड़कों पर लेन बनाई जाती हैं? सड़क के दोनो ओर कार्नर लेन मार्किंग पर हमेशा मिट्टी की परत चढ़ी रहती है। बाईं ओर की लेन अक्सर पार्किंग के लिये इस्तेमाल की जाती है और कहीं भी कोई गाड़ी खड़ी मिलने या लोगों के सड़क पर चलने की संभावना के चलते इस लेन को इस्तेमाल ही नहीं करना चाहता। फिर होता यह है कि इस लेन पर धीरे-धीरे मिट्टी की चादर बिछ जाती है और ड्राइविंग के लिये यह लेन सुरक्षित नहीं रह जाती। अब देखिये कि तीन लेन की सड़क में से एक लेन इस्तेमाल न हो पाने के कारण 33% सड़क तो यूँही खत्म हो जाती है।
हम बात कर रहे थे लेन सिस्टम की तो किसी भी शहर को देख लीजिये आपको आधे से ज़्यादा सड़कों पर लेन ही नहीं दिखेंगीं। यह अधूरा काम लोगों को लेन सिस्टम फ़ालो न करने के लिये प्रेरित है। सब सड़कों पर लेन न बनाकर प्रशासन जनता को यही संदेश प्रेषित करता है कि लेन सिस्टम सिर्फ़ एक फ़ार्मेलिटी है और नतीजा सामने आता ही है। लोगों को लेन सिस्टम के मूलभूत नियम भी नहीं मालूम। लोग दायें-बायें मुड़ते हुए इंडिकेटर देते हैं जबकि इंडिकेटर तब दिया जाना चाहिये जब आप एक लेन से दूसरी लेन में जा रहे हों। दूसरी बात सड़कों पर दायें-बायें मुड़ने के निशान अकसर नहीं बनाए जाते और यदि बनाए जाते हैं तो बिल्कुल सिग्नल के पास जबकि ये निशान वहां होने चाहिये जहां पर लोग लेन बदलते हैं मतलब सिग्नल से कम से कम 400-500 मीटर की दूरी पर ताकि लोग सही समय पर अपनी लेन निर्धारित कर लें। इसके लिये सड़कों पर दिशा-निर्देश सूचक साइनबोर्ड्स भी लगे होने चाहिये जोकि दिल्ली में हाल के सालों में लगने लगे हैं मगर बंगलौर में उनका अब भी सर्वथा अभाव है।
लेन सिस्टम तभी ठीक से अपनाया जा सकता है जबकि गति सम्बंधित नियम ठीक से अपनाए जाएं। किसी सड़क के एक स्ट्रैच पर बड़ी गाड़ियों के लिये गति-सीमा 40 होती है और छोटी गाड़ियों के लिये 50 या 60। वैसे तो इस नियम का पालन किया ही नहीं जाता, यदि किया भी जाए तो कई कठिनाइयां आएंगीं। एक बस जो 40 की गति पर चल रही है और उसके लिये बायीं लेन निर्धारित है। यदि उस बस को दायीं ओर जाना है तो इस प्रक्रिया में उन सभी गाड़ियों की गति बाधित होगी जो उस बस के पीछे 60 की गति से चल रही हैं। यह प्रक्रिया हमारी सड़कों पर इतने बार दोहराई जाती है कि बंगलौर की औसत गति 10 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई है। इसकी वजह है शहर की प्लानिंग। हर 100 मीटर पर एक मोड़ या कट होता है और उसके लिये कोई सिग्नल या लेन हो ज़रूरी नहीं। इसका असर ट्रैफ़िक की गति पर दिखाई पड़ता है।
बंगलौर में एक और चीज़ जो देखने में आती है वह है हर सिग्नल के पास स्पीड-ब्रेकर। मेरे अनुसार यह भी प्रशासन की ग़ैर-जिम्मेदारी का एक नमूना ही होता है। प्रत्यक्ष रूप से प्रशासन नियमों का पालन करवाने में असफल रहता है इसलिये ऐसे अप्रत्यक्ष तरीके अपनाता है। स्पीड-ब्रेकर की ऊँचाई और चौड़ाई नियमों में बंधी है मगर प्रशासन खुद इस ओर इतना लापरवाह होता है कि कई बार ऐसे स्पीड-ब्रेकर बनाए जाते हैं जिन्हें पार करने में ज़ेन जैसी लो ग्राउण्ड क्लियरेंस वाली गाड़ियों का तला उनसे टकरा जाता है। इन स्पीड-ब्रेकर्स पर अकसर ज़ेब्रा नहीं बनाए जाते जिसकी वजह से इन्हे रात में, और कई बार दिन में भी, देख पाना कठिन होता है। नतीजन होती हैं दुर्घटनाएं। इन दुर्घटनाओं में जो नुकसान होता है उसकी जिम्मेदारी प्रत्यक्ष रूप से प्रशासन पर होनी चाहिये। बंगलौर-मैसूर हाइवे पर एक जगह लोग सड़क पार करते हैं इसलिये प्रशासन ने वहां पर एक स्पीड-ब्रेकर बना दिया है। होना यह चाहिये था कि पैदल-पार पथ या सड़क पार करने वालों के लिये आप्श्नल रेड सिग्नल जैसा कुछ बनाया जाता, मगर प्रशासन ने स्पीड-ब्रेकर बनाकर छोड़ दिया, वह भी हाइवे पर। मैं रात को वहां से गुज़रा और मुझे वह स्पीड-ब्रेकर नहीं दिखाई दिया। दुर्घटना होते होते बची। प्रशासन की नज़र में नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं?

4 comments:

Gyandutt Pandey said...

ग्रेट पोस्ट। आप जोर लगायें तो बढ़िया पुस्तक लिख सकते हैं इस मुद्दे पर।
यह अलग बात है कि चाव से पढ़ने वाले भी ट्रैफिक नियम नहीं पालन करेंगे!

महेन said...

हा हा हा!!! आपकी बात बिल्कुल सही है।
पुस्तक लिख पाऊँगा या नहीं यह तो नहीं जानता मगर मेरी बड़े ज़ोरों की इच्छा रही है कि यदि मुझे पावर और मौका दिये जाएँ तो मैं किसी शहर की ट्रैफ़िक-व्यवस्था पर काम करना चाहूँगा।

विनय said...

ये स्पीड-ब्रेकर नहीं नेक-ब्रेकर हैं| आपका सुझाव अच्छा है-
"होना यह चाहिये था कि पैदल-पार पथ या सड़क पार करने वालों के लिये आप्श्नल रेड सिग्नल जैसा कुछ बनाया जाता"

अभिषेक ओझा said...

सडको और ट्रैफिक का विकास में बहुत महत्त्व हैं... अगर योजनाबद्ध तरीके से किया जाय तो. अमेरिका में ग्रेट डिप्रेसन के समय में खूब सड़कें बनी, जिनका कई वर्षों तक बहुत कम इस्तेमाल होता रहा...

पर फिर... अमेरिका के विकास में इसका कितना योगदान रहा सब जानते हैं. बहुत अच्छा आलेख लिखा है आपने... कई विकसित हो रहे शहरों में योजनाबद्ध तरीके से सडकों और ट्रैफिक का विकास और प्रबंधन बहुत जरूरी हो गया है.