Thursday, 11 September 2008

भारत की ट्रैफ़िक संस्कृति भाग - 1

अभी पिछले दिनों पेन्सुल्वेनिया, अमेरिका से एक दल बंगलौर आया। उन्हें आमंत्रित करने के पीछे उद्देश्य था कि वे यहां की ट्रैफिक-स्थितियों का अवलोकन करें और विस्तृत सुझाव प्रस्तुत करें। उन लोगों ने शहर के दो-चार चक्कर काटने के बाद दो टुक शब्दों में कहा कि यहां भी वही टेक्नोलोजी इस्तेमाल हो रही है जो अमेरिका में होती है इसलिये इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है मगर बेहद बेसिक चीज़ें जैसे सड़कों पर गड़्ढ़े भरे होने चाहिये और लाइट की सही व्यवस्था होनी चाहिये आदि पर काम करने की सख्त ज़रूरत है।
यह ऐसे समय पर हुआ है जबकि मैं अपने भारत लौटने के बाद से ही रोज़ देर से दफ़्तर पहुँच रहा हूँ। 13 किलोमीटर तय करने में डेढ़ घंटे लगते हैं। जब मैं यहां से अप्रेल में गया था तब मुझे लगभग 45 मिनट लगते थे यानि 4-5 महीनों में 45 मिनट का अंतर आ गया। इस वजह से इस बारे में काफ़ी दिनों से सोच रहा था। दरअसल ट्रैफिक के बारे में उस समय सोचना शुरु किया जब बाइक हाथ लगी थी ’93 में। हालांकि उस दौरान ट्रैफिक की खास समस्या दिल्ली में थी नहीं। मगर यह बात शुरु से कचोटती रही है कि हमारी सड़कें इतनी खस्ताहाल रहती हैं, लोगों में ट्रैफिक-सेंस नहीं है और सरकारी मशीनरी भी ट्रैफिक को उतना ही हल्के तौर पर लेती है जितने हल्के तौर पर सड़क पर चलता हुआ आम आदमी।
बंगलौर अनपेक्षित रूप से और अचानक विकसित हो गया। विकसित का मतलब सिर्फ़ साफ़्टवेयर कंपनीज़ का यहां आना है, इंफ़्रास्ट्रक्चर के संदर्भ में तो सिर्फ़ बेड़ागर्क ही हुआ है जैसाकि भारत में हर बढ़ते शहर के साथ अनिवार्य रूप से होता ही है। मगर यहाँ के बारे में जो तथ्य मुझे रोचक लगता है वह यह कि बंगलौर सिलिकान सिटी बनने से पहले रिटायरमेंट हब हुआ करता था इसलिये यहां का माहौल काफ़ी लेडबैक टाइप हुआ करता था। भीड़ थी ही नहीं और दो-चार ही खासमखास इलाके थे जिनकी देखभाल प्रशासन को करनी होती थी। जब इस शहर का आकार बढ़ने लगा तो प्रशासन ने अपनी काम करने की गति में कोई सुधार करने की नहीं सोची। लोग आनन-फ़ानन में ज़मीन के बढ़ते दामों का फ़ायदा उठाने के चक्कर में गली-गली में इमारतें खड़ी करने लगे। सड़क जैसी बेसिक चीज़ के बारे में किसी ने सोचा ही नहीं। वैसे सड़क यहां पर न दस साल पहले बेसिक चीज़ थी न आज है। यह हाल कमोबेश पूरे भारत पर लागू होती है मगर बंगलौर इस मामले में अग्रणी है। चैन्नई और हैदराबाद में बंगलौर के मुकाबले बहुत बेहतर सड़कें हैं। मेरे नए फ़्लैट के आगे सड़क नहीं थी और लोगों ने फ़्लैट इसी शर्त पर खरीदे थे कि बिल्डर सड़क बनाकर देगा। जो काम प्रशासन का है उसके लिये पैसा हमारी ही जेब से जा रहा है। गाड़ी खरीदते वक़्त जो रोड-टैक्स आप भर रहे हैं सो अलग है। वैसे कुछ दिनों पहले ही खबर थी कि रोड टैक्स से मिले पैसों में से सिर्फ़ 55 करोड़ रुपये ही सड़कों के निर्माण और रख-रखाव पर खर्च किये गए हैं जबकी टैक्स लगभग 1700 करोड़ वसूला गया है। जहां तक मुझे याद पड़ता है बंगलौर में रोड-टैक्स पूरे देश में सबसे ज़्यादा अर्जित किया जाता है, दिल्ली से भी ज़्यादा। तो पैसे की कमी नहीं है। कमी है विज़न की। प्रशासन जिन लोगों के हाथ में है उन्हें या तो ट्रैफिक का क ख ग भी नहीं मालूम या फ़िर उन्हे इसमें कोई रुचि नहीं है। वे सिर्फ़ अपनी डयूटी बजाकर घर जाते हैं।
भारतीयों के दो कैरेक्टरिस्टिक हैं जिनके बारे में मैनें कुछ साल पहले सोचा था: हमें घिचपिच और भीड़-भड़क्के में रहने की आदत है और दूसरा हमें शोर से प्यार है। इसके दो उदाहरण हैं मेरे पास। हमारे शहरों में, कस्बों, कालोनियों में घर इतने पास पास बनाए जाते हैं, इतने चिपका चिपका कर कि एक के घर में झाड़ू लगे तो दूसरे के घर में उसकी आवाज़ जाती है। और जहां तक शोर की बात है तो हमारा शोरप्रेम तो जग जाहिर है। लोग सड़क को अपने बाप की जागीर समझकर वहां तंबू गाड़कर जगराता करते हैं और अपने साथ पूरे मोहल्ले को ज़बर्दस्ती जगाते हैं। सड़क पर चलते हुए लोग हार्न इस तरह बजाते हैं जैसे रफ़ी के गाने सुना रहे हों। इंग्लैंड में एक बार हम चार सहकर्मियों ने गाड़ी किराए पर ली और दो-चार शहर घूमने का विचार बनाया। तय किया गया कि गाड़ी मैं चलाऊँगा। गाड़ी गोडाउन से निकालने के बाद घर तक लेकर जानी थी जोकि एक किलोमीटर की दूरी पर था। यह काम मेरे एक सहकर्मी अंजाम देना चाहते थे। उन्होनें गाड़ी चलानी शुरू की और सड़क तक आए। आगे एक गाड़ी सड़क पर क्लीयरेंस मिलने का इंतज़ार कर रही थी। मेरे सहकर्मी का हाथ स्वत: ही हार्न पर चला गया जिसका मुझे पहले से ही अंदेशा हो रहा था। मैनें झट से उनका हाथ पकड़ लिया। 4 महीने में मुझे वहां पर सिर्फ़ तीन बार हार्न सुनने को मिला। यह अनायास ही नहीं कि हम सड़क पर हमेशा हार्न बजाते रहते हैं और न ही सिर्फ़ हमारे यहां की ट्रैफिक-परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि हमें हार्न बजाना पड़ता है।
दोनों ही देशों में यह जो अंतर है यह वास्तव में कल्चरल डिफ़ैरेंस है। उनकी संस्कृति में हार्न बजाने का मतलब गाली देना होता है और अपने यहां यह उस शोर का हिस्सा है जिसमें रहने की हमें आदत पड़ी हुई है। एक घटना याद आ रही है। बरसों पहले जर्मन की कक्षा खत्म होने के बाद कनाट प्लेस में गोपालदास बिल्डिंग के नीचे से मैं अपने घर जाने के लिये बस पकड़ा करता था। पीछे ही सुपर बाजार का आफ़िस था जिसके बाहर मैं और मेरे एक मित्र खड़े थे। सड़क के दूसरी ओर मैनें एक अमेरिकी/यूरोपी महिला को देखा जो चलते चलते केला खा रही थी। मैं यह जानने के लिये ठिठककर रुक गया कि वह छिलके का क्या करती है। जहां चारों ओर गंदगी पड़ी हो वहां हम अपना कूड़ा भी उसमें मिला देने के लिये प्रोन होते हैं और फ़िर भारत में कूड़ेदान ढूंढना भगवान ढूंढने से ज़्यादा दुश्कर है (कूड़ेदानों की कुला संख्या मंदिरों से कम ही होगी)। वह महिला केला खत्म करने के बाद रुकी और उसने चारों ओर नज़र दौडाई। सड़क के इस ओर उसे एक कूड़ेदान दिखाई दिया। उसने सड़क पार की और छिलका उसमें डालकर सड़क पार करके चली गई। उस दिन मुझे लगा कि सफ़ाई रखना कुछ देशों में सिर्फ़ आदत नहीं है वह उनकी संस्कृति में घुलमिल चुका है और मजबूत होकर अब कल्चर बन चुका है। यही ट्रैफिक के साथ भी है। ट्रैफिक के नियमों का पालन करना भी इसी संस्कृति का हिस्सा है, वरना मुझे क्यों वहां कहीं भी ट्रैफिक पुलिस नहीं दिखाई दी और फिर भी लोग नियमों के अनुसार गाड़ियां चला रहे थे।

पुनश्च: यह बकवाद आगे भी जारी रखने का इरादा है क्योंकि आजकल मैं ट्रैफिक के अलावा कुछ नहीं सोच पा रहा हूँ और विस्तार से इस बारे में लिखूँगा।

8 comments:

sidheshwer said...

मैं तो पहाड की तलहटी में बसे एक छोटे से गांव में रहता हूं, इसलिए ट्रैफ़िक से साबिका नहीं पड़ता, कभी-कभार दिल्ली-लखनऊ जाने पर सड़क पार करने में जान पर आ बनती है.
और हां ,यहां 'कर्मनाशा' का लिंक! धन्यवाद नहीं कहूंगा,कहूंगा तो बस्स-बोफ़्फ़ाईन!

अभिषेक ओझा said...

बंगलोर के बाद ये बाकी जगह भी वैसे ही फ़ैल रहा है.... पुणे में भी यही हाल है. प्लानिंग नाम की कोई चीज़ नहीं होती... बस अंधाधुंध कंपनियों को बुलाना होता है, इन्फ्रास्त्रक्चर की कौन सोचता है.

अभी पुणे में यूथ गेम्स होने वाले हैं आखिरी समय पर बरसात में जो हाल है... मत पूछिए.

दुनिया में ऐसे भी शहर हैं जहाँ १०० साल से भी ज्यादा पहले की की हुई प्लानिंग आज तक चल रही है. अपने यहाँ शायद प्लानिंग ही सौ साल बाद होगी !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

हम भी आजकल एक छोटे से पहाडी शहर में रहते हैं, मगर बैंगलोर की सुहानी यादें मरते दम तक साथ रहेंगी.

Raviratlami said...

वैसे भी भीड़ (जनसंख्या)के कारण कोई सेंस आ पाना मुश्किल है. ये हाल तो रतलाम जैसे पांच लाख की जनसंख्या वाले शहर का भी रहा है. कहीं कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसी बात ही नहीं. सब जगह एट्रेंडम प्लानिंग चलती है.

सुशील कुमार छौक्कर said...

यह समस्या आजकल हर शहर की है महेन जी। यहाँ तो टेफिक लाईट पर भी बेवजह हार्न मारने वाले मिल जाऐगे। उनका बस चले तो वो उड़ कर चले जाए। तसल्ली नाम की कोई चीज नही इनके पास। कभी कभी गुस्सा इतना आता है कि जाके एक रसीद दूँ पर अपना शरीर देख कर चुप रह जाता हूँ।

डॉ .अनुराग said...

बेहद जरूरी मुद्दा जिस पर हम हिन्दुस्तानियों में लगभग हथियार से डाल दिये है ..मुंबई में जरा सी बारिश होते ही क्यों बाड का खतरा हो जाता है क्यूंकि दरअसल वे एक टापू के बीच बना शहर है ओर बढ़ते शहरीकरण ओर अंधाधुंध दोहिकरण के कारण किसी ने इसके बेसिक सिस्टम सीवेज पर ध्यान नही दिया....शहर की प्लानिंग वही है आबादी बढ़ रही है......एक सार्थक लेख ....आपकी अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा....

Gyandutt Pandey said...

सच में - इस देश में हॉर्न संस्कृति की हर्निया के मरीज हैं हम सब!

दीपान्शु गोयल said...

बहुत सही लिखा है आपने हमारे यहां समस्या ये है कि सुधारने की बातें तो सभी करते हैं लेकिन सुधारने के लिए खुद कुछ नहीं करते हैं। अगर हर कोई अपने को सही करले तो काफी हद तक ये सब ठीक हो सकता है।