Sunday, 31 August 2008

याद

याद?
मुझे कुछ याद नहीं
मुझे नहीं सताती किसी की याद
इस समय को जीने के बाद
जो बचता है मेरे पास
वह कल की अंधी खोह में खोजती-टटोलती
मेरी दो आँखें और दो हाथ होते हैं

याद?
याद मेरे लिये
पेशानी पर खिंच आई लकीरें हैं
याद है चेहरे पर बिसूर गई एक मुस्कुराहट
और है भविष्य में व्याप्त नाउम्मीदी

9 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत ही उम्दा याद।

यादें हंसाती है यादें रुलाती है
यादें हमारे साथ चलती जाती है।

Nitish Raj said...

महेन जी
यादें याद आती है...

मीत said...

जिसे तुम याद हो वो और किसे याद करेगा
जिसे तुम भूल जाओ, और भला याद क्या करे ?

आप की पोस्ट पे दिमाग़ में आया .... इसे आगे बढ़ाने की कोशिश फिर करूंगा

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत खूब ..
यादों के साए से कौन बच पाया है

Gyandutt Pandey said...

रीयली याद नहीं सताती। बधाई!
कोई तो है जो रीयर व्यू में न देख कर जिन्दगी की गाड़ी चला रहा है। अन्यथा लोग देखते पीछे और चलते आगे हैं - मैं समाहित!

महेन said...

ज्ञान जी, अगर यादें सताने लगें तो जीना मुश्किल हो जाएगा… शादी के बाद पुराने प्रेम भुला देना ही समझदारी है। ;)
वैसे मुझे सिर्फ़ याद नहीं सताती किसी की, कभी भी मगर अतीत की ओर तो मैं भी देखता हूँ; हाँ रूमानियत से।

अभिषेक ओझा said...

यादें अच्छी बुरी... मुझे तो लगता है की बुरी यादें हम धीरे-धीरे भुला देते हैं, और अच्छी यादें ही रह जाती हैं... कम से कम अपने साथ तो ऐसा ही है... जीतनी धुंधली होती जाती है उतनी अच्छी लगती है.

सोतड़ू said...

कुछ वक्त हुआ शायद मैं भी ऐसा ही था.... मुझे भी किसी की याद नहीं आती थी। मैं रूमानियत के साथ नहीं पिछली ज़िंदगी को मज़े के साथ देखता था। लेकिन ये बात 10 मार्च से पहले की है।
अब मुझे लगता है कि ऐसी रूमानी लफ़्फ़ाज़ी वही कर सकता है जिसके पास सिर्फ़ उसके ठाने हुए दुख हों।

भूल-चूक लेणी देणी

महेन said...

ये आज की नहीं, 2003 में लिखी हुई कविता है। वैसे मुझे अभी भी किसी की याद नहीं सताती मगर यहाँ अंतर अनुभव का है। तुझे जो अनुभव हुआ उसने तेरी धारणा बदल दी, मुझे अभी तक इस तरह का अनुभव नहीं हुआ इसलिये समग्र रूप में मेरा अतीत ऐसा है जिसे कोई भी खुशी-खुशी रूमानियत से याद करने का जोखिम उठा सकता है। कम से कम मैनें कह तो दिया कि "वे हमारे ठाने हुए नकली दुख थे।" आगे देखते हैं…