Sunday, 24 August 2008

यारों से बातचीत

गलबहियाँ डाली ही नहीं कभी
शिकवे रह गए अनकहे ही
ग़ुरूर के पुठ्ठों पर धौल ही मारते रहे
सहलाना तो भूल ही गए
जो चोट मैंने तुमसे खाई
उसकी सुईयाँ तुम्हें भी चुभी ही होंगीं
जैसे तुम्हारे लिये रचे गये मेरे श्राप
मुझे भी अपवित्र कर गए
चलो उन निरापद दिनों की ही बात करते हैं
तब अपने बदहाल दिनों का आसमान
न साफ़ था न मैला
मगर अपना-अपना था
तुमनें मुझे न काटा न चाटा
तुम सिर्फ़ दोस्त ही बने रहे
निर्लिप्त दोस्त
वे बीयर की बोतलों
और गोश्त की हांडी पर
चढ़े हुए दिन थे
उफ़नते और धांस की महक भरे दिन
जो एक ही गिलास में ढलते थे
और एक ही थाली में उतरते थे
हाथ धुलने के साथ ही झगड़े भी
एक ही नाली में बहते थे
ऐसा कुछ है क्या कि
जब अपना कहने को कुछ नहीं होता
तब सब अपने होते है?
चलो इन बचकाने सवालों में भी नहीं उलझते
मेरा सच तो यह है कि
जब अपना आसमान साफ होने लगे
तब दूसरों का मैल काटता है
तुम्हारा सच भी ऐसा ही कुछ होगा
दरअसल तुम और मैं
समानांतर सच में जीने वाले दोस्त हैं
जो सिर्फ अपने आसमान का मैल
धुलने का इंतज़ार करते हैं
और अब जो मैल धुल गए हैं
तो क्या कुछ भी कहने को बाकी है?

13 comments:

सोतड़ू said...

मेरे प्यारी दही (या मही)
मुझे लगता है कि रुपये-शोहरत को तो छोड़ा मां-बाप, भाई-बहन, बीवी-साली चाहे कितने ही प्यारे, कितने ही प्यार करने वाले हों दोस्त की ज़रूरत को पूरा नहीं करते। सबसे ग़रीब वो आदमी होता है जिसका दोस्त नहीं होता। बल्कि कुछ दिन पहले ही मैं कह हा था कि हिटलर, सद्दाम जैसे तानाशाहों के साथ दिक्कत ये रही होगी कि कोई उनका दोस्त नहीं होगा। कोई ऐसा आदमी उनके पास नहीं बचा होगा जो उन्हें बोल सके तू साड़े खुद को महान समझ ले पर है दरअसल चूतिया और ये चूतियापे बंद नहीं करेगा तो जल्द ही मर लेगा। अगर आप तानाशाह नहीं हैं तो भी आपके पास कोई सच बोलने वाला दोस्त नहीं तो आप भी नहीं बचेंगे। मां, बीवी का मामला अलग है उनसे बहस कर आप नहीं जीत सकते। वो या तो रोएंगे या रुलाएंगे, वो या तो रूठ जाएंगे मनवाने के लिए या आपको रुठवाएंगे मनवाने के लिए। तू भला आदमी है मेरे भाई.... अपना ख़्याल रखियो।

भूल-चूक लेणी-देणी

Nitish Raj said...

भई ये तो अच्छी लगी लेकिन कई पहलु अनसुलझे से लगे...दो बार पढ़ने के बावजूद...बहरहाल महेन
कृष्ण जन्मोतस्व पर बधाई

महेन said...

@सोतड़ू
:D जिसका कोई दोस्त नहीं होता वह सबसे ग़रीब आदमी होता है और उससे भी ग़रीब आदमी वह होता है जिसका एक ही दोस्त होता है। इमोश्नल डिपेंडेंसी घातक होती है इसलिये खूब सारे दोस्त बनाओ और खूब दुनियां देखो। वही फ़ालो कर रहा हूँ। दोस्ती की ग़रीबी मुझे नहीं है भाई। इस बीच तरह-तरह के लोग मिले जिसकी वजह से सोच का दायरा भी बढ़ा। और फ़िर तू तो है ही…

महेन said...

@nitish
नितिश भाई, यह कविता पुराने दोस्तों के लिये है इसलिये आपको काफ़ी कुछ समझ नहीं आएगा। संदर्भ जानना ज़रूरी है। आपने फ़िर भी पढ़ी धन्यवाद।
जन्माष्टमी की आपको भी शुभकामनाएं।

अभिषेक ओझा said...

दोस्ती बहुत कुछ सिखाती है भाई ! किस्मत से कई निस्वार्थ हैं... बस क्या कहें! किस्मत ही है.

सोतड़ू said...

सही कहा मेरे दही.... लेकिन क्या ये ज़रूरी नहीं कि जिन्हें आप दोस्त मानते हो, जिन्हें आप दोस्त कहते हो उन्हें आसानी से यूं ही न जाने दिया जाए। हां ये सही है कि तेरा दोस्ती का दायरा बड़ा है, तू सामान्यतः खुले दिल से लोगों का स्वागत करने वाला आदमी है लेकिन कितने लोगों को आप दोस्त कह पाते हो.... तो जो चीज़ मुश्किल से बनती हो उसे आसानी से खोना ठीक नहीं। हालांकि ये सिर्फ़ थ्योरी है कई बार एक वाक्य, एक शब्द सालों के संबंध को तोड़ सकता है जैसे कांच की दीवार में कील ठोकी गई हो.... मैं तेरी समझदारी या निर्णय क्षमता पर सवाल नहीं उठा रहा लेकिन फ़िक्र हो रही है (ऐसा कम ही होता है। अच्छा होता कि सब साथ बैठते वॉटर जग से बर्फ़ लगी बीयर निकालकर पीते हुए....

भूल-चूक लेणी-देणी

महेन said...

तू खुलकर बात कह रहा है, बड़ा अच्छा लग रहा है। शायद पहली बार ऐसा कर रहा है।
तेरी बात सही है मगर कई बार चीज़ें इतनी उलझ जाती हैं कि गांठें खोलना मुश्किल हो जाता है।
अरे भाई मैंने ये कब कहा कि साथ बैठकर जग के नल से draught बीयर स्टाइल में बीयर नहीं पी सकते?
वैसे मैंने काफ़ी वक़्त से सोच रखा है कि अगली बार जब आऊँ तो सब लोगों को इकठ्ठा करुं और मिलकर पार्टी करें। इस बाबत मैंने तुझे कहा भी था। तेरे यहां या श्याम के यहां।

सोतड़ू said...

कहीं भी, जहां लोग आसानी से इकट्ठे हो जाएं.... पर श्याम क्या करेगा, वो तो अभी तक सिर्फ़ कोल्ड ड्रिंक पीता है।

(श्याम भाई) भूल-चूक लेणी देणी

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत ही खूबसूरती से कुछ सच्चाईयों को, पुराने खूबसूरत दिनों को बयान किया हैं यारों की बातचीत में। महेन जी हमारे प्यारे शब्दों में ये दो शब्द बहुत प्यारे हैं दोस्त और दोस्ती । ये अलग बात हैं कि दोस्ती जैसे प्यारे शब्द को प्रयोग कर कुछ दोस्तों ने इस्तेमाल किया हैं दोस्त को। जिससे मेरे लिए इस दोस्ती का अर्थ कुछ धुधला हो गया हैं। पर आज भी ये दोनो शब्द प्यारे हैं मुझे। आपकी कविता में से अपनी पसंद की लाईने छांटने लगा तो कुछ भी छोड़ा नही जा रहा है। बस बस बार पढ़ रहा हूँ।

Gyandutt Pandey said...

मित्र यह पुराने नये का तो पता नहीं पर मित्रता को समय के साथ "उर्वारुक मिव बनधनात" की तरह पके फल की तरह अलग होते देखा है।
समय को कहीं और कुछ तो हस्ताक्षर करने होते हैं!

महेन said...

@सोतड़ू
यार मज़ा तो तभी है जब साकी न पिये… और क्या पता उसे कोल्ड ड्रिंक का नशा होता हो।

Ek ziddi dhun said...

यार भाई, तेरी कविताओं के प्रिंट कुछ समझदार लोगों को भेज रहा हूं। जो राय होगी बताऊंगा

महेन said...

:) :D