Tuesday, 19 August 2008

शब्द

वक़्त की किताब पर
लिखा एक शब्द
घिस-घिसकर मिट जाएगा
भुला दिया जाएगा
रौंद दिया जाएगा
पैरों तले
रेशा-रेशा जिसका
उखड़ जाएगा
एक दिन धुल जाएगा
जिसका अस्तित्व
लेकिन हज़ारों सालों बाद भी
जो प्रतिध्वनित होगी
वह
उस शब्द की गूँज होगी।

8 comments:

बालकिशन said...

बहुत खूब.
बेहतरीन..... उम्दा....
आनंद आ गया.

pallavi trivedi said...

kya baat hai...bahut khoob.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर जी ..

अनुराग said...

बस्ता खंगालो भाई.....

राजीव रंजन प्रसाद said...

लेकिन हज़ारों सालों बाद भी
जो प्रतिध्वनित होगी
वह
उस शब्द की गूँज होगी।

सुन्दर अभिव्यक्ति..


***राजीव रंजन प्रसाद

www.rajeevnhpc.blogspot.com
www.kuhukakona.blogspot.com

दीपा पाठक said...

सत्य वचन महेन जी, शब्द की गूंज को आप कभी दबा नहीं सकते। आपके ब्लॉग पर आज पहली बार आना हुआ अच्छा लगा।

अभिषेक ओझा said...

कविता कहाँ पुरानी होती है... उनके लिखने की तिथि भले पुरानी हो सकती है...

Gyandutt Pandey said...

कोई आश्चर्य नहीं; नाद और शब्द को वैदिक ॠषि शाश्वत मानते रहे हैं।
और मैं भी करता हूं विश्वास।