Friday, 15 August 2008

ब्लोगर्स की जमात के बीच मेरी ग़ैर-मौजूदगी और याचनात्मक प्रोमोश्नल मेल

तकरीबन नौ दिन हुए वापस आए और जितनी मुझे उम्मीद थी, मेरी मसरूफ़ियत उससे भी कई गुना बढ़ गई है। पिछले सप्ताहांत के लिये किये जाने वाले कामों की एक लिस्ट बनाई थी जो बीस की संख्या पार कर गई। पूरा सप्ताहांत उसमें निकल गया, फ़िर भी कुछ काम रह गए। सो, कल के लिये भी काम बचे हुए हैं।
देवी जी को लेकर डाक्टर के पास जाना भी इस दौरान लगा रहा। प्रसव के आखिरी दिनों में डाक्टर हफ़्ते से पहले देवी जी के दर्शन करना चाहती है और नर्सिंग होम घर से काफ़ी दूर है, इसलिये उसी में आधा दिन चला जाता है। फ़िर भारत पहुंचने के बाद आफ़िस के काम और भी बढ़ गए हैं और मेरे काउंटरपार्टस मुझसे उन सारे कामों की आशा भी कर रहे हैं जोकि मेरे नहीं हैं और उन सारे कामों की भी जो मैं इंग्लैंड में होने की वजह से पहले नहीं कर सकता था। इसके अलावा वे लोग जितना ज़्यादा हो सके काम निकलवा लेना चाहते हैं क्योंकि बच्चे के आते ही मैं तकरीबन पन्द्रह दिनों की छुट्टी पर चला जाऊँगा। इस दौरान मैं गधे की तरह काम कर रहा हूँ और चक्की के न जाने कितने पाटों के बीच पिस भी रहा हूँ।
इस सबके बीच ब्लोगिंग करने का वक़्त ही नहीं निकल पा रहा, जिसकी गर्मी मुझतक पहुँच रही है। मैनें दो बातें इस दौरान नोटिस कीं।
पहली यह कि ब्लोगजगत और सिनेमाजगत में खास अंतर नहीं है। जबतक आप अपनी मौजूदगी दर्ज करवा सकते हैं तबतक लोग आपको याद रखेंगे, वरना धीरे-धीरे भूलने लगेंगे। (ज्ञान जी और संजीत जी जैसे लोग अपवाद हैं) बीच-बीच में कुछ हलके-फ़ुलके पोस्ट मैं गानों-ग़ज़लों की शक्ल में अपने दूसरे ब्लोग पर डालता रहा। इसमें कोई खास झंझट नहीं है। सिर्फ़ दस-पन्द्रह मिनट लगते हैं। इसलिये सोचा जबतक इस ब्लोग पर कुछ ना डाल सकूं तबतक दूसरे और तीसरे ब्लोग को ही कम से कम सक्रिय रखूँ। मगर मैं शायद इसी ब्लोग की वजह से पहचाना जाता हूँ इसलिये जितने भी लोग मेरे इस ब्लोग को देखते हैं उन्हें लगा होगा मैं ग़ायब हो गया हूँ। हालांकि काफ़ी अंतराल के बाद दो-एक पुरानी लिखी कविताएँ पोस्ट कर दीं, जिनपर मेरा traffic feed बताता है कि ज़्यादा लोग पढ़ने के लिये नहीं आए।
इसकी कई वजहें हो सकती हैं। शायद लोगों को मेरा लिखा पसंद नहीं आया या अंतराल ने मुझे उनके मानस से साफ कर दिया। मगर मुझे लगता है कि मेरे पोस्ट डालने के समय में अंतर की वजह से लोगों को मेरे पोस्ट के बारे में पता ही नहीं लगा क्योंकि इंग़्लैंड में मैं भारत के सुबह के तकरीबन चार-पांच बजे समय पोस्ट किया करता था और यहां पोस्ट डालने का वक़्त शाम के आठ से दस के बीच हो गया है।
खैर, इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात जो मैं उपस्थिति की कर रहा था, वह हमेशा प्रमुख कारक रहता है। जैसाकि मैनें कहा कि मेरे पास ब्लोग्स पढ़ने का समय नहीं था तो टिप्पणी करने का कहाँ से होता? सिर्फ़ दो-चार ब्लोग्स पर टिप्पणी करके या सिर्फ़ पढ़कर हट जाया करता था। इसका सीधा प्रभाव मुझे अपनी पाठक संख्या पर दिखाई दिया। मैं टिप्पणी नहीं कर रहा तो लोग काहे मेरे ब्लोग पर टिप्पणी करेंगे?
यहां लौटने के बाद जो काम मैं अपने बचे-खुचे समय में करता रहा वह था पढ़ने का। इसी दौरान अचानक ब्रेख़्त की कविताओं का एक पुलिंदा, जो मैनें सालों पहले प्रिंट-आउट लेकर रख लिया था हाथ लगा। मुझे लगा और कुछ नहीं तो चलो कुछ एक कविताओं का अनुवाद ही कर लिया जाए। इसी समय विजय गौड़ जी ने मुझे धर दबोचा और वो अनुवाद अपने यहाँ पोस्ट कर दिये। फ़िर लगा कि चलो अब गंभीरता से अगर अनुवाद करना है तो पहले कुछ पढ़ लिया जाए। फलस्वरूप आज तकरीबन पांच किताबें खरीद लाया।
पाठक न मिलने के रोने के बीच मैनें जिस दूसरी बात का नोटिस लिया वह यह कि एक ओर मेरे जैसे लोग हैं जो शांति से इस ग़म में घुट रहे हैं कि कोई पढ़ नहीं रहा और दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो तमाम ब्लोगर्स की मेल आई-डी उठा-उठाकर उन्हें मेल भेज रहे हैं कि आओ मेरा ब्लोग पढ़ो; मैं गुरु-गंभीर विषय पर बहुत ही सार्थक चिंतन कर रहा हूँ और अगर आपने यह नहीं पढ़ा तो क्या जिये आप सरीखा। इस दौरान दिन में बीसियों ऐसे मेल या तो मैं उड़ाता रहा या तंग आकर लोगों को प्रेम-पूर्वक या गुस्से में लिखता रहा ऐसे मेल न करने के लिये।
मेरे तईं यह बेहयाई है कि लोग बग़ैर जाने-पहचाने किसी को भी मेल भेज देते हैं और अक्सर मेरी प्रतिक्रिया नरम नहीं होती। मुझे दिन में लगभग दस प्रोमोशनल काल्स मेरे मोबाईल पर आती हैं जिनसे मैं खासा परेशान हूँ और अब इसी तरह ही याचनात्मक मेल कि आईये मेरा ब्लोग पढ़ लीजिये। इस तरह की मेल मुझे चौराहों पर खड़े उन भिखारियों की याद दिलाती है जो नकली दयनीयता पैदा करके लाखों का धंधा हर साल कर जाते हैं। हालांकि ब्लोगर्स के मामले में मुझे यह दयनीयता नकली नहीं लगती। वे ब्लोगर-जीव सच ही दयनीय हैं जो अनजाने लोगों को अपना ब्लोग पढ़वाने के लिये मेल भेजते हैं।
मेरा विचार और माथा दोनों गरम है। आपका कया हाल है?

14 comments:

अनुराग said...

शुक्र है आप तो गरम हो जाते है ,हम स्पेम करकर के थक गये है ,g मेल वालो के लिए किसी सज्जन ने आज पोस्ट डाली है की कैसे इन लोगो के मेल बीच में ही रोक दिए जाये ...कुछ ब्लोगर्स ऐसे है जिनका लिखा पढने की हमेशा इच्छा होती है ,प्रत्यक्षा ,आप ...एक दो गुमनाम से लोग है......पर ये बात आपने ठीक कही की आप गायब हुए ओर लोग आप को भूल गये ये यहाँ पर है...पर धीरे धीरे आप के पास एक फिल्टर आ जाता है की कौन सा सही मायनो में पढ़कर टिपण्णी देनी है....वैसी भी आप टिपण्णी पढ़कर अंदाजा लगा लेते है की किस ने सही मायने में लेख पढ़कर लिखा है किस ने सरसरी तौर पर खाली फर्ज निभाया है ...हफ्ते में एक बार भी अच्छा लिखेगे बहुत होगा....ब्लॉग का हंग ओवर भी आने में देर नही लगती

Gyandutt Pandey said...

टेक केयर ऑफ योर देवीजी डियर। वह ज्यादा जरूरी है।
बाकी ब्लॉगरी तो लम्बी ईनिंग का मामला है। कभी कभी इससे ऊब भी वाजिब है।

Udan Tashtari said...

घर में नया मेहमान आये तो स्वागत की तैयारी ठंडा दिमाग रख कर करना चाहिये. :) आपको कोई कैसे भूल सकता है? हम तो विजय भाई की पोस्ट पर भी आपको मिल आये थे.

स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

अनूप शुक्ल said...

वे ब्लोगर-जीव सच ही दयनीय हैं जो अनजाने लोगों को अपना ब्लोग पढ़वाने के लिये मेल भेजते हैं। वाह। लेकिन इत्ता गुस्सा मत करो जी। लोग कद्रदान समझ के मेल करते होंगे।

घर परिवार का ख्याल रखो। ब्रेख्त की कविता का अनुवाद अच्छा था। और करें। पोस्ट करें।

दिनेशराय द्विवेदी said...

महेन जी, ज्ञान जी की सलाह उचित है। यह वक्त है काम के वक्त में से आने वाले और उसे लाने वाली की फिक्र की जाए। फिक्र ही नहीं प्यार भरा स्पर्श भी चाहिए। आप वो करें। ब्लागरी तो चलती रहेगी। आप भी यहीं हैं और हम भी।

आजाद है भारत,
आजादी के पर्व की शुभकामनाएँ।
पर आजाद नहीं
जन भारत के,
फिर से छेड़ें, संग्राम एक
जन-जन की आजादी लाएँ।

सुशील कुमार छौक्कर said...

महेन जी, हमें तो आपकी पोस्ट का इंतजार रहता हैं। आपके शब्दों का जादू तो हमारे पर चला हुआ हैं। और जी रही अनचाही मेल के आने की उससे तो हम भी परेशान हैं। उसका तो कुछ हल निकलना ही चाहिए। और हाँ हमें इंतजार हैं नन्हें मेहमान का।

संगीता पुरी said...

अनचाही मेल के आने का तो कुछ हल निकलना ही चाहिए। हम भी परेशान हैं। खुशखबरी सुनने का इंतजार रहेगा।

Nitish Raj said...

महेन ये तो मैंन भी गौर किया है कि चार दिन आप आए नहीं तो लोग ऑफिस में अफवाह उड़ाने लग जाते हैं कि नौकरी तो नहीं बदल रहा। वो ही हाल यहां का भी है। लेकिन अब मेरी आदत में ये आगया है कि इतने कम समय में कि मैं कुछ को ही तलाशता हूं पढ़ने के लिए। क्योंकि वो सिर्फ दो लाइन लिख कर और एक तस्वीर चेप कर पोस्ट नहीं डालते। तो अब मेरी तलाश जारी रहती है कि कोई नया उस लिस्ट में जु़ड़ जाए। आज आप जुड़ गए कल कोई और जुड़ जाएगा। रही दूसरी बात अनुराग ने सही कहा कि यूज स्पेम।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

महेन जी को गुस्सा क्यूँ आता है :)??? आप इस वक्त सिर्फ़ और सिर्फ़ घर और आने वाले मेहमान का सोचिये ..यह सब तो चलता रहता है ..और जो आपको नियमित पढने वाले हैं वह आपका साथ कभी नही छोडेंगे .... :)जल्दी से अच्छी खबर सुनाईएगा

सोतड़ू said...

भाई ये टिप्पणी मैं तेरे लिए कर रहा हूं, ब्लॉग के लिए नहीं। हालांकि यकीनन ये तेरा ब्लॉग (या जैसा कि तू लिखता है ब्लोग) पढ़कर ही कर रहा हूं। मैंने कल तेरी कविताएं पढ़ी थीं और आज नहाते वक्त मैंने ये टिप्पणी सोची। हालांकि कल ही मैंने उसे- तुम जानते हो किसे (वही जिसका नाम नहीं लिया जा सकता)फ़ोन किया था और कहा था कि तेरी कविताएं आश्चर्यजनक रूप से (मेरे लिए) बहुत बेहतर हैं। तो आज नहाते वक्त मैंने ये सोचा कि तू युद्धकाल में पैदा हुए प्रेम के कवि जैसा है जिसे दूसरे युद्धरत या युद्धप्रेमी लोग चूतिया साबित करने पर या कम से कम कहने-मानने पर तुले रहते हैं (कम से कम दो योद्धाओं को तो मैं जानता ही हूं)। तो मेरे जैसे लोग यो योद्धा न भी हों पर आक्रामक लड़ाके हों हीं उनकी हरकत पर सवाल भी नहीं उठाते। पर हां ब्लॉगिंग का शुक्रिया- मुझे तेरे बारे में सच जानने को मिला। ठीक वैसे ही जैसे कि विशाल भारद्वाज की वजह से पता चला कि अबे दीपक तो सचमुच अच्छी एक्टिंग कर लेता है....

भूल-चूक लेणी-देणी

कैसरदेव said...

मुझे समझ में नहीं आता कि आप लोग लिखते क्यों हो !!
आपकी पोस्ट कोई कॉपी कर लेगा तो क्या करोगे, कभी सोचा है इस बारे में !!!!!

( मैं लिखने से नहीं मना कर रहा बल्कि चाहता हूँ कि आप इस बारे में सोचें कि कैसे लड़ें चिट्ठा चोरी से. )

Sanjeet Tripathi said...

लो भई, अपनेराम(जो कि असल में आलसीराम हैं) भी पधाए लिए इधर कू।
बावा अईसा है कि टेंशन लेने का नई सिरफ़ देने का ना।

देखो, पैले तो भौजी को हमरा नमस्ते बोलने का अऊर उनका ज्यादा ध्यान रखने का। पंगा नई लेने का हां।

ह्म्म, रही बात बंधुओं की जो हर पोस्ट की सूचना ई-मेल पर भेजते हैं। यार दिक्कत ये है कि मना करने के बाद भी भेजना बंद नई करते कई बंधु तो।
कोई खास पोस्ट हो तो समझ में भी आता है कि चलो ई मेल पर सूचना दे दी लेकिन यहां तो हर पोस्ट की सूचना।
खैर!
और हां लिखने में कमी हुई तो खैर नई मामू, देख लेना हां।
अपन ने जिन-जिन को लत लगवाई है ब्लॉगिंग की, उनके लिए स्प्ष्टतया संदेश है कि लिखना कम नई होने का, भले हम खुद आजकल कम लिखें ;)

अभिषेक ओझा said...

इतना गुस्सा करके भी क्या करना है पर क्या कर सकते हैं एक मेल वाली लिस्ट में मैं भी था. मुझे भी आती थी... आपकी मेल भी देखी.

और अनुपस्थिति का क्या कहें अपना भी यही हाल है... बहुत दिनों से न लिख पा रहा हूँ न पढ़ ही पा रहा हूँ. पर जरूरी काम है उस पर ध्यान दीजिये... ब्लॉग्गिंग तो होते ही रहेगी!

PD said...

बस ये बताने के लिए कमेन्ट कर रहा हूँ कि अच्छी फिल्म देखने के शौक़ीन कुछ लोग हिट-फ्लॉप कि फिक्र किये बिना इतिहास से फ़िल्म निकालते रहते हैं वैसे ही अच्छे ब्लॉग ढूँढने वाले भी चंद लोग हैं इस जहाँ में.. :)